Why Media is So Negative in India?

Written by गुरुवार, 26 अप्रैल 2007 13:41
मीडिया सकारात्मक कब बनेगा ? 


गत वर्ष एक समाचार पढा था कि हमारे राष्ट्रपति डॉ.अब्दुल कलाम ने हर वर्ष आयोजित होने वाली इफ़्तार पार्टी को रद्द कर दिया है, एवं उस पार्टी के खर्च को एक अनाथालय को दान करने की घोषणा की है, लगभग उन्हीं दिनों में रामविलास पासवान द्वारा आयोजित इफ़्तार पार्टी में उन्हें लालू प्रसाद यादव को जलेबी खिलाते हुए एवं दाँत निपोरते हुए चित्र समाचार पत्रों मे नजर आये थे ।

उक्त दोनों समाचारों पर मीडिया की भूमिका ने जरूर कई सवाल खडे किये । भारतपुत्र अब्दुल कलाम के सकारात्मक और उत्कृष्ट कदम को लगभग सभी अखबारों में नगण्य सा स्थान मिला (समाचार पत्र के कोने में या पिछले पृष्ट पर), जबकि ऐसे लोग जिनका "इफ़्तार" और "रोजे" से कोई लेना-देना नहीं है, उनके समाचार एवं चित्र इलेक्ट्रानिक एवं प्रिण्ट मीडिया की सुर्खियाँ बने रहे । ऐसा क्यों ?

इन घटनाक्रमों की रिपोर्टिंग की नकारात्मक भूमिका को लेकर बुद्धिजीवियों एवं सामाजिक संगठनों को सवाल उठाने चाहिये । एक अच्छे और महान कार्य अथवा पहल को उतना "कवरेज" क्यों नहीं मिलता, जबकि गुण्डे-बदमाशों एवं घटिया नेताओं को लगभग पूरे पेज का कवरेज मिलता है । जरा कल्पना करें कि राष्ट्रपति के इस कदम को यदि समाचार पत्रों में "हेडलाईन" के रूप में छापा जाता, तो उस समाचार का कितना और कैसा "असर" होता, न सिर्फ़ मुस्लिमों में, बल्कि पूरे देश में । राष्ट्रपति के इस क्रांतिकारी कदम को व्यापक प्रचार मिलना चाहिये था, जो कि नहीं मिला, उलटे इस बात पर खामख्वाह की चर्चा की गई और समय बर्बाद किया गया कि, इस नेता की इफ़्तार पार्टी में कौन-कौन आया, कौन नहीं आया, उस नेता की इफ़्तार पार्टी में किसे नहीं बुलाया गया था, किसने क्या खाया, किसने-किससे कितनी देर तक बात की आदि-आदि बकवास । जबकि दूसरी ओर सच तो यही है कि आज भी औसत रूप से मुस्लिम समाज बेहद गरीब और अशिक्षित है, क्या उसे वाकई कोई फ़र्क पडता है कि किस नेता ने इफ़्तार पार्टी दी या नहीं दी ? रोजा रखना और इफ़्तार करना एक धार्मिक क्रिया है, उस माहौल में यदि अब्दुल कलाम के सकारात्मक कदम को मुख्य पृष्ठ पर जगह मिलती तो उसका भरपूर असर होता । यह तो मात्र एक उदाहरण है, आज तो हमें मीडिया परिदृश्य में इस प्रकार की प्रवृत्ति सहज ही देखने को मिल जाती है ।

किसी भी नकारात्मक समाचार को बढा-चढा कर पेश करना, फ़िर उस समाचार को लगातार "फ़ॉलोअप" करना (तभी तक कि जब तक कोई नया "चटपटा" समाचार ना मिल जाये), फ़िर उसे भूल जाना और किसी नई तथाकथित "एक्सक्लूसिव" की तलाश में लग जाना, यह आजकल के पत्रकारों (?) का शगल बन गया है । क्या हम तेजी से ब्रिटेन की "टेब्लॉयड" संस्कृति की ओर बढ रहे हैं, जहाँ प्रसिद्ध लोगों (?) (अच्छे और आदर्श लोगों नहीं) के व्यक्तिगत सम्बन्धों, शादी, तलाक, बलात्कार आदि के बारे में छ्पाई होती रहती है । "शिवानी हत्याकांड", "मधुमिता हत्याकांड", "जेसिका लाल हत्याकांड" और सबसे बढ कर ऐश-अभिषेक की शादी का जैसा और जितना कवरेज हुआ उतना तो भारत के प्रथम अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा को भी नहीं मिला । परन्तु क्या इन समाचारों के सामाजिक प्रभाव के बारे में भी मीडिया को नहीं सोचना चाहिये ? इन समाचारों को लगातार देखने-सुनने-पढने से हमारी युवा पीढी और बच्चों पर क्या असर हो रहा है, इसकी जिम्मेदारी किसकी है ? जबकि मीडिया यदि अपनी "असली शक्ति" का उपयोग करे तो वह क्या नहीं कर सकता । यहाँ पर उल्लेखनीय है कि शीतयुद्ध के जमाने में रूस और अमेरिका के अखबार अपने-अपने देशों को आगे बताने के लिये प्रचार-दुष्प्रचार का सहारा लिया करते थे, दोनो ही देशों के समाचार पत्रों एवं मीडिया में देशभक्ति की होड लगी रहती थी, उद्देश्य था देशवासियों का मनोबल बढाना एवं बनाये रखना ।

एक घटना का उल्लेख करना आवश्यक है - किसी तीसरे देश में हुई एक दौड प्रतियोगिता में अमरीकी धावक पहले स्थान पर एवं रूसी धावक मात्र कुछ सेकण्डों से दूसरे स्थान पर रहा । अब एक ही समाचार को किस तरह छापा गया - अमरीकी अखबार ने लिखा "हमारे महान धावक ने रूसियों के गर्व को चूर-चूर करते हुए भारी अन्तर से दौड जीती", वही रूसी अखबार ने लिखा - "रूस की महान खेल परम्परा को आगे बढाते हुए हमारे धावक ने जोरदार प्रदर्शन करते हुए प्रतियोगिता में दूसरा स्थान प्राप्त किया" (इस समाचार में प्रथम आये अमरीकी का कोई उल्लेख नही था) । तात्पर्य यह कि मीडिया की सुर्खियाँ हमेशा सकारात्मक समाचारों से परिपूर्ण होना चाहिये, न कि भ्रष्टाचार, अनैतिकता, हिंसा, दंगो से । जरा पाठकगण याद करें कि उन्होंने कितनी बार अण्णा हजारे, अब्दुल कलाम (राष्ट्रपति बनने से पहले), डॉ. पद्मनाभन, बचेन्द्री पाल, धनराज पिल्लै, राजेन्द्र सिंह (पानी वाले बाबा के नाम से मशहूर), नारायण मूर्ति, किरण बेदी आदि जैसी हस्तियों को कितनी बार मुखपृष्ठ पर बडे-बडे अक्षरों के साथ देखा है ? नहीं देखा, क्योंकि अच्छे-अच्छे कारनामों को हमारा मीडिया (प्रिंट और इलेक्ट्रानिक दोनो) अन्दर के पृष्ठों पर जगह देता है, वह भी कंजूसी से । जबकि घोटालों, स्कैण्डलों, बम विस्फ़ोटों, दंगों, दो कौडी के सलेम टाईप के गुण्डों को हमेशा मुखपृष्ठ पर जगह मिलती है । हाल ही मेरे एक मित्र ने जो कि इसराइल से लौटकर आया, वहाँ के समाचार पत्रों के बारे में बताया कि वहाँ लगभग सभी अखबार या चैनल कोई ना कोई सकारात्मक समाचार छापते-दिखाते रहते हैं, जिससे जनता में एक धनात्मक सन्देश जाता है । इसराईल में बस में हुए एक विस्फ़ोट के समय यह समाचार दूसरे पृष्ठ पर था, जबकि उसी दिन एक किसान ने अपने खेत में नई तकनीक का इस्तेमाल कर सिंचाई की नई पद्धति विकसित की, यह समाचार मुख्यपृष्ठ पर था, तस्वीर सहित । जबकि बम विस्फ़ोट की दूसरे पृष्ठ पर भी कोई तस्वीर नहीं छापी गई । ठीक यही अमेरिका में ग्यारह सितम्बर के हमले के बाद हुआ, लाशों की, बिलखते लोगों, रोती महिलाओं की या अस्पतालों में घायलों की तस्वीरें वहाँ मीडिया ने स्वेच्छा से नहीं दिखाई, जबकि आग बुझाने वाले और घायलों का बचाव करने वाले दमकलकर्मियों और युवाओं को जब पुरस्कार बाँटे गये, तो सभी समाचार पत्रों ने उसे मुख्यपृष्ठ पर स्थान दिया, यही तो है सकारात्मक पत्रकारिता । इससे आम जनता, जो अपनी परेशानियों में पहले से ही त्रस्त है, का मनोबल बढता है, अच्छे और ऊर्जावान लोगों के समाचार पढने से मन में भी उसी प्रकार के विचार उत्पन्न होते हैं ।

भारत से तुलना करें तो हमारा मीडिया, मुशर्रफ़ की "बॉडी लैंग्वेज" पढने में ही उलझा रहता है, और वे सबको गरिया कर चले गये.... ऐश-अभिषेक की शादी में कुत्ते की तरह गेट के बाहर खडे रहे, डंडे खाये फ़िर भी शर्म नहीं आई... मीडिया का एक ही काम रह गया है, पहले विवाद पैदा करना, फ़िर उसे खूब सेंकना / चबाना, आपस में भिडाना, फ़िर नया शिगूफ़ा छोडकर नई खबर में लग जाना, पुराने घोटाले का क्या हुआ इस बारे में सोचना उसका काम नहीं (तेलगी, निठारी... आदि) । असली दिक्कत यह है कि कुछ बडे समाचार घराने अपने-आप को "किंगमेकर" समझने लगे हैं, और साबुन बेचना और अखबार चलाने को एक जैसा ही काम मानते हैं । सभी प्रतिष्ठित समाचार पत्रों, चैनलों, पत्रकरों, "मीडिया-मुगलों" को इस दिशा में विचार करना चाहिये, कि क्या देश में किसी नई प्रेस आचार संहिता की आवश्यकता है ? या बाजारवाद की अंधी दौड में मीडिया भी शामिल रहेगा, जिसका मुख्य काम है जनजागरण और समाज को नई दिशा देना, न कि समाचार "बेचना" (!) । ऊपर जिन हस्तियों के नाम लिखे हैं उनमें से कई के नाम तो आज के युवाओं ने सुना भी नहीं होगा, उनके काम के बारे में जानना तो बहुत बडी बात है, लेकिन उसी युवा को यह जरूर पता होगा कि शाहरुख खान का पीठ दर्द अब कैसा है, या सलमान खान कब और किससे शादी करेगा, या नहीं भी करेगा । अब यदि हमारे बच्चे छोटा राजन, अबू सलेम और वीरप्पन को ज्यादा जानते-पहचानते है बजाय वर्गीज कुरियन के तो इसमें किसका दोष है ?

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