मणिपुर में नाज़िमा बीबी को इस्लामी कट्टरपंथियों की धमकियाँ...

उत्तर-पूर्व के सभी प्रदेशों की तरह मणिपुर को भी हमेशा से एक प्रगतिशील राज्य माना जाता रहा है. पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में समाज नारी-प्रधान रहा है. लगभग सभी राज्यों की विभिन्न जनजातियों में महिलाओं को समान अधिकार प्राप्त हैं. मणिपुर में चुनाव होने जा रहे हैं, जिसमें सोलह वर्षों तक अनशन करने वाली इरोम शर्मिला भी अपनी राजनैतिक पार्टी बनाकर चुनाव लड़ रही हैं. इरोम शर्मिला की साथी हैं नाज़िमा बीबी, और वे भी इस चुनाव में खड़ी हुई हैं. लेकिन नाज़िमा बीबी का चुनाव में खड़ा होना इस्लामी कट्टरपंथी ताकतों को रास नहीं आ रहा और उन्होंने नाज़िमा बीबी के खिलाफ फ़तवा जारी कर दिया है. नाज़िमा बीबी मणिपुर की पहली मुस्लिम महिला उम्मीदवार हैं, और उन्हें मुस्लिम महिलाओं का जबरदस्त समर्थन भी मिल रहा है, परन्तु मुल्ला और पुरुष-प्रधान इस्लाम नाज़िमा बीबी को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है.

नाज़िमा बीबी के अनुसार यदि वे चुनाव जीतती हैं और उनकी पार्टी की सरकार बनती है तो उनके पास केंद्र के सामने AFSPA क़ानून रद्द करने तथा राज्य में मुस्लिम महिलाओं के रोजगार तथा घरेलू हिंसा के खिलाफ कुछ योजनाएँ हैं. मैं और इरोम शर्मिला दोनों ही चाहते हैं कि मणिपुर विकास करे और यहाँ महिलाओं की स्थिति में और सुधार आए. उन्हीं के क्षेत्र की एक मस्जिद के मौलवी ने नाज़िमा बीबी के खिलाफ फ़तवा जारी किया है कि मरने के बाद उन्हें किसी इस्लामी कब्रिस्तान में जगह नहीं दी जाएगी तथा जहां तक संभव हो मुस्लिम समाज नाज़िमा बीबी का सामाजिक बहिष्कार करे. इस पर नाज़िमा बीबी ने कहा है कि उन्हें परवाह नहीं है कि मौलवी क्या कहते हैं, उनका समाजसेवा का काम उनके जीवन पर्यंत चलेगा और मरने के बाद किसे परवाह है कि मुझे कहाँ कब्र मिलती है या नहीं. मैं इरोम शर्मिला से अत्यधिक प्रभावित हूँ और उन्हीं की तरह लगातार अहिंसक तरीके से समाजसेवा और महिला जागरण का कार्य करती रहूँगी.

जैसा कि सभी जानते हैं, दिल्ली में स्थित कथित रूप से प्रगतिशील “गिरोह” सदैव इरोम शर्मिला के साथ खड़ा रहा है. अरुंधती रॉय जैसे कई विदेशी फंड पोषित फाईव स्टार कार्यकर्ताओं ने भारतीय सेना के खिलाफ बयानबाजी और दुष्प्रचार करने के लिए इरोम शर्मिला के कंधे का सहारा लिया है. लेकिन जब आज उन्हीं की पार्टी की एक प्रमुख मुस्लिम महिला के खिलाफ इस्लामी कट्टरपंथी फतवेबाजी कर रहे हैं, तब ऐसे में इस गिरोह की “प्रगतिशीलता” कहाँ चली गई?? नारी अधिकारों तथा महिला समानता के झंडे उठाने वाले दिल्ली के दलाल मणिपुर जाकर नाज़िमा बीबी के समर्थन में ठोस स्वरूप में क्यों खड़े नहीं होते?? वेटिकन और सऊदी फंड से चलने वाले बुद्धिजीवी गिरोहों के सिद्धांत और इनकी समाजसेवा अथवा महिलाओं की स्थिति के बारे में इनके सेमीनार कितने झूठे और खोखले होते हैं यह इसी घटना से समझ में आ जाता है. नाज़िमा बीबी के समर्थन और इस्लामी फतवे के खिलाफ दिल्ली में ही किसी भी असली-नकली NGO ने कोई मोर्चा तक नहीं निकाला, तो ये मणिपुर जाकर क्या लड़ेंगे?

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