बैंकों का विलय खटाई में...

केन्द्र सरकार द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को मजबूत करने के लिए उनकी संख्या 27 से घटाकर छः तक लाने की योजना है. बैंकों का आपस में विलय करवाया जाएगा, ताकि छोटे-छोटे बैंक मिलकर बड़ा बैंक बन सके. परन्तु फिलहाल विमुद्रीकरण ने इस योजना को लंबित कर दिया है.

अब विलय की बजाय, सरकार का ध्यान बैंकों के वित्तीय समावेशन में बदलाव करने का होगा. सूत्रों ने बताया कि समेकन और विलय की प्रक्रिया अगले लोकसभा चुनाव 2019 तक होने की उम्मीद नहीं है। सूत्रों के मुताबिक, विमुद्रीकरण के पश्चात सरकार ने संभवतः बैंकिंग प्रणाली को बाधित कर सकने की संभावना से घबराकर यह कदम पीछे खींच लिया है. बैंक यूनियनों ने भी सरकार पर हमले तेज कर दिए थे और हड़ताल पर जाने की धमकी दी थी।  बैंक बोर्ड ब्यूरो (BBB), तथा पूर्व नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक विनोद राय ने मिलकर देश में बैंकों की संख्या कम रखने की यह योजना बनाई थी.

इससे पहले वित्त मंत्रालय ने कहा था कि यह कदम न सिर्फ बैंकों को मजबूत करेगा, अपितु खराब ऋणों से मुक्त होने की दिशा में भी सफलता मिलेगी. परन्तु अब चुनावों तथा यूनियनों के दबाव में सरकार इस योजना से पीछे हटती दिखाई दे रही है. आठ नवंबर के विमुद्रीकरण ने सारी योजना और रोडमैप को गड़बड़ा दिया है.हालाँकि SBI ने स्पष्ट किया है कि वह अपनी सभी आनुषंगिक बैंकों तथा भारतीय महिला बैंक का विलय 2019 से पहले कर लेगा. 

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