सुप्रीम कोर्ट ने आतंकियों के वकीलों को दिया जोरदार झटका

सोमवार को एक जमानत मामले की सुनवाई करते भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसी टिप्पणी की है, जो आने वाले समय में बेहद महत्त्वपूर्ण सिद्ध होगी. लाजपत नगर बम धमाके के आरोपियों में से एक आतंकी ने उसकी पुत्री के निकाह हेतु पैरोल अथवा अंतरिम जमानत की माँग की थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे स्पष्ट शब्दों में ठुकरा दिया और कह दिया कि जो लोग अंधाधुंध किसी भी हत्याकांड` और देशद्रोही गतिविधियों में शामिल होते हैं उन्हें न्यायालयों से इस प्रकार की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए.

मोहम्मद नौशाद नामक आतंकी, जो कि 1996 के लाजपत नगर बम धमाकों (जिसमें 13 लोग मारे गए, और 38 घायल हुए थे) का आरोपी है, उस ने एक माह के पैरोल याचिका लगाई थी. तर्क यह दिया गया था कि उसे अपनी बेटी के निकाह में शामिल होना है. तीन न्यायाधीशों की बेंच ने एकमत से यह निर्णय दिया कि “...जो आतंकी होते हैं, उनके परिवार नहीं होते...”, ऐसे में निकाह के लिए पैरोल माँगना तर्कसंगत नहीं है. नौशाद के वकील सिद्धार्थ दवे ने कहा कि आरोपी पहले ही बीस वर्ष जेल में बिता चुका है और वह न्यायालय से दया की उम्मीद रखता है. सरकार के वकील ने जमानत अथवा पैरोल का विरोध करते हुए कहा कि, सीबीआई ने इस आतंकी के आजीवन कारावास को फाँसी में बदलने की अपील लगा रखी है, ऐसे में इसे बाहर छोड़ना उचित नहीं है. चीफ जस्टिस खेहर ने कहा कि बम धमाके करने वाला यह नहीं कह सकता कि मेरा भी परिवार है, मेरे भी बच्चे हैं... क्योंकि बम धमाके करते समय उसने कभी भी सामने वाले परिवारों का विचार नहीं किया था. इसलिए किसी भी आतंकी को परिवार या अपराध, दोनों में से एक को चुनना ही होगा... जब आप किसी देशद्रोही गतिविधि में शामिल होते हैं तो आपका कोई परिवार नहीं रह जाता...”

उल्लेखनीय है कि साध्वी प्रज्ञा को भी न्यायालय ने एक पारिवारिक विवाह में नहीं जाने दिया था. इसी प्रकार अब न्यायालय ने भविष्य के ऐसे सभी मामलों में एक गाईडलाईन तय कर दी है कि जो भी आतंकी और देशद्रोही गतिविधि में शामिल है, अपराध सिद्ध हो चुका है उसका उसके परिवार से कोई सम्बन्ध नहीं माना जाएगा और उन्हें पेरोल अथवा अंतरिम जमानत नहीं मिलेगी... आतंकियों से कठोरता से निपटने में यह फैसला एक मील का पत्थर सिद्ध होगा.

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