किराए अथवा ठेके पर खेती को कानूनी स्वरूप??

देश के कृषि क्षेत्र में एक बड़ा सुधार होने की उम्मीद है, केंद्र द्वारा “ठेके पर खेती” को कानूनी बनानी की तैयारी चल रही है. ऐसा अनुमान है कि इससे न सिर्फ कृषि क्षेत्र में रोजगार बढ़ेगा, बल्कि भूमिहीनों को बैंकों से ऋण वगैरह भी दिया जा सकेगा.

उल्लेखनीय है कि भारत की आधी से अधिक कामगार जनता किसी न किसी स्वरूप में कृषि से जुडी है. कृषि क्षेत्र भारत की कुल आय का सातवाँ हिस्सा उत्पादन करता है, हालाँकि इस क्षेत्र में आय घटती जा रही है, लेकिन रोजगार प्रतिशत नहीं घट रहे. प्रधानमंत्री ने पांच वर्ष में किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य रखा है, वह तभी संभव है जब कृषि क्षेत्र में कुछ क्रांतिकारी कदम उठाए जाएँ.

कृषि क्षेत्र सब्सिडी के बोझ से दबा हुआ है, मुफ्त बिजली का दुरुपयोग बड़े किसान कर लेते हैं... आयकर में छूट का फायदा भी बड़े किसान ही उठा ले जाते हैं. ऐसे में अधिक जमीन के मालिक जो कि मजदूरों से कृषि करवाते हैं, उन्हें तो फायदा ही फायदा होता है लेकिन उस मजदूर की हालत बेहद खराब बनी रहती है. किसानो की आत्महत्या दर महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंधप्रदेश में सर्वाधिक है. इन कृषि मजदूरों अथवा छोटी जोत के छोटे किसानों की तरफ केंद्र सरकार का ध्यान काफी समय से है. एक सर्वे के अनुसार कृषि क्षेत्र में 48% किसान परिवारों को कहीं से कोई ऋण नहीं मिलता, न साहूकार से और ना ही बैंक से. जबकि 52% बड़े और धनी किसानों को बैंकों से, सहकारी समितियों से और मित्रों से भी ऋण मिल जाता है. आंधप्रदेश विधानसभा ने 2011 में एक क़ानून बनाया है जिसके अनुसार किराए पर अथवा ठेके पर खेती करने वाले भूमिहीन मजदूर/कामगार को भी बैंक से ऋण और किसान क्रेडिट कार्ड की सुविधा देने का प्रावधान रखा गया है. एक अध्ययन के मुताबिक़ केवल आंधप्रदेश में 30% खेती किराए पर या ठेके पर चल रही है... यानी खेती कोई और कर रहा है और मालिक हैदराबाद की आलीशान कोठी में बैठकर राजनीति कर रहा है. खेतों में काम करने वाले उस मेहनती गरीब को आजीवन कोई ऋण या बैंक सुविधाएं नहीं मिल पातीं.

इसीलिए केंद्र सरकार में इस बात पर विचार चल रहा है कि किराए की खेती या ठेके पर खेती को कानूनी स्वरूप दे दिया जाए, जिसके अनुसार मालिक के खेत पर काम करने वाले की एंट्री भी जमीन के कागजों में “किराएदार” के रूप में की जाए. उसका जमीन पर कोई अधिकार नहीं होगा, परन्तु उस व्यक्ति को भी “उत्पादक” माना जाएगा. उसका नाम, पता, आधार कार्ड इत्यादि सब दर्ज होगा, जिससे यदि वह चाहे तो अपने बच्चों की शिक्षा अथवा अन्य रोजगार के लिए बैंकों से ऋण व सब्सिडी प्राप्त करने का अधिकारी होगा. आँध्रप्रदेश में इस क़ानून के सकारात्मक परिणाम मिले हैं और इसी से प्रभावित होकर मोदी ने इस कदम पर विचार किया है. शायद जल्दी ही इसे राष्ट्रीय स्तर पर भी लागू कर दिया जाएगा.

Tags: desiCNN, Agriculture Reform, Agricultural Reforms in India, Narendra Modi and Agriculture, Tenant Farming law

ईमेल