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मूल लेखक : अरविन्दन नीलकंदन

जिस तरह नई दुल्हन चूड़ी की आवाज़ अधिक करती है, नए नए मुल्ले या पंडित की आवाज़ तेज ही होती है, उसी तरह हाल ही में बुद्धिजीवी होने का एक नया चलन पैदा हो गया है, और वह है राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उसके नेताओं के बारे में झूठ फैलाना, झूठा प्रचार करना!

पिछले कुछ वर्षों से उत्तरी भारत में राजनैतिक महत्त्वाकांक्षा और देश तोड़ने की योजना के तहत दलित-मुस्लिम गठजोड़ और इनके बीच तथाकथित सामाजिक समरसता निर्माण करने के खोखले प्रयास चल रहे हैं.

केंद्र सरकार के विरोध में जब IIT चेन्नई में तथाकथित “बीफ़ फेस्टिवल” का आयोजन हुआ और उसके अगले दिन तमाम अखबारों, चैनलों तथा वेबसाईटों पर एक तस्वीर प्रकाशित हुई थी. इस तस्वीर में एक झबरे वालों का कंजर किस्म का अधेड़ व्हील चेयर पर बैठा हुआ दिखाया गया, जिसकी एक आँख सूजी हुई थी.

केरल में सरेआम गाय काटी गई, रिपोर्ट में आया कि भैंस कटी है, फिर आया कि बैल काटा गया है और अंततः कल-परसों तक इस पर चर्चा होगी कि केरल में जो पब्लिक में मुर्ग़ा कटा है उसकी इजाज़त संविधान देता है कि नहीं।

पिछले भाग में हमने देखा कि किस तरह “इस्लाम में जातिवाद नहीं है” का झूठ बोलकर कई मुस्लिम जातियाँ, हिन्दुओं के हिस्से का आरक्षण चट कर रही हैं. सरकारें भी वोट बैंक के चक्कर में हिन्दुओं को एक “अर्धसत्य” बोल-बोलकर बरगलाती रहती हैं कि “मुसलमानों को धार्मिक आधार पर आरक्षण नहीं दिया जाएगा”.

भारत में जातीय और धार्मिक विमर्श के तहत दो झूठ आपने अक्सर कई वर्षों से सुने होंगे. पहला झूठ आपने सुना होगा कि “...इस्लाम और ईसाईयत में कोई जातिवाद नहीं है, इस्लाम और ईसाई पंथ के अनुयायियों में कोई भेदभाव नहीं होता..., इसलिए हे दलितों, हमारी तरफ आ जाओ...”

कम्युनिस्टों से लेकर राष्ट्रवादियों तक सभी एक स्वर से भारत की हजार वर्ष की गुलामी की बात सरलता से कह जाते हैं। बारहवीं शताब्दी में मोहम्मद गोरी के दिल्ली पर कब्जा करने से लेकर वर्ष 1947 में अंग्रेजों के जाने तक के काल को सभी सहज भाव से भारत की गुलामी का काल मान लेते हैं।

भारत के इतिहास पर, प्राचीन से लेकर आधुनिक तक, हजारों की संख्या में पुस्तकें मिल जाएंगी, हजारों विद्वान मिल जाएंगे, परंतु एक बड़ा प्रश्न यह है कि क्या ये सारे विद्वान भारत को ठीक से समझते हैं या फिर क्या ये पुस्तकें भारत को ठीक से समझाती हैं?

ज़ाहिर है कि शीर्षक देखकर आप थोडा चौंके होंगे. क्योंकि अब देश GST लागू करने के अंतिम चरण में पहुँच चुका है, तथा अंतिम तैयारियाँ चल रही हैं. लेकिन यदि डॉक्टर सुब्रह्मण्यम स्वामी की मानें तो व्यापारियों और उद्योगपतियों का GST संबंधी तमाम डाटा और जानकारियों की न सिर्फ सुरक्षा खतरे में है.

सहारनपुर में दलितों और ठाकुर राजपूतों का विवाद का समाचार मिल रहा है। कभी दलित कहते है कि हम इस्लाम स्वीकार कर लेंगे, कभी ठाकुर कहते है कि हम इस्लाम स्वीकार कर लेंगे। इस्लाम स्वीकार करने से जातिवाद की समस्या समाप्त हो जाती तब तो दुनिया के सभी इस्लामिक देश जन्नत के समान होते।

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