झारखंड (Jharkhand) का नाम लेते ही हमारे मन में साधारणत: जनजातीय लोगों के चित्र ही मन में उभरते हैं। ऐसा मान लिया जाता है कि विकास की दौड़ में पिछड़ गए, वनों में रहने वाले जनजातीय लोगों का ही प्रदेश है झारखंड।

गणित तो हम सभी ने पढ़ा होगा, परंतु क्या कभी गणित को औपनिवेशिक मानसिकता से स्वाधीनता दिलाने की लड़ाई भी हमने लड़ी है? गणित को स्वाधीन कराने की लड़ाई? क्या हमें कभी यह ध्यान में भी आया है कि गणित जैसा विषय भी औपनिवेशिक मानसिकता का शिकार हो सकता है?

भारतीय लोकतंत्र का तथाकथित सेकुलरिज्म अब उस अवस्था को प्राप्त होता जा रहा है, जहाँ कोई भी ऐरा-गैरा-नत्थू-खैरा भारतीय न्याय व्यवस्था और संविधान को लात मारकर अपना सिक्का चलाना चाहता है.

लगभग साढ़े तीन वर्ष पहले त्रिपुरा में भाजपा के प्रभारी पद पर सुनील देवधर (Sunil Deodhar) के नियुक्ति हुई थी. यह प्रदेश शुरू से लेकर आज तक भाजपा के लिए “भीषण सूखे” जैसा प्रदेश ही रहा है. यहाँ न तो भाजपा का कोई संगठन था और न ही कोई वैचारिक जमीन.

मंदिरों की सरकारी लूट (Temple Loot) बंद हो, तथा केन्द्रीय स्तर पर SGPC शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी) जैसी (लेकिन गैर-राजनैतिक) संस्था बने जो देश के सभी प्रमुख मंदिरों के प्रबंधन एवं व्यवस्थापन की जिम्मेदारी संभाले इस उद्देश्य से पिछले कई वर्षों से विभिन्न संगठन मिलकर सरकारों के समक्ष अपना प्रतिवेदन देते आए हैं.

जो बात पिछले कई वर्षों से भाजपा कह रही है, उस पर वामपंथ के ही एक नेता ने अपनी मुहर लगा दी है. जैसा कि सभी जानते हैं, उत्तर-पूर्व के राज्यों में नागालैंड और मेघालय लगभग पूर्णरूप से ईसाई राज्य बन चुके हैं, नागालैंड में तो बाकायदा कई स्थानों पर “लैंड ऑफ़ क्राईस्ट” (Church Funding in Nagaland) के बोर्ड लगे दिख जाएंगे.

जयललिता की मृत्यु के बाद से दक्षिण भारत की राजनीति खासकर तमिलनाडु में जो एक बड़ा सा शून्य बन गया है, उसे भरने के लिए लगभग सभी पार्टियाँ अपनी कमर कसने लगी हैं.

पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ने RSS से संबद्ध संस्थाओं (RSS and its Organizations) द्वारा चलाए जा रहे स्कूलों पर कड़ा रुख अपना लिया है. राज्य के शिक्षा मंत्री पार्थो चटर्जी ने विधानसभा में लिखित बयान में कहा है कि राज्य में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की संस्थाओं से संबद्ध 493 स्कूल हैं, इनमें से 125 स्कूल राज्य सरकार से “नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट” प्राप्त किए बिना अपना स्कूल (Saraswati Shishu Mandir) संचालित कर रहे हैं.

भारतीय समाज में स्त्रियों की प्रमुख प्राकृतिक शारीरिक क्रिया (Menstrual Cycle) अर्थात माहवारी के बारे में बात करना बेहद संवेदनशील, संकोची और पर्दादारी वाला माना जाता है. यहाँ तक कि आज के आधुनिक समय में भी केवल शहरी और महानगरीय क्षेत्रों को छोड़ दें तो कस्बे और गाँवों में यह विषय अभी भी दाएँ-बाँए देखकर फुसफुसाते हुए बात करने वाला विषय माना जाता है. ऐसे समय पर अक्षय कुमार ने Padman (पैड-मैन) फिल्म बनाकर इस धारणा को तोड़ने का सफल प्रयास किया है. पिछले कुछ समय से अक्षय कुमार लीक से हटकर विषयों पर फ़िल्में चुनने लगे हैं, पैडमैन भी इसी श्रृंखला की फिल्म है.

गत 19 जनवरी को महाराष्ट्र के अम्बरनाथ स्थित वान्द्रापाड़ा परिसर में एक “जाति-पंचायत” बुलाई गयी थी. इस जाति पंचायत की बैठक का मुख्य एजेण्डा था “कंजारभाट” समाज (Kanjarbhat Community) के कुछ पढ़े-लिखे युवाओं द्वारा नवविवाहिताओं के कौमार्य परीक्षण की घृणित एवं अपमानजनक प्रक्रिया के विरोध में, सोशल मीडिया पर चलाए जा रहे “Stop the V Ritual” मुहिम के खिलाफ उन युवाओं पर दबाव बनाना.