कभी भारतीय संस्कृति का प्रतीक माने जाने वाले बंगाल की दशा आज क्या हो चुकी है, ये बात तो किसी से छिपी नहीं है. हिन्दुओं के खिलाफ साम्प्रदायिक दंगे तो पिछले काफी वक़्त से होना शुरू हो चुके हैं और अब तो हालात ये हो चुके हैं कि त्यौहार मनाने तक पर रोक लगाई जानी शुरू हो गयी है.

कर्णाटक से केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगड़े (Anant Hegde) द्वारा टीपू सुल्तान (Tipu Sultan) को अत्याचारी और बर्बर शासक बताया गया। इतिहास को निष्पक्ष होकर देखे तो पता चलता है कि टीपू सुल्तान का असली चेहरा क्या था।

दीपावली के दिन मैंने एक फेसबुक पोस्ट की थी, जिसमें मैंने उस त्यौहार के दौरान अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे, विभिन्न चौराहों पर खड़े पुलिसकर्मियों को दीपावली की बधाई प्रेषित की थी.

प्राचीन भारत में ऋषि-मुनियों को जैसा अदभुत ज्ञान था, उसके बारे में जब हम जानते हैं, पढ़ते हैं तो अचंभित रह जाते हैं. रसायन और रंग विज्ञान ने भले ही आजकल इतनी उन्नति कर ली हो, परन्तु आज से 2000 वर्ष पहले भूर्ज-पत्रों पर लिखे गए "अग्र-भागवत" का यह रहस्य आज भी अनसुलझा ही है.

संजय लीला भंसाली की फ़िल्म पदमावती के कारण आज अल्लाउद्दीन खिलजी पुनः चर्चित हो चुका है, जो मध्यकाल के दुर्दांत शासकों में से एक था.

माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रकाश के त्योहार दिवाली पर आतिशबाजी पर रोक लगाने के साथ ही देश में आतिशबाजी की परम्परा तथा चलन पर एक बहस छिड़ गई है. पटाखों (आतिशबाजी) के चलन को नकारने वाले मुख्य रूप से दो तर्क दे रहें हैं -

पिछले भाग में आपने पढ़ा कि हरिलाल गाँधी द्वारा इस्लाम कबूलने के बाद महात्मा गाँधी किस तरह बिलबिला गए थे, और उन्होंने लंबा सा पत्र सार्वजनिक रूप से लिख मारा. (पिछला भाग पढने के लिए यहाँ क्लिक करें)

“महात्मा”(??) गाँधी के मुस्लिम प्रेम के बारे में बाकायदा तथ्यात्मक रूप से एवं विभिन्न लेखकों की पुस्तकों के सन्दर्भ देकर पहले काफी कुछ लिखा जा चुका है. गाँधी द्वारा गाहे-बगाहे हिंदुओं को ज्ञान बाँटने के तमाम पहलू इतिहास में दर्ज हैं, साथ ही तुर्की के खलीफा के समर्थन में सुदूर भारत में चल रहे मुस्लिमों के आंदोलन, जिसका नाम हिंदुओं को मूर्ख बनाने के लिए “खिलाफत आंदोलन” रखा गया था, के प्रति गाँधी का समर्थन भी जगज़ाहिर है.

हाल ही में ताजमहल को लेकर खामख्वाह एक विवाद पैदा किया गया कि योगी सरकार ने इसे उत्तरप्रदेश के दर्शनीय स्थलों की सूची से बाहर क्यों कर दिया. वास्तव में प्राचीन भारत की वास्तुकला को लेकर फर्जी इतिहासकारों ने भारतीयों के मनोमस्तिष्क में इतने नकारात्मक भाव भर दिए हैं कि उन्हें विदेशी आक्रान्ताओं द्वारा बनाई गयी वास्तुकलाओं और लाशों पर बने मज़ार के ऐसे भवनों में अच्छाई दिखाई देती है, जिसके निर्माण के बाद कारीगरों के हाथ काट दिए गए हों.

पिछले भाग में आपने हिन्दुओं के इतिहास एवं हिन्दू धर्म के बारे में कुछ मूल बातें पढीं... (पिछले भाग को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें..) अब आगे पढ़िए.

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