कहा जाता है कि बिजली का अविष्कार अंग्रेज वैज्ञानिकों वोल्टा, कूलम्ब, अम्पीयर, एडिसन, फराडे आदि ने सत्राहवीं से उन्नीसवीं शताब्दी में किया। हमारी पाठ्यपुस्तकों में भी यही बताया जाता है। वास्तविकता कुछ और ही है..

जैसा कि सभी जान चुके हैं, वामपंथियों के कारण केरल राजनीतिक हिंसा का एक बड़ा अड्डा है| लेकिन इस बार मामला हिन्दू-मुस्लिम नहीं है, बल्कि कम्युनिस्टों (साम्यवादी) एवं मुस्लिम लीग के बीच हाल ही में हुए विवाद ने मलप्पुरम जिले के एक तटीय गाँव तनूर को चर्चा का मुद्दा बना दिया है|

हाल ही में भारत के वरिष्ठ वकील फली एस नरीमन (जो कि पारसी समुदाय से आते हैं) ने उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की इस बात को लेकर आलोचना की थी, कि “एक भगवाधारी महंत को” सत्ता नहीं संभालनी चाहिए.

दलित-मुस्लिम एकता कितना खोखला नारा है, इस बारे में हम पिछले भाग में संत रविदास और संत कबीर के कुछ उद्धरणों द्वारा जान चुके हैं... पहले भाग को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें...

वाई, महाराष्ट्र के सातारा ज़िले में कृष्ण नदी के तट पर स्थित एक छोटा सा शहर है। सह्याद्री पर्वत श्रृंखला से घिरा, यह शहर कृष्णा नदी पर कई घाटों के लिए प्रसिद्ध है, यहां अनेक प्राचीन मंदिर हैं। वाई की एक पहचान और भी है कि इसने भारतीय इतिहास के दो सबसे महत्वपूर्ण परिवारों को जन्म दिया हैं।

यह निर्विवाद है कि भारत की अति प्राचीन सामाजिक व्यवस्था पूरी दुनिया की तुलना में अधिक विकसित तथा वैज्ञानिक थी। उस समय भारत वैज्ञानिक मामलों में भी दुनिया में उपर था, सामाजिक मामलों में तो था ही।

आजकल देश में दलित राजनीती की चर्चा जोरों पर है। इसका मुख्य कारण नेताओं द्वारा दलितों का हित करना नहीं अपितु उन्हें एक वोट बैंक के रूप में देखना हैं। इसीलिए हर राजनीतिक पार्टी दलितों को लुभाने की कोशिश करती दिखती है।

राजनीति करना और राजनीति को समझना दो अलग-अलग बातें हैं। भारतीय राजनीति में इन दोनों विधाओं में सामंजस्य रखने वाले अनेक नेता हुए हैं, जिन्होंने राजनीति करते हुए राजनीति को अच्छे से समझा, तदनुसार रणनीति बनाई और सफलता प्राप्त की।

हिन्दू समाज की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे जातिवाद से ऊपर उठ कर सोच ही नहीं सकते। यही पिछले 1200 वर्षों से हो रही उनकी हार का मुख्य कारण है। इतिहास में कुछ प्रेरणादायक घटनाएं मिलती है।

उत्तरप्रदेश में अवैध बूचड़खानों के खिलाफ योगी की सख्त कार्यवाही जारी है और उधर अवैध बूचड़खाने के मालिक, जिन्होंने कभी क़ानून का पालन नहीं किया, कभी नियमों के मुताबिक़ धंधा नहीं किया वे अपने सेकुलर बुद्धिजीवी मित्रों के गिरोह की मदद से देश की जनता को बता रहे हैं कि इससे “रोजगार” खत्म होने का खतरा है और “राजस्व” का नुक्सान भी है.

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