गोवा के मुख्यमंत्री और पूर्व रक्षामंत्री मनोहर पर्रीकर (Manohar Parrikar) अभी अमेरिका में अपनी कैंसर की बीमारी से जूझ रहे हैं. हाल ही में उन्होंने विपक्ष की जिद पर मुम्बई में तात्कालिक चिकित्सा करवाने के तुरंत बाद विधानसभा में बजट पेश किया था और इसके बाद ही वे इलाज करवाने अमेरिका गए.

पश्चिमी सभ्यता को मानने वालों का विश्वास है कि विज्ञान ग्रीस में जन्मा (Greek Claim of Mathematics and Science) और वहीं से दुनिया भर में फैला। ज्ञान विज्ञान के प्रति मनुष्य जाति में सदैव ही तीव्र जिज्ञासा रही है।

जब इतिहास को सतत विकृत (Distorted History) करके पेश किया जाता है, और पाठ्यक्रमों तथा लोक जनश्रुतियों से सच्चा इतिहास धीरे-धीरे गायब होने लगता है तब ऐसे-ऐसे सामाजिक विकार पैदा हो जाते हैं कि बयान नहीं किया जा सकता, और ऐसा अक्सर केवल हिन्दुओं के साथ ही होता है, क्योंकि अव्वल तो सही इतिहास जानने के बारे में हमारी रूचि कम है, और ऊपर से वामपंथ पोषित संस्थाओं (Fake Historians) तथा “सेकुलरिज्म नामक एड्स की बीमारी” ने हिन्दू मानस को इतना बोदा, बेवकूफ और सुस्त बना दिया है कि सामने वाला जो भी इतिहास कहता है उस पर हम सहज विश्वास कर लेते हैं.

प्राप्त ख़बरों के अनुसार वित्त मंत्रालय (Finance Ministry of India) में Joint Secretary (संयुक्त सचिव) जैसा बड़े स्तर का एक अधिकारी हाल ही में फ्रांस के पेरिस (Paris) में एक “हनी ट्रैप” (Honey Trap) में फँसा हुआ पाया गया.

कुछ दशक पहले की बात है, अलीगढ़ मुस्लिम विवि (Aligarh Muslim University AMU) में प्रोफ़ेसर इरफ़ान हबीब (Irfan Habib) ने अपने एक पूर्व छात्र और अब उसी विवि में पढ़ा रहे फैकल्टी सदस्य केके मुहम्मद (KK Muhammed) को अपने दफ्तर में बुला भेजा.

भारत का मुकुट कहा जाने वाला जम्मू-कश्मीर एक बार पुनः अंदर ही अंदर उबलने लगा है, लेकिन इस बार “युद्धक्षेत्र” मुस्लिम बहुल कश्मीर नहीं, बल्कि हिन्दू बहुल जम्मू है.

इस समय पूरे भारत में एक सकारात्मक वातावरण है. GST और नोटबंदी के झटकों के बाद अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे सँवर रही है और सामान्य रूप से समाज में भी कोई बड़ी उथल-पुथल नहीं है.

झारखंड (Jharkhand) का नाम लेते ही हमारे मन में साधारणत: जनजातीय लोगों के चित्र ही मन में उभरते हैं। ऐसा मान लिया जाता है कि विकास की दौड़ में पिछड़ गए, वनों में रहने वाले जनजातीय लोगों का ही प्रदेश है झारखंड।

गणित तो हम सभी ने पढ़ा होगा, परंतु क्या कभी गणित को औपनिवेशिक मानसिकता से स्वाधीनता दिलाने की लड़ाई भी हमने लड़ी है? गणित को स्वाधीन कराने की लड़ाई? क्या हमें कभी यह ध्यान में भी आया है कि गणित जैसा विषय भी औपनिवेशिक मानसिकता का शिकार हो सकता है?

भारतीय लोकतंत्र का तथाकथित सेकुलरिज्म अब उस अवस्था को प्राप्त होता जा रहा है, जहाँ कोई भी ऐरा-गैरा-नत्थू-खैरा भारतीय न्याय व्यवस्था और संविधान को लात मारकर अपना सिक्का चलाना चाहता है.