अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सबसे ज्यादा हल्ला वामपंथी ही करते हैं...और इससे बड़ा विद्रूप और कुछ नहीं हो सकता... स्टालिन के अपने शासन काल में कुल 2.7 करोड़ लोग बिलकुल गायब हो गए...कितनी ही ज़िन्दगियाँ साइबेरिया की गुमनामी में खो गयीं,

संजय भंसाली के समर्थन आये लोग उसके विरोध को पूर्वाग्रह से किया हुआ बता रहे है और उसके समर्थन में दो तरह के तर्क दे रहे है। एक यह की लोगो ने पद्मावती की पठकथा बिना देखे विरोध कर रहे है और दूसरा संजय भंसाली भारत के एक श्रेष्ट निर्देशक है जो बड़ी फिल्म बनाने में सिद्धस्त है, इस लिए उनको पूरी स्वतंत्रता है कि वह अपनी कला की किसी भी तरीके से अभिव्यक्त करे। मैं यह पहले तो एक बात साफ़ कर दूँ की संजय भंसाली का पद्मावती को लेकर फिल्म बनाने का विरोध भारतियों ने किया है न की किसी विचारधारा के अंतर्गत यह हुआ है। यहां लोग यह भूल जाते है की जिस करणी सेना ने भंसाली को झापड़ मारा है वह सेक्युलर कांग्रेस समर्थित है, उसका बीजेपी से कोई मतलब भी नही है इसलिए राजनीति इसमें नही घुसेडनी चाहिए। अब चलिए मुद्दे पर आते है।

विकलांग करके गवाने की भयावह, घृणित परंपरा ! ये जो विकलांग करवा कर गाना गवाने की परंपरा है, वो ईसाई "रिलिजन" से आई है। आज जैसा आप बच्चों के जन्म, शादी पर, गाने वाले हिजड़ों को देखते हैं, वैसा कुछ होने का जिक्र भी भारतीय ग्रंथों में नहीं आता... पूरा इतिहास यहाँ पढ़िए...

वामपंथी इतिहासकारों ने इतिहास को लिखा नहीं है, उसे अपनी इच्छानुसार ‘गढ़ा’ है l नालंदा बौद्ध विहारों की क्षति में हिन्दुओं का हाथ दिखा देने के लिए और तुर्क आक्रमणकारियों पर पर्दा डाल देने के लिए क्या क्या फरेब नहीं किये गए... आगे पढ़िए... 

यदि 15 अगस्त 2013 में 810 Million अर्थात 81 करोड़ याने कि 66% जनता इतनी गरीब थी कि वो सरकारी राशन की दुकानों पर मिलने वाले अनाज को खरीदने में असमर्थ थी और उनको जिन्दा रखने के लिये खाद्य सुरक्षा अधिनियम लाया गया जिसके अंतर्गत उन्हें क्रमशः 1, 2 और 3 रुपयों में गेहूं, ज्वार या बाजरा और चावल दिये जाने का प्रावधान किया गया तो अब 7 सवाल यह उठते हैं कि : 

बाबरी ध्वंस के पश्चात अयोध्या में घटनाक्रम कुछ इस प्रकार हुआ...

6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में जब तीन गुंबद वाला ढाँचा गिर गया तो उस दिन सायंकाल अयोध्या पुलिस थाने में दो रिपोर्ट लिखी गई।

1. ढाँचे के समीप ड्युटी पर तैनात पुलिस इंस्पेक्टर ने एक एफआईआर लिखवाई जिसमें पुलिस इंस्पेक्टर ने लिखवाया कि‘’लाखों कारसेवक ढाँचे पर चढ गये और उन्होने ढाँचे को गिरा दिया पर मैं किसी को पहचानता नही.’’।

जब हम छोटे थे तो घर में चापाकल हुआ करता था, अब ये सिर्फ सरकारी ही देखने मेंआता है | जब घर में एक नया चापाकल लगवाने की बात हुई तो दादाजी सारे पुर्जे ख़रीदने निकले | करीब सात सौ रुपये का चापाकल था, और उसके साथ लगनी थी लम्बी सी पाइप|

विक्रमीय संवत्‍सर की बधाइयां देते-लेते पूरा दिन हो गया...। भारत कालगणनाओं की दृष्टि से बहुत आगे रहा है। यहां गणित को बहुत रुचि के साथ पढ़ा और पढ़ाया जाता था। यहां खास बात पर्व और उत्‍सवों के आयोजन की थी और उसके लिए अवसरों को तय करना बड़ा ही कठिन था।

उस दिन ओसामा बिन लादेन के तिक्का-बोटी दिवस की बरसी थी। टी वी के इक्का-दुक्का चैनलों पर घूँघट काढ़े एक समाचार फ़्लैश हुआ कि कांधला के निकट एक ट्रेन में तब्लीगी जमात के कुछ लोगों के साथ मार-पीट हुई और अगले दिन बीकानेर से हरिद्वार जाने वाली ट्रेन रोक कर उस पर पत्थर बरसाए गए।

देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देने वाले क्रांतिकारियों का जब जब जिक्र होगा, 1911 से 1945 तक अनवरत अपने आपको भारत की आज़ादी की लड़ाई के लिए तिल तिल गलाने वाले महान क्रांतिकारी रासबिहारी बोस (Ras Bihari Bose) का नाम हमेशा आदर के साथ लिया जाता रहेगा, जिनका 25 मई को जन्मदिवस है।