भारत में सचेत हिन्दू (Hindu Awareness) आज भी बहुत कम हैं। अर्थात जिन्हें देश-दुनिया की ठोस जानकारी के साथ हिन्दुओं की तुलनात्मक स्थिति मालूम है। तदनुरूप जो अपना कर्तव्य निभाने की कोशिश करते हैं। इनकी संख्या संभवतः देश में एक प्रतिशत भी नहीं है। इनमें लेखक, पत्रकार, विद्वान और हर कार्यक्षेत्र के लोग हैं। यद्यपि यहाँ "ओपिनियन मेकर" वर्ग में प्रभावी हिस्सा वामपंथियों, इस्लाम-परस्तों और जाने-अनजाने देशघातियों, हिन्दू-विरोधियों का ही है। सो, संख्यात्मक दृष्टि से सचेत हिन्दू यहाँ नगण्य हैं। देश के प्रभावी बुद्धिजीवी उन्हें संघ-भाजपा से जोड़कर देखते हैं। यह कुछ सच भी है, क्योंकि चुनावों में ये प्रायः भाजपा समर्थक होते हैं। किन्तु यही सचेत हिन्दुओं की कठिनाई भी रही है। उनकी समझ भाजपा की देन नहीं, बल्कि स्वतंत्र चिन्तन का परिणाम है। इसीलिए उन्हें एक ओर से लांछन, तो दूसरी ओर से ताना सुनना पड़ता है, सहयोग कहीं से नहीं मिलता। लम्बे समय से प्रभावशाली सेक्यूलर-वामपंथी बुद्धिजीवियों ने उन्हें "सांप्रदायिक", "मुस्लिम-विरोधी", "संघी-भाजपाई" तत्व कहकर विचार-विमर्श में अछूत-सा बनाए रखा है। जबकि भाजपा के अनुयायी उन पर अंध-समर्थक बनने का दबाव देते रहे हैं। इस प्रकार, स्वतंत्र सोच-विचार के कारण सचेत हिन्दू (Hindu Nationalistic Academia) पर दोतरफा चोट होती है। अर्थात् ठीक उस कारण जिस के लिए उसका महत्व होना चाहिए था! इस प्रकार, ऐसे हिन्दुओं को दूसरे हिन्दू ही ब्लैकमेल करते हैं। आईये जानते हैं कि वे लोग कौन हैं?

-- वे ऐसे लोग हैं जो विशेष प्रसंगों पर चिन्ता दिखा कर हिन्दू-रक्षक होने का संकेत करके राजनीतिक, चुनावी, आर्थिक सहयोग, आदि लेते हैं। फिर उन पर तब तक मुँह नहीं खोलते जब तक कि फिर चुनाव न आ जाए।

-- जो दिवंगत और वर्तमान हिन्दू विद्वानों, कर्मयोगियों की उपेक्षा करते हैं। जो पार्टी-प्रचारकों से विद्वानों को सीख दिलाने की जिद रखते हैं, सीधे और छल-पूर्वक, दोनों प्रकार से। जो राष्ट्रीय, सामाजिक, धर्म चिन्ताओं को दलीय घेरे के अंदर रखकर सोच-विचार की जबर्दस्ती थोपते हैं। जिस का अर्थ होता है कि कमरे के अंदर आप जो चाहे बोलें, बाहर दल व नेता की जयकार करें...

-- जो शिक्षा, संस्कृति को बड़ा हल्का काम मानते हैं। जिस से इन क्षेत्रों में काम करने वाले सच्चे, गंभीर, परिश्रमी लोग (जो वैसे ही ढूँढने पर कम ही मिलते हैं) सदैव बेहद उपेक्षित रहते हैं।

-- जो अपने सामान्य नेताओं तक को ऋषि, मनीषी, संत, आदि प्रचारित करने में राजकोष का बेहिसाब धन नष्ट करते हैं। इस कारण सच्चे ज्ञानियों, उन की शिक्षाओं को नई पीढ़ी कम जानती है, फलतः सांस्कृतिक गिरावट बढ़ती जाती है।

-- जो राष्ट्रीय, शासकीय, नीतिगत जिम्मेदारियाँ देने में योग्यता नहीं, बल्कि निजी वफादारी और चाटुकारिता को महत्व देते हैं। समाज हित से ऊपर निजी या दलीय हित को प्रश्रय देते हैं।

-- जो अपने शुभचिन्तकों, सहयोगियों से भी दोहरी बातें करते हैं।

-- जो राष्ट्रीय नीति-निर्माण पर कभी सच्चा विचार-विमर्श नहीं, बल्कि पार्टी-प्रोपेगंडा करते हैं। इस प्रकार समय, सत्ता और संसाधन की नियमित बर्बादी करते हैं।

-- जो अपनी और अपने दल की छवि बनाने के लिए अतिरंजना, मिथ्या और अनर्गल बोलते रहते हैं, पर इसे जरूरत बताकर अपने असहज सदस्यों को चुप करते हैं।

-- जो शिवाजी, दयानन्द, विवेकानन्द, श्रद्धानन्द, श्रीअरविन्द, टैगोर, अज्ञेय, जैसे मनीषियों पर श्रद्धा रखते हैं, किन्तु उन की किसी सीख की परवाह नहीं रखते, बल्कि उलटा करते हैं। इस से होती राष्ट्रीय हानि की जिन्हें कोई समझ नहीं है.

-- जो देश, समाज और धर्म-रक्षा के लिए स्वतंत्र रूप से काम करने वालों को बाधा देते, झूठी बदनामी तक करते हैं... ताकि तत्संबंधी कुछ भी करने, जैसे चाहे करने, या न करने का उन का एकाधिकार बना रहे।

-- जो समाज के जाने-माने घोर शत्रुओं पर चोट के बजाए अपने प्रतिद्वंदी हिन्दू नेताओं या मामूली दलों, आदि को निपटाने के लिए पूरी बुद्धि, समय और संसाधन लगाते हैं। इस तरह वास्तविक शत्रुओं को मजबूत होने के लिए पूरा अवकाश देते हैं..

-- जो सत्ता में आने पर विशिष्ट ज्ञानयोगियों, हिन्दू-हितैषियों, हिन्दू-सेवकों को सम्मान देने के बदले उन पक्के विरोधियों व मतलबियों को मान देते हैं, जो स्वार्थवश इन की ओर निहारते हैं। फलतः हिन्दुओं में सच्चे योद्धाओं, ज्ञानियों की वृद्धि कुंठित होती है। आखिर जिन लोगों का सार्वजनिक महत्व दिखे, वैसा ही बनने की प्रेरणा फैलती है। सो समाज में ज्ञानियों, समाज-सेवकों, योद्धाओं के बदले चाटुकारों, अनुचरों, प्रचारकर्मियों की वृद्धि होती है।

-- जो दशकों तक सत्ता में रह कर भी हिन्दुओं को सामाजिक सबल बनाने के लिए कुछ नहीं करते, बल्कि उन्हें अपने दल, नेता पर निर्भर रहने को विवश करते हैं। इस बहाने से कि ‘हानिकर लोग’ सत्ता में न आएं तथा ‘और बुरा’ न हो। इस प्रकार, जो हिन्दुओं को सामाजिक रूप से असहाय बनाए रखते हैं।

-- जो हिन्दुओं को सबल बनाने के बजाए कोई बुरा अतीत या संभावना दिखाकर डराते हैं, कि यदि उन्हें समर्थन न दिया, तो दुष्ट, दानव सत्तासीन हो कर हिन्दुओं को और सताएंगे... अथवा, ‘यदि हम ने कुछ न भी किया, न कर सके, वगैरह, तो दूसरों को समर्थन देकर अपनी हानि करोगे।

यह सब हिन्दुओ को ब्लैकमेल करना नहीं, तो क्या है?

इन सब को जैसे भी उचित ठहराएं, यह वह चेतना या कर्म नहीं है जिस की सीख समकालीन महान हिन्दू मनीषियों ने भी दी थी। यह राष्ट्रवाद भी नहीं, बल्कि अंध-पार्टीवाद है। कम्युनिस्टों की नकल है। केवल कम्युनिस्ट ही हमेशा पार्टी को पहली टेक बनाते थे। वही टेक इन्होंने भी अपना ली। इस के बाद कम्युनिस्टों की तरह ही निरंतर प्रपंच जरूरी हो जाता है। एक झूठ छिपाने के लिए सौ झूठ बोलने जैसा। अतः, स्वामी विवेकानन्द ऊपरी आदर्श हैं, केवल फोटो दिखाने और हिन्दुओं को भ्रमित करने के लिए। इसीलिए विवेकानन्द की किसी सीख पर नहीं चला जाता। वास्तविक आदर्श जैसे-तैसे चुनाव जीतने के गुर सोचने वाले पार्टी-पुरुष हैं। इसलिए, हिन्दुओं की असहायता वस्तुतः तनिक भी नहीं घटी है। चाहे भाजपा ताकतवर लगे, पर हिन्दू-शत्रु जरा भी कमजोर नहीं पड़े। उन की गतिविधियाँ उसी उद्धटता से जारी हैं। तमाम हिन्दू-विरोधी वैसे ही कटिबद्ध अपना काम कर रहे हैं। अतः भाजपा की सत्ता होना अपने आप में कोई उपलब्धि नहीं है। क्योंकि इन में वह योग्यता, तैयारी, कर्मनिष्ठा बिलकुल नहीं, जो हिन्दू-शत्रुओं में है। भाजपा सत्ता लेकर भी असल मुद्दों पर बगलें झाँकती है, जबकि हिन्दू-शत्रु सत्ता के बिना भी मौके का इस्तेमाल जानते हैं। जिस मनोयोग से भाजपा ने सत्ता का प्रयोग प्रतिद्वंदी पार्टियों को निपटाने में किया, उस का दशांश भी हिन्दू-विरोध रोकने और सच्ची शिक्षा के प्रसार के लिए नहीं किया। ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ का फूहड़ नारा उन की अयोग्यता का स्व-घोषित प्रमाण है।

इस प्रकार, सचेत हिन्दुओं की विडंबना विचित्र है। वे भाजपा समर्थक हैं, पर उन्हें ही ब्लैकमेल किया जाता है कि भाजपा का अंध-समर्थन करें। जबकि हिन्दू-विरोधियों को छुट्टा छोड़ दिया गया, बल्कि उन का आदर किया जाता है! यह ठीक गाँधीजी की तरह हिन्दुओं को "फॉर-ग्रांटेड" लेना हुआ। उस के अनिष्टकारी परिणामों से सीख लेने के बजाए सारी बुद्धि पार्टी-प्रचार में लगाई जाती है। इस बीच हिन्दू या राष्ट्रीय हितों पर चौतरफा घात चलता रहता है। क्योंकि हिन्दुओं के शत्रु किसी पार्टी के बंधक नहीं हैं। वे अधिक सचेत, साफ नजर और चतुर हैं। वहाँ लल्लुओं, मतलबियों को पद, संसाधन और महत्व नहीं दिया जाता। इसीलिए वे हर पार्टी से काम लेना, उन का इस्तेमाल करना जानते हैं। उन के लिए पथ नहीं, लक्ष्य महत्वपूर्ण है। अतः पार्टी-भक्ति को देश-भक्ति समझना बहुत बड़ी भूल है। जुमलेबाजी को नीति, महान मार्गदर्शकों को भुलाकर पार्टी नेताओं को मनीषी या जादूगर समझना, उन्हीं पर भरोसा, उन्हीं का प्रचार, आदि घातक है। सदैव लक्ष्य का ध्यान रखना चाहिए, पथ का नहीं... यह हिन्दुओं के शत्रुओं से भी सीखना चाहिए। 

बड़ा ही विचित्र सा शीर्षक है यह, क्या श्री भगवद्गीता की पुनरुत्पादन क्षमता पर कोई लेख भी लिखा जा सकता है? गीता (Bhagvadgita and Krishna) क्या कोई बीज है? जिसे बोने से कुछ उत्पन्न हो सकेगा? गीता तो ज्ञान की पुस्तक है, उपदेश है एवं इसका पठन, पाठन एवं जीवन में इसके उपदेशों को उतारना ही गीता की क्षमता है एवं हमारे देश में हजारों वर्षों से साधू संत एवं विद्वान् इस विषय पर भांति भांति के लेखन कर चुके हैं एवं कई विद्वानों ने गीता रहस्य, प्रस्थान त्रयी पर भाष्य, श्री कृष्ण भावनामृत आदि आदि द्वारा गीता के रहस्यों को उद्घाटित किया है, फिर यह उलटबांसी किसी वामपंथी या अज्ञानी के ही दिमाग की उपज हो सकती है.

राम जन्मभूमि का मुद्दा (Ram Mandir Movement) पिछले कई वर्षों से प्रमुख रूप से चर्चा में रहा है, अब यह मामला सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) की सुनवाई में अंतिम चरण पर पहुँच चुका है. इस सन्दर्भ में कई-कई पक्ष अपने-अपने दावे कर रहे हैं, लेकिन वास्तव में मूल सवाल ये है कि राम जन्मभूमि मुद्दे पर हिन्दुओं के अलावा किसी और पक्ष की बात यदि सुननी भी हो, तो वह केवल “सच्चा मुसलमान” की ही हो सकती है, किसी “काफिर” की नहीं. अब सवाल ये उठता है कि सच्चा मुसलमान कौन है? इसके लिए पहले थोड़ी पड़ताल करते हैं. 

जाली समाचार (Fake News) देने के विरुद्ध सूचना व प्रसारण मंत्री की पहलकदमी उठते ही दब गई। कुछ लोग इसे उचित बता रहे हैं। यद्यपि सभी मानते हैं कि मीडिया में मनगढ़ंत, जाली, विकृत और प्रायोजित समाचारों की संख्या बढ़ रही है। यह केवल सोशल मीडिया तक सीमित नहीं है। हाल के उदाहरण देखें। अभी पिछले सप्ताह एक बड़े अंग्रेजी अखबार ने सुर्खी देकर छापा, ‘उच्च जाति के लोगों ने गुजरात में दलित युवक को घोड़े पर चढ़ने के कारण मार डाला।’ उसी समाचार के विस्तृत विवरण में अंदर पुलिस सुपरिंटेंडेंट के हवाले से यह भी था कि वह युवक स्कूल गेट पर और जहाँ-तहाँ लड़कियों के सामने स्टंट करता रहता था, जो भी उस पर हमले का कारण हो सकता है। किन्तु अखबार ने जाति-गत हमले की हेडलाइन बनाई, जो पूरी दुनिया में तुरत फैल गई – क्योंकि यही रंगत विदेशियों के लिए उस समाचार को सनसनीखेज बनाती! इस तरह, खबर को जान-बूझ कर जातिगत रंग देकर पेश किया गया।

इसी तरह, हाल में ही एक अन्य बड़े अंग्रेजी अखबार में समाचार छपा, ‘सोशल मीडिया पर फोटो शेयर करने के लिए युवक की गिरफ्तारी।’ लेकिन उस में यह छिपा लिया गया कि वह फोटो कैसी थी। उस युवक ने एक मंदिर में शिवलिंग पर जूते सहित अपना पैर रखकर सेल्फी ली थी, जिसे सोशल मीडिया में डालने पर किसी ने पुलिस में शिकायत की और पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया। वस्तुतः जाति, धर्म, मजहब और पार्टी से जुड़े समाचारों में अधिकांश मीडिया का विषम व्यवहार रोजमर्रे की बात हो गई है। अनेक पत्रकार एक विशेष समूह को उत्पीड़क और दूसरे को उत्पीड़ित बताने का अघोषित लक्ष्य रखते रहे हैं। कुछ के लिए यही स्थिति राजनीतिक पार्टियों और संगठनों के प्रति भी रही है। इस के लिए खबरों को आधे-अधूरे प्रस्तुत करना, तोड़ना-मरोड़ना, कभी उत्पीड़क तो कभी उत्पीड़ित की पहचान छिपाना, अथवा खूब प्रमुखता देकर छापना, आदि इस के साधन रहे हैं। यदि निष्पक्षता से जाँच हो, तो यह सब निस्संदेह विकृत समाचार देने के उदाहरण हैं। गोधरा कांड (2002) के बाद तो बारह वर्षों तक लगातार (Media Bias and Gujrat Riots) यह सब उत्साहपूर्वक चलता रहा। अब इसे सभी कमो-बेश स्वीकारते भी हैं।

लेकिन वह पूरी तरह बंद नहीं हुआ है, जो ऊपर के उदाहरणों से देखा जा सकता है। प्रश्न है कि समाज में जातिगत, धर्मगत और पार्टीगत पक्षपात या वैमनस्य फैलाने के लिए मीडिया के दुरूपयोग के दुष्परिणामों पर क्या विचार नहीं करना चाहिए? आतंकवाद संबंधी कई कांडों की जाँच-पड़ताल में यह सामने आया है कि झूठे या विकृत समाचारों का किशोरों, नवयुवकों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। वे उस घटना का बदला लेने की प्रवृत्ति से भरते हैं, जिसे अतिरंजित या गलत रूप से प्रसारित किया गया था। इन सब के अलावा, विदेशियों के प्रलोभन से नकली और प्रायोजित समाचारों से भी हमारे देश की भारी हानि होती रही है। इस का सब से भयावह प्रमाण सोवियत गुप्तचर एजेंसी के.जी.बी. के अभिलेखागार के पूर्व-कर्मचारी वसीली मित्रोखिन के दस्तावजों से सामने आया था। उस की चर्चा हमारे राजनीतिक, बौद्धिक वर्ग ने नहीं के बराबर की, इस से भी उस रहस्य का संकेत मिलता है जो उस में उजागर किया गया था।

वस्तुतः भारतीय लोग ‘मित्रोखिन आर्काइव्स (Mitrokhin Archives), खण्ड एक (1999) तथा खण्ड दो (2005) के प्रकाशन के बाद भी एक गहरी बात से अपरिचित हैं! पुस्तक के पहले खण्ड के हजार पृष्ठों में यूरोप और अमेरिका में के.जी.बी. के कई एजेंटों और उन के कारनामों का विवरण था, जिस के आधार पर उन देशों में अनेक एजेंट और सामग्रियाँ पकड़ी गईं। मित्रोखिन आर्काइव्स के तमाम विवरणों, घटनाओं, आंकड़ों आदि में एक भी गलती नहीं पाई गई, जिन की जाँच विविध देशों में वहाँ की सरकारों ने की। उसी पुस्तक के दूसरे खण्ड में दो अध्याय (पृ. 312-340) भारत में के.जी.बी. के अनेक कामों के बारे में हैं। नेहरू काल से लेकर इस में लगभग 1989 तक के कुछ छिट-पुट विवरण हैं। अर्थात, जो दस्तावेज के.जी.बी. कर्मचारी वसीली मित्रोखिन को मिले थे और जिसे वे नोट कर बाहर ले जा सके थे। उस पुस्तक के पृ. 324 पर भारतीय मीडिया के एक हिस्से का यह रूप भी मिलता है – ‘‘के.जी.बी. की फाइलों के अनुसार इस ने सन 1973 तक भारत के दस अखबारों और एक न्यूज एजेंसी को (कानूनी कारणों से उन के नाम नहीं बताए जा सकते) नियमित रूप से पैसे देकर नियंत्रण में कर लिया था। वर्ष 1972 के दौरान के.जी.बी. ने भारतीय अखबारों में अपनी ओर से प्रायोजित 3789 सामग्री छपाने का दावा किया – संभवतः किसी गैर-कम्युनिस्ट देश में यह सब से बड़ी संख्या थी। फाइलों के अनुसार, यह संख्या 1973 में गिर कर 2760 हो गई, जो 1974 में बढ़कर 4486 और 1975 में 5510 हो गई। कुछ मुख्य नाटो देशों में के.जी.बी. ऐसे सक्रिय उपाय अभियानों के बावजूद तुलना में बमुश्किल एक प्रतिशत से कुछ अधिक चीजें प्रकाशित करा पाया था, जो उस ने भारतीय प्रेस में करवाया।’’

यह केवल एक झलक है। वह भी आज से चालीस-पैंतालीस वर्ष पहले की। उन प्रायोजित समाचारों, सामग्रियों, जाली कागजातों के बल पर भारतीय राजनीति के सर्वोच्च स्तर पर निर्णय प्रभावित होने के विवरण भी पुस्तक में हैं। सब से भयंकर बात यह है कि पुस्तक में ‘कानूनी कारणों से’ भारत में राजनीतिक, अकादमिक और मीडिया जगत में ऐसे सैकड़ों के.जी.बी. एजेंटों की पहचान नहीं दी गई (जो पहले खंड में यूरोप, अमेरिका में एजेंटों के बारे में छाप दी गई थी)। इस का अर्थ यह भी है कि ब्रिटिश और अमेरिकी सरकार को भारत में उन एजेंटों, यानी नेताओं, अफसरों, संपादकों, प्रोफेसरों और संस्थानों के नाम गत पंद्रह वर्षों से मालूम हैं – क्योंकि यह पुस्तक ब्रिटिश सरकार की ओर से गहरी छान-बीन के बाद प्रकाशित हुई थी! इसीलिए पहले खंड में में वे नाम छपे थे। मगर भारत की जनता आज तक अँधेरे में है कि वे कौन लोग थे, और आज भी मौजूद हैं, जिन्हें के.जी.बी. ने खरीदा हुआ था। कौन जाने वे तथा वैसे कितने अन्य लोग आज भी किन-किन विदेशी एजेंसियों के लिए काम कर रहे हैं?

फिर, अंदरूनी स्तर पर भी, कुछ वर्ष पहले राडिया (Neera Radia) टेपों के उजागर होने के बाद सामने आया था कि हमारे कई बड़े पत्रकार राजनीतिक फिक्सिंग का काम भी करते रहे हैं। स्पष्टतः यह सब एक दिन में या एकाएक नहीं हुआ हो सकता। मीडिया की शक्ति का दुरुपयोग करके ही वह सब हो सका। अतः किसी व्यक्ति, कंपनी, राजनीतिक पार्टी या विदेशी ताकतों को लाभ पँहुचाने के सभी क्रिया-कलाप एक ही समस्या का संकेत करते हैं। वरिष्ठ पत्रकार प्रीतीश नंदी ने बहुत पहले ही चिंता जाहिर की थी, कि बुरी खबर, और खासकर सरकार को कठघरे में खड़ा करने वाली खबरों के प्रति हमारे अंग्रेजी संपादकों में ऐसा आकर्षण है कि वे उस की किसी जाँच, प्रमाणिकता की जरूरत नहीं समझते। यही हाल रहा तो कुछ दिनों में पत्रकार ऐसी रिपोर्टें गढ़ने लग जाएंगे। वस्तुतः टी.वी. चैनलों में तो यह होता ही रहा है। कई स्टिंग ऑपरेशन वास्तव में गढ़े गए समाचार थे।

अब सोचें, कि मनगढंत, जाली, मिलावटी, शरारतपूर्ण, राजनीति-प्रेरित और विदेशियों की सेवा करने वाले समाचारों में सब से घातक कौन है? यह भी कि क्या गर्हित उद्देश्यों से ऐसी खबरों, सामग्रियों का धंधा वैसे ही चलता रहना चाहिए? यह समझने के लिए बड़ी बुद्धि की जरूरत नहीं कि समाचारों में अतिरंजित या झूठे आरोपों को हवा देने से आम लोग भ्रमित होते हैं। सामुदायिक दूरी और वैमनस्य बढ़ता है। इस के परिणाम कहाँ तक जा सकते हैं। इस की झलकियाँ कई बार मिल चुकी हैं। अतः मीडिया के समर्थ, स्वाभिमानी लोगों को इस पर गंभीरता से सोचना चाहिए और सरकार को भी कोई सही उपाय निकालने में सहयोग देना चाहिए।

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साभार :- Indiafacts.org 

हिंदू समाज (Hindu Dharma) विश्व का सबसे संगठित समाज है हांलाकि आज भारत में तरह-तरह के ऐसे संगठन उत्पन्न हो गए हैं जो हिंदू समाज की मुख्य समस्या उसका असंगठित होना बताते हैं। इन संगठनों के इस विचार के पीछे स्वयं हिंदू समाज के विषय में उनका अज्ञान तो है ही, विश्व के विषय में भी गहरा अज्ञान है। पता नहीं कि वह संसार के किस समाज से हिंदू समाज की तुलना करके उसे असंगठित बताते हैं।

आपको केरल के पद्मनाभ स्वामी के मंदिर का स्मरण तो होगा ही... किस तरह से वहाँ के अकूत खजाने को लेकर जाँच हुई.

इन दिनों संघ और भाजपा पर क्षोभ की लहर (BJP and Secularism) हिंदू समाज के एक बड़े हिस्से में, विशेषकर उसके पढ़ने लिखने वाले हिस्से में फैल रही है.

किसी भी सरकार की ठसक केवल कानूनी ही नहीं, सांस्कृतिक-बौद्धिक भी होती है। यह गैर-लोकतांत्रिक तथा लोकतांत्रिक, दोनों सरकारों के लिए सच है।

कुछ वर्ष पहले का एक मामला शायद पाठकों को याद हो. आगरा में विश्व हिन्दू परिषद् के नेता अरुण माहौर की दिनदहाड़े बीच बाज़ार में “कसाईयों” ने हत्या कर दी थी, क्योंकि अरुण माहौर लगातार गौहत्या के खिलाफ अभियान चलाए हुए थे.

यह रिपोर्ट आई है तमिलनाडु के शिवगंगा जिले से. दक्षिण तमिलनाडु के इस जिले में हजारों दलितों को चर्च द्वारा ईसाई बनाया जा चुका है.