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(यह लेख मूलतः नितिन श्रीधर ने लिखा है, और इसका हिन्दी अनुवाद अवतंस कुमार ने किया है)

इसके पहले वाले लेख में (उस लेख की लिंक यह है)... हमने दुनियाँ भर के विभिन्न मतों और संस्कृतियों में मासिक-धर्म से जुड़ी मान्यताओं और प्रचलनों पर विचार किया था।

प्राचीन भारत में हमारे ऋषि-मुनियों एवं विद्वानों ने जनता को शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रखने के लिए परम्पराओं में कई ऐसे खेल आविष्कार कर दिए थे, जिनके द्वारा न सिर्फ हिन्दुओं का युद्ध कौशल उभरकर सामने आता था, बल्कि शस्त्रों को पहचानने, उनके द्वारा सटीक हमला करने एवं उनसे बचाव करने की तकनीक भी व्यक्ति खेल-खेल में ही सीख जाता था.

हाल ही में एक प्रसिद्ध पत्रिका “आउटलुक” ने अपनी एक रिपोर्ट में दावा किया है कि भारत के पूर्व राष्ट्रपति केआर नारायणन अपने अंतिम समय से पहले हिन्दू दलित नहीं रह गए थे, बल्कि वे “कन्वर्टेड ईसाई” बन चुके थे.

सतनामियों के इतिहास के बारे में अधिकाँश लोग अंजान हैं. झारखंड, छत्तीसगढ़ और बंगाल के एक बड़े हिस्से में फैले लगभग एक करोड़ से अधिक सतनामी समुदाय वही हैं, जिन्होंने औरंगजेब द्वारा हिन्दुओं पर जजिया थोपने के इस्लामिक फैसले का कठोरतम विरोध किया था.

भारत की कई महत्त्वपूर्ण पुरातात्विक महत्त्व की बेशकीमती वस्तुएँ आज भी विदेशों के संग्रहालयों अथवा सरकारों के कब्जे में मौजूद हैं. इन अनमोल विरासतों के बारे में भारत सरकार के पास सबूत भी मौजूद हैं, परन्तु कुछ कानूनी एवं कुछ तकनीकी कारणों की वजह से भारत के ये गौरवशाली विरासत अभी भी भारत में नहीं आ पाई हैं. कोहिनूर हीरा तो खैर विश्वप्रसिद्ध है ही, उसी से मिलता-जुलता एक और हीरा है, जिसका नाम है “नासक”.

सृष्टि विज्ञान के दो पहलू हैं। पहला पहलू है कि सृष्टि क्या है? आधुनिक विज्ञान यह मानता है कि आज से 13.7 अरब वर्ष पहले बिग बैंग यानी कि महाविस्फोट हुआ था। उसके बाद जब भौतिकी की रचना हुई, अर्थात्, पदार्थ में लंबाई, चौड़ाई और गोलाई आई, वहाँ से विज्ञान की शुरुआत हुई। उससे पहले क्या हुआ, इस पर विज्ञान मौन है। क्योंकि भौतिकी की यह सीमा है।

कुछ तथाकथित दलित चिंतकों (असल में वेटिकन के गुर्गे) का सदा से आरोप रहता है कि मंदिरों में दलितों के साथ भेदभाव किया जाता है, उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं मिलता. हालाँकि यह बात पहले ही सिद्ध हो चुकी है कि यह केवल दुष्प्रचार भर है, क्योंकि देश के हज़ारों मंदिरों में से इक्का-दुक्का को छोड़कर किसी भी मंदिर में घुसते समय, किसी से उसकी जाति नहीं पूछी जाती है.

हाल ही में केरल के एक उच्च पदस्थ से रिटायर्ड हुए पुलिस अधिकारी ने हिन्दू-मुस्लिम-ईसाई समुदायों के पैदा होने वाले बच्चों के बारे में जो शोध रिपोर्ट सार्वजनिक की उसके बाद केरल के राजनैतिक तबकों के साथ-साथ ईसाई बहुल क्षेत्रों में भी बेचैनी फ़ैल गयी है.

पिछले कुछ वर्षों में देखा गया है कि भारत में जैसे ही “संस्कृत” का नाम लिया जाता है, तो तमाम कथित प्रगतिशील और नकली बुद्धिजीवी किस्म के लोग नाक-भौंह सिकोड़ने लगते हैं. वेटिकन पोषित कुछ तथाकथित दलित चिंतकों ने तो संस्कृत जैसी समृद्ध भाषा को “ब्राह्मणवाद” से जोड़ दिया है, जबकि दिल्ली-चेन्नई के वामपंथ पोषित विश्वविद्यालयों ने संस्कृत को लगभग “साम्प्रदायिक” और भगवाकरण से जोड़ रखा है.

किसी के जीवन में जब कोई विपत्ति आती है, तो अपनी हिम्मत और धैर्य से वह उससे बाहर निकल आता है, परन्तु हमेशा प्रत्येक विपत्ति जीवन का कोई न कोई सबक दे ही जाती है. कुछ लोग विपत्तियों में घबरा जाते हैं, जबकि कुछ लोग ऐसा प्रयास भी करते हैं कि जिस संकट से वे गुज़रे हैं, वैसा संकट  किसी दूसरे पर न आए, और यदि दुर्भाग्य से आ ही जाए तो उसे समय पर, सही स्थान पर, सही व्यक्ति से सहायता मिल जाए. ऐसी ही प्रेरक घटना है छत्तीसगढ़ पुलिस में कांस्टेबल स्मिता तांडी और रविन्द्र सिंह क्षत्रिय के जीवन की... आगे पढ़िए.

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