“संपर्क फॉर समर्थन” के तहत कुलदीप नैयर से भाजपा नेता मिलने गए, तब अटपटा लगा था। एक आदतन हिन्दू-विरोधी, इस्लाम-परस्त और पाकिस्तान-प्रेमी पत्रकार के पास इतने बड़े हिन्दू-राष्ट्रवादी क्या पाने गए थे? जिसे देश-विदेश में कश्मीर पर आई.एस.आई. के पैसे से चल रही भारत-विरोधी गतिविधियों में शामिल होने में कोई संकोच नहीं, उस से मिल कर संदेश क्या दिया गया? उस से तो सौ गुना अच्छा, देश-हित कारी होता यदि वे अरुण शौरी से मिलने जाते। चलो, खैर... बड़े लोगों की बड़ी बातें। परन्तु नैयर ने इस भेंट पर लेख ही लिख दिया, तो चोट फिर हरी हो गई। नैयर ने भिंगाकर जूते मारने जैसा लिखा है! तमाम हिन्दू-विरोधी लफ्फाजी दुहराई, आर.एस.एस. शासन को ‘अशुभ’ बताया और भाजपा नेता को उपदेश दिया कि मस्जिदें न तोड़ा करो, विभाजन की राजनीति न करो, वगैरह वगैरह।

सीताराम गोयल ने दशकों पहले भाजपाइयों को समझाया था... सवाल करने का काम करो, सफाई देने का नहीं! उन्होंने हिन्दुओं और मुसलमानों से संबंधित नीति सुधारने के सदर्भ में यह कहा था। वही बात भाजपा बनाम अन्य नेहरूवादी, समाजवादी दलों के लिए भी सही है। मुसलमान शिकायत करते रहते हैं। हिन्दू सफाई देते रहते हैं। उसी तरह, सभी दल भाजपा पर आरोप लगाते रहते हैं। भाजपा सफाई देती रहती है, कि हम तो सब के हैं, सब का विकास साथ चाहते हैं, मतलब कि आप जैसे ही हैं, भले, मेहनती हैं, हमें गलत न समझो। कुछ यही नैयर को जाकर कहा गया। जबाव में, व्यंग्य आरोप और नसीहतें मिलीं। यही मिलती थी अडवाणी, वाजपेई को। क्योंकि यह संगठन नहीं, बुद्धि की बात हैः क्या करना, क्या नहीं करना। इस्लामियों ने रास्ता निकाला था:- इस से पहले कि कोई तुम से तुम्हारे पापों का हिसाब माँगे, उस पर ढेर सी शिकायतें जड़ दो। आरोप लगाओ। रोओ-गाओ। बस, वह सफाई देने में लग जाएगा और तुम्हारे पाप छिपे रहेंगे। भारतीय राजनीति में पिछले सौ साल से यही हो रहा है। गाँधीजी ने इसे शुरू किया। नेहरूजी ने इसे राजकीय सिद्धांत बनाया। कम्युनिस्टों ने उसे धार दी, और समाजवादी-गाँधीवादी सब वही रटने लगे। इस प्रकार, स्वतंत्र भारत में भी - चाहे हिन्दुओं को हीन नागरिक बना डाला गया, कश्मीर से हिन्दू मार भगाए गए, मुसलमानों ने जब चाहे सड़क पर दंगे करना अपना विशेषाधिकार बना लिया, यहाँ से लेकर बंगलादेश, पाकिस्तान तक सैकड़ों हिन्दू मंदिर तोड़ डाले गए, लाखों-लाख हिन्दू मार डाले गए, जबरन धर्मांतरित कराए गए – पर क्या मजाल कि हिन्दू पूछे कि हमारे साथ यह क्या हुआ है?

वही हाल हमारी पार्टियों का है। चाहे उन्होंने सेक्यूलरिज्म के नाम पर संविधान को विकृत कर डाला, सरकारी धन की लूट-बाँट नियमित धंधा बना लिया, जातिगत, भाषाई, क्षेत्रीय, हर आधार पर हिन्दुओं को तोड़ने की नीति गढ़ ली, कानून, नैतिकता सब ताक पर रख इस्लाम-परस्ती को संविधान से भी ऊपर बना डाला, शिक्षा-संस्कृति तहस-नहस करते गए... मगर भाजपा महानुभावों को उन पापियों से प्रश्न पूछना और उन्हें जबाव देने पर विवश करना न सूझा। समझाने पर भी नहीं। कि उन मूर्खों / मक्कारों से पूछे कि तुम्हारे झूठे सेक्यूलरिज्म ने देश का क्या हाल किया है? कि हिन्दू अपने विरुद्ध भेद-भाव, अपनी पीड़ा के प्रश्न उन से पूछें जो इस के कारण हैं। उलटे, भाजपा मेहनत से नेहरूवादी, सेक्यूलर-वामपंथी नारों को ही लागू करने में लग गई, ताकि सब कहें कि ओह, ये कितने अच्छे लोग है! गरीबों, मुसलमानों, मिशनरियों, पोप, सूफियों, यानी सब का ख्याल करते हैं। एक जिस का ख्याल करने की जरूरत नहीं, वे हैं हिन्दू, जिन्हें न कोई समस्या, न शिकायत है। वैसे भी, ये जाएंगे कहाँ?

सचमुच, अरूण शौरी कहाँ जाएंगे, उन से मिलने की जरूरत नहीं! क्या किया है उन्होंने? ठीक है, उन्होंने साहसपूर्वक देश के हिन्दू-विरोधी अकादमिक, मीडिया वातावरण पर ऊँगली रखने में अग्रदूत की भूमिका निभाई। कम्युनिस्टों की धूर्त्तता, चर्च की अनुचित गतिविधियों और इस्लामी राजनीति की कुटिलता प्रमाणिक रूप से उघाड़ी। बेलगाम भ्रष्टाचार और सेक्यूलरवाद के गठबंधन का पर्दाफाश किया। आर.एस.एस-भाजपा पर मनमाने लांछन लगाने की आदत पर चोट की। अपनी बुद्धि, विद्वता और परिश्रम के बल पर। सब से बढ़ कर, शौरी ने इस्लाम पर उस महत्व का काम किया, जो स्वामी दयानन्द सरस्वती, राम स्वरूप और सीताराम गोयल के सिवा यहाँ किसी ने व्यवस्थित रूप से नहीं किया था... पर इन सब से क्या? शौरी ने संगठन, पार्टी और उन के नेताओं की जी-हुजूरी तो नहीं की। इसलिए, उन का सारा सामाजिक काम बेमानी रहा! उन से मिल कर विचार-विमर्श कौन कहे, उलटे उन पर थू-थू, छिः-छिः हुई कि वे पद-लोभी हो गये हैं।

हाँ, कुलदीप नैयर की बात और है! ये बहुत बड़े हैं, विरोधी दुनिया में इन की पूछ है। सो, यह अच्छी ‘रणनीति’ रहेगी कि इन से वार्ता हो। साथ फोटो छपे। तब प्रचार हो सकेगा कि हम तो सब के साथ हैं, सब हमारे साथ हैं। और क्या चाहिए! किन्तु क्या नैयर वोट दिलाएंगे? आखिर भाजपा को वोट कौन देता है? कुछ पारंपरिक हिन्दू-भावी और संघ-भाजपा कार्यकर्ताओं के प्रचार से पंद्रह-बीस प्रतिशत पक्के मतदाता। पर लगभग उतने ही कांग्रेस, मायावती, लालू, मुलायम, जैसे दलों के भी पक्के वोट हैं। इसलिए मुक्त पाँच-दस प्रतिशत, जो किसी पार्टी का बंधक नहीं, वह जब जिसे वोट देता है, उसे बढ़त मिलती है (गठबंधन वाली स्थिति अलग है)। इसी में किसी नेता/ दल की हवा बनाने, बिगाड़ने वाले भी हैं। तो क्या नैयर से मिलना इन्हें प्रभावित करेगा? संभवतः नहीं। वह बहुत कुछ देखता है, केवल नाटक नहीं। इसीलिए, संगठन निर्णायक चीज नहीं है। सकर्मक लोग और सुबुद्धि उस से बड़ी चीज है। वैसे भी, जब कोई राजनीतिक संगठन बहुत बड़ा बन जाए, तब उस की अपनी दुनिया, ढर्रा, जरूरतें, निहित स्वार्थ, जड़ता, विवशता, आदि हो जाती है। इसलिए भी वह सुबुद्धि के सामने छोटा है।

कुलदीप नैयर के पास कौन सा संगठन है? तब 9 करोड़ सदस्यों का दंभ भरती पार्टी के प्रमुख उन के दरवाजे क्यों गए? क्यों नहीं कभी नैयर ही उन से मिलने चले गए, ‘ऐसे ही’ जिसे कहा जाता है। यानी कुछ लेने-पाने को। यह उलटा क्यों घटित हुआ? एक बड़े पत्रकार के पास करोड़ों वाली पार्टी के नेता क्यों गए? जरूर उन का विशाल संगठन किसी कमी की पूर्ति नहीं कर पा रहा है। वह कौन सी चीज है? सुबुद्धि, सुनीति का विकल्प संगठन नहीं है। आखिर नुरूल हसन से लेकर सैयद शहाबुद्धीन तक ने बिना किसी संगठन के बेजोड़ सफलताएं हासिल कर दिखाई। शहाबुद्धीन को अटलबिहारी वाजपेई लाए और सीधे राज्य-सभा सदस्य बनाया! मात्र बुद्धि से शहाबद्दीन न केवल ऊँचे पहुँचे, मुस्लिम राजनीति को बलशाली बनाया, बल्कि विविध सत्ताधारियों से एक से एक बड़े दूरगामी फैसले करवाए।

और इन ‘संगठन’-जापी राष्ट्रवादियों ने अब तक क्या हासिल किया? वही, मात्र और संगठन, और कुछ कार्यालय, और कुछ भवन, और कुछ सदस्य, और सम्मेलन, समारोह, चिंतन-बैठकें.... और ‘अपने’ बड़े-पदधारी तथा अनेक सरकारें। मगर वे क्या करती रही हैं? रुटीन शासन, लच्छेदार भाषण और खाली जुमलों, आदि के अलावा शहाबुद्दीन, फारुख उमर अब्दुल्ला, अमर्त्य सेन, सूफियों और राजदीप सरदेसाई से लेकर कुलदीप नैयर तक की इज्जत-आफजाई! निस्संदेह, ऐसी इज्जत के हकदार अरूण शौरी या अन्य हिन्दू विद्वान भी नहीं हैं! इन ‘रणनीति’-बहादुर राष्ट्रवादियों से इज्जत पाने की कुंजी है, हिन्दू-विरोधी, सेक्यूलर-वामपंथी बनना और संघ-भाजपा से द्वेष रखना। इतिहास यही दर्शाता है। इस प्रकार, भाजपा सचेत अचेत रूप से हिन्दू-विरोधी सेक्यूलरवाद को और प्रतिष्ठित करती रही है। कुलदीप नैयर को सलामी देना, उन का रुतबा बढ़ाना और बदले में नसीहत सुनना उसी क्रम में है।

लोक सभा में एक अनोखा बिल (नं. 226/2016) विचार के लिए पड़ा हुआ है। यह संविधान की धारा 25-30 की सही व्याख्या तथा धारा 15 में गलत संशोधन को रद्द करने से संबंधित है।

इतिहास के कई झूठे सिद्धांतों को अब भी किताबों में पढ़ाया जा रहा है। उसी में से एक है – आर्य आक्रमण सिद्धांत। (Aryan Invasion Theory) इस सिध्धांत को भ्रम फैलाने के लिए ही अंग्रेजो ने औपनिवेशिक काल में फैलाया था। उसका सीधा सा उद्देश्य था की इस देश पर हिंदु के जितना ही मुसलमान और अंग्रेज का अधिकार है। आर्य आक्रमण सिद्धांत एक बहुत ही चालाकी से अभ्यासक्रम में डाला गया सफेद झूठ है। इस सिद्धांत का गलत उपयोग आज भी कथित दलित पार्टियां और साम्यवादी दल करते है। साथ ही में उच्च वर्ण के हिंदुओ को बाहर से आया हुआ कह कर गरियाते रहते है। उनकी दृष्टि से विध्वंसक मुग़ल और आर्य दोनों ही बाहर से आए है। ऐसे में इस नकली थ्योरी को बाबासाहब के चश्मे से देखना जरूरी हो जाता है।

बाबासाहब आंबेडकर ने महात्मा ज्योतिबा फुले (Jyotiba Fule) को अपना गुरु माना था, उन्होंने प्रतिपादित किया था की आर्य बाहर से आए, और यहां के अछूतो को यानि की अनार्यो को अपना बंदी बनाया। लोकमान्य बालगंगाधर तिलक जो की हिंदु संस्कृति के श्रेष्ठ अध्येता थे उन्होंने भी यही माना था की आर्यो का मूल वतन उत्तर ध्रुव के पास में ही है। साथ ही में अछूतो के उद्धार के लिए आंदोलन के पुरोधा गोपालबाबा बलंगजी ने भी कहा था की अछूत यहां के मूलनिवासी थे और आर्य बाहर से आए एवं यहां के अछूत को उन्होंने गुलाम बनाया, दक्षिण भारत में पेरियार का भी मत यही था।

 

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लेकिन बाबासाहब आंबेडकर ने कोई पूर्वानुमान लगाने की बजाय इसका अभ्यास करना उचित समझा। उन्होंने वेदों का अभ्यास कर के एक पुस्तक लिखी जो कि काफी लोकप्रिय भी है- “Who were Shudras?” (शूद्र कौन थे?) उस पुस्तक में वह यूरोपियन और औपनिवेशक इतिहासकारो द्वारा प्रचलित झूठ का तर्कबद्ध रूप से खंडन करते है। सारांश के रूप में मैं कुछ अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ। ये सभी तर्क बाबासाहब आंबेडकर द्वारा प्रस्तुत किए गए थे.... 

झूठ: आर्यवंश के लोगो ने वेद का निर्माण किया। यह वंश मूल रूप से बहार से आया था और उन्हों ने भारत पर आक्रमण किया।

तर्क: आर्य शब्द वेदो में ३३ बार प्रयुक्त हुआ है। वह कहते है की आर्य शब्द गुणवाचक है , जिसका अर्थ श्रेष्ठ होता है। यह शब्द वंशवाचक नहीं है। आर्यवंशीय लोगो ने दस्युओं को बंदी बनाया और भारत पर आक्रमण किया इसका वेदो में कोई प्रमाण नहीं है।

झूठ: आर्य का वर्ण गोरा था, दस्यु का वर्ण काला था। भारत के मूलनिवासी दस्यु थे।
तर्क: वेदो में इसका कोई प्रमाण नहीं है की आर्य और दस्यु के बीच वांशिक भेद था। वेदो में जब भी कहीं यह शब्द आते है तो उसका संबंध वंश से न होकर पूजा-पद्धति से है।

झूठ (लोकमान्य तिलक की धारणा):- जैसा की शुरुआत में ही लिखा की लोकमान्य तिलक आर्य को उत्तर ध्रुव का यानि की एंटार्कटिक का मानते है।
तर्क: बाबासाहब कहते है की, ‘अश्व’ यानि की घोड़े की आर्य के जीवन में बहुत ही महत्वता थी। जबकि एंटार्कटिक में तो घोडा है ही नहीं। इससे यह धारणा भी निराधार हो जाती है।

झूठ: आर्यों ने दास और दस्यु को गुलाम बनाया, उन्हें ‘शूद्र’ नाम दिया गया।
तर्क:- वेद की दृष्टि से आर्य के साथ दास और दस्यु की भिड़ंत स्थानीय थी।

इसके अलावा भी बाबासाहब आंबेडकर इस पुस्तक के प्रकरण नंबर ४ में शूद्र विरुद्ध आर्य में आर्य आक्रमण सिद्धांत का बहुत ही आलोचनात्मक ढंग में खंडन करते है। नृवंशशास्त्र और इतिहास में रूचि रखने वालो को यह प्रकरण अवश्य ही पढ़ना चाहिए. बाबासाहब आंबेडकर के अलावा स्वातंत्र्यवीर वीर विनायक दामोदर सावरकर अपनी पुस्तक ‘हिंदुत्व’ और राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर भी अपनी पुस्तक ‘वी, आर आवर नेशनहुड डिफाइंड’ में आर्य के आक्रमण सिद्धांत का विवेचनात्मक खंडन करते है। वह कहते है कि सभी जातियां भारत में जन्मी थी, उनका बाहर से आने का कोई प्रमाण नहीं है और सभी हिंदु आर्य है।

संदर्भ :
Who were Shudras By Dr. Ambedkar
‘कहीं से हम आए थे नहीं’ – डॉ. विजय कायत (पांचजन्य विशेषांक, अप्रैल २०१५)
‘सब से पहले मेरा देश’- भि. रा. इदाते (पांचजन्य विशेषांक, अप्रैल २०१५ 

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साभार :- India Facts

सिद्धगिरि मठ, कनेरी (Siddhagiri Math Kaneri) में पिछले 25-30 वर्षों से जैविक खेती (Organic Farming) की जा रही है। वर्ष 2014 से हमने छोटे-छोटे किसानों को समृद्ध स्वावलंबी और स्वाभिमानी बनाने के लिए एक प्रयोग प्रारंभ किया।

अधिकाँश मित्रों ने महाराज फ़तेह बहादुर शाही (Fateh Bahadur Shahi) के बारे में अधिक पढ़ा-सुना नहीं होगा. महाराज फतेहबहादुर शाही वर्तमान उत्तरप्रदेश और बिहार के बड़े इलाके एवं सीमावर्ती क्षेत्र के शासक रहे हैं.

बहुत कम लोग जानते होंगे कि साहित्य सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने "जेहाद" नाम की एक कहानी भी लिखी थी. जिसे हमारे शेखुलर प्रकाशकों ने पुस्तकों से लगभग गायब ही कर दिया.100 वर्ष पहले लिखी गई मुंशी प्रेमचंद की कहानी प्रस्तुत है। कहानी का नाम है "जेहाद".

वैदिक व्यवस्था को आधार मानकर राज्य व्यवस्था एवं राष्ट्र निर्माण के सर्वोत्कृष्ट अनुभव हमें गीता करवाती है, भगवन श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन एवं उनके भाइयों को जो उपदेश युद्ध के मैदान में दिए गए वह सभी उपदेश वेदों की आज्ञा ही तो है, किन्तु अज्ञानवश हम उन वेदाज्ञाओं को भूलकर गीता में न जाने कौन सा ज्ञान खोजने लग जाते है कि चाहे राष्ट्र, समाज, संस्कृति पूर्ण नष्ट हो जाये परन्तु फिर भी हम यही सोचते रहते है की कोई चमत्कार हो जायेगा.

यदि हम विश्व के सभी समाजों का अध्ययन करें तो पाएंगे कि हिंदू समाज दुनिया का सबसे अधिक समरस, संगठित और सभ्य समाज है। परंतु दुर्भाग्यवश आज इसे सर्वाधिक भेदभावपूर्ण, बिखरा हुआ और संकीर्ण समाज के रूप में चित्रित किया जाता है।

बात सन 2005 की है, मुझे पांच छः साल बेसब्र प्रतीक्षा के बाद लैंडलाइन फोन का कनेक्शन मिला था तब तक उत्तराखंड के पहाड़ में मोबाइल फोन नहीं थे, इंटरनेट डाटा तो पूरे देश में दूर की बात थी हम पहाड़ में ब्रॉडबैंड ईमेल आदि भी नहीं जानते थे.

जैसा कि सभी जानते हैं, तिरुपति स्थित तिरुमाला मंदिर (Tirupati Devasthanam) भारत के प्रमुख धनी मंदिरों में से एक है, जहाँ प्रतिवर्ष करोड़ों रूपए का दान और चढ़ावा आता है. लेकिन अधिकाँश लोग इस बात से अनजान हैं कि देश के सभी प्रमुख मंदिरों पर सरकारों का आधिपत्य है. मंदिरों में जारी सरकारी लूट (Temple Loot) के बारे में इसी पोर्टल पर चार भागों की एक श्रृंखला प्रस्तुत की गई थी (यहाँ, यहाँ, यहाँ और यहाँ क्लिक करके अवश्य पढ़ें), परन्तु मंदिरों की अकूत संपत्ति, प्रबंधन और व्यवस्थाओं पर सरकारों के इस नियंत्रण (HRCE Act) के कारण हिन्दू मंदिरों में भ्रष्टाचार, अनियमितताएँ तो बढ़ी ही हैं, लेकिन साथ ही सनातन परम्पराओं, पूजा-अर्चना एवं विभिन्न कर्मकांडों में भी सरकार का हस्तक्षेप बढ़ रहा है. 

तिरुमला तिरुपति देवस्थानम बोर्ड (TTD) में भी पिछले कुछ वर्षों से विभिन्न प्रकार की बातें सुनाई देती रहीं, लेकिन चूँकि अधिकाँश हिन्दू सुप्त अवस्था में रहते हैं और सरकारों पर हिन्दू मामलों को लेकर कोई दबाव नहीं बनाते इसलिए तिरुपति देवस्थानम के कई मामले यूँ ही दबा दिए गए. आंधप्रदेश में चर्च की असीमित गतिविधियाँ काँग्रेसी मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी के कार्यकाल में उफान पर थीं और अब हालत ये हो गई है कि कई बार तिरुपति मंदिर के अंदर भी चर्च के गुर्गे अपनी किताबें लेकर ईसा मसीह का प्रचार करते पाए जाने लगे हैं.

 

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ऐसे ही कई मुद्दों को लेकर हाल ही में तिरुपति देवस्थानम के प्रमुख पुजारी श्री एवी रामन्ना दीक्षितुलू ने बाकायदा एक प्रेस कांफ्रेंस करके मंदिर प्रशासन पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं. दीक्षितुलू ने साफ़-साफ़ आरोप लगाया है कि मंदिर में आने वाली ज्वेलरी और बेशकीमती रत्नों का वर्षों से कोई पुख्ता ऑडिट नहीं हुआ है और उसमें बड़ी मात्रा में हेराफेरी किए जाने की आशंका है. दीक्षितुलू के अनुसार 1996 तक मंदिर के पुजारी ही भगवान की समस्त ज्वेलरी, मुकुट इत्यादि के व्यवस्थापक हुआ करते थे. हमने सभी प्रकार के दान का अप-टू-डेट हिसाब-किताब रखा हुआ था. दुर्भाग्य से 1996 में आंध्रप्रदेश सरकार ने इस मंदिर का अधिग्रहण कर लिया और पिछले बाईस वर्षों में ज्वेलरी को एक बार भी नहीं गिना गया. 1996 के बाद दान में मिले गहनों एवं स्वर्ण आभूषणों की गिनती जरूर हुई है, परन्तु जो प्राचीन आभूषण थे, उनका कोई ऑडिट नहीं हुआ है. दीक्षितुलू की माँग है कि मंदिर के खजाने का CCTV कैमरा लगाकर सुप्रीम कोर्ट के जज की निगरानी में “सार्वजनिक ऑडिट” होना चाहिए, तथा एक-एक आभूषण का “डिजिटल रिकॉर्ड” होना चाहिए, परन्तु सरकार इस दिशा में कतई गंभीर नहीं है. TTD प्रशासन ने इसके बाद श्रीरामन्ना को प्रमुख पुजारी के पद से बर्खास्त कर दिया है. 

मुख्य पुजारी ने मंदिर संपत्ति की सम्पूर्ण जाँच सीबीआई से करवाने की भी मांग की है, ताकि मंदिर में हिंदुओं की संपत्ति से आए हुए दान के रुपयों को कहाँ-कहाँ और कैसे खर्च किया गया, इसकी पूरी जानकारी जनता के सामने आए. उदाहरण के लिए तेलुगूदेसम पार्टी के एक विधायक ने अनंतपुर के गुदीमाला गाँव में भव्य मंदिर बनाने के लिए दस करोड़ रूपए की माँग TTD बोर्ड के सामने रखी है जिसे मंजूरी दे दी गई, जबकि ऐसा कोई प्रावधान मंदिर नियमावली में नहीं है. इसी प्रकार तिरुपति मंदिर के ट्रस्टी बोर्ड और उसके द्वारा की जाने वाली नियुक्तियों में भी भारी अनियमितताएँ देखी गई हैं. हाल ही में एक अखबार की स्टिंग रिपोर्ट में यह सामने आया है कि तिरुपति मंदिर में नकली हिन्दू नामों का सहारा लेकर धर्मान्तरित ईसाई भी स्टाफ की भर्ती में शामिल हो चुके हैं. ज़ाहिर है कि ऐसे कर्मचारियों को हिन्दू धार्मिक आस्थाओं से क्या लेना-देना? इसी प्रकार कुछ वर्ष पहले जम्मू स्थित वैष्णो देवी ट्रस्ट बोर्ड द्वारा जब माता के मंदिर में चढाए गए गहनों की विस्तृत जाँच की गई तो उसमें से कई गहने नकली पाए गए, परन्तु उस समय इसका आरोप भक्तों पर ही मढ़ा गया था कि उन्होंने ही नकली गहने चढाए होंगे... इस प्रकार लीपापोती करके मामला रफा-दफा कर दिया गया था.

श्रीरामुलू दीक्षितुलू के अनुसार मंदिर प्रशासन केवल पैसा कमाने में लगा हुआ है. VIP दर्शन के नाम पर लाखों रूपए की लूट पिछले दरवाजे से जारी है, जिसके कारण पुराने अर्चक एवं पुजारी तो आहत हैं ही, कई बार मंदिर की परम्पराओं एवं धार्मिक आस्थाओं पर भी आघात कर दिया जाता है और प्रशासन चुपचाप देखता रहता है, क्योंकि वह उस VIP से पैसा ले चुका होता है. मुख्य पुजारी ने 45 पुजारियों के हस्ताक्षर से युक्त अपनी समस्त शिकायतें प्रधानमंत्री, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और आंधप्रदेश के राज्यपाल को विस्तार से लिखकर भेज दी हैं, कि जिस प्रकार केरल के पद्मनाभ स्वामी मंदिर का ऑडिट किया गया था, वैसा ही ऑडिट तिरुपति मंदिर का भी होना चाहिए, VIP दर्शन बन्द होने चाहिए तथा प्रशासन के निरंतर बढ़ते हस्तक्षेप के कारण धार्मिक भावनाओं के आहत होने को रोका जाए.

वास्तव में अब समय आ गया है कि केन्द्र और राज्य सरकारें, हिंदुओं के दान के पैसों की यह लूट बन्द करें, तथा HRCE क़ानून में आमूलचूल परिवर्तन करके मंदिरों का प्रशासन, प्रबंधन, व्यवस्थापन एवं समस्त धार्मिक-आर्थिक व्यवहार के लिए एक केन्द्रीय समिति का गठन किया जाए, जिसमें IAS अधिकारियों एवं नेताओं का कोई हस्तक्षेप न हो. मंदिरों का पैसा केवल और केवल गरीब हिंदुओं की भलाई, स्कूल, अस्पताल एवं हिन्दू मंदिरों की देखभाल में ही खर्च होना चाहिए. बहरहाल, अब मामला रोचक हो गया है क्योंकि "हिंदुत्व" के लगभग एकमात्र सबल योद्धा अर्थात डॉक्टर सुब्रमण्यम स्वामी इस मुद्दे को लेकर हाईकोर्ट चले गए हैं और उन्होंने मंदिर के मामले में आंधप्रदेश सरकार के हस्तक्षेप को रोकने तथा श्रीरामन्ना की बहाली हेतु अर्जी लगा दी है.