वाई, महाराष्ट्र के सातारा ज़िले में कृष्ण नदी के तट पर स्थित एक छोटा सा शहर है। सह्याद्री पर्वत श्रृंखला से घिरा, यह शहर कृष्णा नदी पर कई घाटों के लिए प्रसिद्ध है, यहां अनेक प्राचीन मंदिर हैं। वाई की एक पहचान और भी है कि इसने भारतीय इतिहास के दो सबसे महत्वपूर्ण परिवारों को जन्म दिया हैं।

यह निर्विवाद है कि भारत की अति प्राचीन सामाजिक व्यवस्था पूरी दुनिया की तुलना में अधिक विकसित तथा वैज्ञानिक थी। उस समय भारत वैज्ञानिक मामलों में भी दुनिया में उपर था, सामाजिक मामलों में तो था ही।

आजकल देश में दलित राजनीती की चर्चा जोरों पर है। इसका मुख्य कारण नेताओं द्वारा दलितों का हित करना नहीं अपितु उन्हें एक वोट बैंक के रूप में देखना हैं। इसीलिए हर राजनीतिक पार्टी दलितों को लुभाने की कोशिश करती दिखती है।

राजनीति करना और राजनीति को समझना दो अलग-अलग बातें हैं। भारतीय राजनीति में इन दोनों विधाओं में सामंजस्य रखने वाले अनेक नेता हुए हैं, जिन्होंने राजनीति करते हुए राजनीति को अच्छे से समझा, तदनुसार रणनीति बनाई और सफलता प्राप्त की।

हिन्दू समाज की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे जातिवाद से ऊपर उठ कर सोच ही नहीं सकते। यही पिछले 1200 वर्षों से हो रही उनकी हार का मुख्य कारण है। इतिहास में कुछ प्रेरणादायक घटनाएं मिलती है।

उत्तरप्रदेश में अवैध बूचड़खानों के खिलाफ योगी की सख्त कार्यवाही जारी है और उधर अवैध बूचड़खाने के मालिक, जिन्होंने कभी क़ानून का पालन नहीं किया, कभी नियमों के मुताबिक़ धंधा नहीं किया वे अपने सेकुलर बुद्धिजीवी मित्रों के गिरोह की मदद से देश की जनता को बता रहे हैं कि इससे “रोजगार” खत्म होने का खतरा है और “राजस्व” का नुक्सान भी है.

उत्तरप्रदेश में “एंटी-रोमियो स्क्वाड” के गठन पर सेकुलर ताकतों का रुदालीगान अपेक्षित ही था. जबकि एंटी-रोमियो स्क्वाड का गठन और आईडी प्रूफ अनिवार्य इसलिए किया गया है, ताकि अपना नाम बदलकर यानी हिन्दू नाम रखकर लड़कियों के साथ धोखाधड़ी, निकाह करने वाले मुस्लिमों को पकड़ा जा सके.

प्रधानमंत्री मोदी द्वारा 1 मई 2016 को शुरू की गई “उज्ज्वला योजना” ने उत्तरप्रदेश में भाजपा के लिए वोटों की बड़ी फसल तैयार करने में प्रमुख भूमिका निभाई थी.

मांसाहार पर बहस जारी है। वैध और अवैध बूचड़खानों पर भी बहस जारी है। योगी आदित्यनाथ की सरकार के आने के बाद से यह बहस और तेज भले ही हो गई हो, परंतु हमें यह याद रखना चाहिए कि अधिक समय नहीं हुआ है, जब देश में कुछ लोग “गौमांस उत्सव” भी मना रहे थे।

आखिर जिस बात का केजरीवाल को इंतज़ार था वह घड़ी आ ही गई. MCD चुनाव सिर पर हैं और ऐसे में यदि “अराजकता-प्रेमी” केजरीवाल को छाती कूटने का मौका मिल जाए तो उसके लिए इससे बढ़िया क्या बात होगी.