नारी जाति के विषय में वेदों को लेकर अनेक भ्रांतियां हैं। भारतीय समाज में वेदों पर यह दोषारोपण किया जाता हैं की वेदों के कारण नारी जाति को सती प्रथा, बाल विवाह, देवदासी प्रथा, अशिक्षा, समाज में नीचा स्थान, विधवा का अभिशाप, नवजात कन्या की हत्या आदि अत्याचार हुए हैं।

असम सरकार ने राज्य के सभी स्कूलों में 8वीं क्लास तक संस्कृत को अनिवार्य बनाने का फैसला किया है। हमारे देश में एक विशेष समूह है जो हमारी सभी प्राचीन मान्यताओं का हरसंभव विरोध करना अपना कर्त्तव्य समझता है।

क्या आप न्यूटन को जानते हैं?? जरूर जानते होंगे, बचपन से पढ़ते आ रहे हैं... लेकिन क्या आप स्वामी माधवन या ज्येष्ठदेव को जानते हैं?? नहीं जानते होंगे... तो अब जान लीजिए.

8 मार्च के दैनिक जागरण में आज बहुत छोटी सी एक कालम की ख़बर है। पाकिस्तानी मूल के लेखक तारिक़ फ़तेह के ख़िलाफ़ मुस्लिम समाज में ज़बरदस्त आक्रोश है। विरोध प्रदर्शनों के बाद उनके ख़िलाफ़ मंगलवार को कोतवाली देवबंद में मुक़दमा दर्ज कराया गया है।

देश का पूरा राजनैतिक विमर्श उत्तरप्रदेश पर केंद्रित है। 5 राज्यो के विधानसभा चुनाव में उत्तरप्रदेश का अपना अलग महत्त्व है। यह भी तय है कि उत्तरप्रदेश के चुनाव परिणाम देश की आगामी राजनैतिक दशा, दिशा को तय करने वाले सिद्ध हो सकते हैं।

तवलीन सिंह जानी मानी लेखिका है. 26 फरवरी, 2017 के अमर उजाला समाचार पत्र में आप पाकिस्तान की दरगाह में हुआ आंतकवादी हमले के विषय में लिखती है... "सिंध में पिछले दिनों जब शहबाज कलंदर की दरगाह पर आत्मघाती हमला हुआ, तो उस हमले के खिलाफ भारत से बहुत कम आवाजें सुनाई पड़ीं.

बचपन में चिड़िया और बहेलिया की कहानी हम सबने पढ़ी थी, जिसमें चिड़िया जाल में फँस जाती हैं, मगर अपनी एकता के बल पर बहेलिये को हराने में सफल हुई थी। अब समुद्र किनारे अयलान कुर्दी नामक बच्चे की लाश "चारा" है, "दाना" है, "चुग्गा" है.

चित्र में आप जिस लडकी को देख रहे हैं, उसका नाम है जोआना पालानी. देखने में भले ही मासूम और सुन्दर दिख रही हो, लेकिन है बेहद खतरनाक.

RSS के आनुषंगिक संगठन जनाधिकार समिति के तत्त्वावधान में आयोजित प्रदेशव्यापी धरने के दौरान उज्जैन में हुई सभा के दौरान संघ के तपे-तपाए स्वयंसेवक और सम्मानित दलित वर्ग से आने वाले उच्च शिक्षित डॉक्टर कुंदन चंद्रावत ने भावावेश में आकर एक गलत बयान दे दिया.

ज़ाहिर है कि शीर्षक पढ़कर आप चौंक गए होंगे. स्वाभाविक सी बात है, क्योंकि आपके दिमाग में यह बैठा दिया गया है कि शिक्षा का अधिकार क़ानून यानी राईट टू एजूकेशन (RTE) एक गरीब समर्थक और समाज की भलाई के लिए बनाया क़ानून है.

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