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सरस्वती नदी से सम्बंधित पिछले लेख (यहाँ क्लिक करके पढ़ा जा सकता है) में आपने इस नदी के इतिहास एवं इसकी पौराणिक उपस्थिति के बारे में जाना था. इस दूसरे भाग में आप जानिये कि स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले से लेकर अभी तक इस नदी को पुनर्जीवित करने के क्या प्रयास हुए हैं और सरकारों तथा शोधकर्ताओं का इसमें कितना योगदान है. 

पिछले कुछ माह में आपने इस प्रकार की ख़बरें बहुत पढ़ी-सुनी होंगी, कि ”भीड़ ने एक मुस्लिम को पीट-पीटकर मार दिया”... “भीड़ ने बीफ के शक में जुनैद को पीटकरमार डाला”, “भीड़ ने गौमांस की आशंका में फलां मुस्लिम के घर का घेराव कर लिया...” आदि-आदि... ज़ाहिर है कि इस प्रकार की हेडलाईन्स देखकर सामान्य व्यक्ति के मन में एक छवि निश्चित बन जाती है कि जब से मोदी सत्ता में आए हैं, अचानक हिन्दू कार्यकर्ता आक्रामक हो गए हैं.

पिछले कुछ वर्षों में भारत में सूखाग्रस्त क्षेत्रों की वृद्धि हुई है. एक तरफ वर्षा की कमी, दूसरी तरफ वनक्षेत्र में कमी, आबादी का बढ़ता घनत्व और विलुप्त होती नदियों के कारण धीरे-धीरे हम एक सूखे भारत की ओर बढ़ रहे हैं. मानसून पर हमारी निर्भरता अच्छी बात नहीं है. ऐसी परिस्थिति में हरियाणा और राजस्थान के मार्ग से बहने वाली प्राचीन सरस्वती नदी का स्मरण होना स्वाभाविक है.

जब भी विनायक दामोदर सावरकर का ज़िक्र आता है, अथवा उनकी जयन्ती/पुण्यतिथि आती है, तो आपने अक्सर देखा होगा कि सावरकर की सभी बातों को दरकिनार करके कुछ निहित स्वार्थी और घटिया तत्व उनके "कथित माफीनामे" को उछालने लगते हैं. चूँकि उनके पास सावरकर की आलोचना करने का कोई और मुद्दा नहीं होता है, इसलिए वे अपनी शर्म छिपाने के लिए इस "नकली मुद्दे" को हवा देते रहते हैं.

जिन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में रूचि है, उन्होंने चाफेकर बंधुओं का नाम जरूर सुना है. परन्तु चूँकि हमारी पाठ्यपुस्तकों में इन बंधुओं और इनके योगदान को उचित स्थान नहीं मिला है, इसलिए आजकल के युवाओं और बच्चों ने इनके बारे में कुछ नहीं जाना.

शीर्षक पढ़कर आप चौंक गए होंगे ना? जी बिलकुल, लेकिन भारत की तथाकथित धर्मनिरपेक्ष अदालतों का यही सच है... चूँकि आरोपी ने रोजा रखा हुआ है इसलिए उसे 29 जून तक गिरफ्तार नहीं किया जाए. पूरा मामला कुछ यूँ है...

देश के कोने कोने में हुए स्वतंत्रता आंदोलनों के बारे में कम जानकारी के चलते न जाने इतिहास के कितने पन्ने अछूते हैं. इसका कारण यह है कि हम कुछ गिने-चुने इतिहासकारों द्वारा पढाए गए मनगढ़ंत इतिहास के जाल में फँस कर रह गए हैं. स्वतंत्रता की चिंगारी को जलाए रखने के लिए बलिदानों की कई अनकही और अनसुनी गाथाएं हैं. यह इन्हीं में से एक है..

हैदराबाद में आपने कई बसें ऐसी देखी होंगी जिनका पंजीकरण नंबर अरुणाचल का है. यह परिवहन में सरकार के एकाधिकार का दोष है| अगर कभी आपने हैदराबाद से चेन्नई के बीच निजी बस ली हो, तो आपने धयान दिया होगा कि बस संभवतः किसी अन्य राज्य जैसे कि अरुणाचल प्रदेश (AR), नागालैंड (NL), पुडुचेरी (PY) या ओडिशा (OD) में रजिस्टर की हुई है|

ऐसा कहा जाता है कि प्यार, युद्ध एवं राजनीति में सब कुछ जायज़ है. जिस समय अमित शाह NDA की ओर से भारत के अगले राष्ट्रपति प्रत्याशी का नाम घोषित कर रहे थे, उस समय किसी ने भी नहीं सोचा था कि वे एक चौंकाने वाला नाम सामने लेकर आएँगे.

नोट :- प्रस्तुत लेख के लेखक गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री स्व छ्वील दास मेहता जी है, ये लेख उन्होंने कच्छमित्र दैनिक में लिखा था, जिसे मै साभार हिंदी में रूपांतरित कर रहा हूँ ताकि हर भारतीय काँग्रेस की इस गंदी सच्चाई को जान सके.

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