क्या आप जानते हैं, भारत का सबसे पहला पायलट कौन?

Written by गुरुवार, 02 नवम्बर 2017 20:35

भारत में सबसे पहले हवाई जहाज़ उड़ाने वाला पायलट (First Indian Pilot) कौन था, इस बारे में सवाल पूछने पर सामान्यतः JRD Tata का नाम सामने आता है. लेकिन क्या यह सच है??

क्योंकि लेख में जिस व्यक्ति की हम बात करने जा रहे हैं, उसे उतनी प्रसिद्धि नहीं मिली, जितनी मिलनी चाहिए थी. बचपन से संघर्षमयी जीवन जीने वाले लेकिन अत्यंत प्रतिभाशाली श्री दत्तात्रय लक्ष्मण पटवर्धन (10 जुलाई 1883 से 18 अक्टूबर 1943) भारत के सबसे पहले पायलट थे. जिनका नाम तक लाखों लोगों ने नहीं सुना होगा.

महाराष्ट्र के कोंकण इलाके में स्थित रत्नागिरी में जन्मे दत्तात्रय पटवर्धन, जिन्हें उनके दोस्त अक्सर “दत्तू” कहकर बुलाते थे, बचपन से ही शरारती और उठापटक करने वाले थे. पाँचवीं कक्षा पास करने के बाद उनकी हरकतों से तंग आकर उनके पिता लखू तात्या ने उन्हें घर से निकाल दिया. इसके बाद दत्तू बाबू कोल्हापुर चले आए. कुछ दिन वहाँ एक होटल में काम किया और फिर बिना टिकट मुम्बई की तरफ भाग निकले, क्योंकि उन्होंने सुना था कि मुम्बई में अच्छी नौकरी मिल जाती है. अच्छी नौकरी तो मिली नहीं, लेकिन फिर भी पेट भरने लायक काम उन्हें मिल गया. अगले छः माह उन्होंने मुम्बई के एक बंदरगाह पर कुली की नौकरी की. मशीनों, वायरिंग, रिपेयरिंग की उनकी जन्मजात प्रतिभा तो थी ही, उसे देखते हुए रेलवे के एक अधिकारी ने उन्हें माटुंगा रेलवे वर्कशॉप में वायरमैन के रूप में नौकरी दे दी. जल्दी ही अपनी प्रतिभा के बल पर दत्तात्रय पटवर्धन रेलवे इंजन ड्रायवर बन गए. अंग्रेजों की टेढ़ी नज़र से बचने और अपनी नौकरी बचाने के लिए उन्होंने चतुराई से अपना नाम “डी. लैक्मैन पैट” (दत्तात्रय लक्ष्मण पटवर्धन का शॉर्टकट) रख लिया.

लेकिन केवल इंजन ड्रायवर बनकर दत्तू खुश नहीं थे. एक दिन उन्हें न जाने क्या सूझी बंदरगाह पर घूमते-घूमते वे एक जर्मन जहाज़ “स्ट्रांस फेल्च” में घुस गए और कोयले की एक बोरी में छिप गए. जब जहाज़ बीच समुद्र में पहुँचा तो ये महाशय कोयले की बोरी से निकलकर जहाज के कैप्टन हेनरिक जोडेल के पास जा पहुँचे और अपनी प्रतिभा एवं कलाकारी के दम पर उन्हें यह मनवाने में सफल रहे कि जहाज के इंजन मेंटेनेंस का काम वे संभाल सकते हैं. कैप्टन ने उन्हें जहाज की वायरिंग की देखभाल का काम सौंप दिया. पटवर्धन के काम की लगन देखकर कैप्टन हेनरिक ने उनकी खासी मदद की, और उन्हें जर्मनी में पासपोर्ट तथा अन्य दस्तावेज मुहैया करवाए, साथ ही हैमबर्ग के मैरीन इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला भी दिलवा दिया. (देखिये, जब व्यक्ति हिम्मत करता है, तो ईश्वर भी किसी न किसी को उसकी मदद के लिए भेज ही देते हैं).

मैरीन इंजीनियरिंग की डिग्री लेने के बाद दत्तू पटवर्धन स्कॉटलैंड चले गए और वहाँ उन्होंने “ओशन किंग” नामक एक विशाल जहाज में इंजीनियर के रूप में नौकरी कर ली. यह जहाज़ 1911 में ब्रिटेन के लिवरपूल से न्यूयार्क के प्रवास पर था. इस जहाज पर उनकी अदभुत प्रतिभा और तकनीकी समझ को देखते हुए कंपनी ने उन्हें 1912 में एक अन्य जहाज “तुकाराम” पर मुम्बई भेज दिया. इस प्रकार उनके जीवन का एक महत्त्वपूर्ण चक्र पूरा हुआ, लेकिन उनकी किस्मत में आगे बहुत कुछ लिखा था.

1914 के आरम्भ में पहला विश्व युद्ध छिड़ गया. दत्तात्रय पटवर्धन खुराफ़ाती होने के साथ हिम्मती और एडवेंचर पसंद तो थे ही. उन्होंने ब्रिटिश युद्ध कार्यालय में जाकर कहा कि वे सेना के “एम्बुलेंस विभाग” में काम करना चाहते हैं. उनके बारे में जानते तो सभी थे, इसलिए उन्हें तत्काल एक “वरिष्ठ सैनिक” के रूप में ब्रिटिश आर्मी की ससेक्स ब्रिगेड में शामिल कर लिया गया. ब्रिटिश सेना में काम के दौरान अब अपने इंजीनियरिंग दिमाग के चलते, उन्होंने विभिन्न हथियारों, रायफलों और बमों के बारे में विशेषज्ञता हासिल करना शुरू कर दिया. फ्रांस के साथ युद्ध में वे अग्रिम मोर्चे पर तैनात भी रहे. फ्रांस में रहते हुए ही दत्तात्रय पटवर्धन को रॉयल एयरफोर्स में शामिल करके उनका प्रमोशन कर दिया गया. उन्हें सेना के अग्रिम मोर्चे पर सामान और हथियार पहुँचाने वाले मालवाहक विमान उड़ाने का मौका मिल गया. बचपन में मुम्बई के रेलवे वायरमैन से शुरुआत करके, जहाज के इंजन की मरम्मत से होते हुए हवाई जहाज़ उड़ाने का यह सफ़र दत्तू के कौशल, प्रतिभा और हिम्मत का ही कमाल थी.

अपने इस कार्यकाल में दत्तू ने विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी की राजधानी बर्लिन पर भी बमबारी की, यहाँ तक कि जर्मनी के प्रसिद्ध कैसर महल पर भी उन्होंने उस समय बमबारी की, जबकि सभी को यह पता था कि वहाँ “एंटी एयरक्राफ्ट गन” लगी हुई हैं. फिर भी अपने विमान को बचाते-बचाते वे दुनिया के पहले बॉम्बर पायलट बने जिसने बर्लिन में जाकर बम गिराए हों. इस विलक्षण कार्य और बहादुरी के लिए किंग जॉर्ज पंचम ने स्वयं “डी.लैकमन पैट” को उच्च मिलिट्री सम्मान दिया. अब यहाँ भी उनकी खुराफात देखिये... बीच समारोह में किंग जॉर्ज के सामने ही उन्होंने ये कह दिया कि वे “डी.लैकमन पैट” नहीं, बल्कि दत्तात्रय लक्षमण पटवर्धन हैं और उन्होंने यह एंग्लो नाम केवल इसलिए रखा कि उन्हें नौकरी मिल जाए. हक्के-बक्के किंग जॉर्ज पंचम ने दत्तू के इस खुलासे का बुरा नहीं माना, बल्कि साफगोई की तारीफ़ ही की, और उसी समारोह में सार्वजनिक रूप से “यंग मराठा इन ब्रिटिश एयरफोर्स” कहकर सम्मान किया. किंग जॉर्ज ने यह निर्देश भी दिया कि इस मराठा योद्धा के खिलाफ ब्रिटिश सेना कोई भी कार्यवाही न करे. यह घटना है 24 अप्रैल 1919 की. उच्च सैनिक सम्मान प्राप्त करने के बाद दत्तू बाबा को रॉयल एयरफोर्स में लेफ्टिनेंट पद पर प्रमोशन मिल गया, और 1920 में उनकी तनख्वाह 1200 रूपए प्रतिमाह हो गयी थी. दत्तात्रय पटवर्धन ने लिखा है कि यह मेरे जीवन का सर्वोच्च खुशी का क्षण था.

1921 में मुम्बई के गवर्नर ने दत्तात्रय को दो दिनों के लिए “शाही अतिथि” के रूप में आमंत्रित किया. फिर दत्तू जी रत्नागिरी पहुंचे और उन्होंने वहाँ चंद्राताई शेवड़े से विवाह किया. पटवर्धन ने 1930 में सेवानिवृत्ति ले ली. दत्तात्रय पटवर्धन की बहादुरी एवं रॉयल एयरफोर्स में हवाई कैरियर का पूरा इतिहास लन्दन के शासकीय गैजेट में 25 मार्च 1921 को प्रकाशित हुआ. ब्रिटेन के लगभग सभी अखबारों ने चित्र सहित दत्तात्रय पटवर्धन की पूरी स्टोरी 13 मई 1919 के अंकों में छापी. भारत में भी दत्तू जी के बारे में सबसे पहला लेख लोकमान्य तिलक के अखबार “केसरी” में 13 मई 1919 को ही प्रकाशित हुआ.

1939 में दूसरा विश्व युद्ध छिड़ गया. रिटायर होने के बावजूद ब्रिटिश सरकार ने दत्तात्रय पटवर्धन से आग्रह किया कि वे दिल्ली में प्रस्तावित “ऑल इण्डिया मिलिट्री, नेवल एंड एयरफोर्स एकेडमी” (All India Military, Naval and Airforce Academy) की स्थापना में भूमिका निभाएँ. पटवर्धन ने यह जिम्मेदारी भी बखूबी निभाई. इस अकेडमी में दत्तात्रय ने कई सिपाहियों और पायलटों को प्रशिक्षण दिया. 18 अक्टूबर 1943 को कैंसर से पीड़ित होकर दत्तात्रय पटवर्धन की मृत्यु हुई. उनकी पत्नी और एकमात्र पुत्र नागपुर में जा बसे. आज की तारीख में उनका पोता प्रभाकर पटवर्धन कांदिवली मुम्बई में एक इंजीनियरिंग कंपनी का सञ्चालन करता है... (इंजीनियरिंग इस खानदान के खून में ही है).

अंत में यह उल्लेख करना आवश्यक है कि अक्सर “भारत के सबसे पहले पायलट” के रूप में जेआरडी टाटा का नाम लिया जाता है, जिन्होंने 1927 में सबसे पहले हवाई जहाज़ उड़ाया, लेकिन वास्तव में दत्तात्रय पटवर्धन ने टाटा से काफी पहले अर्थात 1914 में ही बॉम्बर विमान उड़ाकर इतिहास बना दिया था. अतः इस मराठा लड़ाके को समुचित सम्मान देकर इन्हें “भारत का पहला पायलट” घोषित किया जाना चाहिए.

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