सोमरस क्या है? What is Somras? :– सही तथ्य जानिये

Written by सोमवार, 30 अक्टूबर 2017 07:35

सनातन धर्म को लेकर इससे ईर्ष्या-द्वेष करने वाले विधर्मी कई बातों को लेकर सामान्य लोगों में भ्रम और झूठ फैलाने का प्रयास सतत करते रहते हैं. जैसे कि यह झूठ फैलाया जाता है कि प्राचीन वैदिक काल में गौमांस खाया जाता था, अथवा वैदिक काल में सनातन धर्मी ऋषि-मुनियों ने सारा ज्ञान अपने पास छिपाकर रखा, गरीबों-वंचितों को नहीं दिया इत्यादि.

बारम्बार ऐसे झूठों का पर्दाफ़ाश किया जाता रहा है. इसी प्रकार का एक भ्रम “सोमरस” (Somras) शब्द को लेकर भी फैलाया जाता है. हमारे वेद, पुराण आदि धार्मिक ग्रंथों में सोमरस का वर्णन आता है. अधिकांश लोग सोमरस को शराब (Wine) या मदिरा (Liquor) समझते है, हालांकि यह तथ्य बिलकुल गलत है. सोमरस, मदिरा और सुरापान तीनों में फर्क है.

विधर्मियों द्वारा फैलाए गए दुष्प्रचार के अनुसार वैदिक काल में देवता, राजा-महाराजा अथवा बड़े-बड़े विद्वान लोग “सोमरस” का सेवन करते थे, और यह शराब का ही एक रूप था. असल में उनके कहने का मतलब यह होता है, कि जिस प्रकार बाहरी देशों से शराबी-कबाबी आक्रान्ता आते थे और यहाँ की हिन्दू स्त्रियों का अपहरण करके हरम बनाते थे, उसी प्रकार हमारे देवता, ऋषि और राजा भी शराबी थे. ऐसा कहकर वे हमारे देवताओं का अपमान तो करते ही हैं, साथ ही ऋषियों एवं वीर राजाओं को बाहरी आक्रान्ताओं के समकक्ष खड़ा करने का असफल प्रयास भी करते हैं. इन्हीं तथाकथित विद्वानों के “स्लीपर सेल” फिल्म-टीवी इंडस्ट्री में भी फैले हुए हैं, इसीलिए हमें कितने ही टी.वी. सीरियल में दिखाया जाता है कि देवता इन्द्र की सभा में सुन्दर अप्सराएँ सोमरस पिलाती हैं, और सभी देव उसका आनन्द लेते हैं. अखबारों अथवा चर्चाओं में भी चुपके से यह बात डाली जाती है कि देवता भी शराब पीते थे. अक्सर शराब के समर्थक यह कहते सुने गए हैं कि सोमरस क्या था, शराब ही तो थी. क्या सच में वैदिक काल में सोमरस के रूप में शराब का प्रचलन था या ये सिर्फ एक भ्रम है? चूंकि दुष्प्रचार करने वाले लोग वेदों की बात करके भ्रम फैलाने का प्रयास करते हैं, इसलिए आइये इसके बारे में वेदों से ही सबूत लेकर सभी तथ्य जानें...

वास्तव में तथ्य यह है कि उस कालखंड में आचार-विचार की पवित्रता का इतना ध्यान रखा जाता था, कि जरा भी कोई इस पवित्रता को भंग करता था उसका बहिष्कार कर दिया जाता था... या फिर उसे कठिन प्रायश्चित करने होते थे. सामान्य-सी बात है कि सनातन धर्म शराब पीने और मांस खाने की इजाजत नहीं दे सकता. यह भी सच है कि धर्म-अध्यात्म की किताबों में हम जगह-जगह नशे की निंदा या बुराई सुनते हैं, तब धर्म के रचनाकर और देवता कैसे शराब पी सकते हैं? ऋग्वेद में शराब की घोर निंदा करते हुए कहा गया है - "हृत्सु पीतासो युध्यन्ते दुर्मदासो न सुरायाम्" यानी की सुरापान करने या नशीले पदार्थों को पीने वाले अक्सर युद्ध, मार-पिटाई या उत्पात मचाया करते हैं.

ऋग्वेद में ही कहा गया है - "यह निचोड़ा हुआ शुद्ध दधिमिश्रित सोमरस, सोमपान की प्रबल इच्छा रखने वाले इंद्र देव को प्राप्त हो।। (ऋग्वेद-1/5/5)" "हे वायुदेव यह निचोड़ा हुआ सोमरस तीखा होने के कारण दुग्ध में मिश्रित करके तैयार किया गया है। आइए और इसका पान कीजिए।। (ऋग्वेद-1/23/1) यहां इन सारी ही ऋचाओं में सोमरस में दूध व दही मिलाने की बात हो रही है. स्वाभाविक है कि शराब में दूध-दही तो नहीं मिलाया जा सकता, यानी सोमरस शराब अथवा मदिरा नहीं हो सकता. यहां यह एक ऐसे पदार्थ का वर्णन किया जा रहा है जिसमें दही भी मिलाया जा सकता है. इसलिए यह बात स्पष्ट हो जाती है कि सोमरस जो भी हो, लेकिन वह शराब या भांग तो कतई नहीं थी और इससे नशा भी नहीं होता था. मदिरा के पान के लिए “मदपान” शब्द का इस्तेमाल किया गया है, जबकि सोमरस के लिए सोमपान का उपयोग हुआ है. मद का अर्थ नशा या उन्माद है जबकि सोम का अर्थ शीतल-अमृत होता है.

अब प्रश्न उठता है कि सोमरस का प्रयोग कब किया जाता था? असल में देवताओं के लिए यह मुख्य पदार्थ था, और अनेक यज्ञों में इसका उपयोग होता था. वराहपुराण के अनुसार ब्रहमा अश्विनी कुमार जो कि सूर्य के पुत्र थे, उन्हें उनकी तपस्या के फलस्वरूप सोमरस का अधिकारी होने का आशीर्वद देते हैं यानी इसका अधिकार केवल देवताओं को था. जो भी देवत्व को प्राप्त होता था उसे भी तपस्या के बाद हवन के माध्यम से ही सोमरस पान का अधिकार मिलता था. इतनी पवित्र वस्तु शराब कैसे हो सकती है?
एक मान्यता ये भी है कि, सोम नाम की लताएं पहाड़ों पर पाई जाती हैं. राजस्थान के अर्बुद, उड़ीसा के हिमाचल की पहाड़ियों, विंध्याचल, मलय आदि अनेक पर्वतीय क्षेत्रों में इसकी लताओं के पाए जाने का उल्लेख मिलता है. कुछ विद्वान मानते हैं कि अफगानिस्तान की पहाड़ियों पर ही सोम का पौधा पाया जाता है. यह बिना पत्तियों का गहरे बादामी रंग का पौधा है. अन्य अध्ययनों से पता चलता है कि वैदिक काल के बाद, यानी ईसा के काफी पहले ही इस पौधे की पहचान मुश्किल होती गई. ये भी कहा जाता है कि सोम (होम) अनुष्ठान करने वाले लोगों ने इसकी जानकारी आम लोगों को नहीं दी, उसे अपने तक ही रखा और कालांतर में ऐसे अनुष्ठान करने वाले खत्म होते गए. यही कारण रहा कि सोम की पहचान मुश्किल होती गई.
ऋग्वेद में सोमरस निर्माण की विधि बताई गई है -

।।उच्छिष्टं चम्वोर्भर सोमं पवित्र आ सृज। नि धेहि गोरधि त्वचि।। (ऋग्वेद सूक्त २८ श्लोक ९)
यानी मूसल से कुचली हुई सोम को बर्तन से निकालकर पवित्र कुशा के आसन पर रखें और छानने के लिए पवित्र चरम पर रखें।

।।औषधि: सोम: सुनोते: पदेनमभिशुण्वन्ति|। - निरुक्त शास्त्र (११-२-२)
यानी सोम एक औषधि है जिसको कूट-पीसकर इसका रस निकालते हैं. सोम को गाय के दूध में मिलाने पर ‘गवशिरम्’दही में ‘दध्यशिरम्’बनता है. शहद या घी के साथ भी मिश्रण किया जाता था. सोम रस बनाने की प्रक्रिया वैदिक यज्ञों में बड़े महत्व की है.

इसकी तीन अवस्थाएं हैं- पेरना, छानना और मिलाना। कहा जाता है ऋषि-मुनि इन्हें अनुष्ठान में देवताओं को अर्पित करते थे और बाद में प्रसाद के रूप में खुद भी इसका सेवन करते थे. सोमरस एक ऐसा पेय है, जो संजीवनी की तरह काम करता है. यह शरीर को हमेशा जवान और ताकतवर बनाए रखता है (ज़ाहिर है कि यह पदार्थ शराब या नशे की कोई वस्तु तो हो नहीं सकती)

।।स्वादुष्किलायं मधुमां उतायम्, तीव्र: किलायं रसवां उतायम। उतोन्वस्य पपिवांसमिन्द्रम, न कश्चन सहत आहवेषु।। - ऋग्वेद (६-४७-१)

यानी सोम बहुत स्वादिष्ट और मीठा पेय है. इसका पान करने वाला बलशाली हो जाता है. वह अपराजेय बन जाता है. शास्त्रों में सोमरस लौकिक अर्थ में एक बलवर्धक पेय माना गया है. क्या शराब पीने से कभी किसी मनुष्य में बल आ सकता है? या वह शरीर को जवान बनाए रख सकता है? लेकिन चूंकि हिन्दू धर्म को बदनाम करना होता है, इसलिए विधर्मी सोमरस को “शराब” के रूप में प्रचलित करते हैं. कुछ वर्ष पूर्व इरान की पहाड़ियों में इफेड्रा नामक पौधा खोजा गया, जिसे सोमलता माना गया है.
यदि सोमरस का आध्यात्मिक पहलू देखें तो यह माना जाता है, कि मनुष्य जब साधना की उच्च अवस्था में पहुँचता है तब इंसान के शरीर में पैदा होने वाला रस ही सोम है. इसके लिए कहा गया है ||“...सोमं मन्यते पपिवान् यत् संविषन्त्योषधिम्। सोमं यं ब्रह्माणो विदुर्न तस्याश्नाति कश्चन।। (ऋग्वेद-१०-८५-३) यानी एक सोमरस हमारे भीतर भी है, जो अमृतस्वरूप परम तत्व है जिसको खाया-पिया नहीं जाता केवल ज्ञानियों द्वारा ही पाया जा सकता है.

संक्षेप में कहने का तात्पर्य यह है कि सनातन धर्म को बदनाम करने, इसकी खिल्ली उड़ाने अथवा सनातन धर्म को दूसरे रेगिस्तानी पंथों के समकक्ष खड़ा करने की दानवी इच्छा के चलते विधर्मी और बिकाऊ लोग हमारे वैदिक ग्रंथों से विभिन्न शब्दों का मनमाना अर्थ निकालते हैं और उसका दुष्प्रचार करते हैं. परन्तु हमें भी सभी सनातनियों के बीच सही स्थिति पहुँचाने का सतत प्रयास करते रहना होगा.

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