जौहर के बारे जानते हैं, "शाका" के बारे में भी जानें...

Written by सोमवार, 17 दिसम्बर 2018 13:36

राजपूत राज्य के किले के द्वार तक जब दुश्मन पहुँच गया हो, किले के अन्दर रसद खत्म हो गए हों, और जब हार निश्चित हो, तब, विशेषकर उत्तर-पश्चिमी भारत में, एक सम्मान-संहिता का पालन किया जाता था जिसे सुनकर आज भी आश्चर्य होता है और रूह काँप जाती है. दुश्मनों का किले के अन्दर घुसपैठ होने से पहले भीतर की सभी वीरांगनाएं, रानी-सा के नेतृत्व में, अपने बच्चों के साथ, सुहाग की निशानियों और आभूषण पहने एक साथ एक बड़ी चिता में कदम रखती थी और अग्नि में भष्म हो जाती थी. इसे जौहर कहा जाता था. इसी दरम्यान जब वीरांगनाएं राख हो रही होती थीं, राजपूत योद्धा अपने जीवन की अंतिम लड़ाई लड़ रहे होते थे जिसे शाका कहा जाता था। किला-द्वार को पूर्णतः खोल दिया जाता था और योद्धा केसरिया वस्त्र धारण कर, जो हिन्दू धर्म में त्याग का प्रतीक है, मुख में तुलसी पत्र लिए अंतिम सांस से पहले अधिक से अधिक संख्या में दुश्मनों का वध करने के उद्देश्य से उनपर टूट पड़ते थे.

जौहर में भष्म हुई इन महिलाओं को वीर-पतिव्रता के मिसाल के रूप में देखा जाता था जो अपने पति के लिए ऐसी गहरी आस्था रखती थीं कि जुदाई और अपमान के जीवन को कुर्बान कर अब अगले जन्म में ही इस पवित्र सम्बन्ध को निभाना स्वीकार करती थी। शाका (या साका) के लिए जंग के मैदान में कूद पड़ने वाले पुरुष योद्धा भी अति सम्मान की नजर से देखे जाते थे। राजपूत अपने इसी अदम्य साहस और निष्ठा के लिए प्रख्यात थे.

चित्तौड़गढ़ के जौहर

वर्तमान राजस्थान में स्थित मेवाड़ क्षेत्र के चित्तौड़गढ़ की धरती 1303 ई., 1535 ई. और 1568 ई. में जौहर के कम से कम तीन वाकये की गवाह रही है. जब जौहर और इससे जुडी रानी पद्मिनी को याद किए जाता है तो जेहन में मेवाड़ की धरती की याद सबसे पहले आती है. कहा जाता है, मुस्लिम तानाशाह अलाउद्दीन खलजी सुविख्यात रानी पद्मिनी की सुंदरता से इतना मतिभ्रम था कि उसने चित्तौड़ के किले पर कब्जा करने का निर्णय लिया. हालांकि, रानी ने सम्मान-संहिता का पालन किया और उसके हाथ न आई. जबकि कई इतिहासकारों का मानना ​​है कि वीरगाथा पद्मावत में उल्लेखित पद्मिनी की कहानी कल्पना मात्र है, 1303 ई. में खलजी के चित्तौड़ आक्रमण पर घटित जौहर के साहित्यिक साक्ष्य आज भी उपलब्ध हैं. खलजी के कुत्सित आक्रमणों से शुरू हुई राजपूत रानियों की आत्मदाह की कई ऐसी कहानियां इतिहास के पन्नो में दर्ज हैं.

अपने पुत्र का शासन सम्हाल रही रानी कर्णावती पर गुजरात के मुस्लिम शासक बहादुर शाह के आक्रमण के फलस्वरूप चित्तौड़ में हुए जौहर का दूसरा उदाहरण दर्ज है. उनके पति राणा सांगा को खनवां की लड़ाई में मुगल राजा बाबर द्वारा हार का सामना करना पड़ा जिसमे वह वीरगति को प्राप्त हुए। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि रानी ने सती(अपने पति की मृत्यु पर एक पत्नी के स्वैच्छिक आत्मदाह) न होकर अपने पति के राज्य-प्रबंधन को अपने हाथों में लेना स्वीकार किया। बहादुर शाह के हमले से राज्य के बचाव में असमर्थ, उन्होंने मुगल सम्राट हुमायूं को एक राखी रक्षा-सन्देश के रूप में भेजा. पर दुर्भाग्यवस, राखी के समय पर न पहुँच पाने के कारण उन्होंने जौहर-शाका का निर्णय लिया। एक चाहरदीवारी में बंद, 13000 अन्य महिलाओं और बच्चों के साथ स्वयं की चिता जलाने के लिए उन्होंने बारूद के प्रयोग का आदेश दिया.शिशु राजकुमार की सुरक्षा और वंश के भविष्य की बागडोर पन्नादाई के हाथों सौंपते हुए उन्होंने इस जग से विदा लिया. किले के योद्धाओं ने भगवा पहन स्वयं को अंतिम युद्ध में झोंक दिया. कुछ ही वर्षों बाद, चित्तौड़ के किले सहित मेवाड़ के राज्य पर सिसोदिया राजपूतों ने विजय प्राप्त किया और क्रमशः विक्रमादित्य और उदय सिंह द्वितीय ने शासन स्थापित किया – ये वही दो राजकुमार थे जिन्हें 1535 ई. के जौहर-शाका के समय सुरक्षित बचा लिया गया था.

चित्तौड़ के किले में तीसरे और अंतिम जौहर-शाका के लिए, जिसका लिखित साक्ष्य आज भी उपलब्ध है, मुगल शासक अकबर को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। उस वक्त मेवाड़ पर राणा सांगा और रानी कर्मवती के चौथे पुत्र राणा उदय सिंह द्वितीय का शासन था। कई राजपूत शासकों ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली थी लेकिन मेवाड़ ने झुकने से इंकार कर दिया। रणनीति के तहत राणा उदय सिंह द्वितीय ने अपने वफादार सरदारों राव जयमल और पत्ता के हाथों में चित्तौड़ की सत्ता सौंपकर अपनी अस्थायी राजधानी गोकुंडा में स्थापित करने का फैसला किया। 1567 ई. में अकबर द्वारा चित्तौड की घेराबंदी एक क्रूरता भरी दास्ताँ है. अकबर के आदेशानुसार 5,000 से अधिक विशेषज्ञ भवन-निर्माताओं, बढ़ई और पत्थर के कारीगरों को किले के दीवारों में सेंध लगाने और सुरंग खोदने के काम में लगाया गया जिसमे राजपूतों द्वारा रक्षार्थ गोले दागने से सैकड़ों कारीगरों की मृत्यु हो गई। चार महीने की असफल घेराबंदी के बाद गुस्से में आकर अकबर ने आम लोगों के नरसंहार का आदेश दे दिया।

“द मुग़ल एम्पायर” में जॉन एफ. रिचर्ड्स कहते हैं: “जल्द ही किले के अन्दर से ऊँचा उठता धुंआँ जौहर की रस्म का संकेत दे रहा था जिसमे राजपूत योद्धाओं ने अपने-अपने परिवार की आहुति दे डाली और स्वयं भी एक सर्वोच्च बलिदान के लिए तैयार हो गए.”
इतिहासकार सतीश चंद्र के अनुसार, निर्णायक युद्ध के लिए किले से बाहर निकले राजपूत योद्धाओं के अलावा, किले के भीतर मंदिरों की रक्षा करते हुए 8,000 से अधिक योद्धा बलिदान हो गए। इस युद्ध में राजपूत सैनिकों की सहायता कर रहे किसानों सहित लगभग 30,000 लोग मारे गए थे।

अकबर की जीवनी में, अबुल फजल ने चित्तौर नरसंहार के बारे में लिखा है:

“इस ऐतिहासिक दिन, यद्यपि उस स्थान पर एक भी ऐसा घर या गली नहीं थी जहाँ नरसंहार किये हुए शवों का ढेर न पड़ा हो, तीन ऐसे प्रमुख स्थल थे जहाँ आश्चर्यजनक रूप से शव का बड़ा ढेर पड़ा था. पहला स्थान था राणा का महल, जहाँ राजपूत बड़ी संख्या में डेट रहे और जब तक अंतिम राजपूत के हाथ में तलवार रही, तब तक 2-3 लड़ाकों की छोटी-छोटी टुकड़ियों में साम्राज्यवादियों पर हमला कर विजय प्राप्त करते रहे. दूसरा था उनके पूजा का मुख्य स्थान- महादेव का मंदिर, जहां बड़ी संख्याँ में राजपूत योद्धा रक्षार्थ तलवारों के भेंट चढ़ गए. और तीसरा था रामपुर द्वार, जहां इन समर्पित योद्धा बड़ी संख्या में कुर्बान हो गए.”

दस्तावेजों से जौहर-शाका के अन्य उदाहरण

राजस्थान स्थित जैसलमेर की धरती दो भयानक जौहर की साक्षी रही है। पहली घटना 1298 ई. की है जब भाटियों ने खलजी के लिए कीमती सामान ले जा रहे एक कारवां को लूट लिया था. इसका बदला लेने के लिए अलाउद्दीन खलजी के सैनिकों ने भाटियों पर आक्रमण किया. इस आक्रमण के फलस्वरूप 24,000 महिलाओं ने स्वेच्छा से खुद को अग्नि के हवाले कर दिया और 3,800 पुरुष शाका की भेंट चढ़ गए। खलजी के हाथ आया वह किला कुछ वर्षों तक वीरान रहा, लेकिन भाटियों ने जल्द ही इसपर पुनः अधिकार प्राप्त कर लिया। इस घटना के लगभग 100 वर्षों बाद एक और ऐसी ही घटना हुई. जैसलमेर के राजा ने दिल्ली पर शासन कर रहे एक और तानाशाह सुल्तान फिरोज शाह तुगलक के एक घोडा पर कब्जा कर लिया. इसके फलस्वरूप तुगलक के आक्रमण ने इस रेगिस्तानी किले के इतिहास को फिर से दुहराया। इस बार आक्रान्ताओं के चुंगल से बचने के लिए 16,000 महिलाओं ने आत्मदाह कर लिया.

इतिहास के पन्नों में जौहर-शाका के घटना कई बार और दर्ज हुई, जैसे रणथम्भोर में 1301 ई. में(हम्मीर देव के राज्य पर अलाउद्दीन खलजी के हमले के दौरान); चंदेरी में 1528 ई. में (मेदिनी राव के राज्य पर बाबर के हमले के दौरान); 1532 ई. रायसीन में(बहादुर शाह के सिलहादी राज्य पर हमले के दौरान); और फिर 1543 में (पूरणमल के राज्य पर शेर शाह के हमले के दौरान)।

1634 ई. में बुंदेलों पर औरंगजेब के कुख्यात आक्रमण के कारण भी एक जौहर की घटना हुई, जिसमे, जौहर में असफल महिलाओं को मुग़लिया हरम में डाल दिया गया, दो राजपूत राजाओं को जबरन इस्लाम धर्म स्वीकार करवाया गया और तीसरे, जिसने धर्मपरिवर्तन स्वीकार करने से मना कर दिया, को मौत के घाट उतर दिया गया. यहां तक ​​कि दक्षिण भारत में, 1327 ई. में मुहम्मद बिन तुगलक द्वारा एक पूर्व होयसल सेनापति सिंगेय नायक तृतीय द्वारा स्थापित राज्य कम्पिली पर आक्रमण के दौरान भी जौहर की घटना के साक्ष्य मिलते हैं। महिलाओं ने खुद को अग्नि के हवाले कर दिया था और सेनापति ने तत्कालीन राजा के सिर को काट कर विजय-संकेत के रूप में तुगलक को भेज दिया था। उसी कम्पाली साम्राज्य के खंडहर पर विजयनगर साम्राज्य की नींव पड़ी.

15 वीं सदी में संस्कृत भाषा में रचित हम्मीर महाकाव्यम में रणथमभोर के चौहान राजा हम्मीर पर अलाउद्दीन खलजी के बड़े पैमाने पर किये गए आक्रमण का वर्णन मिलता है। इसमें वर्णन है कि खलजी ने राजा हम्मीर के भाई को अपने पाले में कर लिया और आक्रमण टालने के एवज में बड़ा हर्जाना और राजा हम्मीर की बेटी का हाथ माँगा. भंडारघर से अनाज ख़त्म होता जा रहा था. हम्मीर की रानी और यहां तक ​​कि उसकी निराश बेटी ने राजा हम्मीर से खुद को दुश्मनों को सौंप किले को बचाने का आग्रह किया. इस महाकाव्य में यह उद्धृत है कि हम्मीर को अपनी बेटी को अशुद्ध मलेच्छ को सौंप देना वैसा ही लग रहा था जैसे कोई अपने मृत्यु को टालने के लिये स्वयं के शरीर के मांस का भक्षण कर रहा हो। अतः सभी महिलाओं द्वारा एक जौहर आयोजित किया गया और राजा हम्मीर मुसलमान सैनिकों के विरुद्ध खेत आये। अमीर खुशरो ने भी रणथंभौर के इस जौहर का विवरण फारसी भाषा में भी लिखा है।

एक वाघेला राजपूत रानी कमला देवी, जो जौहर करने में असफल रही, अलाउद्दीन खलजी के चुंगल में फंस गयी। उनका अपहरण कर खलजी ने उनसे जबरन निकाह किया. जब उनकी अतिखूबसूरत बेटी, देवल देवी, बड़ी हुई, उसका निकाह खलजी के बेटे खिज्र खान से कर दिया गया. यही नहीं, खिज्र खान के भाईयों में भयानक आपसी लड़ाई के फलस्वरूप एक-एक कर उसके दो भाईयों ने देवल देवी का अपहरण कर उससे निकाह किया.

मुस्लिम जगत में गुलामों का फैलता बाजार

प्रत्यक्ष तौर पर, जौहर-शाका मुख्य रूप से बलात्कार, अनादर और दासता, और शायद मुस्लिम सेनाओं द्वारा लाशों का बलात्कार करने से बचने के लिए किया जाता था. आठवीं शताब्दी में सिंध पर अरबी आक्रमण क्रूरता और भयानकता के लिए कुप्रसिद्ध है. “अल हिंद, द मेकिंग ऑफ़ द इंडो-इस्लामिक वर्ल्ड” के लेखक आंद्रे विंक के अनुसार, अरब भारत में पहले आक्रमणकारी थे जिन्होंने यहाँ के मूल निवासियों को बड़ी संख्या में बंदी बनाकर गुलाम के तौर पर रखा. आक्रमण का जिक्र करते हुए, वह यह भी कहते हैं:

“… निर्विवाद ही, कई महिलाओं और बच्चों को गुलाम बना दिया गया था। सूत्रों से पता चलता है कि, धार्मिक कानून का कर्तव्यनिष्ठ रूप से पालन करते हुए, ‘दासों और लूट का पांचवां हिस्सा’ खलीफा के राजकोष के लिए अलग कर इराक और सीरिया के लिए भेज दिया जाता था। बाकी लूट का माल मुसलमानों की सेना में बाँट दिया जाता था. रुर में 60,000 कैदियों को दासता में धकेल दिया गया। कथिक तौर पर मुल्तान में 6,000 और ब्राह्मणबाद में 30,000 लोगों को गुलाम बनाया गया। इस प्रकार के दस्ता फ़ैलाने वाले आक्रमण उमाय्याद काल के बाद तक सिर्फ सिंध में ही नहीं बल्कि हिंदुस्तान में ज्यादा हुए, और उज्जैन एवं मालवा तक हुए. अब्बासिद गवर्नरों ने पंजाब पर भी धावा बोला, जहां से कई लोगों को कैद कर गुलाम बनाकर अन्य देश ले जाया गया. ”

11 वीं शताब्दी में, गजनी के सुल्तान महमूद ने भारत को लूटने के लिए लगातार कई बार आक्रमण किया जिसमे सामूहिक हत्याएं और मंदिरों के विनाश के साथ-साथ बड़ी संख्याँ में लोगों को गुलाम बनाया गया. इतिहासकार अल उत्बी ने कहा है(राजा जयपाल के राज्य पर महमूद के हमले के बारे में): “ईश्वर में विश्वास रखने वाले को ईश्वर ने अकूत धन-सम्पदा और 5 लाख पुरुष और स्त्री गुलाम बख्शा है.” बंदियों में राजा जयपाल, उनकी संतान, उनके संतानों की संतानें, भतीजे और कई सगे-सम्बन्धी थे जिन्हें गजनी के गुलामबाज़ार में बेचने के लिए ले जाया गया.

महमूद के निन्दुना(पंजाब) पर 1014 ई. के आक्रमण के बारे में अल-ऊत्बी ने कहा है: “दासों की संख्याँ इतनी ज्यादा थी की उनका मूल्य बहुत सस्ता हो गया था; इस राज्य के सम्मानित लोगों को गजनी में दुकानदारों का गुलाम बनाया गया.” महमूद के थानेसर(हरयाणा) पर आक्रमण के विषय में इतिहासकार फ़रिश्ता ने लिखा है “मुसलमान सेना 2 लाख लोगों(क़रीब दो सित हज़ार बंदा) को बंदी बनकर ले गई जिससे राजधानी भारतीय लोगों से भरी लगती थी; हरेक सैनिक के पास कई गुलाम और दास-लड़कियां थीं.”

मुस्लिम इतिहासकारों के अनुसार जब तक मुस्लमान शासकों का भारत पर साम्राज्य रहा, यहाँ तक कि मुग़ल काल में भी, गुलाम बनाने की ऐसी क्रूरतम घटनाएँ ज़ारी रही. कहीं गुलामों की संख्या का उल्लेख मिलता है और कहीं नहीं लेकिन कई सूत्रों ने गुलामों का दाम सस्ता होना और इनकी बहुतायत में उपलब्धता को प्रसन्नतापूर्वक व्यक्त किया है. अल्लाउदीन खलजी की सेवा में 50000 गुलाम लड़के थे और फिरोजशाह के पास 1,80,000! संगीतकार अमीर खुशरो ने लिखा है कि तुर्क, हिन्दुओं को जब मन चाहे बंदी बना सकते थे और खरीद बेच भी सकते थे. स्त्री-बंदियों को विश्व में मुस्लिम जनसंख्याँ बढाने के औजार के रूप में देखा जाता था. इनसे दिल्ली के गुलाम बाज़ार में नया माल आता रहता था. इससे पंजाब में ‘गाखर’ नामक व्यापारी समुदाय का उदय हुआ जो मध्य एशिया के घोड़ों के एवज में भारत के गुलामों का व्यापार करते थे. हिन्दू-गुलामों को हिन्दुकुश(फारसी में इसका मतलब ‘हिन्दुओं का हत्यारा’ है) के रास्ते मध्य एशिया के गुलाम बाज़ार में हज़ारों की संख्या में ले जाया जाता था. अत्यधिक ठण्ड न झेल पाने के कारण कई गुलाम रास्ते में ही मर जाते थे, जिससे इस पर्वत का नाम हिन्दुकुश पड़ा. स्कॉट सी. लेवी के अनुसार हिन्दुओं की मांग मध्य एशिया के शुरू के गुलाम बाज़ारों में इसलिए ज्यादा थी क्योंकि मुस्लिम समाज में इनकी पहचान अल्लाह में विश्वास न रखने वाले या काफिरों की थी. लेवी के मुताबिक इन बाजारों में भारत के कुशल कारीगर और सुन्दर लड़कियों की विशेष मांग थी:

“कुशल गुलामों की विशेष मांग थी. भारत में अपेक्षाकृत बड़े और अधिक उन्नत वस्त्र उद्योग, शानदार शाही वास्तुकला स्थापित थी और कृषि पैदावार भी अधिक थी. भारत के पडोसी देशों को इससे पता चलता था कि इस उपमहाद्वीप में कुशल कारीगर बहुतायत मात्रा में उपलब्ध थे. इस कारण प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक शक्तियाँ सफल आक्रमणों के बाद बड़ी संख्या में कारीगरों को गुलाम बनाकर अपने देश ले जाते थे। उदाहरण के लिए, तैमुर के 14वीं सदी के उत्तरार्ध में दिल्ली पर आक्रमण के दौरान, कई हजार कुशल कारीगरों को गुलाम बनाया गया और मध्य एशिया ले जाया गया। तैमुर ने इन दासों को अपने अधीन अभिजात वर्ग को सौंप दिया, हालांकि, उसने समरकंद की समृद्ध राजधानी में स्थित बीबी खानम मस्जिद के निर्माण के लिए राज-मिस्त्रियों को अपने पास रख लिया। शायद इसलिए, यह आश्चर्य की बात नहीं है कि, आमतौर पर, आकर्षक, युवा स्त्री-दास निर्माण-प्रौद्योगिकी में कुशल लोगों की तुलना में ऊंचे दाम पर बिकती थीं. ” – स्कॉट सी लेवी, हिंदूज़ बियॉन्ड द हिन्दुकुश: इंडियंस इन द सेंट्रल एशियन स्लेव ट्रेड

अकबर ने दो बार फैसला किया कि महिलाओं और बच्चों को गुलाम बनाए जाने को रोका जाना चाहिए। पर इस निर्णय को स्वयं उसके सेनापतियों और उत्तराधिकारी शासकों द्वारा गंभीरता से नहीं लिया गया; और ख़ुद अकबर ने भी तब नैतिकता तो ताक पर रख दिया जब उसने चित्तौर की घेराबंदी कर महिलाओं, बच्चों सहित सभी को जान से मारने का आदेश दिया। अकबर के शासन के दौरान बच्चों का अपहरण और व्यापार आम बात थी. इसका उल्लेख उसके बेटे जहांगीर के संस्मरण में भी मिलता है. विदेशी यात्रियों मनरिक और बर्नियर ने भी लिखा है कि शाहजहां और औरंगजेब के शासनकाल के दौरान कर न चुका पाने की स्थिति में, कर-संग्रहक, किसान को उसकी पत्नी और बच्चों सहित विभिन्न गुलाम-बाजारों और मेलों में बेच देते थे.

भारत के हर मायने में एक अमीर देश था- धन-वैभव में, मानव संसाधन में, कुशल कारीगरी में – – लेकिन इससे बढ़कर मुस्लिम आक्रमणकारियों को कोफ़्त इस बात से होती थी कि यह काफिरों का देश था. और इस कारण वे बार-बार आक्रमण करते थे. भारत के मूर्ति-पूजक हिन्दुओं को मारना या इस्लाम धर्म स्वीकार करवाना इस्लाम धर्म में पुण्य का काम माना जाता था.

राजपूत महिलाओं ने बहादुरी के कीर्तिमान गढे

मुसलमान-शासित भारत में, लोगों को गुलाम बनाने और उनकी खरीद-फरोख्त करने का फलता-फूलता बाज़ार देखकर यह आश्चर्यजनक नहीं लगता कि कई सारे राजपूत वंशों ने, हार निश्चित होने की स्थिति में, जौहर-शाका को अपनाया. चूंकि हिन्दू धर्म में आत्मा की मुक्ति के लिए दाह-संस्कार को एक पवित्र कर्म मानते हैं, राजपूत स्त्रियों ने मृत्यु के लिए जहर खाने या अन्य उपाय को छोड़ जौहर का चुनाव किया.

सामाजिक विज्ञान के कई शोधकर्ता जौहर को एक ऐसी प्रथा के रूप में देखते हैं जिसके द्वारा असहाय महिलाओं को पितृसत्तात्मक समाज द्वारा पीड़ित किया जाता था. उनका ऐसा दृष्टिकोण, उनकी, न केवल हिंदू धर्म के बारे में, बल्कि मध्यकालीन मुस्लिम शासकों की घोर धार्मिक असहिष्णुता और हिंसक विचारधारा से पीड़ित भारतीय समाज की स्थिति के बारे में अज्ञानता भी दर्शाती है. ऐसी सोंच इस तथ्य को भी नजरअंदाज करता है कि तत्कालीन राजपूत महिलाएं अपने-अपने पुरुषों से अदम्य साहस और सम्मान के मानदंडों पर खड़ा उतरने की अपेक्षा रखती थीं. राजपूत लोकगीतों में ऐसी कई उदहारण मिलते हैं जिसमे राजपूत स्त्रियाँ अपने पुरुषों द्वारा किंचित भी कायरता को सहन नहीं करती थी और उन्हें इन बातों के लिए शर्मिंदा भी करती थीं ताकि वे बहादुरी और सच्चाई की राह चुनें. इस कारण ही शाका पर निकलने वाले पुरुषों की जीवित लौट आने की कोई गुंजाइश ही नहीं होती थी।

जैसे हादी रानी को ही देखें- एक ​​राजपूत राजकुमारी अपने नव-विवाहित पति राव रतन सिंह को औरंगजेब की सेना का रास्ता रोकने की उनके पिता की आज्ञा, जिसे वह टालना चाहता है, मानने को विवश करती है. और जब राव युद्ध के मैदान से एक संतरी को अपने महल भेजते हैं ताकि उनकी पत्नी से मुलाकात कर वह एक स्मृति-चिन्ह ला सके, राव को सौंपने हेतु उनकी पत्नी, संतरी को अपना सिर काट कर भेंट कर देती है. रानी का सन्देश स्पष्ट देती है – एक क्षत्रिय के लिए उसके धर्म से महत्त्वपूर्ण कुछ भी नहीं है. राव ने वह युद्ध पूरी शक्ति से लड़ा और जीता भी. हालांकि, इस पौराणिक कथा के अनुसार, युद्ध के बाद अपनी पत्नी से मिलन की इच्छा लिए उन्होंने खुद की जान ले ली.

एक अन्य उदहारण रानी दुर्गावती का मिलता है, जिन्होंने अपने पति के देहांत के पश्चात् 15 वर्षों तक गोंड राज्य के प्रशासन की बागडोर संभाली. वह अक्सर युद्ध में भाग लेती थी और यहां तक ​​कि, कुछ में तो, उन्होंने मुगलों को भी हराया। अपने अंतिम युद्ध में उन्होंने अकबर की सेना के विरुद्ध जंग लड़ा, और कई घाव खाने के बाद जब हार निश्चित जान पड़ा, खुद छुरा घोंपकर मृत्यु को गले लगा लिया पर मुग़ल सेना के हाथ न आई।

निष्कर्ष

आखिरकार, सिसोदिया जो मुस्लिम तानाशाहों के विरुद्ध टिक सकने में सक्षम थे, जैसे कुछ तटस्थ राजाओं को छोड़ अन्य राजपूतों ने मुस्लिम शासकों के साथ गठजोड़ कर लिया. पतन होते मुग़ल और राजपूतों के समय मराठा साम्राज्य एक प्रमुख शक्ति के रूप में उभरा. बाद में, राजपूतों ने ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ गठजोड़ किया और भारत की स्वतंत्रता के समय, उनके राज्यों को राजस्थान राज्य में एकीकृत कर लिया गया।

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि प्रभावी युद्ध रणनीति की कमी, विभिन्न राजपूत राज्यों में आपसी एकता का अभाव और सम्मान एवं नैतिकता की परम भावना के कारण भारत पर लगातार हमला कर रहे आक्रमणकारियों को रोक पाने में राजपूत शासक असफल रहे. 

विल्हेल्म वॉन पोचहमेर के मुताबिक: “वे मैदान छोड़ भाग रहे दुश्मनों को बिना हानि पहुंचाए छोड़ देते थे. वे अपने कब्जे में आये दुश्मनों को, बदले में अपने सैनिकों की रिहाई की बिना मांग किये, इस गलत धारणा से मुक्त कर देते थे कि ये बर्बर आक्रमणकारी अपने युद्ध-बंदियों के साथ भी ऐसा ही व्यवहार करेंगे. वे यह समझने में कामयाब नहीं हो पाए कि वे किसी शूरवीरों के कुश्ती में नहीं, अपितु वे इन लड़ाइयों में अपने अस्तित्व को कायम रखने की एक कठोर और निर्मम संघर्ष में फंसे थे. क्योंकि आक्रमणकारी न सिर्फ हिन्दू संस्कृति को नस्तेनाबूद करने पर तुले थे बल्कि उनके लिए यह काफिरों को दोजख(नर्क) में भेजने की लड़ाई भी थी. इसमें कोई शक नहीं कि बहादुरी की दृष्टि से जौहर-शाका, जो सभी महिलाओं की स्वैच्छिक आहुति और पुरुष योद्धाओं के जीवन की आखिरी लड़ाई होती थी, बहुत साहसिक और महान कार्य था लेकिन राजनीतिक रूप से, वह दुश्मनों के उद्देश्य यानि ‘ज्यादा से ज्यादा काफिरों को मौत’ को ही पूरा कर रहे थे.”

जौहर-शाका का काल बीत गया। उस काल की परंपराएं भी मर चुकी हैं. राजस्थान के वे किले और महल सेल्फी लेने पर्यटकों की भीड़ से उमड़ पड़े हैं और फिल्म-निर्माता इनके इतिहास का मनगढ़ंत और मसालेदार कहानियाँ गढ़ रहे हैं। लैंगिकता, हिंसा, कामुकता और स्वतंत्रता पर निकल रहे शोध पत्र, जौहर को, मध्यकालीन युग के विकृत प्रथाओ की सूची में डाल रहे हैं।

लेकिन, एक काल में, एक गीत जो रानी संयुक्ता(संयोगिता नाम से भी जाना जाता है) ने राजा पृथ्वीराज चौहान के लिए लिखा था, उन्हें इतिहास के पन्नों में सदा के लिए अमर कर दिया:

“हे चौहान वंश के सूर्य … क्या जीवन अमर है? इसलिए अपनी तलवार खींचो और भारत के दुश्मनों का वध करो; स्वयं की परवाह न करो – इस जीवन के वस्त्र फट कर तार-तार हो गए हैं। मेरी चिंता मत करना – अगले जन्म और हर जन्म में, हम फिर मिलेंगे. हे! मेरे सम्राट – आगो बढ़ो .”

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(मूल लेखिका : सुहाना सिंह, साभार इण्डिया फैक्ट्स)

The article has been translated from English into Hindi by Satyam

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