हिन्दू धर्म :- गौरव, उत्थान और पतन के कारण (भाग २)

Written by शनिवार, 07 अक्टूबर 2017 13:08

पिछले भाग में आपने हिन्दुओं के इतिहास एवं हिन्दू धर्म के बारे में कुछ मूल बातें पढीं... (पिछले भाग को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें..) अब आगे पढ़िए.

जो हाल शक, कुशाणों का, वही हाल किया हूणों का भी. मध्य एशिया के ये सारे असंस्कृत, क्रूर कबाईली लोग. इनसे डरकर चीन ने अपनी ऐतिहासिक दीवार खड़ी की. लेकिन भारत के सेनानियों ने उनका भी निःपात किया. मालवा के राजा यशोवर्मा ने अन्य हिन्दू राजाओं को संगठित कर हूणों को परास्त किया. यह पूरा विजय का इतिहास हैं. संगठित हिन्दू शक्ति के यशस्वी प्रकटीकरण का इतिहास हैं. यह हिन्दुओं की विजिगीषु वृत्ति का इतिहास हैं. हमारे प्राचीन काल में हमारे ऋषि, मुनि, संतोंने एक समरस हिन्दू समाज का निर्माण किया, जिसके कारण हम विश्व के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र बने, यह तो पिछले लेखों में हमने देखा. लेकिन इस सामर्थ्य के पीछे एक और बड़ा कारण था – हमारी राष्ट्रनिष्ठा. हमारे ऋषि मुनियों ने, हमारे पुरखों को राष्ट्रनिष्ठा से जोड़ा. उनके मन में राष्ट्र भक्ति का भाव जागृत किया.

अथर्ववेद के ‘पृथ्वी सूक्त’ में इस देश भक्ति का उत्कट आविष्कार हैं.

यत् ते भूमे विखनामि क्षिप्रं तदपि रोह तुI मा ते मर्म विमृग्वरि मा ते हृदयर्पिपमII

अर्थ – हे भूमि, मैं जिस जगह पर (आपने फायदे के लिए, खनिज लेने के लिए) खोद रहा हूँ, वह शीघ्र ही प्राण तत्व से भर जाए. मेरे द्वारा, आपके मन पर आघात न हो. आप के ह्रदय को मेरे द्वारा चोट न पहुचे.

दूसरा मन्त्र हैं –

इन्द्रो यां चक्र आत्मने 'नमित्रां शचीपतिः| सा नो भूमिर् वि सृजतां माता पुत्राय मे पयः ॥१०॥

अर्थ – शचीपति इंद्र द्वारा जिस भूमि को शत्रु रहित किया हैं, यह भूमाता मेरे लिए वैसे ही दूध (पय:) की धारा प्रवाहित करे, जैसे मां अपने बेटे के लिए करती है. अर्थात हमारे पुरखों ने हमारे देश को हमेशा ही ‘भूमाता’ कहा हैं. सर्वव्यापी पृथ्वी में वह जहां रहता हैं, उस मातृभूमि के बारे में ही सारे उल्लेख हैं.

एक और मंत्र हैं –
अहमस्मि सहमान उत्तरो नाम भूम्याम्‌। अभीषाडस्मि विश्वाषाडाशामाशां विषासहिः।।

अर्थ – मैं अपनी मातृभूमि के लिए सभी प्रकार के कष्ट भोगने हेतु तैयार हूँ. मैं सभी दिशाओं में विजय प्राप्त करूँगा.

अथर्ववेद में आगे लिखा हैं –

यद् वदामि मधुमत तद वदामि यदिक्षे तद वनन्ति मा| त्विषीमानस्मि जूतिमानवान्यान हन्मि दो धत : ।।

अर्थ – मेरे मातृभूमि के हित में ही मैं बोलुंगा. जो कुछ करना हैं, वह मेरे मातृभूमि के वैभव के लिए ही करूंगा.

इस सूक्त के अंतिम भाग में कहा गया हैं –

दीर्घं न आयु: प्रतिबुध्यमाना, वयं तुभ्यं बलिहृत: स्याम II ६२ II

अर्थ – हमें दीर्घायुष्य मिले. हमें अच्छा ज्ञान मिले और मातृभूमि के लिए आवश्यकता पड़ने पर हम बलिदान भी करे.

ऋग्वेद में भी मातृभूमि की सेवा की बारे में लिखा हैं –

उप सर्प मातरं भूमिमेताम् । (ऋग्वेद : १०/१८/१०)

अर्थ - हे मनुष्य, तू इस मातृभूमि की सेवा कर

यजुर्वेद में उल्लेख हैं –

नमो मात्रे पृथिव्यै नमो मात्रे पृथिव्यै । (यजुर्वेद : ९/२२)

अर्थ - मातृभूमि को हमारा नमस्कार हो, हमारा बार-बार नमस्कार हो.

वयं राष्ट्रे जागृताम पुरोहिताः । (यजुर्वेद : ९/२३)

अर्थ - हम राष्ट्र के बुद्धिमान् नागरिक अपने राष्ट्र में सर्वहितकारी होकर अपनी सद्प्रवृत्तियों के द्वारा निरन्तर आलस्य छोड़कर जागरूक रहें ।

हमारे पुराणों में भी राष्ट्र भावना जागृत करने वाले अनेक उल्लेख हैं. ‘विष्णु पुराण’ में लिखा हैं, “सहस्त्र जन्मों के बाद भारतवर्ष में जन्म मिलता हैं और यहाँ जन्म लिये लोगों को ही स्वर्ग और मोक्ष प्राप्त होते हैं. ‘ब्रह्मपुराण’ का २७ वा अध्याय तो ‘भारतवर्षानुकीर्तनम’ इसी नाम से प्रसिध्द हैं. इसमें लिखा हैं, “जो नरश्रेष्ठ भारत में जन्म लेते हैं, वह धन्य हैं. देवों को भी इस भूमि में जन्म लेने की तीव्र इच्छा रहती हैं. इस भारतभूमि के सभी गुणों का वर्णन करना किसे संभव हैं..?” ‘वायु पुराण’ में भी इसी आशय का वर्णन आता हैं.

स्वामी विवेकानंद जी के जीवन में इसी पर आधारित एक घटना हैं – स्वामीजी सबसे पहले परिव्राजक के रूप में १८९० में जब अल्मोड़ा गए थे, तो स्वाभाविकतः न शिष्य परिवार था, और न ही कोई संपर्क. अल्मोड़ा के खजांची बाजार में श्री बद्रिसहाय टूलधारी जी रहा करते थे. अल्मोड़ा के प्रतिष्ठित व्यक्ति थे और लाला बद्री सहा नाम से जाने जाते थे. टूलधारी यह उन्होंने लिया हुआ उपनाम था. उन्होंने स्वामीजी को अपने यहाँ आमंत्रित किया. स्वामीजी उस प्रवास में और बाद में १८९७ के मध्य में जब पुनः अल्मोड़ा गए थे, तब भी बद्रिसहाय जी के ही यहाँ रहे. वहा स्वामीजी से चर्चा होती थी. चर्चा में स्वामीजी ने बताया की ‘ईश्वर की मूर्ति को हमें कुछ समय के लिए बाजू में रखना चाहिए. समाज पुरुष यही हमारा ईश्वर हैं. समाज की और राष्ट्र की पूजा याने साक्षात् ईश्वर की पूजा..!’ स्वाभाविकतः बद्रिसहाय जी ने पूछा, ‘यह बात किसी वेद, उपनिषद या पुराण में लिखी हैं? और यदि नहीं, तो हम आपकी बात क्यूँ माने?’

स्वामीजी ने तुरंत वेद और उपनिषदोंमे उल्लेखित ऋचाओं के सन्दर्भ दिए. बद्रिसहाय जी को आश्चर्य हुआ. उन्होंने सारे सन्दर्भ स्वामी जी से उतार लिए और बाद में वाराणसी जाकर उन ग्रन्थों का अध्ययन किया. स्वामीजी ने बताएं हुए विचार उन ग्रंथों में मिल रहे थे. बाद मे स्वामीजी की मृत्यु के पश्चात बद्रिसहाय जी ने इस विषय पर एक पुस्तक लिखी, जिसे लोकमान्य तिलक ने आशीर्वचन दिए. १९२१ में यह पुस्तक, ‘दैशिकशास्त्र’ नाम से प्रकाशित हुई. स्व. दीनदयाल उपाध्याय इस पुस्तक से बड़े प्रभावित थे. उन्होंने राष्ट्र के ‘चिती’ और ‘विराट’ की संकल्पनाएं इस पुस्तक से ही ली थी.

प्राचीन काल में इन वेदों से, पुराणों से प्रेरित होकर, अपने मातृभूमि के लिये हिन्दू समाज एकजूट होकर लड़ा. उसने सिकंदर, शक, कुषाण, हूण जैसे अनेक विदेशी आक्रमण लौटा दीये. उन्हें परास्त किया. भारत को दुनिया का प्रथम क्रमांक का देश बनाया.... किन्तु आज..? इतनी गौरवशाली परंपरा के संवाहक हम, कितनी राष्ट्रनिष्ठा हम में हैं..? जिनके पास ऐसी गौरवशाली परंपरा नहीं थी, वह जापान, अमेरिका, जर्मनी जैसे देश हमेशा उनकी मातृभूमि के बारे में पहले सोचते हैं. उनके सारे निर्णय देशहित को ध्यान में रख कर होते हैं. किसी जमाने में, एक हजार वर्ष पूर्व, ‘राष्ट्र सर्वप्रथम’ इस मंत्र को लेकर हम दुनिया के सबसे शक्तिशाली और वैभवशाली देश बने थे. आज उसे फिर अपनाना पड़ेगा..!

और विघटन प्रारंभ हुआ...!

विश्वविख्यात अर्थशास्त्री प्रो. अंगस मेडिसन ने अपने “The History of World Economics” में सबूतों के आधार पर यह लिखा हैं कि सन १००० में भारत विश्व व्यापार में सिरमौर था. पूरे दुनिया में व्यापार का २९% से ज्यादा भारत का हिस्सा था (यह इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं की आज विश्व व्यापार में पहले क्रमांक के देश चीन के हिस्से में विश्व का १४.४% व्यापार हैं). भारत विश्व का सबसे धनवान देश था...! लेकिन शायद यह हमारे खुशहाली की, संपन्नता की, ऐश्वर्य की पराकाष्ठा थी. इसके बाद तो भारत की स्थिति में निरंतर गिरावट आती चली गयी. इस्लामी आक्रांताओं से देश पराभूत हुआ. सामाजिक विकृतियां बढ़ने लगी. एकजूट समाज बिखरने लगा. जातियों में बटने लगा.

वैसे यह कहना की ‘इस्लामी आक्रमण के बाद ही हमारे देश का सामाजिक ताना-बाना बिखरता गया’, अर्धसत्य हैं. सच तो यह हैं की हमारे सामाजिक बिखराव का प्रारंभ हो चूका था. और इसीलिए इतने शक्तिशाली भारतवर्ष को इस्लामी आक्रांताओं के सामने लगातार पराजय मिली. गुलामी मिली. इसका कारण तो हिन्दुओं की संपन्नता में ही था. पिछले आलेखों में हमने देखा की हमारे ऋषि – मुनियों ने इस विशाल देश के विभिन्न समुदायों में, समूहों में एकता का, समता का सूत्र पिरोया था. ‘हम सब हिन्दू हैं’ यह सूत्र तो था ही. सबकी भाषा भले ही भिन्न हो, संपर्क भाषा एक ही थी – संस्कृत. खैबर के दर्रे से सुदूर कंबोडिया, जावा, सुमात्रा तक संस्कृत ही चलती थी. यह ज्ञान की भाषा थी, व्यापार की भाषा थी, लोक भाषा थी. फिर समता का सूत्र था. वर्ण व्यवस्था के बावजूद समरसता थ, कारण ‘वर्ण’ यह जन्म के आधार पर तय नहीं होते थे. वह तो कार्य करने के अलग अलग वर्ग थे. और इसी आधार पर हिंदुत्व ने पूरे विश्व में धाक जमाई थी. एक भी आक्रमण न करते हुए सारा दक्षिण एशिया हिन्दू बन चुका था. और यहाँ उत्तर – पश्चिम की सीमा पर हमने सिकंदर, शक, कुशाण, हूण जैसे हमले न केवल झेले थे, उनको परास्त किया था या भगा दिया था.

मालवा के राजा यशोधर्मा ने हूणों के राजा मिहिरगुल को संपूर्ण परास्त किया, सन ५२८ में. इसके बाद लगभग पाँच सौ वर्ष भारत पर आक्रमण करने का दुस्साहस दुनिया की किसी ताकत ने नहीं किया. बीच में महंमद कासिम ने सिंध पर आक्रमण किया था. लेकिन वह मात्र सिंध प्रान्त तक ही सिमित रहा. देश पर उसका प्रभाव नहीं पड़ा. सन ६०० से लेकर तो सन १००० तक का कालखंड यह हमारे इतिहास का स्वर्णिम कालखंड हैं. अत्यंत वैभवशाली, संपन्नशाली और शक्तिशाली परिस्थिति में हम थे, और यही से हमारे पुरखों से चूक प्रारंभ हुई. हम में शिथिलता आ गयी. समाज को किसी का भय नहीं रहा. ऐश्वर्य और संपन्नता के सामने, जिन तत्वों के आधार पर ऋषि – मुनियों ने हमारे समाज को संगठित किया था, एकजूट किया था, वह तत्व बिखरने लगे. वर्ण व्यवस्था अब गुणों से नहीं, तो जन्म से तय होने लगी. ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र यह सब जन्म के आधार पर बनते गए. इससे ऊँच – नीच की भावना बलवति होती गयी. जिनके हाथों में ज्ञान था, ऐसे ब्राह्मणों ने जाति वर्चस्व की बाते हमारे धर्मग्रंथो में डालना प्रारंभ किया. इस सामाजिक बिखराव के चलते ‘राष्ट्र सर्वप्रथम’ यह मंत्र भी धुंधला सा होता गया.

इसका परिणाम तो होना ही था. पूरे भारतवर्ष में उस समय द्रविड़, असुर, नाग, राक्षस, निषाद, यवन, किरात, कैवर्त, कांबोज, दरद, खस, शक, कुशाण, पणी, आंध्र, पुलिंद, मूतिब, पुंड्र, भरत, यादव, भोज, आदि समूह एकजूट होकर रह रहे थे, वे बिखरने लगे. सन ९८० मे जयपाल को परास्त कर इस्लामी आक्रांता सबुक्तगीना ने पंजाब जीत लिया. अगले कुछ वर्षों तक वह, और बाद के वर्षों में उसका लड़का महमूद गजनी, भारत पर आक्रमण करते रहे. और इतने शक्तिशाली हिन्दू साम्राज्य, ताश के पत्तों जैसे ढहने लगे. अगले डेढ़ सौ वर्षों में इस्लामी आक्रांता भारत पर छा गए. उन्होंने अपने साथ अपना महजब, अपनी भाषा, अपनी रहन-सहन भी लायी. बख्तियार खिलजी ने सन ११९३ में नालंदा समवेत अनेक विश्वविद्यालय जला दिए, ध्वस्त किये. संस्कृत भाषा जाती रही. हमारी पूरी शिक्षा व्यवस्था छिन्न भिन्न हो गयी.

इस असुरक्षा ने, अज्ञान ने हिन्दू समाज में अनेक प्रकार की विकृतियां भर दी, जो आज तक हम ढो रहे हैं. समता, सहकार्य, स्वातंत्र्य, ज्ञान आधारित व्यवस्था.... यह सब नष्ट हो गए. विषमता ने समाज में अपना स्थान पक्का किया. “धर्म एव हतो हन्ति, धर्मो रक्षति रक्षितः” यह वचन सत्य हुआ. हम धर्म की रक्षा नहीं कर सके, इसलिए हमारा विनाश हुआ. दलित अत्याचार, अस्पृश्यता, उच्च वर्ण का वर्चस्व आदि विकृतियां समाज में पैठ गयी. और इसी को हम धर्म समझने लगे. हिन्दू धर्म का स्वरुप ही बदल गया. धर्म की व्याख्या बदल गयी. आडंबर बढ़ गया. हिन्दू धर्म पराभूत हुआ. भारत का यह हाल देखकर दक्षिण-पूर्व एशिया का हिन्दू बहुल क्षेत्र भी अपना धर्म बदलने लगा. . . देश गुलामी के भयंकर अंधकार में जाता रहा....

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संदर्भ :–

डॉ. काशीप्रसाद जायसवाल – १. मनु और याज्ञवल्क २. हिन्दू पोलिटी
आचार्य क्षितिमोहन सेन – १. भारतवर्ष में जाति भेद २. संस्कृति संगम
डॉ. पु. ग. सहस्त्रबुध्दे – हिन्दू समाज : संगठन और विघटन 

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