हिन्दू जीवनशैली और इतिहास की सरल परिभाषा : भाग १

Written by शुक्रवार, 06 अक्टूबर 2017 20:56

हम हिन्दू किसे कहेंगे..? जो गीता जानता हो, रामायण – महाभारत जानता हो, वह..? तो फिर ऐसे अनेक हैं, जो ना तो गीता जानते हैं, और ना ही रामायण – महाभारत. फिर भी वह हिन्दू हैं..! फिर जो रोज भगवान् की पूजा करते हैं, वे हिन्दू हैं..? वैसे भी नहीं.

हम में से अनेक ऐसे हैं, जो कभीकभार ही मंदिर जाते हैं.. कभी कभार ही पूजा करते हैं. लेकिन कुछ ऐसे भी हैं, जो भगवान् को ही नहीं मानते. फिर मंदिर जाना और पूजा करना तो बहुत दूर की बात हैं. वे सारे हिन्दू हैं..! तो क्या भारत में रहने वाला ही हिन्दू हैं..? ऐसा भी नहीं कह सकते. बंगला देश के १५% नागरिक हिन्दू कहलाते हैं. उधर दूर फिजी में या सूरीनाम में या मॉरिशस में... हिन्दू सत्ता में बैठे हैं. वहां के प्रधानमंत्री भी बने हैं. इंडोनेशिया के बाली में भी हिन्दू रहते हैं. तो फिर हिन्दू किसे कहेंगे हम..? बड़ा ही संभ्रभ (कंफ्यूजन) निर्माण हो रहा हैं. 

सावरकर जी ने ‘हिन्दू’ की बड़ी सरल व्याख्या की हैं –

‘असिंधू सिन्धु पर्यन्ता, यस्य भारत भूमिका” पितृभू: पुण्यभूश्चैव सवै हिन्दुरिति स्मृतः II’

अर्थात 'सिन्धु नदी से लेकर, हिन्द महासागर पर्यंत फैली हुई भूमि को जो व्यक्ति अपनी पितृभूमि (पूर्वजों की भूमि) व पुण्यभूमि मानता हैं, वह हिन्दू हैं'..! अर्थात किसी भी मत / पंथ को मानने वाली, साथ ही इस देश को अपना मानने वाली व्यक्ति, हिन्दू हैं..! दुसरे किसी भी चश्मे से हम इसे देखेंगे, तो हतप्रभ रह जायेंगे. दूसरे किसी भी धर्म में इस प्रकार की परिभाषा नहीं हैं. वहां पर, एक धर्मग्रंथ हैं, एक ईश्वर हैं. हिंदुत्व की व्याख्या में यह सब नहीं आता. आप आस्तिक हैं, तो हिन्दू हैं, आप नास्तिक हैं, तो भी हिन्दू हैं. अर्थात हिंदुत्व यह धर्म हैं ही नहीं. कारण हम जिसे धर्म कहते हैं, वह अंग्रेजी religion से बिलकुल भिन्न हैं. हिंदुत्व तो हमारी जीवनशैली हैं. हमारा कोई एक धर्मग्रंथ नहीं हैं. कोई एक भगवान भी नहीं हैं. पूजा की कोई एक पध्दति भी नहीं हैं.जो लोग इस्लाम या ख्रिश्चन धर्म मानते हो, उनके लिए यह समझ के बाहर की चीज हैं.

धर्म ऐसा होता हैं..? इसका कारण हैं, हमारा हिंदुत्व हमारी जीवनशैली हैं. हमारे मूल्य हैं. जिसे अंग्रेजी में रिलिजन कहते हैं, वह हमारा ‘धर्म’ नहीं हैं. यदि ऐसा हैं, तो फिर हमारा ‘रिलिजन’ कौनसा हैं..? हिंदुत्व यदि जीवनशैली हैं, तो हमारी पूजा पध्दति को हम क्या कहे..? हम इसे ‘सनातन’ कह सकते हैं. ‘वैदिक’ कह सकते हैं. हम इसे ‘हिन्दू’ भी कह सकते हैं. सदियों से इस विशाल भरतभूमि के इतिहास को, सभ्यता को, संस्कृति को हिन्दू समाज समृध्द करता आया हैं... हिंदुत्व की प्राचीन, ऐतिहासिक धरोहर हैं.. परंपरा हैं.. हमें तो बस, इस परंपरा को अक्षुण्ण बनाए रखना हैं..!

अब मन में प्रश्न यह उठता हैं, कि यह हिन्दू समाज कभी ‘समाज’ के रूप में भी था..? संगठित था..? आज के समाजशास्त्रियों का मानना हैं, कि हिन्दुओं को ‘हिन्दू’ इस नाते संगठित करना अत्यधिक कठिन हैं. आप उन्हें जातियों के आधार पर तो संगठित कर सकते हैं – अग्रवाल समाज, क्षत्रिय समाज, कायस्थ समाज, कुर्मी समाज, पटेल समाज, कान्यकुब्ज ब्राह्मण, सरयुपारिन ब्राह्मण आदि. आप उन्हें भाषिक समूह के रूप में भी संगठित कर सकते हैं – तामिल, मराठी, कन्नड़, बंगला आदि.. किन्तु इन सब के ऊपर उठकर इस समाज को ‘हिन्दू’ इस नाते से खड़ा करना असंभव की श्रेणी में आता हैं. किसी हिन्दू के कष्ट देखकर, या हिन्दू समाज की अवमानना पर, अवहेलना पर यह समाज क्रोधित हुआ हैं, खौल उठा हैं ऐसा भी नहीं दिखता. यदि ऐसा होता, तो १९७१ में पाकिस्तान ने पुर्व पाकिस्तान (आज के बंगलादेश) में दो लाख से ज्यादा हिन्दुओं का पाशविक पध्दति से वंशविच्छेद (genocide) किया था, अमानुष हत्याएं की थी, अगणित बलात्कार किये थे, तब हिन्दू समाज के खौलने का कोई उदाहरण सामने नहीं आया था. कश्मीर की घाटियों से हिन्दुओं को मार मार कर भगाया गया. तब भी देश का हिन्दू समाज कमोबेश सोया रहा. हिन्दुओं के आराध्य भगवान् श्रीराम आज टाट और बांस के मंदिर में कैद हैं. तब भी हिन्दू समाज न जागृत दिखता हैं, और न ही आक्रोशित..!

तो क्या, हिन्दू समाज इतिहास में भी ऐसा ही था..? स्पष्ट उत्तर हैं – नहीं. इतिहास में हिन्दू समाज, ‘समाज’ के रूप में एक था. समरस था और संगठित भी था. जी हां. यही हिन्दू समाज की विशेषता थी. प्रख्यात चिंतक डॉ. पु.ग.सहस्त्रबुध्दे ने इसका सुन्दर वर्णन किया हैं. समाज को संगठित करने के आयाम क्या होते हैं..? अगर ‘धर्म’ का आधार ले, तो सारा यूरोप मूलतः ख्रिश्चन था. उसे तो एक ‘समाज’, एक ‘राष्ट्र’ के रूप में खड़ा होना चाहिए था. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. दुनिया के सबसे बड़े युध्द तो यूरोप की धरती पर हे लड़े गए, और आज भी यूरोप एक राष्ट्र नहीं हैं. हमारा भारतवर्ष यूरोप जैसा ही एक खंड हैं. यदि हमारे पूर्वजों ने समाज को संगठित न रखा होता, तो शायद आज हम भी यूरोप जैसे ही अनेक राष्ट्रों में बटें होते. अरब राष्ट्रों का आधार तो एक धर्म हैं ही, उनकी भाषा, आचार – विचार पध्दति भी समान हैं. लेकिन फिर भी वे अनेक राष्ट्र हैं. अफगानिस्तान से मोरोक्को तक मुस्लिम साम्राज्य अनेक शताब्दियों से हैं, लेकिन यह सारा भूप्रदेश एक राष्ट्र के रूप में किसी के स्वप्न में भी अस्तित्व में नहीं आया. प्राचीन काल में चीन और वर्तमान में अमेरिका ने ही इस प्रकार से एक राष्ट्र के रूप में खड़े होने में सफलता प्राप्त की हैं. इसके आधार पर, हमारे पूर्वजों का यश कितना दुर्लभ था, इसका अंदाज हम लगा सकते हैं.

हजारो वर्ष पूर्व हमारे पूर्वजों ने इस ‘राष्ट्र’ को खड़ा करने के लिए कुछ बाते तय की थी –

1. इस राष्ट्र में रहने वाला संपूर्ण समाज एकरूप, एकरस होना चाहिये, यह उनका दृढनिश्चय था.

2. इस ध्येय की आड़ में वर्ण, वंश, आचार पध्दति नहीं आएगी यह उन्होंने सुनिश्चित किया था.

3. इसलिये सहिष्णुता और संग्राहकता यह दोनों दुर्लभ गुण भारतियों में विकसित हुए.

आज से दो हजार – तीन हजार वर्ष पहले, हिन्दू संगठित थे, समरस थे. और इसीलिए अत्यधिक सामर्थ्यशाली थे. इसका उदहारण मिलता हैं, ग्रीक (यूनानी) सम्राट सिकंदर के आक्रमण के समय. पारसिक राष्ट्र के, अर्थात आज के ईरान के, शासकों का ग्रीक साम्राज्य से परंपरागत बैर था. विशाल पारसिक साम्राज्य के सामने, छोटे छोटे से यूनानी राजा कही न ठहरते थे. किन्तु सिकंदर के पिता, फिलिप ने, इन छोटे राज्यों को संगठित कर, यूनानियों का एक राज्य बनाया. ईसा पूर्व ३२९ में, फिलिप की मृत्यु के पश्चात, सिकंदर इस संगठित यूनानी राज्य की ताकत लेकर पारसिक साम्राज्य से भिड़ गया. और पहले ही झटके में उसने इस साम्राज्य को ध्वस्त किया. खुद को पारसिक का सम्राट घोषित कर वह आगे बढ़ा. रास्ते में बाबिलोनी साम्राज्य को भी उसने परास्त किया. वर्तमान के सीरिया, मिस्र, गाझा, तुर्की, ताजिकिस्तान को कुचलते हुए वह भारत की सीमा तक पहुंचा. अन्य राष्ट्रों को उसने जैसा जीता, उसी आसानी से भारत को जितने की उसकी कल्पना थी. भारत के अत्यंत समृध्द ‘मगध साम्राज्य’ को उसे जितना था.

लेकिन उसकी कल्पना और अपेक्षा के विपरीत, भारत में उसे कड़े विरोध का सामना करना पड़ा. आज के हमारे पंजाब प्रान्त को तो उसने जीत लिया, पर एक एक इंच भूमि उसे जी जान से लड़कर जीतनी पड़ी. मानो काले कभिन्न चट्टानों पर उसकी सेना सर फोड़ रही हो..! मगध के दर्शन भी न करते हुए, रक्तरंजित अवस्था में, विकल और विकट परिस्थिति में उसे वापस लौटना पड़ा. विश्वविजयी कहलाने वाले, ‘सिकंदर महान’ की भारत में ऐसी दुर्गत क्यूँ हुई..? उन दिनों भारत की उत्तर – पश्चिमी सीमा पर, सिन्धु नदी के दोनों तटों पर सौभूती, कठ, मालव, क्षुद्रक, अग्रश्रेणी, पट्टनप्रस्थ ऐसे अनेक छोटे छोटे गणराज्य थे. तक्षशिला जैसा राज्य भी था. सिकंदर के विशाल सेनासागर के सामने वह टिक न सके. किन्तु सिकंदर को प्रत्येक विजय की भरपूर कीमत चुकानी पड़ी. उसके सैनिक इतने परेशान हो गए, डर गए और थक गए कि व्यास (बियास) नदी के उस पार, ‘यौधेय गणों की बड़ी मजबूत सेना खड़ी हैं’, यह सुनकर ही उनके छक्के छुट गए. सिकंदर ने फिर भी आगे बढ़ने का निर्णय लिया तो मानो सेना में भूचाल आ गया. उसके सैनिक रोने लगे और उसे आगे जाने से रोकने लगे. यूनानी इतिहासकार प्लूटार्क लिखता हैं – ‘पोरस से युध्द करने के बाद सिकंदर की सेना का मनोबल पूरी तरह से टूट गया था. और इसीलिए सिकंदर को व्यास के उत्तर तट से ही वापस लौटना पड़ा.’ यूनानी सेनानी और इतिहासकार डीयोडोरस ने भी भारतीय सैनिकों के वीरता एवम् एकजूटता के अनेक किस्से बयान किये हैं.

मालव और क्षुद्रक ये दो छोटे गणराज्य सिन्धु नदी के तट पर थे. दोनों में परंपरागत खानदानी दुश्मनी थी. लेकिन सिकंदर से युध्द करने के लिए उन्होंने अपना पिढीजात बैर भुला दिया. अब दोनों राज्यों के नागरिक इस बैर को कैसा भूलेंगे..? इसलिए दोनों गणराज्यों ने आपस में कन्यादान कर, दस हजार विवाह संपन्न किये. हिन्दुओं की एकजूटता का यह अनुपम उदाहरण हैं...! भारत से लौटते समय, सिकंदर की इतनी ज्यादा हानि हुई थी की दो वर्ष में ही, ईसा पूर्व ३२३ में उसकी मृत्यु हुई. सिकंदर के मरने के बाद, उसने जीता हुआ सारा पंजाब, पुनः स्वतंत्र हो गया. इस कालखंड में हिन्दू सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य का उदय यह भारतवर्ष को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण घटना थी. विदेशी आक्रान्ताओं का सशक्त प्रतिकार करने का यह क्रम अगले हजार – बारह सौ वर्ष निरंतर चलता रहा. भारतवर्ष का यह स्वर्णिम कालखंड था.

इस बीच दो तीन सौ वर्षों के बाद, सम्राट अशोक के अहिंसा तत्व के प्रचार – प्रसार के बाद, जब भारत की लड़ने की धार कुछ कम हुई तो डेमित्रीयस नामका सेनानी बेक्ट्रिया से जो निकला तो सीधे भारत के अयोध्या तक पहुचा. लेकिन कलिंग (उड़ीसा) के महाप्रतापी राजा खारवेल ने उसे इरान की सीमा तक खदेड़ दिया..! शक और कुशाणों का आक्रमण तो यूनानियों से भी महाभयंकर था. ये लोग मतलब क्रूर कबाईली टोलियाँ थी. मारना, लूटना, तबाह करना इसी में इनको आनंद आता था. लेकिन भारतीय सेनानियों ने इस पाशविक आक्रमण को भी समाप्त किया. जब उत्तर के राजा निष्प्रभ होते थे, तब दक्षिण के राजा, भारतवर्ष को आक्रांताओं से बचाने सामने आते थे. सातवाहन साम्राज्य के गौतमीपुत्र सातकर्णी ने शकों से जबरदस्त युध्द कर उनके राजा नहमान को मार कर उनको खदेड़ दिया था. कुशाणों के आक्रमण के समय, उनका कडा मुकाबला हम नहीं कर सके. लेकिन सांस्कृतिक धरातल पर हम इतने मजबूत थे, की सारे कुशाण हिन्दू हो गए. वैदिक आचरण करने लगे. संस्कृत बोलने – लिखने लगे. उनके राजा कनिष्क ने बौध्द धर्म का स्वीकार किया.

(अगले भाग में जारी रहेगा...)  पढ़ते रहिये desiCNN

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