पश्चिमी लेखकों द्वारा जातिप्रथा और ब्राह्मणों पर हमला क्यों?

Written by सोमवार, 02 अक्टूबर 2017 12:15

पश्चिमी विचारक मारिया विर्थ का यह लेख भारत के कई क्षेत्रों में पसंद और कई में नापसंद किया जाएगा, क्योंकि इसमें उन्होंने भारत की जाति-व्यवस्था को तोड़ने तथा ब्राह्मणों पर आए दिन होने वाले वैचारिक हमलों की पूरी पोल खोल दी है.

मारिया विर्थ, जो कि पश्चिमी बुद्धिजीवियों के षड्यंत्रों को अच्छे से समझती हैं, उनका कहना है कि वास्तविकता यह है कि पश्चिम के लोगों को भारत के बारे में बहुत ही कम जानकारी है. लगातार (कु)प्रचार के कारण उन्हें केवल इतना ही पता है कि भारत में जाति-व्यवस्था है, यह जाति-व्यवस्था अमानुष किस्म की है. कुछ पश्चिमी विद्वान केवल इतना भर जानते हैं कि कि जाति-व्यवस्था हिन्दू धर्म का महत्त्वपूर्ण अंग है, और ऊँची जाति वाले लोग नीची जातियों के साथ रोटी-बेटी का सम्बन्ध नहीं रखते. उन्होंने ऐसा भी सुना हुआ है कि ऊँची जाति के लोग नीची जाति वालों लगातार मारते रहते हैं. अपने इसी आधे-अधूरे और अधकचरे ज्ञान के सहारे वे भारत के बारे इधर-उधर अनर्गल लिखते रहते हैं. 

मारिया आगे लिखती हैं, कि भारत की जाति व्यवस्था के बारे में मुझे बचपन से ही जानकारी थी, लेकिन जर्मनी में नाजियों द्वारा जो अत्याचार किए गए उसके बारे में मुझे कुछ भी नहीं पता था. इसके अलावा अमेरिका में गुलाम-प्रथा और उनकी बस्तियों पर गोरे अमेरिकियों द्वारा किए जाने वाले अत्याचारों के बारे में भी मुझे स्कूल में कुछ नहीं पढ़ाया गया. 1960 के आरम्भ से ही मैं पश्चिमी किताबों को देख रही हूँ और उन किताबों में “भारत के ब्राह्मण अत्यंत दुष्ट किस्म के हैं” यह पढ़ाया गया... और यह आज भी जारी है. कुछ दिनों पूर्व भारत के ऋषिकेश में मुझे तीन जर्मन युवक मिले, मैंने उनसे पूछा कि भारत में उन्हें क्या विशेषता दिखाई दी? उनका उत्तर था “जाति-व्यवस्था”. क्योंकि उन्होंने अपने बचपन से ही इस प्रकार की कहानियाँ अपने पाठ्यक्रम में पढ़ रखी थीं. मारिया विर्थ का कहना है कि, “इस बात पर विचार करना जरूरी है, कि भारत की जाति-व्यवस्था खराब है, यहाँ के ब्राह्मण दुष्ट और अत्याचारी हैं...”- इस प्रकार का माहौल बनाने के पीछे एक सुनियोजित षड्यंत्र कौन और क्यों चला रहा है? और वह भी इतने वर्षों से लगातार?

मारिया कहती हैं कि मैं मानती हूँ कि भारत में जाति-व्यवस्था है, अस्पृश्यता भी कहीं-कहीं बरकरार है, लेकिन ऐसा कहाँ नहीं है?? विश्व के कई देशों में यह मौजूद है. प्राचीन काल में भारत में जाति नहीं होती थी, केवल “वर्ण” होते थे. यानी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, इन्हीं चारों वर्णों की जानकारी है और यह चारों समाज के अविभाज्य अंग हैं. जिस प्रकार मानव शरीर में मस्तक, हाथ, पेट और पैर होते हैं, उसी प्रकार ये चारों वर्ण हुआ करते थे. शरीर का कोई भी अंग कम महत्त्वपूर्ण नहीं है, इसका सन्देश यही था. अगर पैर नहीं होंगे तो कोई चल नहीं सकेगा और पेट गडबड़ी करेगा तो भी शरीर बिगड़ेगा. समाज में किसान, मजदूर, व्यापारी, शिक्षक सभी तो चाहिए, किसी एक के न होने से समाज ठहर जाएगा. वर्ण व्यवस्था इसी के अनुसार बनाई गई थी.

वर्ण व्यवस्था में यह मान्य किया गया था कि इन लोगों के कार्यों में अदलाबदली हो सकती है. हो सकता है कि कोई किसान, शिक्षक बन जाए या कोई व्यापारी मजदूर बन जाए. इसीलिए वर्ण व्यवस्था “अनुवांशिक” नहीं, बल्कि कर्म आधारित थी. प्रत्येक व्यक्ति के गुणों के अनुसार उसे उस वर्ण में रखा जाता था. यदि व्यक्ति पठन-पाठन और स्मरण रखने में उत्तम होता था, तो उसे ब्राह्मण वर्ण में रखा जाता था. इसी प्रकार बलशाली और युद्ध गुणों से युक्त व्यक्ति को क्षत्रिय वर्ण में रखा जाता. ब्राह्मणों का काम वेदों का पठन करके, उन्हें स्मरण रखना और उसे उसी रूप में अचूक अगली पीढ़ी तक पहुँचाना.इसीलिए ब्राह्मणों को अपना सत्वगुण, शुद्धता एवं शुचिता बनाए रखना आवश्यक होता था. शुद्धता का पालन, नियमों का पालन अत्यधिक कठोरता से करना भी उन्हीं की जिम्मेदारी थी.

वेदों की शुद्धता बनाए रखना ब्राह्मणों का कर्तव्य था. इसीलिए मृत प्राणियों को ठिकाने लगाने वाले, अथवा नाली सफाई करने वाले कर्मचारियों से उनका स्पर्श न हो इसका भी ध्यान रखना पड़ता था. पश्चिमी देशों में भी एक बड़े कालखण्ड में निचले दर्जे का काम करने वालों को हीन मानने की प्रथाएँ थीं. आज भी कई पश्चिमी देशों में कुछ-कुछ प्रथाएँ मौजूद हैं. लेकिन कालान्तर में भारत की इस उत्तम “वर्ण व्यवस्था” को भ्रष्ट कर दिया गया और इसे अनुवांशिक रूप दे दिया गया, जो कि गलत हुआ. जन्म के आधार पर कोई भी अपने-आप ब्राह्मण नहीं कहा जा सकता, ब्राह्मण बनने के लिए वैसा कर्म भी करना पड़ेगा यह बात भुला दी गई और धीरे-धीरे “वर्ण” से हटकर जाति व्यवस्था का निर्माण हो गया. लेकिन लेख का मूल सवाल तो यह है कि आखिर पश्चिमी कथित विद्वान भारत की जाति व्यवस्था और ब्राह्मणों को ही क्यों कोसते हुए पाए जाते हैं??

जब अंग्रेजी शासन के दौरान, कर्नाटक के मदिकेरी क्लब में अंग्रेज लोग केवल गोरों को ही प्रवेश देते थे, उस समय किसी को तकलीफ नहीं होती थी. उन्हीं दिनों कई अन्य क्लबों में “कुत्तों और भारतीयों का प्रवेश वर्जित है” ऐसे बोर्ड खुलेआम लगाए जाते थे, तब पश्चिमी विद्वान कहाँ थे? अंग्रेजों द्वारा भारतीय कृषि की लूट एवं गलत नीतियों के कारण बंगाल सहित देश के अन्य भागों में ढाई करोड़ भारतीय भूख से मर गए तब पश्चिमी विद्वान कभी बेचैन नहीं हुए? समूचे विश्व में गुलामी की प्रथा शुरू करने वाले अंग्रेज, अमेरिकन भारत से जहाज भर-भरकर वेस्टइंडीज, फिजी जैसे देशों में ले जाते थे, तब कोई पश्चिमी विद्वान क्यों नहीं रोया? मुगल आक्रान्ताओं ने भारत को लूटा, हत्याएँ कीं, बलात्कार किए, अत्यधिक क्रूरता दिखाई... क्या कभी वेटिकन पोषित विद्वानों ने इस बारे में चिंता व्यक्त की? राजस्थान में हजारों स्त्रियों ने “जौहर” (जलते कुंड में कूदकर आत्महत्या) किया, किसी पश्चिमी विद्वान ने उस पर नहीं लिखा. ब्रिटेन के सांसदों को भारत की जाति-व्यवस्था की चिंता है, लेकिन कभी ISIS द्वारा गर्दनें काटने को लेकर इतनी चिंता नहीं हुई?? यदि कुछ देर के लिए झूठ ही सही, मान भी लें कि ब्राह्मणों ने अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए अत्याचार किए, तो भी ये अत्याचार ईसाईयों, कम्युनिस्टों और मुसलमानों द्वारा समूचे विश्व में किए गए अत्याचारों, के मुकाबले नगण्य ही है.

तो फिर ऐसा क्यों है कि भारत और पश्चिम के जो “तथाकथित विद्वान” हैं (जिनका कहीं न कहीं चर्च से भी सम्बन्ध है), वे ब्राह्मणों और जाति को लेकर इतना हंगामा मचाए हुए रहते हैं? क्योंकि उन्हें स्वयं द्वारा किए गए अपराधों को छिपाना होता है. दुनिया को यह पता न चले कि वे खुद इतिहास में कितने क्रूर और हत्यारे थे, इसलिए जानबूझकर दुनिया का ध्यान भारत की जाति व्यवस्था एवं ब्राह्मणों की तरफ करने के सतत प्रयास जारी रहते हैं. ये कथित विद्वान केवल और केवल अत्याचारों की ही बात करते हैं, जबकि भारत न जाने कितना बदल चुका है. इन कथित विद्वानों को आरक्षण के लाभ, अल्पसंख्यकों के फायदे के लिए सरकारों द्वारा चलाई जा रही योजनाएँ वगैरह दिखाई नहीं देते. उन्हें केवल ब्राह्मणों को कोसना है और जाति के नाम पर दलितों को भड़काना है.

दुनिया भर में भारत की जाति-व्यवस्था और ब्राह्मणों को कोसने-गरियाने के पीछे एक कारण और है. ये बुद्धिजीवी चाहते हैं कि भारत के ब्राह्मण स्वयं को अपमानित और दीन-हीन महसूस करें, ब्राह्मणों को अपने पूर्वजों के कृत्यों पर शर्म आए तथा ब्राह्मण भारत के वेदों का अभ्यास छोड़कर अपने विद्यार्थियों को इसकी शिक्षा देना बन्द कर दें. इसलिए इस दिशा में लगातार संगठित प्रयास जारी हैं. ब्राह्मणों के वैदिक ज्ञान के कारण ईसाईयत एवं इस्लामिक जगत में खलबली है, उन्हें इस बात का पूर्ण अहसास है कि जिस प्रपोगंडा को वे फैलाना चाहते हैं (या फैला रहे हैं), उसकी वैचारिक काट सिर्फ वेदों में है. वे जिस कथित सत्य की बात करते हैं, सनातन धर्म और वेदों में उसका खंडन दो मिनट में किया जा सकता है. स्वाभाविक है कि भारतीय वेद परंपरा ही दुनिया में इस्लाम और ईसाईयत के प्रसार को रोकने की क्षमता रखती है. दुर्भाग्य से भारत के मूल वैदिक ज्ञान का एक बड़ा हिस्सा लुप्त हो चुका है. कांचीपुरम के शंकराचार्य श्री चंद्रशेखरानंद सरस्वती अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि वेदव्यास ने पाँच हजार वर्षों पूर्व 1180 शाखाओं के चार भाग किए, आज की तारीख में उनमें से केवल आठ श्लोक ही उपलब्ध हैं. ऐसी आशंका जताई जा रही है, कि इस अनमोल वैदिक ज्ञान की कई प्रतियाँ टुकड़ों-टुकड़ों में इंग्लैण्ड, जर्मनी जैसे देशों के संग्रहालयों में मिल सकती है. वास्तव में देखा जाए तो ISIS या इस्लामिक आतंकवाद के मुकाबले भारत के ब्राह्मणों एवं जाति-व्यवस्था से दुनिया को रत्ती भर का भी खतरा नहीं है. परन्तु “प्रायोजित विरोध” करने वाले बुद्धिजीवी इस बात को समझने के लिए तैयार नहीं.

मारिया विर्थ लिखती हैं कि कुछ दिनों पहले मैं दक्षिण भारत के एक मंदिर में गई थी, जहाँ प्रसाद लेने के लिए एक बेहद दुबले-पतले, चेहरे से ही गरीब और भूखे दिखाई देने वाले ब्राह्मण दम्पति को देखा. मेरे देखते ही देखते वे दूसरी बार फिर से प्रसाद लेने के लिए पंक्ति में खड़े हो गए... निश्चित सी बात है कि ब्राह्मण दम्पति अत्यधिक भूखा होगा. स्थिति यही है कि भारत में गरीब ब्राह्मणों की संख्या भी बढ़ रही है, उन्हें किसी सरकारी योजना का लाभ नहीं मिलता न ही आरक्षण मिलता है. लेकिन फिर भी मैं यही कहूँगी कि ब्राह्मणों द्वारा कभी भी स्वयं को दोष नहीं देना चाहिए, न ही अपराधबोध की भावना से ग्रस्त होना चाहिए (क्योंकि पश्चिम का षड्यंत्र यही है). आज जो भी वैदिक ज्ञान भारत में बचा है इन्हीं ब्राह्मणों के कारण बचा हुआ है. यह अनमोल ज्ञान ऐसे ही अगली पीढ़ियों तक हस्तांतरित होते रहना चाहिए. यदि शर्म करनी ही है, तो उन सनातन विरोधियों को करनी चाहिए, जो लगातार ब्राह्मणों की खिल्ली उड़ा रहे हैं, हिन्दू धर्म को गालियाँ दे रहे हैं. मैं एक ईसाई हूँ, लेकिन फिर भी हिन्दू धर्म और ब्राह्मणों के खिलाफ जारी इस विषवमन का कतई समर्थन नहीं करती... दुनिया में ईसाईयों, मुस्लिमों और वामपंथियों ने जो दुष्कृत्य किए हैं, उसे देखते हुए शर्मिंदा तो उन्हें होना चाहिए, ब्राह्मणों को नहीं... वैदिक ज्ञान को सहेजने वाले ब्राह्मणों और जाति के विरुद्ध यह विषवमन इसीलिए किया जा रहा है, ताकि विश्व भर में दूसरों द्वारा किए गए कुकर्मों पर पर्दा डाला जा सके.

-- मूल लेख :- जर्मनी की लेखिका मारिया विर्थ 

अनुवाद :- सुरेश चिपलूनकर, desiCNN.com 

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