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भारत को एकसूत्र में बाँधती, विविध भारती “सखी सहेली”

Written by शनिवार, 08 जुलाई 2017 20:18

विगत दो दशकों में जब से टीवी जैसे माध्यम ने घरों के ड्राईंग रूमों और बेडरूमों में लगभग कब्ज़ा जमा लिया था, उसी दौर में बहुत से लोगों ने सोचा था कि शायद अब रेडियो के दिन लद गए. लेकिन वे कितने गलत थे, यह बात इसी से सिद्ध होती है, कि रेडियो स्टेशनों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है.

निजी क्षेत्र को इसमें जोड़ने के कारण यह और भी तेजी से फैला और जिसके विलुप्त होने की बात कही जा रही थी, वह मोबाईल में भी घुसपैठ कर गया और छा गया. दृश्य माध्यमों के इस “कर्कश दौर” में रेडियो की प्रासंगिकता आज भी मौजूद है. हालाँकि निजी क्षेत्र के आगमन, विज्ञापनों की भूख, कम जानकार अनाउंसर, फूहड़ता की प्रतिस्पर्धा के कारण रेडियो में भी कर्कश दौर प्रारम्भ हो चुका है, परन्तु हमेशा की तरह सरकारी आकाशवाणी से प्रसारित होने वाले विविध भारती ने रेडियो की गरिमा, रेडियो की मधुरता, रेडियो की प्रासंगिकता को बनाए रखा है. निजी क्षेत्र के नए-नवेले एफएम स्टेशनों में कुछ उदघोषक निश्चित रूप से अच्छे उभरकर आए हैं, लेकिन विज्ञापनों और आमदनी की “प्राणलेवा प्रतिस्पर्धा” की वजह से उन्हें भी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने का पूर्ण अवसर नहीं मिल रहा. इस दौर में विविध भारती के यूनुस खान, कमल शर्मा, रेणु बंसल, ममता सिंह, निम्मी मिश्रा जैसे कई मंजे हुए, अनुभवी और आवाज़ में उतार-चढ़ाव के जबरदस्त जादूगरों ने विविध भारती को सर्वोच्च स्थान पर बनाए रखा है, और वह भी बिना किसी फूहड़ता या कर्कशता के.

इसी विविध भारती पर एक कार्यक्रम लम्बे समय से चल रहा है, जिसका नाम है “सखी-सहेली”. जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर है, यह कार्यक्रम केवल और केवल महिलाओं द्वारा, महिलाओं के लिए संचालित होता है. देश की लगभग 50% आबादी को “एक्सक्लूसिवली” संबोधित करने वाला रेडियो पर संभवतः यह इकलौता ही कार्यक्रम होगा. और सबसे ज्यादा मजे की बात यह है कि कार्यक्रम भले ही महिलाओं के लिए होता है, लेकिन इसे सुनने और सराहने वाला एक बड़ा वर्ग पुरुषों का भी है. यह कार्यक्रम की संरचना की मजबूरी है कि इसमें पुरुषों के पत्र शामिल नहीं होते, वर्ना इस समय जो 400-500 पत्र रोजाना विविध भारती को मिल रहे हैं, वह निश्चित रूप से दोगुने होते. बहरहाल... लेख का मुद्दा यह नहीं है कि रेडियो की प्रासंगिकता कितनी है (क्योंकि स्वयं प्रधानमंत्री ने अपने मन की बात कहने के लिए दूरदर्शन की बजाय रेडियो को प्राथमिकता दी है). मूल मुद्दा यह है कि सखी-सहेली नामक कार्यक्रम देश की महिलाओं में जागरूकता बढ़ाने वाला और देश को एकसूत्र में बाँधने वाला एक जोरदार कार्यक्रम सिद्ध हो रहा है.

Sakhi Saheli Anniversary

क्या आप जानते हैं कि 30 मई को हिन्दी पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है, क्योंकि इसी दिन आज से 191 वर्ष पहले (जी हाँ!!!) सबसे पहले हिन्दी समाचार पत्र “उदन्त मार्तण्ड” (उगता सूर्य) का प्रकाशन हुआ था. क्या आप जानते हैं कि आज से पचास वर्ष पहले डॉक्टर असीमा चटर्जी (शांतिस्वरूप भटनागर पुरस्कार पाने वाली पहली महिला वैज्ञानिक) ने औषधीय पौधों की मदद से कैंसर को मात करने वाली कीमोथेरेपी दवाओं के विकास में प्रमुख भूमिका निभाई थी. क्या आप जानते हैं कि रक्षा गोपाल नामक लड़की, जिसने इस वर्ष बारहवीं कक्षा में भारत में सर्वोच्च अंक प्राप्त किए हैं, उसने आगे की पढ़ाई के लिए साईंस की बजाय मानविकी को चुना है? यह सब मैं कैसे जानता हूँ... क्योंकि मैं पुरुष होने के बावजूद सखी-सहेली नामक यह ज्ञानवर्धक कार्यक्रम सुनता हूँ. इस कार्यक्रम में देश के दूरदराज गाँवों से दर्जनों की संख्या में पोस्टकार्ड आते हैं (याद करने का प्रयास कीजिए कि आपने पिछली बार पोस्टकार्ड हाथ में लेकर कब देखा था?). छत्तीसगढ़ में एक गाँव है अम्बादंड, जिसकी कुल जनसँख्या है केवल 284. लेकिन इसमें से भी एक महिला ने दो-तीन बार सखी-सहेली में पत्र भेजा है... कल्पना कीजिए कि रेडियो की पहुँच कहाँ तक और कैसी है.

(यह लेख आप तक desicnn.com के सौजन्य से पहुँच रहा है... जारी रखें)

गोलाबाज़ार, खालवा, बालम टिक्की, बेमेतरा, समाना मंडी, गोटेगांव, मलकापुर, हरदोई, धामनगांव, अमलनेर... ऐसे-ऐसे नाम और ऐसे-ऐसे गाँवों-कस्बों से पत्र आते हैं कि आप सोच भी नहीं सकते, आपने नाम सुने भी नहीं होंगे. पत्र भेजने वाली महिलाएँ अधिकाँश घरेलू महिलाएँ हैं, लेकिन उनका सामाजिक और व्यावहारिक ज्ञान कामकाजी महिलाओं से कहीं भी कम नहीं पड़ता. जब इस कार्यक्रम में पत्रों को पढ़ा जाता है, अथवा विषयानुसार उन पर चर्चा की जाती है तो हम आश्चर्यचकित हो जाते हैं कि छत पर नर्सरी उगाने से लेकर विवेकानंद के प्रवचनों तक, और बनारस के पान से लेकर डायबिटीज़ तक सभी विषयों पर किस प्रकार महिलाएँ लिख रही हैं, फोन कर रही हैं और उत्साह से भाग ले रही हैं... और इन सभी के बीच जब अचानक आपके कानों में “मेरे जीवन में किरण बनके बिखरने वाली, बोलो तुम कौन हो...” (फिल्म तलाक, 1958) पड़ता है तो आप न जाने कहाँ खो जाते हैं. कई ऐसे अनसुने गीत आपको इस कार्यक्रम में सुनने को मिल जाते हैं. धीरे-धीरे यह स्थिति बनने लगती है कि दिन-रात चीखने वाले, मुर्गा-लड़ाई का केंद्र बने हुए, अ-मुद्दों को मुद्दा बनाकर चबाने वाले 600 से अधिक चैनल आपको बेहद फूहड़ और घटिया लगने लगते हैं. आप सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि दुनिया कितनी बड़ी है, दुनिया कितनी सुन्दर है, दुनिया में टीवी की “भचभच और मचमच” के अलावा ढेर सारा और भी बहुत कुछ है....

इंदौर के प्रसिद्द उद्घोषक, पत्रकार, संगीत रसिक और भारत के लगभग सभी दिग्गज कलाकारों के लिए मंच संचालन करने वाले संजय पटेल कहते हैं कि “सखी-सहेली” कार्यक्रम की विराट सफलता और निरंतरता का राज़ इसमें छिपा है कि यह “सरल है... सहज है..., सामान्य है... और इस कार्यक्रम से भारत एक धागे में पिरोया जा रहा है...”....

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अनुवाद एवं इनपुट : सुरेश चिपलूनकर
(साभार : Swarajyamag.com) 

Read 866 times Last modified on रविवार, 09 जुलाई 2017 08:10
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