स्वातंत्र्यवीर विनायक सावरकर की अनबुझी राष्ट्रवादी प्यास

Written by बुधवार, 26 अप्रैल 2017 08:22

आज की तारीख में मूल समस्या यह है कि, सावरकर का नाम लेते ही "राष्ट्रवाद विरोधियों तथा ब्राह्मण द्वेषियों" के पेट में मरोड़ उठने लगते हैं... हाल ही थाणे में सावरकर जी पर आयोजित एक कार्यक्रम में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह शामिल हुए.

उन्होंने कई दूसरी बातों के अलावा एक बात और कही कि, "आपके सावरकर जी से, हिंदुत्व से, राष्ट्रवाद से मतभेद हो सकते हैं वे रहने दें, लेकिन कम से कम इतनी बेशर्मी तो मत दिखाईये कि आप यह कहें की सावरकर ने भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के लिए कुछ नहीं किया था...". इसके बाद तो सावरकर विरोधियों के तन-बदन में आग लग गई, कई फेसबुक समूहों और सोशल मीडिया पर सावरकर के लिए जमकर गालीगलौज की गई, जिसका मूल कारण था उनका "ब्राह्मण" होना... दो-दो कौड़ी के लोग, जिनके पुरखों ने भी कभी स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा नहीं लिया, वे भी सावरकर के खिलाफ ऊटपटांग बकने लगे... मणिशंकर अय्यर जैसे "नकली ब्राह्मण" जिन्होंने कभी एक रात भी सामान्य जेल में नहीं बिताई होगी, वे भी बिलबिलाने लगे... "दल-हित" चिन्तक, जिन्होंने केवल दलितों के नाम पर मलाई खाई है, उन्हें भी सावरकर के कार्यो के बारे में नहीं पता.. वे भी पूँछ में पटाखा बंधे जैसा उछलने लगे... इस अवसर पर मुझे मराठी के उत्कृष्ट लेखक जयेश मेस्त्री का यह लेख स्मरण हुआ. उसे आपकी सेवा में पेश कर रहा हूँ... अनुवाद किया है भाई विवेक कुमार पचपोल ने...

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मूल मराठी लेखक : जयेश शत्रुघ्न मेस्त्री

हिन्दी अनुवाद : विवेक कुमार पचपोल

"मेरे मरणोपरांत मेरे स्मरण में अगर कोई स्मृतिशिला लगवाना चाहे, तो उस पत्थर पर मेरे नाम के पीछे स्वातंत्र्यवीर ये उपाधी नही लगाई तो भी चलेगा... परंतु यदि इस पर कुछ लिखना चाहो तो "हिंदु संगठक सावरकर" ये अगर लिख सको तो मुझे ज्यादा पसंद होगा। ऐसा सावरकर जी ने एक बार अपना मनोगत रखते हुए कहा था। सावरकर जी हिंदुत्व के प्रखर पुरोधा थे ये बहुत से लोगो की गलतफहमी है. कट्टर हिंदुत्ववादी छवि होने की वजह से, वे अन्य धर्मों के विरोधी थे, ऐसा झूठ हमेशा लोगो के बीच फैलाया जाता है। सावरकर जी एक बार छोटी नाव जिसे होडी कहते है से रत्नागिरी जा रहे थे, वह नाव लालखान नामक एक मुस्लिम व्यक्ति की थी। सावरकर जी ने नाव के ऊपर ही सहभोज करने का निर्णय लिया और लालखान को उसका डब्बा लाने को कहा। तब लालखान ने कहा- “आप मुस्लिमो के कट्टर विरोधी है और मैं तो....“ तभी सावरकर जी तपाक से बोले “मेरे सनातन धर्म का विरोध करनेवाले मुसलमानों का मै विरोध करता हू, आप उसमे से एक हो क्या?” लालखान ने नकार देते हुए अपनी गर्दन हिलायी। तब सावरकर जी बोले, “ फिर हमारे सहभोज में शामिल होइए” ऐसे असंख्य उदाहरण है जिससे स्पष्ट होता है कि सावरकर जी अन्य धर्मों के विरोधी नहीं थे.

मूल रूप से सावरकर जी कभी विरोधक नहीं थे वे तो उद्धारक थे. सावरकर जी ने केवल हिन्दू ही नही बल्कि मुसलमानों को भी धार्मिक कर्मकांड का त्याग करने को कहा था. सावरकर जी ने अस्पृश्यता के विरोध में आन्दोलन शुरू किये. जिन लोगो को गांधीजी हरिजन कहते थे, उन्हीं लोगो को सावरकर “पूर्व-अस्पृश्य” कहते थे. १९२९ में रत्नागिरी के प्राचीन श्री विठ्ठल मंदिर में प्रथमतः सावरकर के प्रयासों से ही पुर्वास्पृश्यों को प्रवेश मिला. शिवू भंगी नामक एक बालक ने सावरकर जी द्वारा रचित "तुम्ही देवाच्या येऊ दिलेती दारी" ये गीत मंदिर की आखिरी सीढ़ी से गाने को शुरुआत करते हुए एक एक पायदान ऊपर चढ़ते गया और जैसे ही गीत खत्म हुआ वो बालक सभामंडप के बीचोंबीच आकर खड़ा था. उसने मंदिर के अंदर प्रवेश किया ये देखकर सभी लोगो ने तालियों की गड़गड़ाहट से उसका स्वागत किया. आज के समय में ये घटना साधारण लग सकती है, परंतु उस कालखंड में ये सबसे बड़ा हिम्मती कार्य था. तत्पश्चात सावरकर जी ने सभी हिन्दुओ को मुक्त प्रवेश मिले इसके लिए पतित-पावन मंदिर की स्थापना की. सन १९२९ में पतितपावन मंदिर के समारोह में हिंदुओं के प्रतिनिधि के रूप में पांडु महार ने शंकराचार्य जी को पुष्पहार अर्पण किया, जिसे शंकराचार्य जी ने स्वीकार किया एवं पांडु महार को प्रसाद स्वरूप श्रीफल दिया. कितना विशाल कार्य था ये... इसकी जानकारी अधिकतर लोगो को नहीं है. सावरकर जी ने उनके द्वारा किये गए कार्यो का कभी भी विज्ञापन नहीं किया. अखिल हिंदु उपहार गृह की स्थापना सावरकर जी (जिन्हें लोग प्यार से तात्या कहते थे) ने सन १९३३ में रत्नागिरी में की. इस उपहारगृह में पूर्वास्पृश्य चाय बनाने के साथ साथ वितरित भी करते थे. इस उपाहारगृह में चाय पीने की वजह से प्रसिद्ध चरित्रकार धनंजय कीर का भंडारी समाज ने बहिष्कार कर दिया था. अस्पृश्यता ये मानवता का अपमान होने की वजह से कानून और मानवीय तरीके से कानून और मानवता की दृष्टि से इसका अत्याचार खत्म करना चाहिए, ऐसा सावरकर जी लिखा है. सावरकर जी के इस महान कार्य को देखकर "डिप्रेस्ड क्लास मिशन" के कर्मवीर विठ्ठल रामजी शिंदे ने कहा, "यहाँ चल रही ऐतिहासिक, सामाजिक क्रांति सही मायने में अभूतपूर्व है जिसमे आप हजारो भंगी-महारप्रभृति धर्मबंधूंओ के साथ सहपूजन, सहभोजन आदि जैसे सारे व्यवहार सार्वजनिक रूप से करते है. ये दिन देखने के लिए में जीवित रहा और ये बहुत अच्छा हुआ है. स्वातंत्र्यवीर सावरकर जी ने अपने अज्ञातवास में मात्र 7 वर्ष के कालखंड में ही इस अभूतपूर्व सामाजिक क्रान्ति को सफल किया, भगवान मेरे जीवन के बचे हुए वर्ष उन्हें अर्पित करें”.

अंदमान मे रहते हुये भी वे समाजकार्य करते रहे. कालापानी जैसी निर्दयी और निष्ठूर सजा काटते हुए भी इन्होंने देशसेवा नहीं छोड़ी. जहाँ एक तरफ वे अंदमान में हिंदुओं पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ लड़ते रहते थे. अंदमान में सजा काट रहे निरक्षर कैदियों को वे साक्षर करते रहते थे, तो दूसरी और उत्तम काव्य की रचना भी करते रहे. सावरकर जब अंदमान से बाहर निकले तब तक ९०% कैदी मराठी में साक्षर हो चुके थे. अंदमान में कैदियों को वर्ष में एक बार कोई एक वस्तु मंगवाने का अधिकार मिलता था. ऐसे में कैदी अच्छी वस्तुएँ या पदार्थ मंगवाते थे. परंतु सावरकर जी ने कैदियों को कहा कि सभी लोग किताबे मंगवाएं. जिसके फलस्वरूप अंदमान में २००० पुस्तको का संग्रह हो गया. जेल के अधिकारी बारी का पुस्तको के प्रति विरोध होने के बावजूद सावरकर जी ने अंदमान में सर्वोत्तम वाचनालय की नींव रखी. अवकाश के दिन कैदी मारपीट या जुआ खेलने की बजाय पुस्तको का वाचन करने लगे. अंदमान में बंदी अधिकतर कैदी या तो मानसिक रूप से विक्षिप्त हो चुके थे या मरण को प्राप्त हो चुके थे परंतु सावरकर तो सही मायने में “मृत्युंजय” थे उन्हें मृत्यु का क्षण मात्र भी भय नहीं था. मृत्यु से सवालों के जवाब नहीं निकलेंगे इसकी उन्हें पूर्णतः कल्पना थी. सावरकर जी सहज कहते थे की, "मैंने मृत्यु की चिंता कभी नही की, शायद इसलिये मै इतने दीर्घकाल तक जीवित रहा” अंदमान में जब उन्हें कत्था कूटने का काम दिया गया, तब भी वे निराश नही हुए, इसके उलट उनके अंदर का तत्वज्ञानी जीवित हो उठा और “ये विश्व एक कत्थाकूट” ऐसा दिव्य विचार करने लगे. भयानक कालकोठरी में उन्हें कमला, विरहोच्छवास, गोमंतक जैसे महाकाव्य और आकांक्षा, मरणोन्मुख शय्येवर, रविंद्रनाथांचे अभिनंदन जैसी रचनाएँ स्फुरित हुयी है. सावरकर जी में अनेक गुण थे. वे राजनीतिक थे, कवी थे, सशस्त्र क्रांतिकारी, लेखक थे, तत्वज्ञानी थे, इतिहास लिखने वाले थे और इतिहास बनाने वाले भी थे. प्रख्यात वक्ता श्री. सच्चिदानंद शेवडे जी कहते हैं "सावरकर याने एक ही शरीर में बसे विविध अवतार”. २ मई १९२१ के दिन सावरकर बन्धुओ को अलीपुर के कारागृह में ले जाने के लिए सेल्युलर जेल से बाहर निकाला गया. पुलिस के कड़े बंदोबस्त में सावरकर बंधूओ को ले जा रहे थे इतने कड़े बंदोबस्त के बावजूद नयी नयी जमादारी प्राप्त कुशाबा पाटील इस बंदिवान ने चाफे के फूलों की माला विनायक सावरकर जी के गले में डाली और उनके चरणों पर मस्तक रख उनका जयजयकार किया. सावरकर जी ऐसे सम्मान के अधिकारी हैं, अरे नहीं, नहीं... वे तो साक्षात् सत्कारमूर्ति है. कारण कि जब अंदमान स्वतंत्र हुआ तब वहाँ पर सजा काट रहे कैदीयो को वहाँ का प्रथम नागरिकत्व प्राप्त हुआ. ये सभी कैदी क्रन्तिकारी नही थे, बल्कि उसमे खूंखार खुनी, बलात्कारी भी थे. पर सावरकर जी द्वारा प्रेषित संस्कारो ने उन अमानुषी कार्य करनेवालों तक को सज्जन बनाया.

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(सावरकर द्वारा अस्पृश्यों के लिए 1929 में स्थापित पतित पावन मंदिर, रत्नागिरी)

स्वतन्त्रता के यज्ञ में अपने जीवन की आहुति देनेवाले इस मातृभूमि के लाडले सपूत को स्त्रियों के प्रति विशेष आदर था. जिस तरह विवेकानंद जी को प्रत्येक स्त्री में मां काली के दर्शन होते थे उसी तरह सावरकर जी को प्रत्येक स्त्री में मातृभूमि के दर्शन होते थे. समाज में पुरुषो के समान स्त्रियों को भी समानता मिले, ऐसी दृढ इच्छा सावरकर जी रखते थे. परंतु प्रकृति ने ही स्त्री व पुरुष इनमे भेद किया है, समानता की कितनी भी बातें करने के बावजूद गर्भधारण जैसा “दिव्य अधिकार” स्त्रियों को ही प्रकृति ने दिया है इसका उन्हें सरोकार था. सावरकर जी स्त्रीयो के प्रति बहुत ही उच्च विचार रखते थे, वे कहते थे की जब भी देश पर कोई संकट आता है उस समय स्त्रियों को अपने पतियों के साथ, और अगर आवश्यकता पड़ी तो उनके बिना भी राष्ट्र की रक्षा के लिए रण मैदान में उतरना चाहिए. उनके “संन्यस्तखडग” नामक नाटक के सेनापति वल्लभ की युवा पत्नी अपने पति के पीछे पुरुष वेष धारण कर रणांगन में उतरती है, युद्ध में उसके पति को बंदी बना लिया जाता है, परन्तु फिर भी युद्ध रुका तो पति को मार दिया जायेगा ऐसी धमकी शत्रुओं की और से मिलती है, परंतु तब सौंदर्य से समृद्ध वो भारतीय नवयौवना जो पुरुषों को भी शर्मिंदा कर दे, ऐसा पराक्रम करती है और "आता शरण नव्हे रण, मारिता मारिता मरण" जिसका अर्थ है कि “अब शरण नहीं अब केवल रण, और अब मारते मारते मरण..” ऐसी सिंहगर्जना करती है. सावरकर जी की स्त्रियों के प्रति विचार भी इतने ही प्रगाढ़ है, भारतीय स्त्री अबला नही सबला है. इसलिए उसे आरक्षण की जरूरत नहीं ऐसी सावरकर जी की धारणा रही. सावरकर जी के व्यक्तित्व का ये एक अलग ही पहलू है, वे केवल क्रांतिकारी या हिंदुसंघटक नही परंतु समाजसेवक और समाज सुधारक भी है. परंतु सावरकर के समाज उद्धारक कार्यो की जानकारी अधिकतर लोगो को नही है. इसके प्रमुख रूप से दो कारण है, एक वे एक हिंदुत्ववादी थे और दूसरा वे जाति से ब्राह्मण थे. ये कारण कुछ लोगो को शायद पसंद न आये परंतु सत्य हमेशा कल्पना से भी कड़वा होता है, चलिए छोड़िये...

स्वयं को हिंदुसंघटक कहलाना सावरकर जी अधिक प्रिय होने के बावजूद प्रत्यक्ष रूप से सावरकर एक मानवतावादी थे. उनका आचरण, उनकी भाषा व्यक्तिगत जीवन में बेहद सादा था. वे कवि हृदय तो थे ही इतना होने के साथ साथ वे एक क्रन्तिकारी थे सावरकर जी द्वारा किये गए अस्पृश्य उद्धार के कार्यों को देखने पर ज्ञात होता है कि ये इंसान सचमुच कोई महात्मा या महामानव रहा. सावरकर जी ने कम से कम ५०० मंदिर अस्पृश्यतामुक्त किये है. सावरकर जी कहते थे कि, अस्पृश्य लोग ही सबसे ज्यादा अस्पृश्यता मानते है. उनका ये विचार शत-प्रतिशत सही ठहराने वाला एक प्रसंग घटित हुआ. एक बार उनकी सभा में एक महार युवक आया और सावरकर जी से कहने लगा, "आप छुआछूत के विरोध में इतना कार्य करते है, क्या आप मेरे हाथ से पानी पी सकते हैं?" सावरकर जी मंच से उतरे और बोले , "हाँ.. क्यों नही?.. जाओ पानी लेकर आओ." वो युवक पानी लाया और सावरकर जी ने उसके हाथ से पानी सहज ही पी लिया, क्योकि ब्राह्मण ने दिया या महार ने दिया, पानी तो पानी होता है... और सावरकर जी ब्राह्मण और दलित में भेदभाव ही नहीं करते थे. इसलिए उन्हें उस महार युवक के हाथों से पानी पीने में कुछ भी संकोच नही हुआ. परन्तु जब सावरकर जी ने उस महार युवक से कहा कि क्या तुम एक चमार युवक के हाथों से पानी सकते हो? तो महार युवक बोला "नही.. नही.. मैं उसके हाथों से पानी नहीं पी सकता, क्योंकि मेरी जाति, उसकी जाति से उच्च है. इसलिए सावरकर जी मजाक में कहते थे कि "हिन्दुओ में सबसे आखिरी जाति कौन सी है? प्रत्येक जाति को ये लगता है, कि अमुक अमुक जाति से उसकी जाति उच्च है". सावरकर जी का ये अभूतपूर्व कार्य देखकर ये प्रश्न उठता है कि सावरकर जी ने इतना त्याग क्यों किया? इस देश के लिए, समाज के लिए इतनी तड़प क्यों थी? वैसे देखा जाये तो देश की तरफ से और समाज की तरफ से सावरकरजी को कुछ नहीं मिला. उस महार युवक ने सावरकर जी को पानी तो पिला दिया परन्तु सावरकर जी की तृष्णा शांत नहीं हुई. सावरकर जी को असल में तृष्णा किस चीज की थी? पानी की? अरे.. अपने अंतिम समय में तो उन्होंने जल का भी त्याग कर दिया था. फिर उनको असल में प्यास किस चीज की थी? उनको प्यास थी, जी हाँ... उनको प्यास थी देश उद्धार की, समाज उद्धार की, सावरकर जी देशप्रेम की तृष्णा से व्याकुल थे. आज यदि वे देहस्वरूप हमारे बीच में मौजूद नहीं है. मगर फिर भी उनकी तृष्णा अभी भी शांत नही हुई है. क्योकि देश को स्वराज्य तो मिला मगर सुराज्य अभी तक प्राप्त नही हुआ है. जिस दिन सिंधु नदी आजाद होगी, जिस दिन हिंदुस्थान की तरफ आँख उठाकर देखने की किसी की हिम्मत नहीं होगी. जिस दिन जातियों के बीच, धर्मो की बीच, पंथों के बीच सभी मतभेद भूलकर हम सब एक राष्ट्र बनकर एक साथ खड़े होंगे व सभी बलाढ्य राष्ट्रो को पीछे छोड़कर सही अर्थों में महासत्ता बन जायेंगे. आज सावरकर जी हमारे बीच नही है परंतु उनके विचारों की दीपमालिका आज भी हमारे मन को रोशन कर जाती है. और उनके इन्ही विचारों की दीपमालिका से हम विश्व को रोशन कर देंगे. ये काम बहुत कठिन है... ये एक संकल्प है. और हम ये संकल्प लेंगे, और कितनी भी विपरीत परिस्थिति आये हम इसे पूर्णत्व पर लेकर जायेंगे. सावरकर जी की ही भाषा में कहे तो " घेतले व्रत न आम्ही हे अंधतेने, लब्ध-प्रकाश - इतिहास निसर्गमाने, जे दिव्य दाहक म्हणूनी असावयाचे, बुद्धयाचि वाण धरिले, करि हे सतीचे", इसका अर्थ है कि ये संकल्प हमने अन्धकार में नही लिया, ये दिव्य दहकते बुद्धिमान व्यक्तियों का प्रण है... 

सावरकर जी के राष्ट्रवाद की यह लौ, जो आज धधकती ज्वाला बन चुकी है... इसमें "बुद्धिपिशाचों" का भस्म होना निश्चित है... बस यह ज्ञान हम अगली पीढी तक सकुशल पहुँचा भर दें... 

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