महान क्रान्तिकारी और अमर बलिदानी वासुदेव बलवंत फड़के

Written by गुरुवार, 23 फरवरी 2017 19:06

भारतवर्ष वो राष्ट्र हैं जहाँ धरती को माँ माना गया हैं और इस मिट्टी ने ऐसे शूरवीर और त्यागी पैदा किये हैं जिनकी शूरवीरता और त्याग ने विश्व को हमेशा आश्चर्यचकित ही किया हैं|

ऐसे ही शूरवीर, त्यागी और चतुर सशस्त्र स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वन्दनीय वासुदेव बलवंत फड़केजी का नाम लिए बिना भारत का स्वतंत्रता संग्राम अधुरा हैं| फड़केजी को भारत के सशस्त्र स्वतंत्रता संग्राम का आदि पुरुष माना जाता हैं| आपका जन्म ४ नवम्बर १८४५ को महाराष्ट्र के कालवा जिले के श्रीधर ग्राम में ऐसे समय हुआ था जब भारतवर्ष गुलामी की ज़ंजीरो में पूरी तरह से जकड़ा जा चूका था| अंग्रेजो का अधिपत्य राष्ट्र के अधिकांश हिस्सों पर हो चूका था उनके अत्याचारों से सामान्यजन त्रस्त होना शुरू हो गए थे| किशोरावस्था में अभी वासुदेव ने कदम ही रखा था की अंग्रेजो द्वारा चारों ओर किसानो पर हो रहे अत्याचारों ने उन्हें अन्दर तक झकझोर दिया था| 

युवावस्था को प्राप्त होते ही वासुदेव ने अपने पिता की इच्छा के विपरीत जाकर ग्राम में कोई आजीविका का साधन न अपनाकर मुंबई जाकर जीआरपी में नौकरी कर ली| यहाँ नौकरी करते हुए वासुदेव ने अपना अध्ययन का कार्य भी जारी रखा| पहली पत्नी का निधन होने के बाद २८ वर्षीय वासुदेव का दूसरा विवाह संपन्न हुआ| उनका जीवन सामान्य गति से एक आम आदमी की तरह चल रहा था किन्तु १८७० में न्यायमूति रानाडेजी का भाषण सुनकर उनके मन पर गहरा प्रभाव पड़ा और उनके मन में उथल-पुथल मचने लगी| १८७१ में ऐसे ही राष्ट्र के लिए विचारमग्न बैठे वासुदेव को तार के द्वारा समाचार मिला की उनकी माताजी का स्वास्थ्य बहुत ख़राब हैं वे ये समाचार प्राप्त होते ही जल्द से जल्द माँ के दर्शन को आ जाये की पता नहीं कब वे अपनी अंतिम साँस ले ले| यह समाचार प्राप्त होते ही वासुदेवजी अपने अँगरेज़ अधिकारी के पास अवकाश की मांग लेकर पहुंचे किन्तु गुलाम होने की वजह भारतीयों के प्रति अंग्रेजो का व्यवहार अच्छा नहीं रहता था और अँगरेज़ अफसर ने इन्हें बेइज्जत करके छुट्टी देने से मना कर दिया| वासुदेव मातृभक्त थे वे कहा मानने वाले थे तुरंत ही वे अपने ग्राम के लिए रवाना हो गए| किन्तु नियति को कुछ और ही मंजूर था उनके पहुँचने से पहले ही उनकी माताजी का स्वर्गवास हो चूका था| वासुदेव अपनी माताजी के मृत शरीर के पैरो को पकड़कर रोने लगे और अंग्रेजी शासन के इस व्यवहार पर उन्हें क्रोध भी आ रहा था|

इस घटना के पश्चात उन्होंने वापस जाकर नौकरी करने का विचार त्याग दिया और मातृभूमि को स्वतंत्र करवाने के विचार से युवाओं के मध्य जाकर उन्हें संगठित करने का प्रयास करने लगे| शहरी युवाओ से उन्हें जब कोई आशा की किरण नज़र नहीं आने लगी| कुछ समय पश्चात गोविन्द राव दावरे और अन्य युवा उनके साथ आने लगे किन्तु कोई बड़ा संगठन खड़ा किया जा सके ऐसा प्रतीत नहीं हुआ तो उन्होंने वनवासी क्षेत्रो में जाने का प्राण किया| उनके मन में यही विचार आया की किस तरह भगवान् राम ने वनवासी और वानरों को संघठित करके अत्याचारी रावण पर विजय पायी थी| किस तरह महाराणा प्रताप ने इन्ही अदिवासियों की सहायता से घमंडी अकबर के छक्के छुड़ा दिए थे| किस तरह शिवाजी महाराज ने इन्ही वनवासीयों में आत्मविश्वास भरकर इन्हें औरंगजेब की अधीनता से एक बड़े भूभाग को स्वतंत्र कर हिन्दवी साम्राज्य की स्थापना की थी|

अब वासुदेव बलवंत फड़केजी “इदं राष्ट्राय स्वाहा” का मन्त्र जाप करके मातृभूमि को सर्वस्व अर्पण करने का प्रण कर चुके थे| नौकरी के साथ साथ उन्होंने गृहस्थ जीवन का भी त्याग कर दिया| महाराष्ट्र के अंचलो में रहने वाली रामोशी जाति के वीर, विश्वसनीय और राष्ट्र के लिए अपना सबकुछ त्याग करने के लिए तैयार लोगो को लेकर सेना बनाने में जुट गए| कुछ ही समय में एक संघठित सेना बन गयी थी और देखते ही देखते तत्कालीन महाराष्ट्र के ७ जिलो में सेना का प्रभुत्व जम चूका था| शिवाजी महाराज की तरह ही वासुदेवजी ने भी गुरिल्ला युद्ध को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया| वे छोटे-छोटे समूहों में कभी भी एकदम से अंग्रेजो पर हमला करते, खज़ाना लूटते और फिर गायब हो जाते| अंग्रेजो के मन में वासुदेव बलवंत फड़के का नाम किसी दुस्वप्न की तरह घर करने लग गया था| १३ मई, १८७९ को वासुदेव के बढ़ते हुए प्रभुत्व को कैसे दबाया जाए इसके लिए कई अँगरेज़ अफसरों ने रात १२ बजे पुणे के विश्राम बाग़ में बैठक कर रहे थे| किन्तु ये क्या वासुदेव अपनी सेना सहित वहां भी पहुँच गए और कई अँगरेज़ अफसरों को मारने के बाद भवन में आग लगा दी| इस घटना ने तो जैसे अंग्रेजी हुकूमत पर वज्रपात कर दिया| अंग्रेजी हुकूमत पूरी तरह से डर गयी और उस समय अँगरेज़ अफसर रिचर्ड ने ये मुनादी करवा दी और पोस्टर चस्पा करवा दिए गए की जो भी वासुदेव बलवंत फड़के को जिंदा या मुर्दा पकड़कर लायेगा उसे १ लाख रुपये का इनाम दिया जायेगा| वासुदेव भी कहा कम थे उन्होंने भी पोस्टर चस्पा करवा दिए की जो भी अफसर रिचर्ड को जिंदा या मुर्दा पकड़ेगा उसे १.५ लाख का इनाम दिया जायेगा| वासुदेव के इस युक्तिपूर्ण कदम से अँगरेज़ पूरी तरह से हतप्रभ थे और अन्दर तक काँप गए| बौखलाकर उन्होंने वासुदेव को ढूँढने का काम तेज़ी से शुरू कर दिया|

वासुदेव ज्वर से पीड़ित होकर पुणे के एक मोहल्ले सदाशिव पेठ में विठोबा के मंदिर में शरण पाए हुए थे| जैसा की भारत का इतिहास रहा हैं, हम दुश्मनों से नहीं वरन अपने ही समाज में बैठे जयचंद और मानसिंह जैसे गद्दारों के द्वारा विश्वासघात से हारे हैं, यहाँ भी यही हुआ| किसी गद्दार ने अंग्रेजो को वासुदेव के मंदिर में छुपे होने की सुचना दे दी| वासुदेव पकडें गए और उन पर मुकदमा चलाया गया| उन्होंने न्यायलय में यही कहा की आज मेरा देश परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ हैं, इससे तो मर जाना ही बेहतर हैं| उन्हें आजीवन कारावास को सजा हुई किन्तु वासुदेव चुपचाप कहा बैठने वाले थे उन्होंने जेल से भागने की चेष्टा की किन्तु शरीर कमजोर होने के कारण १७ मील भागने के बाद पुलिस के द्वारा फिर से पकड़ लिए गए| उनके प्रभाव और व्यक्तित्व को अँगरेज़ अच्छी तरह से जान गए थे और उन्हें भारत की किसी भी जेल में बंद करना वे अपने साम्राज्य के लिए खतरा समझते थे| उन्हें अफ्रीका में अदन की जेल में भेज दिया गया, जहाँ पर कुछ वर्षो की मर्मान्तक पीड़ा और यातना को सहते हुए १७ फरवरी १८८३ को अपना शरीर स्वतंत्रता की बलिवेदी पर अर्पित कर दिया| वे निश्चित ही पहले ऐसे क्रांतिकारी थे जिनके डर के कारण अंग्रेजो ने उन्हें भारत की जेल में न रखकर विदेश भेजने का प्रबंध किया था|

उनकी शहीदी पर न्यायमूर्ति रानाडेजी ने कहा था की “वासुदेव बलवंत फड़के ने देश की बलिवेदी पर अपने जीवन का सर्वस्व अर्पित कर दिया”| ऐसे प्रातः स्मरणीय महानायक को याद करना हर भारतीय का कर्तव्य हैं|

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