भारत की "वर्ण व्यवस्था" विश्व की सर्वोत्तम व्यवस्था थी

Written by मंगलवार, 04 अप्रैल 2017 21:22

यह निर्विवाद है कि भारत की अति प्राचीन सामाजिक व्यवस्था पूरी दुनिया की तुलना में अधिक विकसित तथा वैज्ञानिक थी। उस समय भारत वैज्ञानिक मामलों में भी दुनिया में उपर था, सामाजिक मामलों में तो था ही।

सामाजिक व्यवस्था में सबसे अधिक महत्व वर्ण व्यवस्था का था। वर्ण व्यवस्था का अर्थ यह था कि प्रत्येक बालक को बचपन में ही उसकी प्रवृत्ति का आकलन करके उसे उस दिशा में बचपन से ही प्रशिक्षित किया जाता था।

किसी भी बालक की प्रवृत्ति में तीन परिस्थितियों का समावेश होता है-  1. जन्म पूर्व के संस्कार  2. पारिवारिक वातावरण  3. सामाजिक परिवेश। जन्मपूर्व के संस्कार पैतृक होते हैं या पूर्वजन्म के या दोनों ही मिलकर, यह अब तक स्पष्ट नहीं है किन्तु जन्मपूर्व के संस्कार प्रवृत्ति को प्रभावित करते है, यह सत्य है। जन्म के बाद बचपन के संस्कारों में परिवार का प्रभाव पड़ता है तथा 6 से लेकर 12 वर्ष की उम्र के बाद सामाजिक प्रभाव भी पड़ना शुरु हो जाता है। यही कारण है कि अति प्राचीन समय में प्रवृत्ति का आकलन करते समय 6 से लेकर 12 वर्ष तक की उम्र ही मानी जाती थी। इस कालखण्ड में जिस बालक में जो प्रवृत्ति अधिक प्रभावी दिखती थी, उसे उसी दिशा में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य के नाम से कहा जाता था। जिस बालक में चिंतन का प्रभाव अधिक होता था, जो मरने से न तो डरे किन्तु मारने से अलग रहे तथा जो किसी दूसरे पर अपनी बात बलपूर्वक थोपने को एक बुराई समझे, उसे ब्राह्मण प्रवृत्ति मान लिया जाता था। ऐसा बालक शांत गंभीर ज्ञान और त्याग से भरपूर माना जाता था। इसके ठीक विपरीत युद्धप्रिय, मरने-मारने को तैयार, दूसरों पर शासन करने की इच्छा रखने वाला क्षत्रिय कहा जाता था। ऐसा बालक निडर साहसी प्रवृत्ति का माना जाता था। इन दोनों के विपरीत जो मरने मारने से भी डरे, तथा दूसरों पर अपनी बात न थोपता हो उसे वैश्य मानते थे। ऐसा बालक चालाक, लोभी और डरपोक माना जाता था। जो बालक श्रम प्रधान होता था, बुद्धिप्रधान नहीं, उसे श्रमजीवी मानकर शूद्र रहने दिया जाता था। यह व्यवस्था बहुत अच्छी थी तथा समाज में सफलतापूर्वक चल रही थी। इन सबमें भी ब्राह्मण प्रवृत्ति को सर्वाेच्च स्थान प्राप्त था तथा शूद्र प्रवृत्ति को सबसे कम महत्व दिया जाता था। आश्रम व्यवस्था में भी वर्णव्यवस्था का समावेश था अर्थात् ब्राह्मण को अंतिम समय में सन्यास तक जाना चाहिए था। जबकि क्षत्रिय वानप्रस्थ तक था, वैश्य और शूद्र गृहस्थ तक थे।

प्राचीन समय में ऐसी भी व्यवस्था थी कि ब्राह्मणों के साथ किसी भी प्रकार का बल प्रयोग अनुचित था। दूसरी ओर ब्राह्मण को सम्मान के अतिरिक्त कोई राजनैतिक पद अथवा धन रखने पर पूरी तरह प्रतिबंध था। हर आदमी अपनी अपनी प्रवृत्ति के अनुसार कार्य करने की अपनी अंतिम सीमा समझता था और कोई व्यक्ति किसी दूसरे की प्रवृत्ति की नकल नहीं करता था। स्पष्ट है कि वर्णव्यवस्था भारत के अतिरिक्त दुनिया के अन्य देशो में लगभग न के बराबर थी।

वर्णव्यवस्था प्रवृत्ति और गुण को आकलित करके बनती थी। जबकि जाति व्यवस्था वर्णव्यवस्था के अन्तर्गत अलग अलग कार्याे में संलग्न व्यक्तियों की होती थी। ब्राह्मणों में भी कार्य के अनुसार पुजारी द्विवेदी या अन्य जातियां थी। यहॉ तक कि ब्राह्मणोें में ही महाब्राह्मण की भी एक जाति थी। इसी तरह क्षत्रियों में तथा वैश्यों में भी जातियां, उपजातियां बनी हुई थीं। जो लोग सामाजिक व्यवस्था का घोर उलंघन करते थे, उन्हें भी किसी प्रकार का दण्ड नहीं दिया जा सकता था किन्तु उनका सामाजिक बहिष्कार करने की प्रथा थी। और ऐसे ही बहिष्कार के अन्तर्गत सामाजिक दण्डस्वरुप अलग किये गये लोग अछूत कहे जाने लगे।

वर्णव्यवस्था में लम्बे समय बाद रुढ़िवाद आया और वर्णव्यवस्था योग्यता तथा प्रवृत्ति का आकलन किये बिना जन्म के आधार पर ही घोषित होने लगी। यह विकृति उच्च वर्ण वालों की धूर्तता के कारण आई अथवा स्वाभाविक रुप से शिथिलता के कारण, यह कहना कठिन है किन्तु यह विकृति आयी अवश्य। इसी तरह जो लोग सामाजिक बहिष्कार के आधार पर अछूत कहे गये उनकी आगे आने वाली पीढ़िया भी अछूत रह गई। यह भी एक विकृति थी। कोई परम्परा जब रुढ़ि बन जाती है तो वह विकारग्रस्त हो जाती है तथा उसके परिणामस्वरुप सामाजिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न होने लगती है। सामाजिक व्यवस्था की इस विकृति का ही परिणाम था कि भारत धीरे धीरे गुलामी की ओर चला गया क्योंकि अयोग्य लोग अपने को ब्राह्मण या धर्मगुरु घोषित करके पूज्य बनने लगे तथा अच्छे अच्छे योग्य लोग भी शूद्र से आगे नहीं बढ सके। राजा के पुत्रा स्वाभाविक रुप से राजा बनने लगे, भले ही उनमें कायरता से भी अधिक बड़ा दुर्गुण क्यों न हो। चिंतन भी बंद हो गया तथा सुरक्षा भी कमजोर हो गई।

ऐसे ही गुलामी के कालखण्ड में स्वामी दयानंद सरीखे कुछ महापुरुषों ने इस विकृति को समझा और जन्म के आधार पर वर्ण और जाति को अस्वीकार करके प्रवृत्ति और कर्म के आधार पर सामाजिक मान्यता दिलाने की कोशिश की। महात्मा गांधी ने उस कोशिश को और आगे बढ़ाया और ऐसा लगा कि बहुत कम समय में वर्णव्यवस्था में जन्म का आधार हटकर प्रवृत्ति और कर्म का प्रवेश हो जायेगा। किन्तु पं. नेहरु सरीखे सत्तालोलुप लोगों को यह सुधार पसंद नहीं आया क्योंकि ऐसा सुधार समाज को तोड़ने और सत्ता को मजबूत करने में बाधक था। इन राजनेताओं ने संयुक्त रुप से वर्णव्यवस्था की सामाजिक विकृतियों को सुधारने की अपेक्षा उनका राजनैतिक लाभ उठाने का प्रयास किया। ऐसे ही प्रयास को उन हिन्दू सवर्णाे का भी भरपूर समर्थन मिला जो अयोग्य होते हुए भी पूज्य बनकर समाज मेें रहना चाहते थे। इस तरह दो अलग अलग समुहों ने गांधी और दयानंद के प्रयत्नों का भरपूर विरोध किया। दयानंद पूर्व से ही चले गये थे तथा गांधी भी भेज दिये गये और आगे इन दोनों गुटों को वर्णव्यवस्था की बीमारियों का लाभ उठाने का पूरा पूरा अवसर मिला। गायत्राी परिवार के श्रीराम शर्मा ने भी इस दिशा में महत्वपूर्ण प्रयत्न किये किन्तु उनके जाने के बाद वे प्रयत्न भी रुढ़ हो गये। आज स्थिति यह है कि भारत इस वर्णव्यवस्था में न सुधार करने की स्थिति में है, न समाप्त करने की स्थिति में, बल्कि भारत तो सिर्फ एक ही स्थिति में है कि जन्मना वर्ण और जाति को लगातार मजबूत करके दो पक्ष आपस में टकराने का ऐसा नाटक करते रहें कि समाज धीरे धीरे दो गुटों में बटकर उनका गुलाम हो जाए।

यदि हम पूरी दुनिया का आकलन करें तो भारत की व्यवस्था ही एकमात्र ऐसी सामाजिक व्यवस्था थी जिसमें प्रवृत्ति योग्यता और क्षमता के अनुसार कार्य विभाजन था। उसमें भी ज्ञान और त्याग को सर्वाेच्च स्थान प्राप्त था। यदि हम इस्लामिक व्यवस्था का आकलन करे तो उनमें क्षत्रिय गुण प्रधान दिखता है। यदि हम पाश्चात्य संस्कृति का आकलन करे तो वह वैश्य गुण प्रधान दिखती है तथा साम्यवाद तो पूरी तरह शूद्र गुण प्रधान है ही। भारतीय संस्कृति को छोड़कर किसी भी अन्य संस्कृति में चारों गुणों का सामांजस्य नहीं दिखता। किन्तु दुर्भाग्य है कि आज भारत के ही स्वार्थी राजनेता और धर्मगुरु वर्णव्यवस्था को गाली देने तक ही अपने को सीमित रखते है जबकि वर्णव्यवस्था समाज व्यवस्था की सबसे सशक्त इकाई है।

अब वर्णव्यवस्था में सुधार संभव नहीं दिखता दूसरी ओर वर्णव्यवस्था को जीवित करने के अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग भी नहीं है। मेरे विचार में इन दोनों विपरीत स्थितियों से बचने का एक तरीका हो सकता है कि हम ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र जैसे रुढ़ और बदनाम हो चुके नामों से किनारा कर ले। दूसरी ओर हम 6 से 12 वर्ष तक के बालको की एक ऐसी परीक्षा प्रणाली का विकास करे जो उनकी प्रवृत्ति के आधार पर उन्हें अलग अलग दिशाओं में भेजने की संस्तुति करें। आज हम अपने प्रशासनिक कार्यों के लिए आई ए एस, आइ पी एस सरीखी परीक्षाएॅ आयोजित करते है। इसी तरह यदि बचपन से ही प्रवृत्ति के आधार पर विद्वान राजनीतिज्ञ, व्यवसायी, श्रमिक सरीखा विभाजन करके उन्हें बचपन से ही अलग अलग प्रशिक्षण दिया जाये तो सामाजिक व्यवस्था में बदलाव आ सकता है।

हम ऐसी भी व्यवस्था कर सकते है जिसके अनुसार विधायिका में विद्वान, कार्यपालिका में राजनीतिज्ञ व्यवसाय में वैश्य तथा श्रमिक के कार्याे में श्रमिक श्रेणी के लोगों को ही प्रवेश अनिवार्य कर दिया जाये। कोई अन्य श्रेणी का व्यक्ति किसी दूसरी श्रेणी के कार्य में प्रवेश उसी तरह वर्जित होगा जैसे आइ ए एस की परीक्षा पास करना आइ ए एस के लिए अनिवार्य है, या डॉक्टर के लिए प्रारंभ में ही बायलाजी अनिवार्य हैं। हो सकता है, इस सुधार से वर्णव्यवस्था को नए परिवेश में जीवित किया जा सकता है।

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(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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