यूपी :- अति-भावुक या दरियादिल पृथ्वीराज चौहान ना बनें

Written by रविवार, 12 मार्च 2017 13:22

अगर आपको नए स्थान पर कभी दिशाभ्रम हुआ होगा, तो एक अनोखी चीज़ पर भी ध्यान जायेगा. चौराहे पर खड़े व्यक्ति को जब दाहिने मुड़ना है या बाएं, यह समझ नहीं आता तो वो सीधा आगे भी बढ़ सकता है. ऐसे में वो अपनी मंजिल से उल्टी दिशा में नहीं जाएगा, लेकिन वो ऐसा करेगा नहीं.

 वह ठीक उल्टी दिशा में मुड़ जायेगा. दाहिने मुड़ना हो तो बायीं तरफ मुड़कर अपनी मंजिल से और दूर हो जाएगा. ऐसा हर नई चीज़ में होता है. बाइक-स्कूटर नया-नया चला रहे लोग भी ब्रेक दबाने के बदले ठीक उल्टा करेंगे. अगर वो सिर्फ एक्सेलरेटर छोड़ दें तो भी गाड़ी रुकेगी, लेकिन वो ऐसा करेगा नहीं. इसकी बजाय एक्सेलरेटर और घुमा के धक्का, और जोर का मार लेगा.

लड़ाई या युद्ध की अगर कोई ट्रेनिंग ना हो तो वहां भी आप पक्का उल्टी हरकत ही करेंगे. जिन्हें थोड़ा अभ्यास होगा, वो आपकी हरकत देखकर, आप पर वैसे ही हँसता है जैसे बाइक का एक्सेलरेटर घुमा कर गिर जाने के बाद आप सीख रहे बच्चों पर हँसते हैं. हथियार से वार करना सीखने वाला, अक्सर सर की हाइट पर प्रहार करने की कोशिश करता है. ये शुद्ध बेवकूफी होती है. जिसे थोड़ा भी अभ्यास होगा वो सर पर किये वार को झुक कर, या हटकर आसानी से बच जायेगा. दस बारह बार ऐसी बेवकूफी करने पर जब नया खिलाड़ी थकने लगेगा, नाकामी से खीज रहा होगा, तब सामने वाला वार करेगा.

अब अगर आप चतुर सिंह चीता की तरह सोच रहे हैं कि जैसे वो झुककर, या हटकर वार बचा गया वैसे ही मैं भी बच जाऊँगा, तो वो भी नहीं होने वाला. वह आपकी कमर से नीचे के हिस्से पर वार करेगा. पैर उठाने की कोशिश में आप गिरेंगे, या चोट खायेंगे, दोनों हाल में जल्दी ही हारेंगे. हिन्दुओं का ये हथियारों का अभ्यास ना होने के कारण ऐसी मूर्खता का भी अभ्यास होता है (तुलना समुदाय विशेष के त्योहारों में हथियारों के, युद्धकला के प्रदर्शन से कर लीजिये). हिन्दू यह मानकर चलता है कि जान पर बन आई तब देखेंगे, अभी तो “अहिंसावादी” होना है, कुछ वैसा ही जैसा डॉ. नारंग के परिवार ने सोचा होगा. डॉ. नारंग और उनके परिवार ने कोशिश नहीं की होगी, ऐसा तो नहीं मानते ना?

ऐसे ही लोगों को हिन्दुओं के धर्मग्रंथों को किसी और से सुनकर, आह-वाह करते भावातिरेक में बहने के बदले, खुद पढ़ने की जरूरत होती है. अगर महाभारत पढ़ेंगे तो फ़ौरन ध्यान चला जायेगा कि भीम दुर्योधन को कमर से नीचे मारता है जिस से वो गिर पड़ता है. उस से पहले भी कृष्ण ऐसी ही सलाह दे चुके होते हैं. जरासंध की बारी में भी टाँगे पकड़ कर चीर दिया गया था. गौर कीजिये कृष्ण की सलाह, जो समझदार नीतिकुशल माने जाते हैं, कमर से नीचे, टांगो पर प्रहार की सलाह देते हैं. भैंस की तरह पगुराने के लिए नहीं सीखने के लिए हैं वो हिस्से. महाकाव्य में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों होंगे. वे हिस्से लड़ाई में जीतना सिखा रहे होते हैं.

किसी भी चीज़ को तोड़ना हो, गिराना हो तो उसके सबसे कमजोर हिस्से पर प्रहार किया जाता है. जड़ों पर चोट की जाती है, ये बिलकुल सामान्य बुद्धि की बात है. हिन्दुओं पर चोट करनी हो, तो कौन सा हिस्सा सबसे कमजोर दिखता है? गरीब हिन्दुओं का वो वर्ग जिसे दलितों का नाम देकर वोट बैंक बनाया गया है, सबसे पहले वहां चोट की जायेगी. कैसे की जायेगी? बहुत आसान है, अहिंसा का अर्थ किसी प्राणी को अकारण चोट ना पहुँचाना, दुखी ना करना होता है. यहाँ से “अकारण” शब्द को गायब कर दीजिये और अब “अहिंसा-अहिंसा” रटना शुरू कर दीजिये. मछुआरों का पेशा करने वाले का आर्थिक नुकसान हो जायेगा, मांस के व्यापारियों का नुकसान हो जाएगा. चमड़े का व्यवसाय करने वाला घृणित हो जायेगा, मोची नीच हो जाएगा, आर्थिक जो इनके व्यवसाय की क्षति हुई वो तो हुई ही, सामाजिक रूप से भी इन्हें महामूर्ख जीव बहिष्कृत करने लगेंगे. अंग्रेजों ने करीब दो सौ साल तक बाकायदा “क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट” बना कर जिन सैकड़ों समुदायों को केवल जन्म के आधार पर अपराधिक घोषित कर रखा था, उन भावनाओं को और पुख्ता करने का इंतजाम अपने आप हो गया. अपना व्यवसाय कानूनी प्रतिबंधों के कारण तो पहले ही नहीं कर पा रहे थे बेचारे, जन्म के आधार पर फिरंगी कभी भी जेल में डाल सकते थे, अब सामाजिक रूप से भी इनसे दूरी “निर्मित” हो गई.

समय बीतने के साथ संचार माध्यमों में बदलाव आया. जहाँ रेडियो मोबाइल में घुसकर नहीं पहुंचा था, वहां भी सस्ते ट्रांजिस्टर उपलब्ध होने लगे. बिजली की कमी ने भी ट्रांजिस्टर-रेडियो पर उतना प्रभाव इसलिये नहीं डाला क्योंकि ये बैटरी से आसानी से चलने वाली चीज़ें थी. धीरे धीरे संचार के बढ़ते ही हमले के बदलते हुए तरीके समझ आने लगे. अब गाँव के कूएँ में गाय मारकर डाल देने से पूरा इलाका धर्म से बाहर नहीं हो जाता है. कहीं गुजरात में जब गौरक्षा के नाम पर आतंक फ़ैलाने की कोशिश होती है, तो उसे फ़ौरन नजर आ जाता है कि ये गौरक्षा ब्रिगेड में मुस्लिम नाम कहाँ से आ गए? वो सवाल करने लगा है, तो तथाकथित सोशल इंजीनियरिंग के अभ्यस्तों को जवाब देने में दिक्कत होने लगी है. अब उसे उसके पुश्तैनी पेशे से ठगकर दूर नहीं किया जा सकता. पंचतंत्र की कहानी जैसा वो कंधे पर उठाई बकरी को कुत्ता कहने वाले ठगों को पहचानने लगा है. हमलावरों से वो अब हमले के तरीके सीख गया है और वापिस पलटा कर वैसे ही हथियार चलाता है. पुराने दौर की तरह उसके तीर-तलवार के लिए तोपें और बन्दूक नयी चीज़ नहीं, वो ए.के.47 और बमों के जवाब में लाठी नहीं उठाता, उन्नत रायफल के जुगाड़ में लग जाता है. उसे चक्रवर्ती रोहित वेमुल्ला की आत्महत्या पर स्पष्ट समझ आता है कि इसे टुकड़ाखोरों ने खुद ही मार डाला है. जब वह रोहित के आखरी ख़त में पढ़ता है कि “मैं राक्षस होता जा रहा हूँ”, या फिर “मेरी आत्मा मर चुकी है” तो उसे फ़ौरन पता चल जाता है की इसकी हत्या दल-हित चिंतकों ने ही कर डाली है.

लोकतंत्र और मतदान भी उसके लिए नया था, एकजुट मतदान और टेक्टिकल वोटिंग भी पहले उसे समझ नहीं आती थी लेकिन वो ये भी सीख गया है. चुपचाप, बिना किसी मान-प्रतिष्ठा के लोभ के वो अपनी अगली पीढ़ियों के लिए काम करने लगा है. वो अब भेंड़ की तरह हांके जाने को तैयार नहीं वो दूर की सोचने लगा है. इसका उदाहरण थोड़े ही दिन पहले तब दिख गया था, जब किसी झंडे के बिना स्नेपडील को जमीन सूंघा दी गई. हम नहीं डरते या नहीं मानते बात की पूंजीपति अकड़, ग्राहक के गायब होते ही गायब हो गई. चुपचाप आमिर को ब्रांड एम्बेसडर से हटा दिया गया. फिल्मों को नुकसान होने पर किंग खान कहे जाने वालों को भी बैकफूट पर जाना पड़ा.

“वामी-कामी बुद्धिपिशाच” ये बदलाव स्वीकारने को तैयार नहीं हो रहे. कुछ तो उनकी बौद्धिक होने की अकड़ और कुछ उनके विदेशी फण्ड की मजबूरी उन्हें जमीनी सच्चाई स्वीकारने नहीं दे रही. वो कहते हैं सत्तर प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाले इलाकों में भाजपा मुस्लिम मतों से जीती है. तो एक बार वो हिसाब मोटे तौर पर मिला कर भी देख लें. इलाके की मुस्लिम आबादी सत्तर प्रतिशत मतलब 100 में से 70 मतदाता समुदाय विशेष के 30 हिन्दू. इलाके में मतदान हुआ साठ प्रतिशत के लगभग यानि 100 में से सिर्फ 60 लोगों ने मतदान किया. इन 60 में से भाजपा का मत प्रतिशत करीब चालीस फीसदी है यानि 100 में से 24 लोगों ने भाजपा को वोट दिया. जहाँ 30 हिन्दू हैं वहां 24 वोट अगर भाजपा के पक्ष में आये हैं तो जाहिर सी बात है कि एकजुट टैक्टिकल वोटिंग हुई है. जो 70 मुस्लिम वोट थे उसमें भी साठ फीसदी मतदान हुआ. यानि कि कुल 42 मत हुए, अब उसके प्रतिशत को देखें तो 22-22 प्रतिशत के लगभग सपा और बसपा को गया है. यानि तीन हिस्से में बंटे हुए बियालिस मत, करीब 15-15 सपा, बसपा, और मुस्लिम दलों को जाते हुए. जो कि हर हाल में 24 हिन्दू वोट से कम थे और इस तरह एकजुट हिन्दुओं के मत ने चुनाव जीता.

हां, मगर इस जीत से आप पृथ्वीराज चौहान को जरूर याद रखियेगा. एक बार मुहम्मद घोरी को उन्होंने हारने के बाद जिन्दा भाग जाने दिया था. इसका नतीजा ये हुआ कि कुछ ही दिन बाद ताकत जुटा कर वो फिर से टूट पड़ा. जब पृथ्वीराज चौहान ने लड़ाई जीती थी, तो घोरी को जिन्दा छोड़ दिया था जान बख्श दी थी. मुहम्मद घोरी ने वो गलती भी नहीं की. उसने फ़ौरन विरोधी को कैद करके, अँधा करके उसके दोबारा हमला करने की संभावना ही ख़त्म कर दी. जीत के समय दया दिखाने की जिन्हें सूझ रही हो, या भावना के अतिरेक में बहे जा रहे हों उन्हें पहले तो ये याद रखना चाहिए कि मुहम्मद घोरी की तरह ये शत्रु भी एक बार में हारकर गया नहीं है. ये शक्ति बटोरकर दोबारा हमला करेगा. गुजरात जीतते ही जैसे गोधरा हुआ था, वैसी ही संभावना बनती ही है.

बाकी चाणक्य का सीधा सा नियम भी था, शत्रु का समूल नाश आवश्यक है. याद ना रहा हो, तो दोबारा याद कर लीजिये.

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