क्या डोनाल्ड ट्रम्प अपने मिशन में कामयाब होंगे??

Written by शनिवार, 04 फरवरी 2017 11:06

पाकिस्तान, सऊदी अरेबिया और ईरान ..........अगर ट्रम्प अपने कार्यकाल में केवल इन 3 मुल्ला देशों को तबाह कर दे तो उसका सारी दुनिया पे बहुत बड़ा अहसान होगा और इस्लामिक आतंकवाद की जडें उखड़ जायेंगीं और जैसा की महान मराठा योद्धा श्रीमंत बाजीराव पेशवा जी ने सूत्र दिया था की जड़ों पे प्रहार करो फिर पेड़ तथा पत्ते अपने आप गिर जायेंगें. 

ये 3 मुस्लिम देश आज सारी दुनिया के लिए एक बहुत बड़ा खतरा हैं क्योंकि सारी दुनिया में इस्लामिक आतंकियों को प्रत्यक्ष एवं परोक्ष मदद इन देशों से ही प्राप्त होती है, अमेरिका की नीति अब तक इनमें से 2 को यानी पाकिस्तान और सऊदी अरेबिया को अपने हितों के लिए प्रयोग करने की नीति रही है उसके बदले में ये सारी दुनिया में चाहे कितना भी इस्लाम की आतंकी विचारधारा का प्रसार करें उस पर अमेरिका ने हमेशा आँखें बंद रखी हैं. कई मित्र पूरी जानकारी ना होने की वजह से ईरान को अच्छा देश समझते हैं किन्तु ईरान का मकसद एक बार समझ लेंगें तो आप जान जायेंगें की वह भी कोई दूध का धुला नहीं है और अंतिम लक्ष्य उसका भी वही है जो इस्लामिक आतंकियों का है यानी सारी दुनिया से काफिरों ( यानी गैर-मुस्लिमों ) का सफाया करके सारी दुनिया में केवल इस्लाम का राज कायम करना. लेकिन ईरान शिया देश है और पाकिस्तान एवं सऊदी अरेबिया मुख्यतः सुन्नी देश और शिया-सुन्नी का झगड़ा सदियों से चला आ रहा है, उसके कई कारण हैं उनमें से एक ये भी की सारी दुनिया पे इस्लाम कायम होने पर उसका ताज किसके हाथ में होगा. ईरान 1979 तक सही देश था लेकिन उसके बाद वहां की कट्टर शिया मुस्लिम जनसंख्या अपने शासक के खिलाफ उठ खड़ी हुई क्योंकि वह उन्हें इस्लामिक कट्टरपन से दूर ले जा रहा था और खुद भी खुले विचारों का था ,उसे भागकर अपनी जान बचानी पड़ी और ईरान ने अपने आप को अगला मुस्लिम देश घोषित कर दिया. 

सुन्नी कट्टरपंथियों के मुताबिक़ ये सही समय है सारी दुनिया पे इस्लाम का राज कायम करने का तो शिया कट्टरपंथियों के मुताबिक़ सही समय अभी नहीं आया , वो तब आएगा जब उनके इमाम मेहदी हसन अल्लाह के भेजे लश्कर लेके दुनिया में वापस आयेंगें और फिर काफिरों का सफाया शुरू करेंगें और भी कई सारे धार्मिक मतभेद हैं दोनों के बीच, कई सुन्नी कट्टरपंथी तो शियाओं को भी काफिरों की श्रेणी में ही रखते हैं और उनके सफाए में भी यकीन रखते हैं. ईरान दुनिया को ये दिखाता है की उसकी सऊदी अरब से दुश्मनी सऊदी अरब की वहाबी कट्टर इस्लाम की विचारधारा से है जबकि असलियत ये है ईरान की दुश्मनी सऊदी अरब से कम सऊदी अरब पे राज करने वाले परिवार से अधिक है जिसकी अमेरिका से करीबियां है और जो की धीरे-२ ही सही लेकिन सऊदी अरब को इस्लामिक कट्टरपन से दूर ले जा सकता है लेकिन ये परिवार शासक होने के बावजूद सऊदी अरब के कट्टर मुल्लाओं से डरता है जो की खुद सऊदी अरब में और दुनिया भर में इस्लाम की कट्टर वहाबी विचारधारा का प्रचार-प्रसार करते हैं और जिनसे प्रेरणा लेकर ही ये अल-कायदा , तालिबान , बोको हरम जैसे आतंकी संगठन पनपते हैं और इनकी फंडिंग मुख्यतः सऊदी अरब के NGOs से ही पायी जाती है

ओसामा-बिन-लादेन खुद एक सऊदी व्यापारी था जो की अपने देश पे राज करने वाले सऊदी परिवार की अमेरिकी नजदीकियों से खफा था क्योंकि वह अमेरिका को एक काफिर मुल्क और सारी दुनिया पे इस्लाम का राज कायम होने में एक बहुत बड़ा रोड़ा मानता था. दुनिया में शिया मुस्लिमों की जनसंख्या 10% है जबकि सुन्नी मुस्लिमों की 90%, इसलिए ईरान बाकी सुन्नियों की सहानुभूति पाने के लिए ही इजराइल से पंगे लेता रहता है और उसे दुनिया के नक्शे से मिटाने का अपना इरादा बार-२ दोहराता है, हमास तथा हिजबुल्ला जैसे कट्टर शिया इस्लामिक आतंकी सन्गठन तैयार करके उस पर हमले करवाता है और जब इजराइल इन आतंकी संगठनों को ईंट का जवाब पत्थर से देता है तो सारी दुनिया की हरामखोर मीडिया इसराइल को ही बदनाम करने में लग जाती है की इसराइल मासूमों को मार रहा है बिलकुल उसी प्रकार जैसे की हमारे कश्मीर भाग में पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित कश्मीरी आतंकियों पर जब हमारी सेना एक्शन लेती है तब उनके एजेंट मानवाधिकार,भारत का जुल्म आदि के नाम पर उन आतंकियों का बचाव करते हैं और भारत को बदनाम करते हैं.

और आज ईरान अपने शिया आतंकी संगठनों का प्रयोग केवल इजराइल के खिलाफ ही नहीं बल्कि अब सभी अरब देशों में करना शुरू कर चूका है अमेरिका को इन ईलाकों से बाहर करने और सऊदी परिवार के प्रभाव को खत्म करने के लिए और इसी कारण आज अनेक मुस्लिम देशों में शिया और सुन्नी के बीच खुनी जंग चल रही है , जिसका खतरा UAE और Jordan जैसे कम कट्टर सुन्नी मुस्लिम अरब देशों पे भी मंडराने लगा है , ईरान शिया आतंकियों को पूरे हथियार और मदद उपलब्ध करवा रहा है तो सऊदी अरब सुन्नी आतंकियों को. यहाँ एक बात बता दें की आज दुनिया में अपनी बर्बरता के लिए तहलका मचाने वाला संगठन ISIS सुन्नी आतंकी विचारधारा का संगठन है जो की ईरान के शिया होने के कारण उससे उतनी ही नफरत रखता है जितनी अन्य काफिरों से और बेधडक उनका कत्ले-आम करता है , इसीलिए अब तक अमेरिका ने ISIS के खात्मे में विशेष दिलचस्पी नहीं दिखाई थी क्योंकि उसे लगता था की अगर ISIS और ईरान, उसके दो दुश्मन एक-दूसरे को खत्म कर डालें तो इसमें उसका फायदा ही है लेकिन ISIS ने यूरोप के शहरों जैसे Belgium,Brussels आदि में आतंकी हमले करके दिखा दिया की ISIS वहीँ पर रुकने वाला नहीं है.

बाकी पाकिस्तान के बारे में तो आप लोगों को कुछ बताने की जरूरत ही नहीं , बस एक बताने योग्य बात ये है इसमें की पाकिस्तान और ईरान की आपस में नहीं बनती है क्योंकि पाकिस्तान खुद को एक सुन्नी मुस्लिम देश पेश करता है और सऊदी अरब को इस्लाम का जन्म देश होने के कारण उसके प्रति विशेष लगाव रखता है और साफ़ तौर पे कह चूका है की ईरान और सऊदी अरब की जंग में वह सीधे तौर पर सऊदी अरब का साथ देगा, लेकिन पाकिस्तान का खात्मा भी ट्रम्प करे ये उम्मीद रखना थोडा ज्यादा होगा वो काम हमारा यानी हिंदुस्तान का होना चाहिए क्योंकि पाकिस्तान के दिए हर जख्म का हिसाब चुकता करना हमारी जिम्मेदारी है बस चीन को बीच में पड़ने से रोकने की जिम्मेदारी अगर अमेरिका या रूस में से कोई भी देश या दोनों देश ले लें तो हम ऐसा कर सकते हैं और ऐसा सम्भव भी है क्योंकि ट्रम्प कह चूका है की अमेरिका और रूस के बीच दुश्मनी की नीति से वह सहमत नहीं है और अमेरिका और रूस को मिलने की जरूरत है...

-- महक गोयल
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(प्रस्तुत विचार लेखक के अपने विचार हैं...)

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