सुनील देवधर :- असंभव को संभव करने में व्यस्त संघी

Written by सोमवार, 26 फरवरी 2018 19:59

लगभग साढ़े तीन वर्ष पहले त्रिपुरा में भाजपा के प्रभारी पद पर सुनील देवधर (Sunil Deodhar) के नियुक्ति हुई थी. यह प्रदेश शुरू से लेकर आज तक भाजपा के लिए “भीषण सूखे” जैसा प्रदेश ही रहा है. यहाँ न तो भाजपा का कोई संगठन था और न ही कोई वैचारिक जमीन.

कहीं-कहीं इक्का-दुक्का बांग्लाभाषी लोगों के बीच भाजपा की धुंधली से पहचान मात्र थी परन्तु जनजातीय इलाकों में तो “कमल फूल” का निशान तक किसी ने देखा नहीं था. 2013 के विधानसभा चुनावों (Tripura Assembly Elections) में भाजपा को पूरे राज्य में कुल मिलाकर 1.54 प्रतिशत वोट मिले थे. 2014 के आम चुनावों में “मोदी लहर” के चलते लोकसभा में अकेले दम बहुमत हासिल करने वाली शक्तिशाली भाजपा की यहाँ दोनों लोकसभा सीट पर जमानत जब्त हो गयी थी. 2014 में भाजपा का त्रिपुरा में ये हाल था...

RSS की पृष्ठभूमि वाले कई प्रचारकों में से एक सुनील देवधर भाजपा के एक सम्मानित लेकिन सामान्य तौर पर जिसे “गुमनाम” कहा जाता है, वैसे सदस्य थे. M.Sc., B.Ed. की शिक्षा प्राप्त एवं पेशे से शिक्षक रहे हुए देवधर मेघालय में आठ वर्षों तक संघ के प्रचारक रहे. प्रचारक के रूप में अपनी सेवाएँ समाप्त करने के बाद उन्होंने “माय होम इण्डिया” नामक एक संस्था का गठन किया और पिछले एक दशक से वे उत्तर-पूर्वी राज्यों में हिन्दुस्तान की एकता-अखंडता के लिए काम करने में लगे हैं. इस कारण उत्तर-पूर्वी राज्य सुनील देवधर के लिए अपरिचित नहीं थे. यहाँ की खासी, सिलहटी, बांगला, नेपाली, असमिया जैसी भाषाएँ अब वे धाराप्रवाह बोलते हैं. इसके अलावा गुजराती, हिन्दी, अंगरेजी और मराठी पर उनका प्रभुत्व पहले से ही है. 2012 के गुजरात विधानसभा चुनावों में दाहोद जिले की तथा 2014 के लोकसभा चुनावों में प्रधानमंत्री मोदी की वाराणसी सीट पर एक बड़ी जिम्मेदारी सुनील देवधर सफलतापूर्वक संभाल चुके हैं.

देवधर की संगठन क्षमता, बांगला भाषा पर उनका प्रभुत्व और उत्तर-पूर्वी राज्यों में उनके कार्यों का पूरा ट्रैक रिकॉर्ड मोदी-शाह की जोड़ी को मालूम था. इसी आधार पर उन्होंने भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य रहे सुनील देवधर को लगभग साढ़े तीन साल पहले त्रिपुरा भेजा और उन्हें इस राज्य में पहला कमल खिलाने की जिम्मेदारी सौंपी. शुरुआती छः महीने तो सुनील देवधर ने पूरा का पूरा त्रिपुरा प्रदेश अपनी यात्राओं से खंगाल डाला, राज्य के एक-एक कोने में जाकर वहाँ की समस्याओं की जानकारी ली. पता चला कि वहाँ भाजपा में “संगठन” नाम की कोई चिड़िया भी मौजूद नहीं है. भाजपा के अधिकाँश तथाकथित पदाधिकारी केवल कुर्सी गर्म करने का काम करते थे. सत्ताधारी माकपा के साथ “मधुर सम्बन्ध” रखने वाले पदाधिकारी भी काफी सारे थे. छः माह के अपने निरीक्षण के अनुसार उन्होंने मोदी-शाह को स्पष्ट शब्दों में बता दिया कि जब तक यहाँ एक पूरी तरह से नई टीम नहीं बनेगी, तब तक स्थिति में सुधार होना असंभव है.

 

tripura

सबसे पहले देवधर ने, विप्लव देब नामक युवा एवं ऊर्जावान व्यक्ति को त्रिपुरा भाजपा प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपकर नई टीम बनाना शुरू किया. राज्य के बुज़ुर्ग भाजपाईयों ने सलाह दी कि मुख्यमंत्री मानिक सरकार की छवि साफ़-सुथरे ईमानदार व्यक्ति की है, इसलिए उनके खिलाफ न बोलें, वर्ना मामला बूमरैंग हो सकता है. परन्तु अपने छः माह के राज्यव्यापी दौरे और आम जनता से जुड़ने के बाद देवधर को समझ में आ गया था कि जिस राज्य में गरीबी रेखा के नीचे की जनसँख्या 68% हो, 37 लाख की जनसँख्या वाले राज्य में बेरोजगारों की संख्या सात लाख हो, महिला अत्याचार तथा राजनैतिक हत्याओं में त्रिपुरा देश का नंबर वन राज्य बन चुका हो, जिनके कार्यकाल में त्रिपुरा में ड्रग्स का कारोबार फला-फूला ऐसे माणिक सरकार की इस “नकली छवि” को तोड़ना जरूरी है. ईमानदार और सादा जीवन वाला मुख्यमंत्री की देशव्यापी इमेज को तोड़ना इतना आसान भी न था, आखिर वामपंथी प्रचार तंत्र ने इतनी मेहनत से यह मजबूत छवि गढी थी. लेकिन जब अपनी प्रचार सभाओं में सुनील देवधर ने धाराप्रवाह बांगला भाषा में माणिक सरकार के कारनामों को उजागर करना शुरू किया, तो असंतुष्ट जनता ने तालियाँ बजाकर स्वागत किया. माणिक सरकार के “मुखौटे” पर खरोंच आते ही वामपंथी खेमा भी सक्रिय हुआ और उन्होंने देवधर पर आरोप मढ़ने शुरू कर दिए. खुद माणिक सरकार को अपनी सभा में कहना पड़ा कि “..भाजपा ने त्रिपुरा में महाराष्ट्र से अपना सूबेदार भेजा है...”. धीरे-धीरे लगभग सभी वामपंथी नेताओं की कटु भाषा में उनके निशाने पर सुनील देवधर ही रहने लगे, जिसका जनता में यह सन्देश गया कि जरूर कुछ न कुछ गडबड़ी है और ये आदमी (देवधर) सच बोल रहा है.

अगरतला स्थित शाम्लिमा बिल्डिंग जहाँ सुनील देवधर का निवास रहा, वह भाजपा के प्रचार कार्यों का केन्द्र बन गई. त्रिपुरा के कोने-कोने में लगातार प्रवास, केवल चार-पाँच घन्टे की नींद और कार्यकर्ताओं को तैयार करना... पिछले तीन वर्ष से सुनील देवधर का यही टाईम-टेबल था. इतने वर्षों के वामपंथी शासन के बावजूद गढ्ढों से भरी त्रिपुरा की सड़कें, जहाँ चार घंटे से अधिक लगातार यात्रा नहीं की जा सकती, वहाँ भी देवधर ने लगातार आठ-आठ घंटे राज्य के दुर्गम इलाकों में जाकर अपनी मुहिम जारी रखी. मनरेगा में हुआ वामपंथी भ्रष्टाचार, स्टॉप डैम और रोज़-वैली जैसे अनेकों घोटलों का उन्होंने लगातार सोशल मीडिया पर भांडाफोड़ करते हुए माणिक सरकार की नकली छवि को तार-तार कर दिया. ज़ाहिर है कि इसके बाद बुरी तरह चिढ़कर वामपंथी अपनी “औकात” पर आ गए और पिछले तेरह महीने में भाजपा के ग्यारह कार्यकर्ताओं की हत्या की गई. अंदरूनी इलाकों में भाजपा कार्यकर्ताओं के परिवार वालों के घर आगजनी और मारपीट इत्यादि समस्त वामपंथी कर्म किए गए. परन्तु सुनील देवधर और उनकी टीम मजबूती से इनका सामना करती रही. इतने कड़े संघर्षों और तीन वर्षों की कड़ी मेहनत का परिणाम जल्दी ही सामने आने वाला है त्रिपुरा विधानसभा के रिजल्ट के रूप में. अब देखना यह है कि क्या वाकई में त्रिपुरा में कोई “राजनैतिक चमत्कार” होगा??

आज तक भारत के इतिहास में एक भी विधायक न होते हुए भी सीधे राज्य की सत्ता हासिल करने वाली एकमात्र पार्टी रही है, और वह थी एनटी रामाराव की तेलुगु देशम, जिसमें उन्होंने इंदिरा गाँधी को धूल चटा दी थी. त्रिपुरा में भाजपा के पास खोने के लिए कुछ नहीं है, वहाँ तो भाजपा को जितनी भी सीटें मिलेंगी वह “प्लस” ही होगा. यदि त्रिपुरा में एनटी रामाराव जैसा कोई चमत्कार भाजपा के पक्ष में हो जाता है, तो यह केवल और केवल सुनील देवधर की कड़ी मेहनत, लगन, तपस्या और सूझबूझ का परिणाम होगा. महाराष्ट्र से गया हुआ यह सूबेदार त्रिपुरा में फिलहाल वामपंथियों की नींद उड़ाए हुए है. उत्तर-पूर्व के राज्यों में भाजपा की बढ़ती उपस्थिति के बीच त्रिपुरा के परिणामों पर सभी की निगाह है....

सबसे महत्त्वपूर्ण बात ये है कि उधर विपक्षी दलों को, RSS द्वारा प्रशिक्षित ऐसे समर्पित और निस्वार्थ कर्म करने वाले लोग ढूँढे से भी नहीं मिलते.... और इधर वालों हाल ये है कि भाजपा में ऐसे नींव के पत्थर अक्सर उपेक्षित ही रह जाते हैं... 

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मूल लेखक : दिनेश कानजी 

अनुवाद : सुरेश चिपलूनकर 

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