पाँच कुख्यात नृशंस वामपंथी हत्याकाण्ड

Written by शुक्रवार, 10 फरवरी 2017 21:40

जैसा कि सभी जानते हैं वामपंथ का घोष वाक्य है “सत्ता बन्दूक की नली से निकलती है”. वामपंथ का कभी भी लोकतंत्र, लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं, पद्धतियों, न्यायालयों अथवा चर्चाओं पर भरोसा नहीं रहा है. भारत के बंगाल में ज्योति बसु नामक व्यक्ति ने वामपंथ को बंगाल में ऊँचाईयों तक पहुंचाया और अपनी कुख्यात हिंसा और हिंसक कार्यकर्ताओं के सहारे तीस वर्ष तक बंगाल में शासन किया.

आज भी वामपंथ शासित केरल, राजनैतिक हत्याओं, बदले और दिनदहाड़े किए जाने वाले हत्याकांड का गवाह बना हुआ है. जैसे-जैसे विपक्ष की ताकत बढ़ती है, उसी अनुपात में वामपंथ की हिंसा और भी बढती चली जाती है. ममता बनर्जी ने वामपंथियों से तीस वर्ष तक मुकाबला किया और उसी की शैली में आक्रामक रूप से अपने कार्यकर्ताओं की लाशों पर चढ़कर आज वह बंगाल की मुख्यमंत्री बनी हैं. सत्ता में आने के बाद TMC भी कतई नहीं बदली, हिंसा, मारपीट-तोड़फोड़ के मामले में उसने भी वही रंग-ढंग बनाए रखा है जो उससे पहले वामपंथ का तरीका था. 

1977 में जबसे माकपा बंगाल में शासन में आई, तभी से राजनैतिक हत्याओं का दौर आरम्भ हो गया था. बड़े ही व्यवस्थित तरीके से वामपंथियों ने अपने विरोधियों का कभी अपहरण करवाया, कभी उन्हें जमकर पीटा और अधिकांशतः उन्होंने विपक्षियों पर बम हमले किए अथवा सीधे ह्त्या करवा दी. ऐसा नहीं कि वामपंथी केवल राजनैतिक विरोधियों की हत्याएँ करते थे, उन्होंने तो छोटे व्यापारियों, शरणार्थियों, मछुआरों और गरीबों को भी नहीं छोड़ा. जबकि वे खुद को गरीबों का मसीहा बताते नहीं थकते हैं. तीस वर्ष का वामपंथी शासन खूनी घटनाओं की जीती-जागती मिसाल रहा है. आईये हम बिलकुल संक्षेप में एक-एक करके टॉप पाँच नरसंहारों के बारे में जानते हैं, जो वामपंथियों ने खुलेआम कर दिए और उनका कुछ नहीं बिगड़ा...

१) सैनबाड़ी हत्याकाण्ड (मार्च 1970) :-

सत्ता में आने से काफी पहले अर्थात 1970 में ही वामपंथियों ने अपना असली खूनी रंग दिखाना शुरू कर दिया था. अपने राजनैतिक विरोधियों पर हमले करना उनका शगल बन गया था. बर्दवान जिले के दो कांग्रेसी भाई अर्थात सेन बंधुओं को माकपा के गुंडों ने घर में घुसकर क्रूरता के साथ मारा. वामपंथी गुंडे यहीं नहीं रुके, उन्होंने दोनों भाईयों के खून से सने हुए चावल उनकी माँ को जबरन खिलाए. इस नृशंस और अमानवीय घटना के बाद वह औरत पागल गो गई और लगभग एक दशक बाद उसकी मृत्यु हुई.... लेकिन ना तो माकपा का दिल पसीजा और न ही कॉंग्रेस उन हत्यारों को कभी पकड़ पाई. इस भीषण हत्याकाण्ड को आज भी “सैन्बाड़ी हत्याकाण्ड के रूप में जाना जाता है और दुर्भाग्य यह है कि सत्ता के लिए आज भी कॉंग्रेस वामपंथ हाथ में हाथ मिलाकर चलते दिखाई देते हैं.

२) मारीचझपी नरसंहार (जनवरी 1979) : 

मुस्लिमों के आतंक से त्रस्त बांग्लादेश से भागकर आने वाले हिन्दुओं की बड़ी संख्या भी बंगाल की सीमा पार करके भारत आती रहती है. सरस्वती पूजा अर्थात वसंत पंचमी के दिन ज्योति बसु सरकार ने सैकड़ों बांग्लादेशी हिन्दू शरणार्थियों को सुंदरबन इलाके में गोलियों से भून दिया था. सुंदरबन में एक द्वीप पर जमा इन हजारों हिन्दू शरणार्थियों (जिनमें से अधिकाँश दलित थे) को बंगाल पुलिस ने बड़ी बेरहमी से आंसू गैस, लाठीचार्ज और गोलियों से छलनी कर दिया था, क्योंकि ये लोग बंगाल में घुसने का प्रयास कर रहे थे. पुलिस के साथ माकपा के स्थानीय गुंडे भी इन बांग्लादेशी हिन्दुओं को मारने-पीटने में लगे हुए थे. बचकर भागने के चक्कर में कई छोटे-छोटे बच्चे नावों से समुद्र में गिर गए. कई दिनों के भूखे-प्यासे इन गरीब दलितों पर बसु सरकार ने कतई रहम नहीं किया और आज भी यह स्पष्ट नहीं है कि इस वामपंथी हत्याकाण्ड में वास्तव में कितने दलित मारे गए. उल्लेखनीय है कि आजकल माकपाई लेखक और साहित्यकार ही मानवाधिकारों का झंडा उठाने में सबसे आगे रहते हैं. याकूब मेमन के लिए ये लोग प्रदर्शन करते हैं, लेकिन मरीचझापी में वामपंथी कैडर के हाथों मारे गए हजारों दलितों के लिए इनके पास कोई शब्द नहीं है.

३) आनंदमार्गी संन्यासियों को जिन्दा जलाया (अप्रैल 1982)

यह अप्रैल 1982 की बात है, कोलकाता के पास उपनगर तिल्जाला में एक शैक्षणिक कॉन्फ्रेंस में आने वाले कुछ आनंदमार्गी संन्यासियों को माकपा के गुंडों ने घेर लिया और उन्हें धारदार हथियारों से मार डाला. इसके बाद भी नृशंस वामपंथ की खूनी प्यास नहीं बुझी तो उन्होंने इन संन्यासियों की मृत देह को जलाया भी. असल में उन दिनों माकपा को यह चिंता सताए जाती थी कि कहीं आनंदमार्ग उनके वामपंथी सोच के गढ़ में सेंध न लगा दे. आनंदमार्ग को एक “हिन्दू हमला” मानते हुए वामपंथियों ने लगातार उसके खिलाफ मुहिम चलाए रखी.
उस सम्मेलन में आने वाली कई टैक्सियों को रास्ते में जगह-जगह रोका गया और उसमें से संन्यासियों तथा महिलाओं को उतार कर पिटाई की गई. सत्ता पोषित इस गुण्डागर्दी में कम से कम सत्रह संन्यासियों की मृत्यु हुई और कुछ जली हुई लाशों की शिनाख्त नहीं हो पाई. इन घटनाओं की ना तो विशेष चर्चा हुई, ना ही माकपाई गुण्डे कभी पकड़े गए...

४) नन्नूर हत्याकांड (जुलाई 2000)

27 जुलाई 2000 को माकपा के कैडर ने ग्यारह मुस्लिम मजदूरों को केवल इसलिए मार डाला था, क्योंकि वे दूसरी पार्टी को समर्थन डे रहे थे, और माकपा के जमीन हथियाने के कार्यक्रम के आड़े आ रहे थे. अपराधियों को वामपंथी सत्ता की शह ऐसी मिली हुई थी कि इस हत्याकाण्ड के अभियुक्तों के खिलाफ 2007 तक तो केस शुरू भी नहीं हो पाया था. मुस्लिम मजदूरों के परिजनों को धमकाने के लिए माकपा के कैडर ने “हर्मद वाहिनी” नामक मोटरसाइकिल गैंग बना रखी थी, जो समय-समय पर गवाहों को धमकाती रहती थी. वामपंथ का पैटर्न बंगाल और केरल में एक जैसा था, अर्थात विपक्षियों को धमकाना, मारना-पीटना, उनके मकान जलाना और राज्य से बाहर भगा देना.

५) नंदीग्राम हत्याकाण्ड (मार्च 2007)

अब जैसा कि सभी जान चुके हैं, पूंजीवाद की कथित विरोधी वामपंथी पार्टियों ने बंगाल में मेदिनीपुर जिले के नंदीग्राम के पास दस हजार एकड़ जमीन जबरन हथिया ली थी, ताकि एक विदेशी कंपनी को वह जमीन सौंपी जा सके. किसानों ने “भूमि रक्षा समिति” बनाकर माकपाई गुंडों का विरोध किया तो सबसे पहले माकपा की “हर्मद वाहिनी” ने उन किसानों पर हमले किए, रात को गाँवों में जाकर उन गरीब किसानों के झोंपड़े जलाए गए, और हवा में फायरिंग करके उन्हें डराया गया. इस घटनाक्रम में चौदह किसान मारे गए और सत्तर घायल हुए. नंदीग्राम में किसानों के प्रदर्शन के दौरान पुलिस फायरिंग में पता नहीं कितने किसान मारे गए, क्योंकि सरकारी आँकड़ा कभी भी ज़ाहिर नहीं किया गया.

गरीबों की मसीहा होने का दम भरने वाले वामपंथ ने केवल बंगाल और केरल में ही असीमित खून बहाया है, वहीं दुनिया भर में इस घातक विचारधारा ने बाकायदा घोषणा करके दस लाख से अधिक हत्याएँ की हैं.

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