मुस्लिम दबाव में पहचान खोती पश्चिम बंगाल की दुर्गा-पूजा

Written by रविवार, 28 अक्टूबर 2018 13:29

कुछ माह पहले रवीश कुमार ने एक “तथाकथित” बहस के दौरान यह पूछ लिया था कि “अगर देश में मुसलमानों की संख्या तेजी से बढ़ती भी रहे, तो इसमें दिक्कत क्या है...”. पश्चिम बंगाल में सत्रह जिले मुस्लिम बहुमत जनसँख्या वाले बन चुके हैं, और वहाँ की जमीनी स्थिति जितनी खतरनाक और जेहादी स्वरूप ले चुकी है... रवीश की बात का जवाब उसी में समाहित है.

जैसा कि वर्षों से हम देखते-सुनते-पढ़ते आ रहे हैं, पश्चिम-बंगाल में दुर्गा-पूजा (नवरात्र) का पर्व बड़े धूमधाम एवं भव्य तरीके से मनाया जाता है. इसकी भव्यता व कला को देखने के भारत के विभिन्न प्रान्तों से ही नहीं, बल्कि दुनिया के विभिन्न देशो से भी बड़ी संख्या में लोग आते है. लेकिन पश्चिम बंगाल में जब से ममता बनर्जी अर्थात तृणमूल काँग्रेस पार्टी की सरकार सत्ता में आई है तब से लगातार प्रतिवर्ष दुर्गा पूजा का पर्व विवाद का विषय बनकर रह गया है और यह विवाद हर साल नए रूप में सामने आता है.

पश्चिम बंगाल में 2011 तक लगभग 34 सालों (1977 से 2011 तक) तक वाममोर्चे की सरकार रही, तब तक स्थिति थोड़ी सामान्य रही है... लेकिन जब से ममता बनर्जी की सरकार सत्ता में आई है तब से दुर्गापूजा व दुर्गा का विसर्जन हमेशा से विवाद का विषय बन गया है. क्योंकि TMC अर्थात ममता बनर्जी सरकार की ज्यादातर नीतियाँ मुस्लिम परस्त बन गयी हैं. पश्चिम बंगाल में 2017 के विधानसभा चुनावो में TMC की प्रचंड जीत के बाद तो मानो TMC की नीतियाँ केवल और केवल मुस्लिम तुष्टिकरण की बन गयी हैं. "मुस्लिम परस्त ममता दीदी" यह बात अच्छी तरह से जानती हैं कि पश्चिम बंगाल में मुस्लिम 27.4% है (2011 जनगणना), लेकिन पश्चिम बंगाल हिन्दू नेता तपन घोष कहते है की “पश्चिम बंगाल में 34 प्रतिशत से ज्यादा मुस्लिम आबादी है और प्रदेश के 8 से ज्यादा जिले मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र है, बाकी 9 जिले भी इसी कगार पर हैं. वर्तमान सरकार यह अच्छी तरह से जानती है कि अगर ये मुस्लिम वोट बैंक एक तरफ रहा, तो उन्हें हमेशा सत्ता में आने से कोई नहीं रोंक सकता है. इसलिए तपन घोष वर्तमान मुख्य मंत्री ममता बैनर्जी को “जिहादी मोमता” बोलते हैं.

इस बार ममता बनर्जी ने स्थनीय क्लबों व दुर्गा-पूजा समितियों (28,000 समितियों को) को 28 करोड़ रूपये आवंटित किये प्रत्येक समिति को 10,000 रूपये की आर्थिक मदद दी गयी. CPM कार्यकर्ता प्रोदिप दास के अनुसार प्रदेश में 72,000 दुर्गा-पूजा समितियां व 17,000 क्लब हैं. CPM ने इन्ही क्लबों व दुर्गा-पूजा समितियों के माध्यम से पश्चिम-बंगाल में 34 साल से तक शासन किया है. चूँकि दुर्गा-पूजा पश्चिम-बंगाल के सबसे बड़ा पर्व है, जिसे बंगाली समाज बहुत ही हर्षोल्लास से मनाता है. दुर्गा-पूजा का पर्व उनके लिए एक भावनात्मक विषय है इसलिए चाहे वाममोर्चे की सरकार रही हो 34 साल उसने भी इसका विरोध नहीं किया. जबकि JNU में यही वामपंथी, सदैव दुर्गा-पूजा पर्व का विरोध करते रहते हैं और उसके विरोध में “महिषासुर शहादत दिवस” भी मनाते हैं. इसकी महत्ता को देखते हुए वर्तमान मुल्ला परस्त ममता सरकार कहाँ पीछे रहने वाली थी. उसने आनन-फानन में स्थानीय दुर्गा-पूजा समितियों को 28 करोड़ रूपये की आर्थिक मदद की घोषणा कर दी. यह घोषणा होते ही प्रदेश के मुस्लिम भड़क गए और बिना पुलिस की अनुमति के मुल्लों की भीड़ ने कोलकाता के ‘टीपू सुल्तान मस्जिद’ के पास केवल उग्र प्रदर्शन ही नहीं किया, बल्कि उन्होंने ममता बनर्जी की सरकार को उखाड़ फेकने का फरमान भी जारी कर दिया. अखिल बंगाल अल्पसंख्यक युवा संघ (आल माइनॉरिटी यूथ फेडरेशन) के बैनर तले 3 अक्टूबर को हुए इस उग्र प्रदर्शन में संगठन के महासचिव मुहम्मद कमरु जमान ने यहाँ तक मांग कर दिया कि प्रदेश के प्रत्येक मदरसे को 2 लाख रूपये की आर्थिक मदद, मस्जिदों इमामों/मौलवियों को 10,000 रूपये मासिक वेतन/वजीफा, कोलकाता में सिर्फ मुस्लिम पुलिस आयुक्त की नियुक्ति हो, और पुलिस फ़ोर्स में मुस्लिमों को ज्यादा प्रतिनिधित्व दिया जाए. फुरफुरा शरीफ नेता टोहा सिद्धिकी ने TMC से यह मांग भी कर दी कि, अगने साल होने वाले लोकसभा चुनावों में अल्पसंख्यक समुदाय (यानी मुस्लिम) के उम्मीदवारों को कम से कम 16 सीटें आवंटित की जाएँ. 

मालदा के एक निवासी अबिष्कार भट्टाचार्य का कहना है “...मालदा के कलियाचौक को मिनी अफगानिस्तान कहा जाता है. कालिया चौक अफीम की खेती व उसकी तस्करी/जाली करेंसी की तस्करी/ अवैद्य हथियारों की तस्करी का प्रमुख अड्डा है जिससे वहां पर स्थानीय पुलिस भी घुसने से डरती है तो हमारी लोगो की क्या मजाल है की हम अपने त्योहारों/रीतिरिवाजों को अपने परम्पराओं के आधार पर मना पायें. प्रदेश सरकार की नीतियों से मुस्लिमो के हौसले बुलंद है स्थानीय हिन्दुओं में भय का वातावरण है.

कूचबिहार निवासी तापस बर्मन का कहना है कि स्थानीय मैत्री संघ जो एक दुर्गा-पूजा समिति है में प्रदेश सरकार लोगो का वर्चस्व है... और प्रदेश सरकार मुस्लिम परस्त है और उनकी यही मुस्लिम परस्त नीतियों को ध्यान में रखते हुए जिले के ज्यादातर दुर्गा-पूजा पंडालों में दुर्गा प्रतिमा के साथ अन्य प्रतिमाओं के हांथो से शस्त्र (अस्त्र/शस्त्र) दोनों को हटा दिया गया है यह सब मुस्लिमो संगठनो ने दवाब में उठाया गया कदम है.  उधर सिलीगुड़ी निवासी मौसम चैटर्जी का कहना है की सिलीगुड़ी में भी कूचबिहार जैसी स्थिति है कई दुर्गा-पूजा पंडालों में दुर्गा प्रतिमा व अन्य प्रतिमाओं में शस्त्रों को शुरू से हटा दिया गया था क्योंकि शस्त्रों से विशेष समुदाय की भावनाएं आहत होती है और यह सब प्रदेश-सरकार की मुस्लिम परस्त नीतियों के कारण हुआ है मुस्लिम समुदाय TMC का एक बड़ा वोट बैंक है. 

मुस्लिम संगठनो के विरोध को देखते हुए अधिवक्ता सौरभ दत्ता ने इस मामले को प्रदेश ने उच्च न्यायालय में चुनौती दे दी. सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने सरकार के इस आदेश को रद्द कर दिया, और सरकार से पूछा कि उसने किस आधार पर दुर्गा-पूजा समितियों को धन का आवंटित किया. सरकार ने कोर्ट को बताया कि अब धन वापस नहीं लिया जा सकता है, क्योंकि दुर्गा-पूजा समितियों को धन का आवंटन किया जा चुका. जबकि अपना नाम ना बताने की शर्त पर कोलकाता के धर्मतल्ला में एक स्थानीय TMC के कार्यकर्ता ने बताया कि ममता बैनर्जी ने किसी भी समितियों को धन का आवंटन किया ही नहीं... केवल घोषणा की थी. हो सकता है कि ममता बनर्जी ने ऐसा निर्णय कोर्ट के रुख व मुस्लिम संगठनो के विरोध प्रदर्शन को देखते हुए किया हो.

IMG 20181027 WA0020

2011 प्रदेश में ममता बैनर्जी ने पहली बार मस्जिदों के मौलवियों को 2500 रूपये का मासिक वजीफा देकर अपने मुल्ला-परस्त होने का सबूत दिया था. इसके बाद मुस्लिम संगठनो की मांग सुरसा के मुंह की तरह बड़ी होती गयी, और आज उनके हौसले इतने बुलंद हैं कि दुर्गा-पूजा का त्योहार जो कि बंगाली समुदाय का सबसे प्रमुख संस्कृति-त्यौहार है, पर संकट के बादल छाये हुए है. मालदा का कलियाचौक (कलियाचौक में 98% आबादी मुस्लिम है) की एक मस्जिद के इमाम असरुल हक़ ने स्थानीय पुलिस स्टेशन को मस्जिद के लेटरपत्र में लिखित शिकायत की, कि दुर्गा-पूजा से उनकी भावनाएं आहत होती हैं. जब-जब भी मुस्लिम समुदाय अपनी पांच बार की नमाज़ अदा करते है, उस समय दुर्गा-पूजा समितियों द्ववारा माइक के माध्यम से कोई ध्वनी प्रेषित न की जाये. लिखित शिकायत में नमाज का समय व नाम तक का उल्लेख किया है कि किस-किस समय उनकी भावनाएं आहत होती हैं. दूसरी तरफ कूचबिहार जिले में ज्यादातर दुर्गा-पूजा के पंडालों में दुर्गा प्रतिमा व अन्य देवताओं की प्रतिमाओं के हांथो से अस्त्र/शस्त्र गायब कर दिए गए हैं अथवा उनको प्रदर्शित तक नहीं किया गया है. एक स्थनीय पूजा समिति ‘मैत्री संघ’ ने कहा कि इससे समाज में सामाजिक सदभाव कायम रहेगा, जबकि स्थानीय निवासी तपस बर्मन का कहना है कि यहाँ सामाजिक सद्भावना जैसी कोई बात नहीं. पिछले कई दशकों से दुर्गा-पूजा बड़ी ही धूम धाम व हर्षौल्लास से मनाया जाता रहा है, लेकिन इस बार मुस्लिम संगठनो के दबाव के कारण इतना बड़ा कदम दुर्गा-पूजा समितियों ने उठाया है.

पौराणिक रूप से देखा जाये तो दुर्गा-पूजा शक्ति की पूजा है और शस्त्र पूजा दुर्गापूजा/विजयदशमी का अनिवार्य अंग है. इस बात को लेकर कूचबिहार के लोगो में बहुत ज्यादा नाराजगी है की प्रदेश की सरकार की नीतियों के कारण उनके संस्कृति पर कुठाराघात किया जा रहा है. कोलकाता के श्रीभूमी दुर्गा-पूजा पंडाल में भगवान कार्तिक को वाहन घोड़े को दिखाया गया है जबकि उनका वाहन मोर है और पंडाल को मुस्लिम संरचना में ढाला गया है. पश्चिम बंगाल में अब हिन्दुओं की स्थिति यह हो चुकी है, कि वे अपने त्यौहार/परम्पराओं/रीतिरिवाजों को भी परंपरागत रूप से नहीं मना सकते है. जबकि मुहर्रम के दौरान मुस्लिमो द्वारा खुले आम घातक हथियारों का प्रदर्शन (अधिकाँश अवैध हथियार) होता है. प्रदेश सरकार इतनी बड़ी मुस्लिम परस्त है कि ममता सरकार में छः मुस्लिम मंत्री है जिसमे पांच उर्दू भाषी है और एक बांग्ला भाषी है जबकि प्रदेश में 95 प्रतिशत से भी ज्यादा बांग्ला भाषी लोग है (हिन्दू-मुस्लिम दोनों समुदाय). अभी हाल में उत्तरी दिनाजपुर के इस्लामपुर में जो घटना घटी, वास्तविक रूप से वह एक सांस्कृतिक संघर्ष था. जिसमें मुसलमानों द्वारा हिन्दू बाहुल्य बांग्ला भाषी लोगो पर उर्दू भाषा व अरबी संस्कृति को जोर जबरजस्ती से थोपा गया. उसके बाद उधर खुनी संघर्ष हुआ. पिछले साल (2017 में) तो दुर्गा-पूजा प्रतिमाओं का विसर्जन तक नहीं होने दिया गया, क्योंकि विसर्जन के दिन ही मुहर्र्मम था और प्रदेश की सरकार ने कोर्ट के आदेश को धता बताते हुए दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन नहीं होने दिया. उसके एक दिन बाद यह संभव हो पाया और जिस दुर्गा-पूजा समिति ने ऐसा करने के ठानी उस समिति को कानून व्यवस्था का हवाला देकर उनको रोक दिया गया गया था इतना ही नहीं, ममता बैनर्जी की पुलिस ने ताजिये निकलने वाले सभी मार्गों पर पड़ने वाले पंडालों की सजावट निकाल दी और अधिकाँश मंदिरों को तिरपाल लगाकर ढँक दिया गया था. (मानो प्रशासन के पिताजी की मौत हुई हो, और सभी गम में डूबे हों). कोलकाता हाईकोर्ट के निर्णयों को पूरी तरह से जूते की नोक पर रखा गया था.

कुल मिलाकर बात यह है कि एक समय बंगाल/पश्चिम-बंगाल अपनी कला/संस्कृति भव्यता पूरे दुनिया में प्रसिद्ध था.... लेकिन अब पश्चिम-बंगाल में दुर्गा पूजा कैसे हो? किस प्रकार हो? उनका विसर्जन कैसे हो? और कब हो? यह सारे दिशानिर्देश "धर्मनिरपेक्षता के ठेकेदार मुस्लिम संगठन" और मुस्लिम परस्त सरकार तय करेगी. ज़ाहिर है कि देश के "कथित तेज़ और निष्पक्ष मीडिया" को बंगाल की ख़बरों से कोई लेनादेना नहीं है, क्योंकि मामला हिन्दुओं के उत्पीड़न का है. 

Read 269 times Last modified on रविवार, 28 अक्टूबर 2018 13:42