तिरुपति के लड्डू से 140 करोड़ का नुकसान...

Written by मंगलवार, 21 फरवरी 2017 13:12

दक्षिण भारत के प्रसिद्ध तिरुपति बालाजी मंदिर के मुँह में पानी लाने वाले लड्डू को खिलाने पर मंदिर ट्रस्ट को 140 करोड़ का प्रतिवर्ष नुक्सान हो रहा है. पिछले तीन वर्ष में यह नुक्सान बढ़ता ही जा रहा है,

क्योंकि भगवान वेंकेटश्वर के मंदिर तिरुपति देवस्थानम ने पिछले ग्यारह वर्ष से लड्डू के भाव बढाए ही नहीं हैं और मुफ्त बाँटे जाने वाले लड्डुओं की संख्या भी बढ़ रही है. अभी भी यह लड्डू 25/- प्रति नग के हिसाब से बेचा जा रहा है, जबकि इसकी लागत बढ़ते-बढ़ते 33/- रूपए तक पहुँच गई है. यह मंदिर भारत के सर्वाधिक धनी संस्थानों में गिना जाता है. 2016 में तिरुपति के विशाल रसोईघर में दस करोड़ से अधिक लड्डू बनाए गए. प्रसाद के रूप में बेचे जाने से अधिक नुक्सान नहीं होता है, बल्कि घंटों लाईन में लगकर आने वाले भक्त को बाँटे जाने वाले लड्डू के कारण घाटा बढ़ता जा रहा है. उल्लेखनीय है कि तिरुपति में लड्डू प्रसाद के भाव भी अलग-अलग हैं. 25/- रूपए में बेचने वाला लड्डू प्रसाद होता है, जबकि दूसरे क्रमांक की पंक्ति में खड़े भक्तों को 10/- में एक लड्डू दिया जाता है. साथ ही लगभग ग्यारह किमी पैदल चढ़ाई करके पहुँचने वाले भक्त को मिलने वाला लड्डू पूरी तरह मुफ्त होता है. अक्टूबर 2013 में यह मुफ्त लड्डू वाली योजना शुरू की गई थी, ताकि पारंपरिक “पैदल दर्शनार्थी” की संख्या बढ़ाई जाए. उसके बाद से लगभग सत्तर लाख लोगों ने नंगे पैर बालाजी के दर्शन किए हैं और मुफ्त लड्डू प्राप्त किया है.

तिरुपति देवस्थानम ट्रस्ट ने कहा है कि वह इस घाटे को उठाने में सक्षम है, इसलिए मीडिया को इसमें चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है. हालाँकि ट्रस्ट इस बात पर विचार कर रहा है कि तत्काल टिकट लेकर दर्शन करने वाले भक्तों को दिए जाने वाले लड्डुओं की संख्या में कमी कर दी जाए, अथवा उनसे अधिक पैसा लिया जाए, लेकिन कड़ी मेहनत और घंटों में धूप में पसीना बहाकर पैदल आने वाले भक्त के लिए लड्डू मुफ्त ही रखा जाएगा. मजे की बात यह है कि 2000 वर्ष पुराने इस मंदिर में पहले चावल की मीठी खीर के रूप में प्रसाद दिया जाता था, लेकिन सौ वर्ष पहले अंग्रेजों ने लड्डू की परंपरा आरम्भ की थी, जो आज भी जारी है.

मुख्य बात यह है कि “मंदिर एवं ट्रस्ट एक्ट” के कारण भारत के किसी भी मोटी आय वाले प्रमुख मंदिरों पर “केवल हिंदुओं” का कोई नियंत्रण नहीं है. राज्य सरकारें, IAS अधिकारी और गैर-हिन्दू भी मंदिरों के ट्रस्ट में शामिल होते हैं. जबकि मंदिरों में आने वाले दान, आय अथवा किए जाने वाले खर्चों, लाभ-हानि के बारे में आने वाली किसी भी सूचना अथवा समाचार के बारे में ठीकरा हिन्दू संगठनों के माथे फोड़ा जाता है, लेकिन कोई भी सरकार मंदिरों से अपना नियंत्रण खत्म नहीं करना चाहती. जबकि चर्चों और मस्जिदों की फण्डिंग अथवा नियंत्रण में सरकार का कोई दखल नहीं होता है, ना ही कोई हिन्दू उनकी प्रबंधकीय समिति में शामिल हो सकता है. हिंदुओं के लिए यह चिंता का विषय होना चाहिए, लेकिन है नहीं. केन्द्र की भाजपा सरकार से उम्मीद है कि वह इस क़ानून में बदलाव करे और एक “राष्ट्रीय मंदिर व्यवस्थापन बोर्ड” का गठन करे, जो गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की तर्ज पर काम करे ताकि मंदिरों की संपत्ति का दुरुपयोग, भ्रष्टाचार पर लगाम लगे तथा मंदिरों का प्रबंधन “गैर-हिंदुओं” के हाथों में न हो, जिससे पैसों का समुचित व्यय किया जा सके.

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