तिरुपति तिरुमला मंदिर में प्रशासन-पुजारी घमासान तेज

Written by सोमवार, 21 मई 2018 13:20

जैसा कि सभी जानते हैं, तिरुपति स्थित तिरुमाला मंदिर (Tirupati Devasthanam) भारत के प्रमुख धनी मंदिरों में से एक है, जहाँ प्रतिवर्ष करोड़ों रूपए का दान और चढ़ावा आता है. लेकिन अधिकाँश लोग इस बात से अनजान हैं कि देश के सभी प्रमुख मंदिरों पर सरकारों का आधिपत्य है. मंदिरों में जारी सरकारी लूट (Temple Loot) के बारे में इसी पोर्टल पर चार भागों की एक श्रृंखला प्रस्तुत की गई थी (यहाँ, यहाँ, यहाँ और यहाँ क्लिक करके अवश्य पढ़ें), परन्तु मंदिरों की अकूत संपत्ति, प्रबंधन और व्यवस्थाओं पर सरकारों के इस नियंत्रण (HRCE Act) के कारण हिन्दू मंदिरों में भ्रष्टाचार, अनियमितताएँ तो बढ़ी ही हैं, लेकिन साथ ही सनातन परम्पराओं, पूजा-अर्चना एवं विभिन्न कर्मकांडों में भी सरकार का हस्तक्षेप बढ़ रहा है. 

तिरुमला तिरुपति देवस्थानम बोर्ड (TTD) में भी पिछले कुछ वर्षों से विभिन्न प्रकार की बातें सुनाई देती रहीं, लेकिन चूँकि अधिकाँश हिन्दू सुप्त अवस्था में रहते हैं और सरकारों पर हिन्दू मामलों को लेकर कोई दबाव नहीं बनाते इसलिए तिरुपति देवस्थानम के कई मामले यूँ ही दबा दिए गए. आंधप्रदेश में चर्च की असीमित गतिविधियाँ काँग्रेसी मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी के कार्यकाल में उफान पर थीं और अब हालत ये हो गई है कि कई बार तिरुपति मंदिर के अंदर भी चर्च के गुर्गे अपनी किताबें लेकर ईसा मसीह का प्रचार करते पाए जाने लगे हैं.

 

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ऐसे ही कई मुद्दों को लेकर हाल ही में तिरुपति देवस्थानम के प्रमुख पुजारी श्री एवी रामन्ना दीक्षितुलू ने बाकायदा एक प्रेस कांफ्रेंस करके मंदिर प्रशासन पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं. दीक्षितुलू ने साफ़-साफ़ आरोप लगाया है कि मंदिर में आने वाली ज्वेलरी और बेशकीमती रत्नों का वर्षों से कोई पुख्ता ऑडिट नहीं हुआ है और उसमें बड़ी मात्रा में हेराफेरी किए जाने की आशंका है. दीक्षितुलू के अनुसार 1996 तक मंदिर के पुजारी ही भगवान की समस्त ज्वेलरी, मुकुट इत्यादि के व्यवस्थापक हुआ करते थे. हमने सभी प्रकार के दान का अप-टू-डेट हिसाब-किताब रखा हुआ था. दुर्भाग्य से 1996 में आंध्रप्रदेश सरकार ने इस मंदिर का अधिग्रहण कर लिया और पिछले बाईस वर्षों में ज्वेलरी को एक बार भी नहीं गिना गया. 1996 के बाद दान में मिले गहनों एवं स्वर्ण आभूषणों की गिनती जरूर हुई है, परन्तु जो प्राचीन आभूषण थे, उनका कोई ऑडिट नहीं हुआ है. दीक्षितुलू की माँग है कि मंदिर के खजाने का CCTV कैमरा लगाकर सुप्रीम कोर्ट के जज की निगरानी में “सार्वजनिक ऑडिट” होना चाहिए, तथा एक-एक आभूषण का “डिजिटल रिकॉर्ड” होना चाहिए, परन्तु सरकार इस दिशा में कतई गंभीर नहीं है. TTD प्रशासन ने इसके बाद श्रीरामन्ना को प्रमुख पुजारी के पद से बर्खास्त कर दिया है. 

मुख्य पुजारी ने मंदिर संपत्ति की सम्पूर्ण जाँच सीबीआई से करवाने की भी मांग की है, ताकि मंदिर में हिंदुओं की संपत्ति से आए हुए दान के रुपयों को कहाँ-कहाँ और कैसे खर्च किया गया, इसकी पूरी जानकारी जनता के सामने आए. उदाहरण के लिए तेलुगूदेसम पार्टी के एक विधायक ने अनंतपुर के गुदीमाला गाँव में भव्य मंदिर बनाने के लिए दस करोड़ रूपए की माँग TTD बोर्ड के सामने रखी है जिसे मंजूरी दे दी गई, जबकि ऐसा कोई प्रावधान मंदिर नियमावली में नहीं है. इसी प्रकार तिरुपति मंदिर के ट्रस्टी बोर्ड और उसके द्वारा की जाने वाली नियुक्तियों में भी भारी अनियमितताएँ देखी गई हैं. हाल ही में एक अखबार की स्टिंग रिपोर्ट में यह सामने आया है कि तिरुपति मंदिर में नकली हिन्दू नामों का सहारा लेकर धर्मान्तरित ईसाई भी स्टाफ की भर्ती में शामिल हो चुके हैं. ज़ाहिर है कि ऐसे कर्मचारियों को हिन्दू धार्मिक आस्थाओं से क्या लेना-देना? इसी प्रकार कुछ वर्ष पहले जम्मू स्थित वैष्णो देवी ट्रस्ट बोर्ड द्वारा जब माता के मंदिर में चढाए गए गहनों की विस्तृत जाँच की गई तो उसमें से कई गहने नकली पाए गए, परन्तु उस समय इसका आरोप भक्तों पर ही मढ़ा गया था कि उन्होंने ही नकली गहने चढाए होंगे... इस प्रकार लीपापोती करके मामला रफा-दफा कर दिया गया था.

श्रीरामुलू दीक्षितुलू के अनुसार मंदिर प्रशासन केवल पैसा कमाने में लगा हुआ है. VIP दर्शन के नाम पर लाखों रूपए की लूट पिछले दरवाजे से जारी है, जिसके कारण पुराने अर्चक एवं पुजारी तो आहत हैं ही, कई बार मंदिर की परम्पराओं एवं धार्मिक आस्थाओं पर भी आघात कर दिया जाता है और प्रशासन चुपचाप देखता रहता है, क्योंकि वह उस VIP से पैसा ले चुका होता है. मुख्य पुजारी ने 45 पुजारियों के हस्ताक्षर से युक्त अपनी समस्त शिकायतें प्रधानमंत्री, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और आंधप्रदेश के राज्यपाल को विस्तार से लिखकर भेज दी हैं, कि जिस प्रकार केरल के पद्मनाभ स्वामी मंदिर का ऑडिट किया गया था, वैसा ही ऑडिट तिरुपति मंदिर का भी होना चाहिए, VIP दर्शन बन्द होने चाहिए तथा प्रशासन के निरंतर बढ़ते हस्तक्षेप के कारण धार्मिक भावनाओं के आहत होने को रोका जाए.

वास्तव में अब समय आ गया है कि केन्द्र और राज्य सरकारें, हिंदुओं के दान के पैसों की यह लूट बन्द करें, तथा HRCE क़ानून में आमूलचूल परिवर्तन करके मंदिरों का प्रशासन, प्रबंधन, व्यवस्थापन एवं समस्त धार्मिक-आर्थिक व्यवहार के लिए एक केन्द्रीय समिति का गठन किया जाए, जिसमें IAS अधिकारियों एवं नेताओं का कोई हस्तक्षेप न हो. मंदिरों का पैसा केवल और केवल गरीब हिंदुओं की भलाई, स्कूल, अस्पताल एवं हिन्दू मंदिरों की देखभाल में ही खर्च होना चाहिए. बहरहाल, अब मामला रोचक हो गया है क्योंकि "हिंदुत्व" के लगभग एकमात्र सबल योद्धा अर्थात डॉक्टर सुब्रमण्यम स्वामी इस मुद्दे को लेकर हाईकोर्ट चले गए हैं और उन्होंने मंदिर के मामले में आंधप्रदेश सरकार के हस्तक्षेप को रोकने तथा श्रीरामन्ना की बहाली हेतु अर्जी लगा दी है. 

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