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क्या अब किन्नरों की संपत्ति पर इस्लाम की बुरी नज़र?

Written by शनिवार, 02 सितम्बर 2017 20:13

भारत के कई पाठकों को गत वर्ष यानी 2016 में उज्जैन में संपन्न हुए सिंहस्थ कुम्भ का स्मरण अवश्य होगा. इस सिंहस्थ कुम्भ में एक विशेष आकर्षण का केंद्र था “किन्नर अखाड़ा”. यानी जिसे हम अंगरेजी में “थर्ड जेंडर” भी कह सकते हैं.

इस किन्नर अखाड़े की महामंडलेश्वर हैं लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी. उज्जैन सिंहस्थ कुम्भ 2016 में इस किन्नर अखाड़े ने अच्छी-खासी खलबली मचाई थी और सनातन धर्म के कई साधू-संतों ने इस अखाड़े के सिंहस्थ में भाग लेने, पेशवाई निकालने एवं संतों के साथ स्नान करने पर आपत्ति भी जताई थी. परन्तु जनता का साथ खुलकर इस अखाड़े को मिला और अंततः बाकी के सभी अखाड़ों को इनकी जायज़ मांग के आगे झुकना पड़ा. महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी के अनुसार, सिंहस्थ महाकुंभ में पहली बार उज्जैन के दशहरा मैदान से किन्नर अखाड़े की पेशवाई निकाली गई. इसकी अगवानी इनके सनातन गुरु अजयदास ने की. लक्ष्मी त्रिपाठी टीवी कलाकार, भरतनाट्यम नृत्यांगना और सामाजिक कार्यकर्ता हैं और किन्नरों के अधिकार के लिए काम करती हैं.

किन्नर समुदाय का मानना है, कि वे लोग जन्मजात योगी हैं. इसलिए उन्हें न तो अलग से किसी अखाड़े की सदस्यता की जरूरत है, और न ही किसी की मान्यता की. इसीलिए उन्होंने बिना किसी साधू-संत की अनुमति लिए सीधे प्रशासन से अनुमति लेकर किन्नर अखाड़े के रूप में वे सिंहस्थ में शामिल हुए. किन्नर अखाड़े की अखंड पीठाधीश्वर सागर (मप्र) की पूर्व महापौर कमला बुआ को बनाया गया है, तथा हर प्रदेश में एक पीठाधीश्वर बनाए गए हैं, जो उस प्रदेश में किन्नर साधुओं और उनके अनुयायियों को एकजुट कर अखाड़े से जोड़ रहे हैं.

अब हम आते हैं ताज़ा विवाद पर. हाल ही में महाराष्ट्र के धूलिया में दिनदहाड़े सड़कों पर किन्नरों के दो गुटों में सशस्त्र संघर्ष हुआ और दोनों गुटों ने थानों में FIR दर्ज की. अभी तक किन्नरों के इन विवादों पर अधिक ध्यान नहीं दिया जाता था, यह माना जाता था कि यदि किन्नर आपस में लड़ रहे हैं तो निश्चित ही पैसों और संपत्ति की बंदरबांट के लिए लड़ रहे होंगे. लेकिन इस बार धूलिया में हुए विवाद का मामला जब खुला तो पता चला कि सिंहस्थ कुम्भ में महामंडलेश्वर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी ने किन्नर अखाड़े के झंडे तले किन्नरों को सनातन धर्म से जोड़ने की जो शुरुआत की है, उसके नतीजे अब जमीनी स्तर पर दिखाई देने लगे हैं.

जैसा कि प्रत्येक शहर में होता है, किन्नरों के विभिन्न गुट होते हैं जिनके अपने-अपने इलाके बंटे हुए होते हैं. एक गुट दूसरे के इलाके में पैसा वसूल करने नहीं जाता है, और यह एक अलिखित समझौता होता है. धूलिया में भी किन्नरों के दो गुटों के बीच पिछले कई वर्षों से पैसों के लेनदेन तथा अपने-अपने इलाकों की सीमाओं को लेकर विवाद चला आ रहा था. पुलिस इसमें कभी हस्तक्षेप नहीं करती थी, क्योंकि यह मामले किन्नरों द्वारा आपस में ही सुलझा लिए जाते थे. लेकिन इस बार स्थिति दूसरी है, 25 अगस्त को किन्नरों के बीच जो हिंसक विवाद हुआ उसके पीछे “हिन्दू-मुस्लिम” एंगल निकलकर सामने आया है. धूलिया के यल्लाम्मा देवी मंदिर की पुजारी पार्वती परशुराम जोगी द्वारा लिखित में की गयी FIR के मुताबिक़ पिछले कई वर्षों से हमारा किन्नर गुट मालेगाँव रोड पर स्थित इस यल्लाम्मा देवी मंदिर परिसर में रहता है. हम लोग इंदौर पीठाधीश्वर किन्नर अखाड़े से सदस्य हैं और इस इलाके में लोगों से नेग माँगकर अपना गुज़ारा चलाते हैं. धूलिया में ही देवपुर भाण्डपूरा क्षेत्र में रहने वाले किन्नरों में से पद्मा नायक, असलम बी, खल्लो हाजी का गुट पिछले दो-तीन वर्षों से हम लोगों पर दबाव बना रहा है कि हम “इस्लाम” स्वीकार कर लें. हमारा गुट यल्लाम्मा देवी का पुजारी है, स्वाभाविक रूप से हम इस्लाम कैसे स्वीकार कर सकते हैं. इसी बात को लेकर मुस्लिम किन्नरों का यह गुट पिछले दिनों हमारे मंदिर में आकर हमें धमका गया कि अगर तुमने जल्दी ही इस्लाम स्वीकार नहीं किया तो हम तुम्हें धूलिया में किसी परिवार से कोई नेग या इनाम नहीं माँगने देंगे. 25 अगस्त को फूलवाला चौराहे पर जब हम लोग दुकानदारों से पैसा माँग रहे थे, तभी असलम बी और खल्लो जान के मुस्लिम किन्नर गुट ने हम लोगों पर हमला बोल दिया और हमारे पैसों और गहनों को लूटने लगे. हमने भी प्रतिकार किया और मामला हिंसक संघर्ष में तब्दील हो गया. आजादनगर पुलिस स्टेशन में हमने FIR भी कर दी है. गणेशोत्सव के बीच में शहर की शान्ति भंग ना हो, इसलिए हम शांत बैठे हैं, लेकिन यदि प्रशासन ने इस्लामिक किन्नरों पर कोई ठोस कार्यवाही नहीं की, तो कुछ भी हो सकता है.

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इस सम्बन्ध में हमने बजरंग दल, विहिप के पदाधिकारियों को भी अपने साथ लिया है तथा हमारे किन्नर अखाड़े के महामंडलेश्वर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी को भी सूचित कर दिया है कि हम किसी भी हाल में इस्लाम स्वीकार नहीं करेंगे. हम लोग पिछली सात पीढ़ियों से यल्लाम्मा देवी मंदिर में हैं और हिन्दू धर्म को मानते आए हैं. पार्वती परशुराम जोगी ने आगे कहा कि यदि यह मामला जल्दी नहीं सुलझाया गया तो गंभीर रूप भी ले सकता है, क्योंकि जब से उज्जैन में किन्नर अखाड़े की स्थापना हुई है और इसे सनातन संतों द्वारा मान्यता भी मिल गयी है, उसके बाद से ही किन्नरों के “इस्लामिक गुटों” में बेचैनी फ़ैली हुई है. किन्नरों के विभिन्न मठों, जमीनों, पैसे और पुश्तैनी संपत्तियों पर मुस्लिम किन्नरों की निगाह है. वे हमें धमकाकर इस्लाम कबूल करवाना चाहते हैं, लेकिन ऐसा नहीं होगा. उल्लेखनीय है कि दबाव बनाकर इस्लाम कबूल करवाने की घटनाएँ देश की विभिन्न जेलों में भी सामने आई हैं, लेकिन मीडिया द्वारा अक्सर दबा दी जाती हैं. जेलों में मुस्लिम कैदियों की संख्या भरमार है और कई जेलों में वे बहुसंख्यक भी हैं. इसलिए इन जेलों में आने वाले हिन्दू विचाराधीन कैदी इनका आसान शिकार बन जाते हैं. जेल के प्रहरी और अधिकारी भी इन मुस्लिम अपराधियों से पैसा खाकर मस्त रहते हैं और हिन्दू अपराधी इनकी दबंगई झेलते रहते हैं. इस पर कभी भी मीडिया में चर्चा नहीं होती, क्योंकि हमारे यहाँ “सेकुलरिज्म” नामक बवासीर इतना ज्यादा हावी है कि पत्तल-कारों को ऐसे विषयों पर लिखने में रूचि भी नहीं है और दर भी लगता है.

पता नहीं इस्लाम कैसा पंथ है, जहां देखो वहीं अपना “प्रचार काउंटर” लेकर खड़ा हो जाता है. इस्लाम की तरफ आओ, अल्लाह को अपनाओ... कुरआन को पढ़ो, इस प्रकार की धार्मिक मार्केटिंग तो ये खुलेआम करते ही हैं, लेकिन असली खेल परदे के पीछे चलता है जहाँ ये गुण्डई और दादागिरी के बल पर “इस्लाम कबूल करो” वाली नीति अपनाते हैं, फिर चाहे वह लव जेहाद हो या किन्नरों के बीच की लड़ाई हो अथवा जेलों में कैदियों के बीच होने वाले विवाद हों... हर जगह विवाद की जड़ “इस्लाम कबूल करो” ही है. हिंदूवादी लोग कभी अपने धर्म की मार्केटिंग या गुण्डई नहीं करते कि “आओ..आओ...आओ... हिन्दू बन जाओ..”, या फिर “लीजिए साहेबान, गीता का नया संस्करण आ गया, जल्दी कीजिए...”. पता नहीं ये धार्मिक मार्केटिंग की बीमारी इस्लाम और ईसाईयत में ही क्यों है?

बहरहाल... मामले की गंभीरता को आप समझ ही गए होंगे... अब चलते-चलते किन्नर अखाड़े और किन्नरों के बारे में दो-चार अनसुनी बातें भी जान लीजिए.

- किन्नर अखाड़े का मुख्य उद्देश्य किन्नरों को भी समाज में समानता का अधिकार दिलवाना है. (वामपंथी और जेंडर बायस्ड का राग अलापने वाली औरतें ध्यान दें).

- किन्नर अपने आराध्य देव अरावन से साल में एक बार विवाह करते है. हालांकि ये विवाह मात्र एक दिन के लिए होता है. अगले दिन अरावन देवता की मौत के साथ ही उनका वैवाहिक जीवन खत्म हो जाता है.

- अगर किसी किन्नर की मृत्यु हो जाए तो उसका अंतिम संस्कार बहुत ही गुप्त तरीके से किया जाता है.

- ज्योतिष के अनुसार वीर्य की अधिकता से पुरुष (पुत्र) उत्पन्न होता है. रक्त (रज) की अधिकता से स्त्री (कन्या) उत्पन्न होती है. वीर्य और रज समान हो तो किन्नर संतान उत्पन्न होती है.

- किन्नरों का जिक्र धार्मिक ग्रंथों में भी मिलता है. पाण्डवों को महाभारत युद्ध जिताने का एक प्रमुख योगदान शिखंडी को भी जाता है.

- महाभारत के अनुसार एक साल का अज्ञातवास को काटने के लिए अर्जुन को भी एक किन्नर बनना पड़ा था.

- फिलहाल देश में किन्नरों की चार देवियां हैं.

अस्तु... फिर मिलेंगे ऐसे ही किसी चौंकाने वाले लेख में... तब तक दूसरे लेख पढ़ते रहिये desicnn.com पर... 

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