खाद्य सुरक्षा बिल और गरीबों के लिए चलने वाली सस्ते अनाज की तमाम योजनाओं (Food Security Scheme) के बारे में अक्सर विमर्श होता रहता है. अधिकाँश बार यही निकलकर आया है, कि ऐसी योजनाएँ भ्रष्टाचारी लोगों का अड्डा बनी हुई हैं.

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पाठकगण अक्सर यह सोचते होंगे कि भारत में "नव-बौद्धों" को ब्राह्मणों के खिलाफ क्यों भडकाया जा रहा है? साथ ही यह प्रश्न भी उनके मन में उठते होंगे कि आखिर म्यांमार के बौद्ध, इस्लाम के खिलाफ इतने आक्रामक क्यों हो गए, जबकि भारत में बौद्ध धर्मावलंबियों को बरगलाने में इस्लामी प्रचारक और वेटिकन सबसे आगे क्यों रहते हैं?? इन जैसे सवालों का जवाब इस लेख में संक्षिप्त रूप से दिया गया है... आगे पढ़िए.

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कणकवली रेलवे स्टेशन से मुम्बई यात्रा करते समय अथवा वहाँ से वापस आते समय स्टेशन की सीढ़ियों के पास श्री मधु दण्डवते (Madhu Dandavate) का जो तैलचित्र लगा हुआ है, मैं सदैव उसे दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार करके ही आगे बढ़ता हूँ.

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अक्सर आपने कुछ "कथित इतिहासकारों" के मुँह से यह सुना होगा, कि "भारत तो कभी एक राष्ट्र था ही नहीं...", "यह तो टुकड़ों में बंटा हुआ एक भूभाग है, जिसे जबरन राष्ट्रवाद के नाम पर एक रखने का प्रयास किया जाता है...".

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 पिछले भाग में आपने पढ़ा (यहाँ क्लिक करके पिछले भाग पढ़ा जा सकता है) कि किस तरह भारत में इस्लामिक पार्टियों, संस्थाओं और जिन्ना ने गाँधी-नेहरू को बेवकूफ बनाकर पाकिस्तान बनाने की नींव 1909 में ही रखनी शुरू कर दी थी.

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भारत का बँटवारा एक कटु ऐतिहासिक सत्य है. 1947 में भारत छोड़कर जाने से पहले अंग्रेज भारत के कई टुकड़े (Partition of India) करके गए थे. सीमाओं के दोनों तरफ भीषण खूनखराबा हुआ था और अंततः मुसलमानों को उनका अपना एक देश “पाकिस्तान” के रूप में मिला.

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सबसे पहले कुछ पंक्तियाँ उन पाठकों के लिए, जिन्हें बांद्रा स्टेशन (Bandra Railway Station) के बारे में जानकारी नहीं है. मुम्बई में स्थित बांद्रा रेलवे स्टेशन, दादर एवं मुम्बई सेन्ट्रल (Mumbai Central) स्टेशन पर पड़ने वाले ट्रेनों के दबाव को कम करने के लिए एक अतिरिक्त टर्मिनस स्टेशन के रूप में विकसित किया गया था, यह स्टेशन पश्चिम रेलवे के अंतर्गत आता है.

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देश की मुख्य धरती से बहुत दूर स्थित अंडमान द्वीप पर स्थित सेल्युलर जेल (Cellular Jail of Andaman) बहुत कुख्यात थी. हालाँकि सावरकर बंधुओं की वजह से अब यह जेल एक “तीर्थस्थल” बन चुकी है, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब इस जेल का नाम सुनकर ही कैदियों की तबियत खराब हो जाया करती थी.

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एक कल्पना कीजिए... तीस वर्ष का पति जेल की सलाखों के भीतर खड़ा है और बाहर उसकी वह युवा पत्नी खड़ी है, जिसका बच्चा हाल ही में मृत हुआ है...

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पैगंबरवासी क्रान्तिकारी हुतात्मा शायर अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ का जन्म उत्तर प्रदेश के शहीदगढ शाहजहाँपुर में रेलवे स्टेशन के पास स्थित कदनखैल जलालनगर मुहल्ले में 22 अक्टूबर 1900 को हुआ था।

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