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कुछ तथाकथित दलित चिंतकों (असल में वेटिकन के गुर्गे) का सदा से आरोप रहता है कि मंदिरों में दलितों के साथ भेदभाव किया जाता है, उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं मिलता. हालाँकि यह बात पहले ही सिद्ध हो चुकी है कि यह केवल दुष्प्रचार भर है, क्योंकि देश के हज़ारों मंदिरों में से इक्का-दुक्का को छोड़कर किसी भी मंदिर में घुसते समय, किसी से उसकी जाति नहीं पूछी जाती है.

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हाल ही में केरल के एक उच्च पदस्थ से रिटायर्ड हुए पुलिस अधिकारी ने हिन्दू-मुस्लिम-ईसाई समुदायों के पैदा होने वाले बच्चों के बारे में जो शोध रिपोर्ट सार्वजनिक की उसके बाद केरल के राजनैतिक तबकों के साथ-साथ ईसाई बहुल क्षेत्रों में भी बेचैनी फ़ैल गयी है.

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पिछले कुछ वर्षों में देखा गया है कि भारत में जैसे ही “संस्कृत” का नाम लिया जाता है, तो तमाम कथित प्रगतिशील और नकली बुद्धिजीवी किस्म के लोग नाक-भौंह सिकोड़ने लगते हैं. वेटिकन पोषित कुछ तथाकथित दलित चिंतकों ने तो संस्कृत जैसी समृद्ध भाषा को “ब्राह्मणवाद” से जोड़ दिया है, जबकि दिल्ली-चेन्नई के वामपंथ पोषित विश्वविद्यालयों ने संस्कृत को लगभग “साम्प्रदायिक” और भगवाकरण से जोड़ रखा है.

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किसी के जीवन में जब कोई विपत्ति आती है, तो अपनी हिम्मत और धैर्य से वह उससे बाहर निकल आता है, परन्तु हमेशा प्रत्येक विपत्ति जीवन का कोई न कोई सबक दे ही जाती है. कुछ लोग विपत्तियों में घबरा जाते हैं, जबकि कुछ लोग ऐसा प्रयास भी करते हैं कि जिस संकट से वे गुज़रे हैं, वैसा संकट  किसी दूसरे पर न आए, और यदि दुर्भाग्य से आ ही जाए तो उसे समय पर, सही स्थान पर, सही व्यक्ति से सहायता मिल जाए. ऐसी ही प्रेरक घटना है छत्तीसगढ़ पुलिस में कांस्टेबल स्मिता तांडी और रविन्द्र सिंह क्षत्रिय के जीवन की... आगे पढ़िए.

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आजादी से पूर्व तक भारतीय उपमहाद्वीप के विजय की चाभी अफगानिस्तान के हेरात व कंधार प्रांत को माना गया, जो खुरासान प्रदेश का दक्षिणी हिस्सा था। यही कारण रहा कि विदेशी आक्रांताओं के लिए खुरासान भारत विजय का मोड्यूल रहा।

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भारत के स्वतन्त्र होने के पश्चात कई धुरंधर विद्वान एवं वैज्ञानिक सोच वाले व्यक्तियों ने इस राष्ट्र के निर्माण में महती भूमिका निभाई है. होमी भाभा, मेघनाद देसाई अथवा विक्रम साराभाई जैसे दिग्गजों के नाम काफी लोकप्रिय हैं और लगभग सभी लोग जानते हैं. ऐसे ही एक नींव के पत्थर हैं, श्री दौलतसिंह कोठारी... जिनके बारे में अधिक लोग नहीं जानते हैं,

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कुछ झूठ ऐसे होते हैं, जो लम्बे समय तक सच मान लिए जाते हैं. इन्हीं में से एक झूठ यह है कि मोहम्मद अली जिन्ना “सेक्यूलर” थे और 1947 से पहले गांधी-नेहरू के साथ हुए सत्ता एवं शक्ति संघर्ष की राजनीति में हारने के कारण जिन्ना ने पाकिस्तान के निर्माण का दाँव चला. लेकिन यह सच नहीं है, “पाकिस्तान” नामक इस्लामिक शरिया देश की कल्पना 1947 से बहुत-बहुत पहले अर्थात 1937 में ही रखी जा चुकी थी.

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चीन ने ओबोर की बात कर कर अंतरराष्ट्रीय जगत में एक नई हलचल पैदा कर दी है। OBOR यानी वन बेल्ट वन रोड, वन रोड यानी सिल्क रोड। यह बड़ी हैरतअंगेज बात है कि चीन ने एक रूट को रोड बना दिया।

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एक समाचार के अनुसार केन्द्र सरकार के उपक्रम नेशनल पेमेंट्स कार्पोरेशन ऑफ इण्डिया (NCPI) ने गूगल और व्हाट्सएप्प को यह अनुमति प्रदान कर दी है, कि वे अपने मोबाईल एप्प से UPI अर्थात एकीकृत भुगतान प्रणाली या कहें सरकारी मोबाईल प्लेटफार्म को समाहित कर सकते हैं.

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कुछ समय पहले उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक बयान दिया था कि “ताजमहल को भारत की परम्परा और विरासत नहीं माना जा सकता”. जैसी कि उम्मीद थी, योगी आदित्यनाथ के इस बयान को लेकर “सेकुलरिज्म एवं वामपंथ” के नाम पर पाले-पोसे जाते रहे परजीवी तत्काल बाहर निकलकर विरोध प्रकट करेंगे.

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