अपनी बात शुरू करूं इससे पहले यह स्पष्ट कह देना चाहता हूं कि अपने लिए न तो चेलमेश्वर (Justice Chelmeshwar) समूह कोई भगवान हैं, और न ही दीपक मिश्रा (Justice Deepak Mishra) को ही कोई क्लीन चिट देने का अपना कोई इरादा है. सच कहें तो इस पोस्ट का आशय चार जजों द्वारा उठाये गए मूल प्रकरण पर बात करने से है भी नहीं. अपन तो इस अप्रत्याशित घटना के बाद फेसबुक (Social Media Trial) पर छा गए समर्थन-विरोध और उसके तरीके के प्रति बात करना चाह रहे हैं.

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बाहर से आए इस्लामिक और तुर्क लुटेरों (Islamic Invaders in India) ने भारत के सोमनाथ मंदिर जैसे हजारों मंदिरों को लूटा और ध्वस्त किया है, यह इतिहास कोई नई बात नहीं है.

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यदि आप सोचते हैं कि फेसबुक पर लिखने से कुछ नहीं होता, तो कुछ मित्रों की इस संघर्ष गाथा को पढ़िए. भारत के वास्तविक इतिहास के साथ रोमिला थापर छाप “नकली इतिहासकारों” (Fake Historians) ने जो कुकर्म किए हैं, उसे बदलने के लिए पिछले साढ़े तीन वर्ष से ललित मिश्रा और CA अनूप कुमार शर्मा के नेतृत्व में कुछ विद्वानों ने एक समूह बनाकर लगातार मोदी सरकार का पीछा किया, और अंततः लम्बे इंतज़ार के बाद इसे हासिल किया.

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पिछले भाग में आपने पढ़ा कि किस तरह इस्लामी आक्रान्ताओं ने औरतों को बंधक बनाकर, उनके साथ बलात्कार करके तथा एक समुदाय विशेष के लोगों के समक्ष उन ऐशगाहों में स्थित शौचालयों (Toilet System) की सफाई करने अथवा धर्म परिवर्तन करने हेतु दबाव बनाया गया. (पिछला भाग पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें...). इसी इतिहास से जुड़े कुछ और सवाल ऐसे हैं, जो सहज स्वरूप में ही उठते हैं, उन पर भी विचार किया जाना आवश्यक है.

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भारतवर्ष अब शौचालय क्रान्ति (Swachchh Bharat Abhiyan) की ओर नए कदम बढा चुका है. शौचालय हर खास-ओ-आम व्यक्ति के जीवन का अभिन्न और अहम हिस्सा बन चुका है.

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सबसे पहले टेवेर्नियर (Tavernier) के बारे में... यह व्यक्ति एक फ्रांसीसी यात्री था, जिसने 1630 से 1668 के बीच ईरान और भारत की 6 बार यात्रा की थी, और वह भारत में एक लाख 20 हजार मील से अधिक घूमा.

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हाल ही में राजकोट गुजरात से आए हुए एक वीडियो ने पारिवारिक मूल्यों पर सबसे बड़ा आघात किया है. लोगों के दिलोदिमाग को हिलाकर रख दिया है. एक मानसिक रूप से अपंग माँ को उसका अपना ही बेटा छत से धकेल रहा है.

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भीमा-कोरेगाँव घटना को लेकर कई बातें हो चुकी हैं और कई चेहरे बेनकाब हो चुके हैं.

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जिस प्रकार तुर्की स्थित खलीफाओं के अत्याचारों को नकारने के लिए एक पूरी व्यवस्था को जन्म एवं समर्थन दिया गया, जिसमें गाँधी समर्थित खिलाफत आन्दोलन शामिल है, जबकि यह कोई खिलाफत आन्दोलन (Khilafat Movement) नहीं था, यह तुर्की के इस्लामी खलीफा को बचाने वहां लोकतंत्र की स्थापना के खिलाफ आन्दोलन था.

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पिछले दिनों महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगाँव (Bhima Koregaon) में जो सुनियोजित दंगा और हंगामा हुआ, तथा जिसे जानबूझकर ब्राह्मण विरुद्ध दलित (Anti Brahmin Propaganda) का जामा पहनाया गया, वह वास्तव में नक्सलवादियों-माओवादियों का षड्यंत्र था.

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