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नवरात्रि आरम्भ हो गयी हैं. विजयदशमी भी आएगी ही. अपने आपको अम्बेडकरवादी, मूलनिवासी, साम्यवादी कहने वाले एक बार फिर से हमेशा की तरह JNU जैसे कुख्यात अड्डे पर विजयदशमी के स्थान पर "महिषासुर शहादत दिवस" मनाने का प्रपंच करेंगे.

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रोहिंग्या के चक्कर में कहीं बांग्लादेशियों को न भूल जाएँ हम... इसलिए समस्या को समझने के लिए आईये शुरू से शुरू करते हैं... रोहिंग्या मुस्लिमों के दो प्रकार है -- १) शरणार्थी एवं २) घुसपैठिये.

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पुराने ज़माने में राजा महाराजा अपने साथ एक भाट(कवि) अवश्य रखते थे. जो हमेशा उनके साथ मौजूद रहते थे. उनका काम था राजा की प्रशंसा में कविता लिखना. इससे होता कुछ नहीं था, बस राजाओ के अहम् को संतुष्टि मिलती थी. इसके एवज में उन्हें बेशुमार दौलत मिलती थी.

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हाल ही में एक नृशंस मामला सामने आया था, जिसके अनुसार स्कूल प्रबंधन की लापरवाही की वजह से एक मासूम “प्रद्युम्न” की जान गई. स्वाभाविक है कि ऊँची फीस वाले, हाई सोसायटी से सम्बन्धित इस स्कूल का ख़बरों में आना तय था, वैसा हुआ भी.

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"दमदमे में दम नहीं अब ख़ैर मांगों जान की
ऐ ज़फर अब हो चुकी शमशीर हिंदुस्तान की।"

बहादुरशाह जफ़र जब गिरफ्तार किये गए, तो उर्दू जानने वाले एक अंग्रेज़ी पुलिस अफसर फिलिप ने गिरफ्तार बादशाह-ए-हिन्द पर तंज कसते हुए यह शेर कहा था।

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पिछले सप्ताह भर से फेसबुक, व्हाट्स एप्प पर कई उत्साही वीरों ने यह सन्देश फैलाना शुरू किया था, कि भारत के मोस्ट वांटेड कुख्यात आतंकी दाऊद इब्राहीम की लन्दन में मिडलैंड स्थित संपत्ति को ब्रिटिश सरकार ने “जब्त” कर लिया है, और यह मोदी जी की भीषण सफलता है.

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सन 1948 में इज़राइल और अरब देशों बीच हुए युद्ध में सात लाख से ज्यादा फिलिस्तीनी मुसलमान बेघर होकर सीरिया और पाकिस्तान जैसे देशों की ओर पलायन कर गए थे. ये दुनिया की सबसे बड़ी शरणार्थी समस्या थी जो आज भी उतनी ही बड़ी है.

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लेख का शीर्षक देखकर आप चौंके होंगे. जी हाँ!! लेकिन वास्तविकता यही है. आजकल भारत की संस्कृति पर चोट करने वाली देशी-विदेशी फ़िल्में अचानक बहुतायत में आने लगी हैं. भारत में अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह 2017, नवंबर माह में गोवा में सम्पन्न होने जा रहा है.

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फेसबुक हमारी दिनचर्या का एक प्रमुख हिस्सा बन चुका है. फेसबुक पर सक्रिय रहने वाले लगभग सभी लोग कभी न कभी इस बात पर अवश्य विचार करते होंगे कि, उनकी पोस्ट पर अधिक लाईक क्यों नहीं आए?

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जम्मू-कश्मीर भारत के गले में फँसी हुई वह हड्डी है, जिसे न उगलते बन रहा है ना निगलते बन रहा है. पिछले सत्तर वर्षों में कई सरकारें आईं और चली गईं, लेकिन मर्ज़ बढ़ता ही गया, ज्यों-ज्यों दवा की.

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