पश्चिम बंगाल के उत्तरी दिनाजपुर जिले के इस्लामपुर के नजदीक पिछले दिनों दारीभीत के एक स्कूल में शांतिपूर्ण छात्र आन्दोलन चल रहा था. आंदोलन की मुख्य माँग यह थी कि स्कूल में बांग्ला शिक्षक की नियुक्ति होनी चाहिए. यह मांग भी लम्बे समय से चल रही थी, लेकिन 20 सितंबर गुरुवार के दिन यह आन्दोलन खूनी संघर्ष में बदल गया और ABVP छात्र संगठन के दो कार्यकर्ताओं राजेश सरकार व तापस बर्मन की पुलिस गोलीबारी से मौत हो गयी, जबकि विप्लव सरकार सहित अन्य कई छात्र गंभीर रूप से घायल हो गए. इन सभी को सिलीगुड़ी के एक अस्पताल में भर्ती करवाया गया.

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मृत्यु, जन्म-पुनर्जन्म एवं मोक्ष से सम्बंधित चालीस प्रश्नों के सटीक उत्तर...

(1) प्रश्न :- पुनर्जन्म किसको कहते हैं ?

उत्तर :- जब जीवात्मा एक शरीर का त्याग करके किसी दूसरे शरीर में जाती है तो इस बार बार जन्म लेने की क्रिया को पुनर्जन्म कहते हैं ।

(2) प्रश्न :- पुनर्जन्म क्यों होता है ?

उत्तर :- जब एक जन्म के अच्छे बुरे कर्मों के फल अधुरे रह जाते हैं तो उनको भोगने के लिए दूसरे जन्म आवश्यक हैं ।

(3) प्रश्न :- अच्छे बुरे कर्मों का फल एक ही जन्म में क्यों नहीं मिल जाता ? एक में ही सब निपट जाये तो कितना अच्छा हो ?

उत्तर :- नहीं जब एक जन्म में कर्मों का फल शेष रह जाए तो उसे भोगने के लिए दूसरे जन्म अपेक्षित होते हैं ।

(4) प्रश्न :- पुनर्जन्म को कैसे समझा जा सकता है ?

उत्तर :- पुनर्जन्म को समझने के लिए जीवन और मृत्यु को समझना आवश्यक है । और जीवन मृत्यु को समझने के लिए शरीर को समझना आवश्यक है ।

(5) प्रश्न :- शरीर के बारे में समझाएँ ?

उत्तर :- हमारे शरीर को निर्माण प्रकृति से हुआ है. जिसमें मूल प्रकृति ( सत्व रजस और तमस ) से प्रथम बुद्धि तत्व का निर्माण हुआ है. बुद्धि से अहंकार ( बुद्धि का आभामण्डल). अहंकार से पांच ज्ञानेन्द्रियाँ ( चक्षु, जिह्वा, नासिका, त्वचा, श्रोत्र ), मन. पांच कर्मेन्द्रियाँ ( हस्त, पाद, उपस्थ, पायु, वाक् ). शरीर की रचना को दो भागों में बाँटा जाता है ( सूक्ष्म शरीर और स्थूल शरीर ).

(6) प्रश्न :- सूक्ष्म शरीर किसको बोलते हैं ?

उत्तर :- सूक्ष्म शरीर में बुद्धि, अहंकार, मन, ज्ञानेन्द्रियाँ । ये सूक्ष्म शरीर आत्मा को सृष्टि के आरम्भ में जो मिलता है वही एक ही सूक्ष्म शरीर सृष्टि के अंत तक उस आत्मा के साथ पूरे एक सृष्टि काल ( ४३२००००००० वर्ष ) तक चलता है । और यदि बीच में ही किसी जन्म में कहीं आत्मा का मोक्ष हो जाए तो ये सूक्ष्म शरीर भी प्रकृति में वहीं लीन हो जायेगा ।

(7) प्रश्न :- स्थूल शरीर किसको कहते हैं ?

उत्तर :- पंच कर्मेन्द्रियाँ ( हस्त, पाद, उपस्थ, पायु, वाक् ) , ये समस्त पंचभौतिक बाहरी शरीर ।

(8) प्रश्न :- जन्म क्या होता है ?

उत्तर :- जीवात्मा का अपने करणों ( सूक्ष्म शरीर ) के साथ किसी पंचभौतिक शरीर में आ जाना ही जन्म कहलाता है ।

(9) प्रश्न :- मृत्यु क्या होती है ?

उत्तर :- जब जीवात्मा का अपने पंचभौतिक स्थूल शरीर से वियोग हो जाता है, तो उसे ही मृत्यु कहा जाता है । परन्तु मृत्यु केवल सथूल शरीर की होती है , सूक्ष्म शरीर की नहीं । सूक्ष्म शरीर भी छूट गया तो वह मोक्ष कहलाएगा मृत्यु नहीं । मृत्यु केवल शरीर बदलने की प्रक्रिया है, जैसे मनुष्य कपड़े बदलता है । वैसे ही आत्मा शरीर भी बदलता है ।

(10) प्रश्न :- मृत्यु होती ही क्यों है ?

उत्तर :- जैसे किसी एक वस्तु का निरन्तर प्रयोग करते रहने से उस वस्तु का सामर्थ्य घट जाता है, और उस वस्तु को बदलना आवश्यक हो जाता है, ठीक वैसे ही एक शरीर का सामर्थ्य भी घट जाता है और इन्द्रियाँ निर्बल हो जाती हैं । जिस कारण उस शरीर को बदलने की प्रक्रिया का नाम ही मृत्यु है ।

(11) प्रश्न :- मृत्यु न होती तो क्या होता ?

उत्तर :- तो बहुत अव्यवस्था होती । पृथ्वी की जनसंख्या बहुत बढ़ जाती । और यहाँ पैर धरने का भी स्थान न होता ।

(12) प्रश्न :- क्या मृत्यु होना बुरी बात है ?

उत्तर :- नहीं, मृत्यु होना कोई बुरी बात नहीं ये तो एक प्रक्रिया है शरीर परिवर्तन की ।

(13) प्रश्न :- यदि मृत्यु होना बुरी बात नहीं है तो लोग इससे इतना डरते क्यों हैं ?

उत्तर :- क्योंकि उनको मृत्यु के वैज्ञानिक स्वरूप की जानकारी नहीं है । वे अज्ञानी हैं । वे समझते हैं कि मृत्यु के समय बहुत कष्ट होता है । उन्होंने वेद, उपनिषद, या दर्शन को कभी पढ़ा नहीं वे ही अंधकार में पड़ते हैं और मृत्यु से पहले कई बार मरते हैं ।

(14) प्रश्न :- तो मृत्यु के समय कैसा लगता है ? थोड़ा सा तो बतायें ?

उत्तर :- जब आप बिस्तर में लेटे लेटे नींद में जाने लगते हैं तो आपको कैसा लगता है ?? ठीक वैसा ही मृत्यु की अवस्था में जाने में लगता है उसके बाद कुछ अनुभव नहीं होता । जब आपकी मृत्यु किसी हादसे से होती है तो उस समय आमको मूर्छा आने लगती है, आप ज्ञान शून्य होने लगते हैं जिससे की आपको कोई पीड़ा न हो । तो यही ईश्वर की सबसे बड़ी कृपा है कि मृत्यु के समय मनुष्य ज्ञान शून्य होने लगता है और सुषुुप्तावस्था में जाने लगता है ।

(15) प्रश्न :- मृत्यु के डर को दूर करने के लिए क्या करें ?

उत्तर :- जब आप वैदिक आर्ष ग्रन्थ ( उपनिषद, दर्शन आदि ) का गम्भीरता से अध्ययन करके जीवन,मृत्यु, शरीर, आदि के विज्ञान को जानेंगे तो आपके अन्दर का, मृत्यु के प्रति भय मिटता चला जायेगा और दूसरा ये की योग मार्ग पर चलें तो स्वंय ही आपका अज्ञान कमतर होता जायेगा और मृत्यु भय दूर हो जायेगा । आप निडर हो जायेंगे । जैसे हमारे बलिदानियों की गाथायें आपने सुनी होंगी जो राष्ट्र की रक्षा के लिये बलिदान हो गये । तो आपको क्या लगता है कि क्या वो ऐसे ही एक दिन में बलिदान देने को तैय्यार हो गये थे ? नहीं उन्होने भी योगदर्शन, गीता, साँख्य, उपनिषद, वेद आदि पढ़कर ही निर्भयता को प्राप्त किया था । योग मार्ग को जीया था, अज्ञानता का नाश किया था ।

महाभारत के युद्ध में भी जब अर्जुन भीष्म, द्रोणादिकों की मृत्यु के भय से युद्ध की मंशा को त्याग बैठा था तो योगेश्वर कृष्ण ने भी तो अर्जुन को इसी सांख्य, योग, निष्काम कर्मों के सिद्धान्त के माध्यम से जीवन मृत्यु का ही तो रहस्य समझाया था और यह बताया कि शरीर तो मरणधर्मा है ही तो उसी शरीर विज्ञान को जानकर ही अर्जुन भयमुक्त हुआ । तो इसी कारण तो वेदादि ग्रन्थों का स्वाध्याय करने वाल मनुष्य ही राष्ट्र के लिए अपना शीश कटा सकता है, वह मृत्यु से भयभीत नहीं होता , प्रसन्नता पूर्वक मृत्यु को आलिंगन करता है ।

(16) प्रश्न :- किन किन कारणों से पुनर्जन्म होता है ?

उत्तर :- आत्मा का स्वभाव है कर्म करना, किसी भी क्षण आत्मा कर्म किए बिना रह ही नहीं सकता । वे कर्म अच्छे करे या फिर बुरे, ये उसपर निर्भर है, पर कर्म करेगा अवश्य । तो ये कर्मों के कारण ही आत्मा का पुनर्जन्म होता है । पुनर्जन्म के लिए आत्मा सर्वथा ईश्वराधीन है ।

(17) प्रश्न :- पुनर्जन्म कब कब नहीं होता ?

उत्तर :- जब आत्मा का मोक्ष हो जाता है तब पुनर्जन्म नहीं होता है ।

(18) प्रश्न :- मोक्ष होने पर पुनर्जन्म क्यों नहीं होता ?

उत्तर :- क्योंकि मोक्ष होने पर स्थूल शरीर तो पंचतत्वों में लीन हो ही जाता है, पर सूक्ष्म शरीर जो आत्मा के सबसे निकट होता है, वह भी अपने मूल कारण प्रकृति में लीन हो जाता है ।

(19) प्रश्न :- मोक्ष के बाद क्या कभी भी आत्मा का पुनर्जन्म नहीं होता ?

उत्तर :- मोक्ष की अवधि तक आत्मा का पुनर्जन्म नहीं होता । उसके बाद होता है ।

(20) प्रश्न :- लेकिन मोक्ष तो सदा के लिए होता है, तो फिर मोक्ष की एक निश्चित अवधि कैसे हो सकती है ?

उत्तर :- सीमित कर्मों का कभी असीमित फल नहीं होता । यौगिक दिव्य कर्मों का फल हमें ईश्वरीय आनन्द के रूप में मिलता है, और जब ये मोक्ष की अवधि समाप्त होती है तो दुबारा से ये आत्मा शरीर धारण करती है ।

(21) प्रश्न :- मोक्ष की अवधि कब तक होती है ?

उत्तर :- मोक्ष का समय ३१ नील १० खरब ४० अरब वर्ष है, जब तक आत्मा मुक्त अवस्था में रहती है ।

(22) प्रश्न :- मोक्ष की अवस्था में स्थूल शरीर या सूक्ष्म शरीर आत्मा के साथ रहता है या नहीं ?

उत्तर :- नहीं मोक्ष की अवस्था में आत्मा पूरे ब्रह्माण्ड का चक्कर लगाता रहता है और ईश्वर के आनन्द में रहता है, बिलकुल ठीक वैसे ही जैसे कि मछली पूरे समुद्र में रहती है । और जीव को किसी भी शरीर की आवश्यक्ता ही नहीं होती।

(23) प्रश्न :- मोक्ष के बाद आत्मा को शरीर कैसे प्राप्त होता है ?

उत्तर :- सबसे पहला तो आत्मा को कल्प के आरम्भ ( सृष्टि आरम्भ ) में सूक्ष्म शरीर मिलता है फिर ईश्वरीय मार्ग और औषधियों की सहायता से प्रथम रूप में अमैथुनी जीव शरीर मिलता है, वो शरीर सर्वश्रेष्ठ मनुष्य या विद्वान का होता है जो कि मोक्ष रूपी पुण्य को भोगने के बाद आत्मा को मिला है । जैसे इस वाली सृष्टि के आरम्भ में चारों ऋषि विद्वान ( वायु , आदित्य, अग्नि , अंगिरा ) को मिला जिनको वेद के ज्ञान से ईश्वर ने अलंकारित किया । क्योंकि ये ही वो पुण्य आत्मायें थीं जो मोक्ष की अवधि पूरी करके आई थीं ।

(24) प्रश्न :- मोक्ष की अवधि पूरी करके आत्मा को मनुष्य शरीर ही मिलता है या जानवर का ?

उत्तर :- मनुष्य शरीर ही मिलता है ।

(25) प्रश्न :- क्यों केवल मनुष्य का ही शरीर क्यों मिलता है ? जानवर का क्यों नहीं ?

उत्तर :- क्योंकि मोक्ष को भोगने के बाद पुण्य कर्मों को तो भोग लिया , और इस मोक्ष की अवधि में पाप कोई किया ही नहीं तो फिर जानवर बनना सम्भव ही नहीं , तो रहा केवल मनुष्य जन्म जो कि कर्म शून्य आत्मा को मिल जाता है ।

(26) प्रश्न :- मोक्ष होने से पुनर्जन्म क्यों बन्द हो जाता है ?

उत्तर :- क्योंकि योगाभ्यास आदि साधनों से जितने भी पूर्व कर्म होते हैं ( अच्छे या बुरे ) वे सब कट जाते हैं । तो ये कर्म ही तो पुनर्जन्म का कारण हैं, कर्म ही न रहे तो पुनर्जन्म क्यों होगा ??

(27) प्रश्न :- पुनर्जन्म से छूटने का उपाय क्या है ?

उत्तर :- पुनर्जन्म से छूटने का उपाय है योग मार्ग से मुक्ति या मोक्ष का प्राप्त करना ।

(28) प्रश्न :- पुनर्जन्म में शरीर किस आधार पर मिलता है ?

उत्तर :- जिस प्रकार के कर्म आपने एक जन्म में किए हैं उन कर्मों के आधार पर ही आपको पुनर्जन्म में शरीर मिलेगा ।

(29) प्रश्न :- कर्म कितने प्रकार के होते हैं ?

उत्तर :- मुख्य रूप से कर्मों को तीन भागों में बाँटा गया है :- सात्विक कर्म , राजसिक कर्म , तामसिक कर्म ।

(१) सात्विक कर्म :- सत्यभाषण, विद्याध्ययन, परोपकार, दान, दया, सेवा आदि ।

(२) राजसिक कर्म :- मिथ्याभाषण, क्रीडा, स्वाद लोलुपता, स्त्रीआकर्षण, चलचित्र आदि ।

(३) तामसिक कर्म :- चोरी, जारी, जूआ, ठग्गी, लूट मार, अधिकार हनन आदि ।

और जो कर्म इन तीनों से बाहर हैं वे दिव्य कर्म कलाते हैं, जो कि ऋषियों और योगियों द्वारा किए जाते हैं । इसी कारण उनको हम तीनों गुणों से परे मानते हैं । जो कि ईश्वर के निकट होते हैं और दिव्य कर्म ही करते हैं ।

(30) प्रश्न :- किस प्रकार के कर्म करने से मनुष्य योनि प्राप्त होती है ?

उत्तर :- सात्विक और राजसिक कर्मों के मिलेजुले प्रभाव से मानव देह मिलती है , यदि सात्विक कर्म बहुत कम है और राजसिक अधिक तो मानव शरीर तो प्राप्त होगा परन्तु किसी नीच कुल में , यदि सात्विक गुणों का अनुपात बढ़ता जाएगा तो मानव कुल उच्च ही होता जायेगा । जिसने अत्यधिक सात्विक कर्म किए होंगे वो विद्वान मनुष्य के घर ही जन्म लेगा ।

(31) प्रश्न :- किस प्रकार के कर्म करने से आत्मा जीव जन्तुओं के शरीर को प्राप्त होता है ?

उत्तर :- तामसिक और राजसिक कर्मों के फलरूप जानवर शरीर आत्मा को मिलता है । जितना तामसिक कर्म अधिक किए होंगे उतनी ही नीच योनि उस आत्मा को प्राप्त होती चली जाती है । जैसे लड़ाई स्वभाव वाले , माँस खाने वाले को कुत्ता, गीदड़, सिंह, सियार आदि का शरीर मिल सकता है , और घोर तामसिक कर्म किए हुए को साँप, नेवला, बिच्छू, कीड़ा, काकरोच, छिपकली आदि । तो ऐसे ही कर्मों से नीच शरीर मिलते हैं और ये जानवरों के शरीर आत्मा की भोग योनियाँ हैं ।

(32) प्रश्न :- तो क्या हमें यह पता लग सकता है कि हम पिछले जन्म में क्या थे ? या आगे क्या होंगे ?

उत्तर :- नहीं कभी नहीं, सामान्य मनुष्य को यह पता नहीं लग सकता । क्योंकि यह केवल ईश्वर का ही अधिकार है कि हमें हमारे कर्मों के आधार पर शरीर दे । वही सब जानता है ।

(33) प्रश्न :- तो फिर यह किसको पता चल सकता है ?

उत्तर :- केवल एक सिद्ध योगी ही यह जान सकता है , योगाभ्यास से उसकी बुद्धि । अत्यन्त तीव्र हो चुकी होती है कि वह ब्रह्माण्ड एवं प्रकृति के महत्वपूर्ण रहस्य़ अपनी योगज शक्ति से जान सकता है । उस योगी को बाह्य इन्द्रियों से ज्ञान प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं रहती है
वह अन्तः मन और बुद्धि से सब जान लेता है । उसके सामने भूत और भविष्य दोनों सामने आ खड़े होते हैं ।

(34) प्रश्न :- यह बतायें की योगी यह सब कैसे जान लेता है ?

उत्तर :- अभी यह लेख पुनर्जन्म पर है, यहीं से प्रश्न उत्तर का ये क्रम चला देंगे तो लेख का बहुत ही विस्तार हो जायेगा । इसीलिये हम अगले लेख में यह विषय विस्तार से समझायेंगे कि योगी कैसे अपनी विकसित शक्तियों से सब कुछ जान लेता है ? और वे शक्तियाँ कौन सी हैं ? कैसे प्राप्त होती हैं ? इसके लिए अगले लेख की प्रतीक्षा करें...

(35) प्रश्न :- क्या पुनर्जन्म के कोई प्रमाण हैं ?

उत्तर :- हाँ हैं, जब किसी छोटे बच्चे को देखो तो वह अपनी माता के स्तन से सीधा ही दूध पीने लगता है जो कि उसको बिना सिखाए आ जाता है क्योंकि ये उसका अनुभव पिछले जन्म में दूध पीने का रहा है, वर्ना बिना किसी कारण के ऐसा हो नहीं सकता । दूसरा यह कि कभी आप उसको कमरे में अकेला लेटा दो तो वो कभी कभी हँसता भी है , ये सब पुराने शरीर की बातों को याद करके वो हँसता है पर जैसे जैसे वो बड़ा होने लगता है तो धीरे धीरे सब भूल जाता है...!

(36) प्रश्न :- क्या इस पुनर्जन्म को सिद्ध करने के लिए कोई उदाहरण हैं...?

उत्तर :- हाँ, जैसे अनेकों समाचार पत्रों में, या TV में भी आप सुनते हैं कि एक छोटा सा बालक अपने पिछले जन्म की घटनाओं को याद रखे हुए है, और सारी बातें बताता है जहाँ जिस गाँव में वो पैदा हुआ, जहाँ उसका घर था, जहाँ पर वो मरा था । और इस जन्म में वह अपने उस गाँव में कभी गया तक नहीं था लेकिन फिर भी अपने उस गाँव की सारी बातें याद रखे हुए है , किसी ने उसको कुछ बताया नहीं, सिखाया नहीं, दूर दूर तक उसका उस गाँव से इस जन्म में कोई नाता नहीं है । फिर भी उसकी गुप्त बुद्धि जो कि सूक्ष्म शरीर का भाग है वह घटनाएँ संजोए हुए है जाग्रत हो गई और बालक पुराने जन्म की बातें बताने लग पड़ा...!

(37) प्रश्न :- लेकिन ये सब मनघड़ंत बातें हैं, हम विज्ञान के युग में इसको नहीं मान सकते क्योंकि वैज्ञानिक रूप से ये बातें बेकार सिद्ध होती हैं, क्या कोई तार्किक और वैज्ञानिक आधार है इन बातों को सिद्ध करने का ?

उत्तर :- आपको किसने कहा कि हम विज्ञान के विरुद्ध इस पुनर्जन्म के सिद्धान्त का दावा करेंगे । ये वैज्ञानिक रूप से सत्य है , और आपको ये हम अभी सिद्ध करके दिखाते हैं..!

(38) प्रश्न :- तो सिद्ध कीजीए ?

उत्तर :- जैसा कि आपको पहले बताया गया है कि मृत्यु केवल स्थूल शरीर की होती है, पर सूक्ष्म शरीर आत्मा के साथ वैसे ही आगे चलता है , तो हर जन्म के कर्मों के संस्कार उस बुद्धि में समाहित होते रहते हैं । और कभी किसी जन्म में वो कर्म अपनी वैसी ही परिस्थिती पाने के बाद जाग्रत हो जाते हैं.  इसे उदहारण से समझें :- एक बार एक छोटा सा ६ वर्ष का बालक था, यह घटना हरियाणा के सिरसा के एक गाँव की है । जिसमें उसके माता पिता उसे एक स्कूल में घुमाने लेकर गये जिसमें उसका दाखिला करवाना था और वो बच्चा केवल हरियाणवी या हिन्दी भाषा ही जानता था कोई तीसरी भाषा वो समझ तक नहीं सकता था. लेकिन हुआ कुछ यूँ था कि उसे स्कूल की Chemistry Lab में ले जाया गया और वहाँ जाते ही उस बच्चे का मूँह लाल हो गया !! चेहरे के हावभाव बदल गये !! और उसने एकदम फर्राटेदार French भाषा बोलनी शुरू कर दी !! उसके माता पिता बहुत डर गये और घबरा गये , तुरंत ही बच्चे को अस्पताल ले जाया गया । जहाँ पर उसकी बातें सुनकर डाकटर ने एक दुभाषिये का प्रबन्ध किया.  जो कि French और हिन्दी जानता था , तो उस दुभाषिए ने सारा वृतान्त उस बालक से पूछा तो उस बालक ने बताया कि " मेरा नाम Simon Glaskey है और मैं French Chemist हूँ । मेरी मौत मेरी प्रयोगशाला में एक हादसे के कारण ( Lab. ) में हुई थी । "

तो यहाँ देखने की बात यह है कि इस जन्म में उसे पुरानी घटना के अनुकूल मिलती जुलती परिस्थिति से अपना वह सब याद आया जो कि उसकी गुप्त बुद्धि में दबा हुआ था । यानि की वही पुराने जन्म में उसके साथ जो प्रयोगशाला में हुआ, वैसी ही प्रयोगशाला उस दूसरे जन्म में देखने पर उसे सब याद आया । तो ऐसे ही बहुत सी उदहारणों से आप पुनर्जन्म को वैज्ञानिक रूप से सिद्ध कर सकते हो...!

(39) प्रश्न :- तो ये घटनाएँ भारत में ही क्यों होती हैं ? पूरा विश्व इसको मान्यता क्यों नहीं देता ?

उत्तर :- ये घटनायें पूरे विश्व भर में होती रहती हैं और विश्व इसको मान्यता इसलिए नहीं देता क्योंकि उनको वेदानुसार यौगिक दृष्टि से शरीर का कुछ भी ज्ञान नहीं है । वे केवल माँस और हड्डियों के समूह को ही शरीर समझते हैं , और उनके लिए आत्मा नाम की कोई वस्तु नहीं है । तो ऐसे में उनको न जीवन का ज्ञान है, न मृत्यु का ज्ञान है, न आत्मा का ज्ञान है, न कर्मों का ज्ञान है, न ईश्वरीय व्यवस्था का ज्ञान है । और अगर कोई पुनर्जन्म की कोई घटना उनके सामने आती भी है तो वो इसे मानसिक रोग जानकर उसको Multiple Personality Syndrome का नाम देकर अपना पीछा छुड़ा लेते हैं और उसके कथनानुसार जाँच नहीं करवाते हैं...!

(40) प्रश्न :- क्या पुनर्जन्म केवल पृथिवी पर ही होता है या किसी और ग्रह पर भी ?

उत्तर :- ये पुनर्जन्म पूरे ब्रह्माण्ड में यत्र तत्र होता है, कितने असंख्य सौरमण्डल हैं, कितनी ही पृथीवियाँ हैं । तो एक पृथीवी के जीव मरकर ब्रह्माण्ड में किसी दूसरी पृथीवी के उपर किसी न किसी शरीर में भी जन्म ले सकते हैं । ये ईश्वरीय व्यवस्था के अधीन है...परन्तु यह बड़ा ही अजीब लगता है कि मान लो कोई हाथी मरकर मच्छर बनता है तो इतने बड़े हाथी की आत्मा मच्छर के शरीर में कैसे घुसेगी..? यही तो भ्रम है आपका कि आत्मा जो है वो पूरे शरीर में नहीं फैली होती । वो तो हृदय के पास छोटे अणुरूप में होती है । सब जीवों की आत्मा एक सी है । चाहे वो व्हेल मछली हो, चाहे वो एक चींटी हो। 

(साभार :- व्हाट्स एप्प... लेखक : अज्ञात) 

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यह सन् 1980 की बात है। तब #डॉ_कर्ण_सिंह श्रीमती इंदिरा गाँधी के कैबिनेट मंत्री थे। उन्होंने अपने मित्र #रोमेश_थापर से एक दिन शिकायत की कि उनकी बहन #रोमिला_थापर “अपने इतिहासलेखन से भारत को नष्ट कर रही हैं”। इस पर उन की रोमेश से तीखी तकरार हो गई। यह प्रत्यक्षदर्शी वर्णन स्वयं रोमिला की भाभी और अत्यंत विदुषी समाजसेवी एवं प्रसिद्ध अंग्रेजी विचार पत्रिका #सेमिनार की संस्थापक, संपादक #राज_थापर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है (राज थापर, ऑल दीज इयर्स, पृ. 462-63)। ध्यान दें कि यह लिखते हुए राज ने रोमिला का बचाव नहीं किया। उलटे कर्ण सिंह से इस झड़प में अपने पति रोमेश को ही कमजोर पाया जो “केवल भाई” के रूप में उलझ पड़े थे। संकेत यही मिलता है कि कर्ण सिंह की बात राज को अनुचित नहीं लगी थी।

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बुधवार, 03 अक्टूबर 2018 19:13

थैंक्यू मिस्टर नथूराम गोडसे...

नाथूराम गोडसे के नाम और उनके एक काम के अतिरिक्त लोग उन के बारे में कुछ नहीं जानते। एक लोकतांत्रिक देश में यह कुछ रहस्यमय बात है। रहस्य का आरंभ 8 नवंबर 1948 को ही हो गया था, जब गाँधीजी की हत्या के लिए चले मुकदमे में गोडसे द्वारा दिए गए बयान को प्रकाशित करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। गोडसे का बयान लोग जानें, इस पर प्रतिबंध क्यों लगा?

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अभी कुछ दिन पहले मेरा रांची जाना हुआ था. रांची में 4 दिन तक रुका. देश भर से आये हुए विभिन्न मूर्धन्य विद्वानों/चिन्तकों से मिलना हुआ. कुछ सही में विद्वान थे/है (उनको सुनने से अच्छा लगा लगा कि हाँ, इनको देश-काल-स्थिति का भान है और वे चिंतित भी हैं व देश में आये हुए बड़े संकट से भारत देश के निवासियों को आगाह कर रहे हैं… विशेष रूप से धिम्मियों को आगाह कर रहे हैं). कुछ स्वघोषित स्वयंभू विद्वान भी थे…. तो कुछ “भगवा-मुल्ले” भी थे...

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भारत को त्योहारों का देश कहा जाता है। सप्ताह में सात दिन होते हैं तो नौ त्योहार होते हैं। सभी त्योहारों को हम सामान्य तौर पर चार विभागों में बाँट सकते हैं। कुछ त्योहार राष्ट्रीय प्रकृति के होते हैं, कुछ सामाजिक प्रकृति के, कुछ पारिवारिक और कुछ व्यक्तिगत प्रकार के त्योहार होते हैं। इन भेदों के आधार पर ही उन्हें पर्व, उत्सव, सम्मेलन और समारोह कहा जाता है। राष्ट्रीय त्योहार पर्व कहे जाते हैं, सामाजिक त्योहार उत्सव कहे जाते हैं, पारिवारिक त्योहार सम्मेलन होते हैं और व्यक्तिगत त्योहार समारोह कहे जाते हैं। राष्ट्रीय त्योहार यानी कि पर्व भी चार प्रकार के हैं – आत्ममूलक, शक्तिमूलक, अन्नमूलक और देहमूलक। आत्ममूलक पर्व श्रावणी पर्व है जिसे सामान्य जगत में रक्षा बंधन के नाम से जाना जाता है। इस दिन श्रावणी उपाकर्म किया जाता है। इसी दिन बालक विद्यालय या गुरुकुल में प्रवेश पाता था। शारदीय नवरात्र शक्तिमूलक पर्व है। इसमें अस्त्र-शस्त्र की पूजा होती है। दीपावली अन्नमूलक पर्व है। इसमें धन-धान्य देने वाली लक्ष्मी की पूजा की जाती है। होली या रंगोत्सव देहमूलक पर्व है। इसमें शरीर के स्वास्थ्य के लिए रंगोपचार करते हैं। ये चार ही राष्ट्रीय पर्व हैं। आज मनाए जाने वाले स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस आदि राष्ट्रीय कहे जाने वाले पर्व वास्तव में राजनैतिक त्योहार हैं। भारतीय संस्कृति और धार्मिक आधार पर रक्षा बंधन, शारदीय नवरात्र, दीपावली और होली ही राष्ट्रीय पर्व हैं।

पर्वों की श्रृंखला में पहला आत्ममूलक पर्व श्रावणी उपाकर्म है। चूँकि इस समय विद्यार्थी गुरुकुल जाता है तो उसको इस समय यज्ञोपवीत धारण कराया जाता है। यज्ञोपवीत के लिए पारस्कर गृह्यसूत्र के दूसरे कांड के दूसरे अध्याय का 11वां मंत्र है – यज्ञोवीतम् परमंपवित्रम्, प्रजापतेर्यत् सहजं पुरस्तात्। आयुष्यमग्रम् प्रतिमुञ्चशुभ्रम्, यज्ञोपवीतम् बलमस्तुतेज:।। इसका तात्पर्य है कि यज्ञोपवीत शुभ्र यानी सफेद होना चाहिए, पीला या केसरिया रंग का नहीं। साथ ही कहा गया है कि यज्ञोपवीत साधारण पवित्र नहीं, बल्कि परमपवित्र है। प्रजापति ने भी इसे धारण किया था और उस समय से ही इसे धारण करने की प्रथा चल रही है। प्रजापति ब्रह्मा तो किसी रूप-आकार में है नहीं, तो उसने इसे कैसे धारण किया था?

हम जानते हैं कि यत् पिंडे तत् ब्रह्मांडे यानी जो पिंड में है, वही ब्रह्मांड में भी है। ब्रह्मांड में प्रजापति ने संवत्सर यानी वर्ष को धारण किया है। इसलिए उसे संवत्सर प्रजापति कहा गया है। सूर्य इसका मस्तक है, अंतरिक्ष उसका हृदय है और भूमि उसकी कटि या पाद स्थान है। हालांकि सूर्य स्थिर है, परंतु पृथिवी की परिक्रमा के कारण सूर्य की तीन गतियां हैं। एक तो वह उत्तरायण होता है, फिर वर्ष में दो बार वह समभाव में रहता है यानी दिन-रात बराबर होते हैं और तीसरी गति में सूर्य दक्षिणायन होता है। यह सारी गति 48 अंश कोण में ही होती है। सूर्य के विषुव रेखा से 24 अंश ऊपर और 24 अंश नीचे ही यह सारी गति होती है। सूर्य जब एकदम उत्तर में होता है और वहाँ से नीचे आता है तो वह दक्षिणायन गति होती है और जब मकर राशि से उत्तर की ओर गति करने पर उसे उत्तरायण कहते हैं जिसे मकर संक्रांति त्योहार के नाम से मनाया भी जाता है।

संवत्सर को यज्ञस्वरूप कहा गया है। यह पवित्र है। इससे ही दिन और रात होते हैं। यज्ञस्वरूप होने के कारण इसमें अग्नि और सोम दोनों होंगे। यहाँ सूर्य अग्नि है और चंद्रमा सोम है। संवत्सर यज्ञ में इन दोनों का संयोग होता है। पृथिवी द्वारा सूर्य के परिक्रमा के पथ को क्रांति वृत्त कहा जाता है। उसमें 12 महीने और 12 राशियां होती हैं। हरेक महीने में सूर्य दूसरी राशि में जाता दिखता है। इसे ही क्रांति कहते हैं। हरेक महीना तीस अंश का होता है। चंद्रमा पृथिवी की परिक्रमा करता है और उसका परिक्रमा पथ 27 नक्षत्रों में बांटा गया है। इसे दक्षवृत्त कहा जाता है। इसलिए इन नक्षत्रों को दक्ष की कन्याएं कहा जाता है। संवत्सर प्रजापति अयण, ऋतु, माह, वार और तिथियों के क्रम से ग्रह, नक्षत्र, राशि आदि को समेटते हुए एक सूत्र को धारण करता है। यही प्रजापति का यज्ञोपवीत है। हमारा यज्ञोपवीत भी प्रतीक रूप में इन सभी को धारण करता है।

संवत्सर प्रजाप्रति में सूर्य मस्तक है, अंतरिक्ष हृदय है और पृथिवी कटिस्थान है। मनुष्य यज्ञोपवीत धारण करता है तो वह भी स्कंध पर से हृदय से होते हुए कटि स्थान पर रहता है। स्कंध शीर्ष है और साथ ही भार वहन करने का आधार भी है। हृदय संकल्प और श्रद्धा का स्थान है। कटि कटिबद्धता का प्रतीक है और गांठ प्रतिज्ञा का सूचक है। संकल्प, श्रद्धा, कटिबद्धता और प्रतिज्ञा के साथ समाज का भार वहन करने को ही यज्ञोपवीत परिभाषित करता है।

दक्षवृत्त में उत्तर, मध्यम और दक्षिण रूपी तीन विभाग होते हैं। इन्हें ही मार्ग कहा गया है। दक्षिण मार्ग सबसे छोटा है, इसलिए यह चार अंशों का होता है, मध्यम मार्ग आठ अंश का और उत्तर मार्ग 12 अंश का होता है। हर मार्ग में तीन-तीन गलियां हैं जिन्हें वीथी कहा जाता है।। प्रत्येक वीथी में तीन-तीन नक्षत्र हैं। उत्तर मार्ग में पहली वीथी का नाम है नाग वीथी और इसमें तीन नक्षत्र हैं – अश्विनी, भरणी और कृतिका। दूसरी वीथी का नाम है गज और इसमें तीन नक्षत्र हैं – रोहिणी, मार्गशिर्ष और आद्रा। तीसरी ऐरावत वीथी है और इसमें तीन नक्षत्र हैं – पुनर्वसु, पुष्य और अश्लेषा। मध्य मार्ग के तीन वीथी हैं। पहली है आर्ष वीथी और इसमें नक्षत्र हैं – मघा, पूर्व फाल्गुनी और उत्तर फाल्गुनी। दूसरी गोवीथी में तीन नक्षत्र हैं – हस्त, चित्रा और स्वाति। तीसरी जरद् गव वीथी में तीन नक्षत्र हैं – विशाखा, अनुराधा और ज्येष्ठा। दक्षिण मार्ग की पहली वीथी को अज कहते हैं और इसमें तीन नक्षत्र हैं – मूल, पूर्व आषाढ़, उत्तर आषाढ़। दूसरी मृग वीथी में तीन नक्षत्र हैं – श्रवण, धनिष्ठा और शतविशा। तीसरी वैश्य-वानर वीथी में तीन नक्षत्र हैं – पूर्व भाद्रपद, उत्तर भाद्रपद और रेवती।

दक्षवृत्त भले ही अलग-अलग वीथियों में बंटा हो, पर मूलत: एक ही रेखा है। इसी प्रकार मनुष्य द्वारा पहने जाना वाला यज्ञसूत्र भी एक ही सूत्र होगा। फिर जिस प्रकार संवत्सर सूत्र में तीन मार्ग हैं, ठीक उसी प्रकार यज्ञसूत्र को भी तीन गुणा कर किया जाता है। तीन मार्गों में नौ वीथियां हैं। इसलिए सूत्र को भी तीन गुना कर दिया जाता है जिससे इसमें नौ धागे हो जाते हैं। नौ वीथियों में 27 नक्षत्र होते हैं, इसी प्रकार तीन बार त्रिगुणित किए गए नौ धागे वाले एक सूत्र के तीन लपेटे लिए जाने से इसमें 27 धागे हो जाते हैं और यह 27 नक्षत्रों का प्रतीक बन जाता है। इस प्रकार यह यज्ञसूत्र संवत्सर प्रजापति का प्रतीक बन जाता है। यहाँ हमे यह ध्यान रखना चाहिए कि यज्ञसूत्र हमेशा तीन सूत्रों का ही होना चाहिए। आज बहुधा लोग छह सूत्रों का पहन लेते हैं, यह गलत है। वे वस्तुत: स्त्रियों के बदले में भीयज्ञसूत्र धारण कर लेते हैं जोकि सरासर गलत है।

यज्ञसूत्र का एक सूत्र 96 अंगुल का होता है। इसका माप यही है कि 96 अंगुल का सूत कातकर उसका त्रिगुणीकरण किया जाए। कहा गया है – तिथिवारश्च नक्षत्रम्, तत्वंवृत्तभाग मार्गत्रयम्। कालत्रयं च मासश्च, ब्रह्मसूत्र हि षडषडनव। तिथियां 15 होती हैं, वार सात हैं, 28 नक्षत्र (27 नक्षत्र + एक अपराजिता नक्षत्र), तत्व 24 हैं, वृत्तभाग चार होते हैं (360 अंश के 90-90 अंश के चार भाग)। एक भाग पर चित्रा नक्षत्र, दूसरे पर रेवती, तीसरे पर श्रवण और चौथे पर पुनर्वसु नक्षत्र होता है। इसे ही एक वेदमंत्र में कहा गया है – स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा: स्वस्ति न: पूषा विश्ववेदा:। स्वस्ति नस्ताक्ष्र्यो अरिष्टनेमि: स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥ पूरब दिशा में वृद्धश्रवा चित्रा नक्षत्र है, पश्चिम दिशा में रेवती, उत्तर में श्रवण और दक्षिण दिशा में पुनर्वसु है। पुनर्वसु वृहस्पति का नक्षत्र है। चार वृत्तभाग के बाद मार्गत्रय यानी तीन मार्ग, तीन काल, 12 महीने हैं। इन सभी अंकों को जोडऩे से 96 भाव हो जाता है। यही 96 भाव के 96 अंगुल का एक सूत्र है

इस प्रकार यज्ञोपवीत संवत्सर का प्रतीक है। जब आप सूर्य के सम्मुख होते हैं तो बायां हिस्सा उत्तर और दायां दक्षिण दिशा होता है। जिस समय सूर्य उत्तरायण होंगे, उस समय संवस्तर प्रजापति के बाएं भाग में होगा। इसी प्रकार यज्ञोपवीत का शीर्ष स्थान मनुष्य के बाएं कंधे पर होगा और दाहिने कटि पर उसकी ग्रंथि होगी। जब सूर्य दक्षिणायण होगा, तब यज्ञोपवीत दाहिने कंधे पर रहेगा और उसकी ग्रंथि बाएं कटि पर होगी। उत्तरायण को हमने देवकाल और दक्षिणायण को पितरकाल माना है। पितरकाल में यज्ञोपवीत हमेशा दाहिने कंधे पर होता है और देवकाल में बाएं कंधे पर होता है। जब वह बाएं कंधे पर होगा और दाहिने कटि पर उसकी ग्रंथि होगी, तब उसे हम उपवीत कहते हैं। अभी यज्ञ को छोड़ दें। यह वास्तव में उपवीत है। उप यानी समीप और वीत यानी प्राप्त होना। जब यह दाहिने कंधे पर होगा तो उसे प्राचीनावीत कहते हैं। पितर तो प्राचीन होते हैं, इसलिए प्राचीनावीत। जब सूर्य समभाव में होगा तो उस समय खेती के सभी श्रमिक कार्य कर लेते हैं। जब हम मनुष्य कर्म करते हैं, तब न उत्तरायण होता है न दक्षिणायण। उस समय सूर्य मध्य भाग में विषुव पर होता है। इसलिए उस समय यज्ञोपवीत न तो दाएं कंधे पर होगा और न ही बाएं कंधे पर, बल्कि वह माला की भांति गले में धारण किया जाएगा। जिस समय हम मानुषी परिश्रम का कार्य करते हैं, तो उस समय यज्ञोपवीत माला की भांति गले में पहना जाएगा। उसे नीवीतम् कहा जाता है।

तैत्तिरीय ब्राह्मण के दूसरे कांड के पाँचवे अध्याय के ग्यारहवें प्रपाठक का पहला (2/5/11/1) मंत्र है नीवीतम् मनुष्याणां, प्राचीनावीतंपितृणां, उपवीतं देवानां। प्रजापति के संवत्सर सूत्र के अनुसार ही मनुष्य भी इस यज्ञसूत्र को धारण करता है। इसलिए प्राकृतिक भाव में जो गति है, ठीक उसी प्रकार यज्ञोपवीत का भी हम स्थान परिवर्तित करते हैं। आज लोग इस विज्ञान को नहीं जानने के कारण केवल बाएं कंधे पर वर्ष भर धारण किए रहते हैं। उन्हें पता ही नहीं है कि इसके तीन नाम हैं – उपवीत, प्राचीनावीत और नीवीत। ये तीनों यज्ञ के लिए ही हैं। यज्ञ का काफी व्यापक अर्थ है। मानुषी श्रम भी एक यज्ञ है, पितरों यानी पूर्वजों के लिए चिंतन तथा कर्म करना भी एक यज्ञ है और प्राकृतिक शक्ति के लिए किया जाने वाला कर्म भी यज्ञ है। इन सभी यज्ञों में इसे धारण किया जाता है और उसे तीनों अवसरों पर तीन अलग प्रकार से पहना जाता है और उसके तीन नाम भी हैं। यह वास्तव में यज्ञसूत्र है। अज्ञानतावश इसे यज्ञोपवीत कह दिया जाता है, परंतु यह यज्ञसूत्र है और इसके तीन नाम हैं। नामों के अनुसार इसे तीन प्रकार से पहना जाता है। यही इसका वैज्ञानिक आधार है।

देश में जब जातिभेद इतना प्रबल नहीं था, तो इसे सभी वर्गों के लोग धारण किया करते थे। हमें स्मरण होगा कि आज से 40-50 वर्ष पहले तक खेतों में काम करने वाले मजदूर आदि भी गले में सूत्र धारण किया करते थे। चूँकि वे शारीरिक श्रम कर रहे होते थे, इसलिए उनका गले में धारण करना उचित था। शारीरिक श्रम करते समय गले से कमर तक लटका सूत्र बाधा बनता है। इसलिए उसे उस समय गले में ही पहनना होता है। इसी प्रकार वैदिक काल में स्त्रियां भी इसे धारण करती थीं। वास्तव में यज्ञसूत्र तो मनुष्य मात्र के लिए है। जबसे हमारे यहाँ आक्रांताओं का आगमन हुआ, तबसे हमारा परंपरागत ज्ञान छिन्न-भिन्न हो गया। तब से ही ये परंपराएं संकुचित होने लगीं।

चूँकि यह यज्ञसूत्र पूरे संवत्सर का प्रतीक है इसलिए यह ज्ञान से जुड़ा और गुरुकुलों में प्रवेश के समय इसे पहनना आवश्यक बना दिया गया। संवत्सर पुरुष प्रजापति की ही भांति मनुष्य भी सामाजिक दायित्वों का वहन करे, यही इस यज्ञसूत्र की शिक्षा है। इसलिए ही ब्रह्मचारियों को यह सूत्र धारण करवाया जाता था और उसे इसको धारण करने के तरीके की भी शिक्षा दी जाती थी। इस शिक्षा से वह ब्रह्मांड का पूरा विज्ञान जान-समझ जाता था। यही इस यज्ञसूत्र का शैक्षणिक महत्व है।

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(यह पोस्ट सूत्रों के आधार पर मिले इनपुट पर आधारित है, शेयर मार्केट के विशेषज्ञ भिन्न-भिन्न राय रखने के लिए स्वतन्त्र हैं)

IL&FS ( INFRASTRUCTURE LEASING AND FINANCIAL SERVICES) का नाम बहुत लोगों ने नहीं सुना होगा। यह एक सरकारी क्षेत्र की कंपनी है जिसकी 40 सहायक कंपनियां हैं। इसे नॉन बैंकिंग फाइनेंस कंपनी की श्रेणी में रखा जाता है। जो बैंकों से लोन लेती हैं। जिसमें कंपनियां निवेश करती हैं और आम जनता जिसके शेयर ख़रीदती हैं। इस कंपनी को कई रेटिंग एजेंसियों से अति सुरक्षित दर्जा हासिल है। AA PLUS की रेटिंग हासिल है। इस कंपनी बैंको से लोन लेती है। लोन के लिए संपत्ति गिरवी नहीं रखती है। काग़ज़ पर गारंटी दी जाती है कि लोन चुका देंगे। चूंकि इसके पीछे भारत सरकार होती है इसलिए इसकी गारंटी पर बाज़ार को भरोसा होता है। मगर एक हफ्ते के भीतर इसकी रेटिंग को AA PLUS से घटाकर कूड़ा करकट कर दिया गया है। अंग्रेज़ी में इसे जंक स्टेटस कहते हैं। अब यह कंपनी जंक यानी कबाड़ हो चुकी है। जो कंपनी 90,000 करोड़ लोन डिफाल्ट करने जा रही हो वो कबाड़ नहीं होगी तो क्या होगी।

ज़ाहिर है इसमें जिनका पैसा लगा है वो भी कबाड़ हो जाएंगे। प्रोविडेंड फंड और पेंशन फंड का पैसा लगा है। यह आम लोगों की मेहनत की कमाई का पैसा है। डूब गया तो सब डूबेंगे। इसमें म्युचुअल फंड कंपनियां भी निवेश करती हैं। काग़ज़ पर लिखे वचननामे पर बैंकों ने IL&FS और उसकी सहायक कंपनियों को लोन दिए हैं। अब वो काग़ज़ रद्दी का टुकड़ा भर है। इस 27 अगस्त से जब यह ग़ैर बैंकिंग वित्तीय कंपनी तय समय पर लोन नहीं चुका पाई, डेडलाइन मिस करने लगी तब शेयर मार्केट को सांप सूंघ गया। 15 सितंबर से 24 सितंबर के बीच सेंसेक्स 1785 अंक गिर गया। नॉन बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के शेयर धड़ाम बड़ाम गिरने लगे।

स्माल इंडस्ट्री डेवलपमेंट बैंक आफ इंडिया (SIDBI) ने IL&FS और उसकी सहायक कंपनियों करीब 1000 करोड़ का कर्ज़ दिया है। 450 करोड़ तो सिर्फ IL&FS को दिया है। बाकी 500 करोड़ उसकी दूसरी सहायक कंपनियो को लोन दिया है। सिडबी ने इन्साल्वेंसी कोर्ट में अर्ज़ी लगाई है ताकि इसकी संपत्तियां बेचकर उसका लोन जल्दी चुकता हो। एक डूबती कंपनी के पास कोई अपना पैसा नहीं छोड़ सकता वर्ना सिडबी भी डूबेगी। दूसरी तरफ IL&FS और उसकी 40 सहायक कंपनियों ने पंचाट की शरण ली है। इस अर्ज़ी के साथ उसे अपने कर्जे के हिसाब किताब को फिर से संयोजित करने का मौका दिया जाए। इसका मतलब यह हुआ कि जब तक इसका फैसला नहीं आएगा, यह कंपनी अपना लोन नहीं चुकाएगी। तब तक सबकी सांसें अटकी रहेंगी।

अब सरकार ने इस स्थिति से बचाने के लिए भारतीय जीवन बीमा को बुलाया है। IL&FS में सरकार की हिस्सेदारी 40.25 प्रतिशत है। भारतीय जीवन बीमा की हिस्सेदारी 25.34 प्रतिशत है। बाकी भारतीय स्टेट बैंक, सेंट्रल बैंक और यूटीआई की भी हिस्सेदारी है। हाल के दिनों में जब आई डी बी आई पर नान परफार्मिंग एसेट NPA का बोझ बढ़ा तो भारतीय जीवन बीमा को बुलाया गया। भारतीय जीवन बीमा निगम के भरोसे कितनी डूबते जहाज़ों को बचाएंगे, किसी दिन अब भारतीय जीवन बीमा के डगमगाने की ख़बर न आ जाए। भारतीय जीवन बीमा निगम के चेयरमैन ने कहा है कि IL&FS को नहीं डूबने देंगे।

IL&FS ग़ैर बैंकिंग वित्तीय सेक्टर की सबसे बड़ी कंपनी है। इस सेक्टर पर बैंकों का लोन 496,400 करोड़ है। अगर यह सेक्टर डूबा तो बैंकों के इतने पैसे धड़ाम से डूब जाएंगे। मार्च 2017 तक लोन 3,91,000 करोड़ था। जब एक साल में लोन 27 प्रतिशत बढ़ा तो भारतीय रिज़र्व बैंक ने रोक लगाई। सवाल है कि भारतीय रिज़र्व बैंक इतने दिनों से क्या कर रहा था। जबकि भारतीय रिज़र्व बैंक ही इन वित्तीय कंपनियों की निगरानी करता है। म्यूचुअल फंड का 2 लाख 65 हज़ार करोड़ लगा है। हमारे आपके पेंशन और प्रोविडेंड फंड का पैसा भी इसमें लगा है। इतना भारी भरकम कर्ज़दार डूबेगा तो क़र्ज़ देने वाले, निवेश करने वाले सब के सब डूबेंगे।

IL&FS का ज़्यादा पैसा सरकार के इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट में लगा है। इसके डूबने से तमाम प्रोजेक्ट अधर में लटक जाएंगे। हुआ यह है कि टोल टैक्स की वसूली का अनुमान ज़्यादा लगाया गया मगर उनकी वसूली उतनी नहीं हो पा रही है। इससे प्रोजेक्ट में पैसा लगाने वाली कंपनियां अपना लोन वापस नहीं कर पा रही हैं। इन्हें लोन देने वाली IL&FS भी अपना लोन वापस नहीं कर पा रही है। हमने इस लेख के लिए बिजनेस स्टैनडर्ड और इंडियन एक्सप्रेस की मदद ली है।

मुझे नहीं पता कि आपके हिन्दी अख़बारों में इस कंपनी के बारे में विस्तार से रिपोर्टिंग है या नहीं। पहले पन्ने पर इसे जगह मिली है या नहीं। दुनिया के किसी भी देश में सरकार की कोई कंपनी संकट में आ जाए और उसमें जनता का पैसा लगा हो तो हंगामा मच जाता है। भारत में ऐसी ख़बरों को दबा कर रखा जा रहा है। तभी बार बार कह रहा हूं कि हिन्दी के अख़बार हिन्दी के पाठकों की हत्या कर रहे हैं। सूचना देने के नाम पर इस तरह से सूचना देते हैं कि काम भर हो जाए। बस सरकार नाराज़ न हो जाए। लेकिन आम मेहनतकशन लोगों के प्रोविडेंड फंड और पेंशन फंड का पैसा डूबने वाला हो, उसे लेकर चिन्ता हो तो क्या ऐसी ख़बरों को पहले पन्ने पर मोटे मोटे अक्षरों में नहीं छापना चाहिए था?

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टेलीकॉम इन्जीनियर पिता और प्राथमिक शिक्षिका माता की एक संतान जो अपने मध्यमवर्गीय परिवेश में पला-बढ़ा. इसे बचपन से संगीत और गाने का शौक रहा लेकिन क्रिकेट भी उतना ही प्रिय था. एक बार एमसीसी (MCC Cricket) की टीम उसके स्कूल के विरुद्ध खेलने आई, तो उन्हें एक खिलाड़ी कम पड़ रहा था. 14 वर्ष के इस लड़के ने अपने स्कूल की टीम के खिलाफ एमसीसी की टीम से खेलते हुए शतक ठोंक दिया. पास ही स्थित मैल्डों क्लब में इस किशोर का औसत था 168 रन. इसके ईनाम के एवज में इस किशोर को उस क्लब की मानद आजीवन सदस्यता प्रदान की गई.

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धनुषकोटि, भारतके दक्षिण-पूर्वी शेष अग्रभागपर स्थित हिन्दुआेंका यह एक पवित्र तीर्थस्थल है ! यह स्थान पवित्र रामसेतु का उद्गम स्थान है. ५० वर्षोंसे हिंदुओं के इस पवित्र तीर्थस्थल की अवस्था एक ध्वस्त नगर की भान्ति बनी हुई है. २२ दिसम्बर १९६४ के दिन इस नगर को एक चक्रवात ने पूरी तरह ध्वस्त किया.

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भारत तो स्वतंत्र हो गया. विभाजित होकर..! परन्तु अब आगे क्या..?

दुर्भाग्य से गांधीजी ने मुस्लिम लीग के बारे में जो मासूम सपने पाल रखे थे, वे टूट कर चूर चूर हो गए. गांधीजी को लगता था, की ‘मुस्लिम लीग को पकिस्तान चाहिये, उन्हें वो मिल गया. अब वो क्यों किसी को तकलीफ देंगे..?’ पांच अगस्त को ‘वाह’ के शरणार्थी शिबिर में उन्होंने यह कहा था, की मुस्लिम नेताओं ने उन्हें आश्वासन दिया हैं, की ‘हिन्दुओं को कुछ नहीं होगा’.

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