पिछले कुछ वर्षों में देखा गया है कि भारत में जैसे ही “संस्कृत” का नाम लिया जाता है, तो तमाम कथित प्रगतिशील और नकली बुद्धिजीवी किस्म के लोग नाक-भौंह सिकोड़ने लगते हैं. वेटिकन पोषित कुछ तथाकथित दलित चिंतकों ने तो संस्कृत जैसी समृद्ध भाषा को “ब्राह्मणवाद” से जोड़ दिया है, जबकि दिल्ली-चेन्नई के वामपंथ पोषित विश्वविद्यालयों ने संस्कृत को लगभग “साम्प्रदायिक” और भगवाकरण से जोड़ रखा है.

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श्रीरामचरित मानस संसार के सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थों में से एक है। गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा रचित इस ग्रन्थ में मानव जीवन के सभी प्रश्नों का उत्तर मिलता है। गोस्वामी जी ने अपने इस महान ग्रन्थ में समाज के प्रत्येक पक्ष का वर्णन किया है।

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यह लेख उस भाषण का एक अंश है, जिसमें Rutger Kortenhost जो कि आयरलैंड के एक स्कूल में संस्कृत के विभाग अध्यक्ष हैं, उन्होंने वहां के पालकों के साथ एक मीटिंग में व्यक्त किए हैं.

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असम सरकार ने राज्य के सभी स्कूलों में 8वीं क्लास तक संस्कृत को अनिवार्य बनाने का फैसला किया है। हमारे देश में एक विशेष समूह है जो हमारी सभी प्राचीन मान्यताओं का हरसंभव विरोध करना अपना कर्त्तव्य समझता है।

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