राजपूत राज्य के किले के द्वार तक जब दुश्मन पहुँच गया हो, किले के अन्दर रसद खत्म हो गए हों, और जब हार निश्चित हो, तब, विशेषकर उत्तर-पश्चिमी भारत में, एक सम्मान-संहिता का पालन किया जाता था जिसे सुनकर आज भी आश्चर्य होता है और रूह काँप जाती है. दुश्मनों का किले के अन्दर घुसपैठ होने से पहले भीतर की सभी वीरांगनाएं, रानी-सा के नेतृत्व में, अपने बच्चों के साथ, सुहाग की निशानियों और आभूषण पहने एक साथ एक बड़ी चिता में कदम रखती थी और अग्नि में भष्म हो जाती थी. इसे जौहर कहा जाता था. इसी दरम्यान जब वीरांगनाएं राख हो रही होती थीं, राजपूत योद्धा अपने जीवन की अंतिम लड़ाई लड़ रहे होते थे जिसे शाका कहा जाता था। किला-द्वार को पूर्णतः खोल दिया जाता था और योद्धा केसरिया वस्त्र धारण कर, जो हिन्दू धर्म में त्याग का प्रतीक है, मुख में तुलसी पत्र लिए अंतिम सांस से पहले अधिक से अधिक संख्या में दुश्मनों का वध करने के उद्देश्य से उनपर टूट पड़ते थे.

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संजय भंसाली के समर्थन आये लोग उसके विरोध को पूर्वाग्रह से किया हुआ बता रहे है और उसके समर्थन में दो तरह के तर्क दे रहे है। एक यह की लोगो ने पद्मावती की पठकथा बिना देखे विरोध कर रहे है और दूसरा संजय भंसाली भारत के एक श्रेष्ट निर्देशक है जो बड़ी फिल्म बनाने में सिद्धस्त है, इस लिए उनको पूरी स्वतंत्रता है कि वह अपनी कला की किसी भी तरीके से अभिव्यक्त करे। मैं यह पहले तो एक बात साफ़ कर दूँ की संजय भंसाली का पद्मावती को लेकर फिल्म बनाने का विरोध भारतियों ने किया है न की किसी विचारधारा के अंतर्गत यह हुआ है। यहां लोग यह भूल जाते है की जिस करणी सेना ने भंसाली को झापड़ मारा है वह सेक्युलर कांग्रेस समर्थित है, उसका बीजेपी से कोई मतलब भी नही है इसलिए राजनीति इसमें नही घुसेडनी चाहिए। अब चलिए मुद्दे पर आते है।

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