शायद आप जानते ही होंगे कि भारत में कुछ राज्य ऐसे भी हैं, जहाँ हिन्दू जनसँख्या “अल्पसंख्यक” (Hindus in Minorities) हैं. जैसा कि सर्वविदित है कि भारत में मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध और जैन समुदाय को अल्पसंख्यक की परिभाषा (Who is Minority) के तहत मान्यता दी गयी है, और अल्पसंख्यकों के लिए चलने वाली योजनाओं, स्कॉलरशिप, फीस में छूट इत्यादि के फायदे इन्हें दिए जाते हैं. परन्तु मुस्लिमों और ईसाईयों की बढ़ती जनसँख्या, बलात और लालच देकर किए जाने वाले धर्म परिवर्तनों के कारण कुछ राज्यों में हिन्दू जनसँख्या बहुत कम बची है. स्वाभाविक न्याय यह कहता है कि इन हिन्दुओं को भी उन सम्बंधित राज्यों में “अल्पसंख्यक” का दर्जा मिलना चाहिए, परन्तु फिलहाल हिन्दुओं का सौभाग्य इतना मजबूत नहीं दिखाई देता.

हाल ही में भाजपा के एक नेता अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर करके माँग की थी कि कश्मीर में हिन्दुओं को “अल्पसंख्यक” का दर्जा मिलना चाहिए, ताकि अल्पसंख्यकों के लिए चलाई जाने वाली केंद्र और राज्य की योजनाओं का लाभ उन्हें मिल सके, परन्तु सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया है कि यह मामला राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (National Minorities Commission NMC) और राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है और सुप्रीम कोर्ट का इसमें कोई दखल नहीं है.

आईये पहले देखते हैं कि “अल्पसंख्यक” शब्द की कानूनी परिभाषा क्या है? संविधान में “अल्पसंख्यक” शब्द केवल चार बार उपयोग हुआ है. धारा 29 में, धारा 30 में और इसके उपबंध 1 और 2 में. रोचक बात यह है कि पूरे संविधान में “अल्पसंख्यक” शब्द की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है. सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने केवल इतना ही कहा है कि “...जिस समाज में संख्या के आधार पर किसी समुदाय की जनसँख्या किसी दूसरे समुदाय से कम है, उसे अल्पसंख्यक माना जा सकता है...” चूंकि संविधान में अल्पसंख्यक शब्द की स्पष्ट परिभाषा है ही नहीं, इसलिए हर आयोग या अलग-अलग जज अपने हिसाब से इसकी व्याख्या करते हुए मनमर्जी के निर्णय देते रहते हैं. इसीलिए जहाँ एक तरफ सच्चर आयोग मुस्लिमों की आर्थिक स्थिति को लेकर उन्हें अल्पसंख्यक परिभाषित करता है, वहीं इलाहाबाद हाईकोर्ट 2006 में ही कह चुका है कि उत्तरप्रदेश में मुसलमान अल्पसंख्यक नहीं हैं. बहरहाल यदि हम सुप्रीम कोर्ट की बेंच को ही सर्वोच्च और अंतिम निर्णय मानें तो उसके आधार पर लक्षद्वीप, नागालैंड, मिजोरम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, जम्मू-कश्मीर और पंजाब... ये आठ राज्य ऐसे हैं, जहां हिन्दू स्पष्ट रूप से संख्या में कम या बहुत ही कम हैं. इसलिए सुप्रीम कोर्ट की “संख्या के आधार पर” वाली व्याख्या में इन राज्यों में हिन्दुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा काफी पहले मिल जाना चाहिए था, लेकिन अब तक नहीं मिला. चूँकि यह स्पष्ट रूप से राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र का मामला और राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यक आयोग के अधिकार क्षेत्र का मामला है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट “केवल सलाह” दे सकता है. उदाहरणार्थ जैन समुदाय को यूपी, उतराखंड, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में पहले अल्पसंख्यक का दर्जा हासिल हुआ था, लेकिन बाद में इसे राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिल गयी.

2011 की जनगणना के अनुसार हिन्दुओं की जनसँख्या इस प्रकार है – लक्षद्वीप (2.5%), मिजोरम (2.75%), नागालैंड (8.75%), मेघालय (11.53%), जम्मू-कश्मीर (28.44%, इसमें भी कश्मीर घाटी में हिन्दू जनसंख्या केवल 1.8% है, बाकी के हिन्दू जम्मू और लेह इलाके में रहते हैं), अरुणाचल प्रदेश (29%), मणिपुर (31.3%) और पंजाब (38.4%, सिखों को अलग से राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यक का दर्जा प्राप्त है, लेकिन पंजाब में सिख जनसँख्या 60% है, इसलिए हिन्दू यहाँ स्वाभाविक अल्पसंख्यक हैं).

इन आँकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि उत्तर-पूर्व के राज्यों में चर्च और मिशनरी के आक्रामक धर्मांतरण के कारण पिछले सत्तर वर्षों में हिन्दुओं की आबादी घटती चली गयी (कुछ राज्यों में तो ये लुप्तप्राय होने वाले हैं), इसी प्रकार कश्मीर और लक्षद्वीप जैसे राज्यों में जहां मुस्लिम जनसँख्या 95% है, यहाँ भी हिन्दुओं को मार भगाने के कारण जनसंख्या में भारी कमी आई. (ये बात अलग है कि कोई भी “कथित प्रगतिशील” या “अवार्ड लौटाऊ गिरोह का बुद्धिजीवी” इन राज्यों में हिन्दुओं की दुर्दशा पर बात नहीं करता). अब होता ये है कि हिन्दू पहले से ही इन राज्यों में हैरान-परेशान और आतंकित है, उस पर तुर्रा ये कि केंद्र से अल्पसंख्यकों के नाम पर आने वाले भारीभरकम फण्ड में से एक फूटी कौड़ी भे इन्हें नहीं मिलती और ना ही प्रतियोगी परीक्षाओं, सरकारी नौकरियों अथवा गरीबी उन्मूलन की योजनाओं में इन्हें कोई फायदा होता है. क्योंकि राज्य सरकार और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग दोनों ने ही इन बेचारे हिन्दुओं को अल्पसंख्यक घोषित नहीं किया हुआ है. यह संविधान की धारा 25 का साफ़-साफ़ उल्लंघन है, परन्तु किसी को परवाह नहीं है.

एक उदाहरण देखिये, केंद्र सरकार ने “अल्पसंख्यक” युवाओं को तकनीकी शिक्षा के लिए 20,000 स्कॉलरशिप देने की घोषणा की. जम्मू-कश्मीर में, जहां कि टोटल राज्य सरकार के स्तर पर मुस्लिम जनसँख्या 70% (और घाटी में 98%) है, वहाँ 753 स्कॉलरशिप में से 717 स्कॉलरशिप मुसलमानों ने हथिया लीं, हिन्दू युवाओं को कुछ नहीं मिला, क्योंकि वे “अल्पसंख्यक” नहीं हैं. यही मामला उत्तर-पूर्व के राज्यों में भी है. इन राज्यों में ईसाई जनसँख्या कहीं 70%, कहीं 85% होने के बावजूद वे “अल्पसंख्यक” बने बैठे हैं और केंद्र की योजनाओं का पैसा मुफ्तखोरी में चूसे जा रहे हैं. पिछले साढ़े तीन साल में केंद्र सरकार और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (NMC) ने भी इस तरफ कोई ख़ास कदम नहीं उठाए हैं और इन “वास्तविक अल्पसंख्यक” हिन्दुओं को उनके हाल पर छोड़ा हुआ है. वास्तव में होना ये चाहिए था कि 5% से कम जनसँख्या होने पर ही किसी समुदाय को अल्पसंख्यक घोषित किया जाना चाहिए, परन्तु असम में (34%), बंगाल में (28%, लेकिन 16 जिलों में 40% से अधिक), केरल में (28%), यूपी में (19.8%) और बिहार में (18.2%) की भारीभरकम जनसँख्या होने के बावजूद मुसलमानों को अल्पसंख्यक बने रहना और कहलाना पसंद है, क्योंकि ऐसा करने से सरकारी पैसों और योजनाओं में “तगड़ा माल चूसने” को मिलता है.

अश्विनी उपाध्याय की याचिका का जवाब देते हुए महबूबा मुफ्ती सरकार के वकील ने कहा कि ये मामला राज्य सरकार के विवेकाधीन में आता है, इसलिए जब हमें लगेगा और जब उचित समय आएगा तब हम राज्य में हिन्दुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा देने पर विचार करेंगे... (ये हर कोई जानता है कि वह उचित समय कभी नहीं आएगा और राज्य सरकार इस पर अंतहीन विचार ही करती रहेगी). कुल मिलाकर बात यह है कि जिन राज्यों में हिन्दू अल्पसंख्यक हैं, चारों तरफ से घिरे हुए हैं, आतंकित हैं... उन राज्यों में भी उनकी मदद के लिए अथवा आर्थिक-सामाजिक सहायता के लिए कोई अल्पसंख्यक क़ानून नहीं है, उनकी किस्मत में फिलहाल अँधेरा ही लिखा हुआ है.

हिंदुओं की दुर्दशा और अल्पसंख्यकों के बारे में ये तीन लेख और भी हैं जो पठनीय हैं... अवश्य पढ़ें... 

१) गरीब सवर्ण हिन्दू छात्रों को छात्रवृत्ति क्यों नहीं?? :- http://www.desicnn.com/news/scholarship-to-only-minorities-not-for-hindus-blatant-discrimination 

२) शिक्षा का अधिकार (RTE) हिंदुओं के लिए जज़िया है... :- http://www.desicnn.com/news/right-to-education-law-is-blatantly-anti-hindu 

३) भारत की जनगणना और ईसाई जनसंख्या... :- http://www.desicnn.com/blog/census-2011-illusionary-christian-population-and-dalits-of-india 

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