आज की रात तो भारत मानो सोया ही नहीं है. दिल्ली, मुम्बई, कलकत्ता, मद्रास, बंगलौर, लखनऊ, इंदौर, पटना, बड़ौदा, नागपुर... कितने नाम लिए जाएं. कल रात से ही देश के कोने-कोने में उत्साह का वातावरण है. इसीलिए इस पृष्ठभूमि को देखते हुए कल के और आज के पाकिस्तान का निरुत्साहित वातावरण और भी स्पष्ट दिखाई देता है.

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कलकत्ता.... गुरुवार. १४ अगस्त... सुबह की ठण्डी हवा भले ही खुशनुमा और प्रसन्न करने वाली हो, परन्तु बेलियाघाट इलाके में ऐसा बिलकुल नहीं है. चारों तरफ फैले कीचड़ के कारण यहां निरंतर एक विशिष्ट प्रकार की बदबू वातावरण में भरी पड़ी है. गांधीजी प्रातःभ्रमण के लिए बाहर निकले हैं. बिलकुल पड़ोस में ही उन्हें टूटी –फूटी और जली हुई अवस्था में कुछ मकान दिखाई देते हैं. साथ चल रहे कार्यकर्ता उन्हें बताते हैं कि परसों हुए दंगों में मुस्लिम गुण्डों ने इन हिंदुओं के मकान जला दिए हैं. गांधीजी ठिठकते हैं, विषण्ण निगाहों से उन मकानों की तरफ देखते हैं और पुनः चलने लगते हैं. आज सुबह की सैर में शहीद सुहरावर्दी उनके साथ नहीं हैं, क्योंकि उस हैदरी मंज़िल में रात को सोने की उसकी हिम्मत ही नहीं हुई. आज सुबह ११ बजे वह आने वाला है. (पिछला भाग... यानी १३ अगस्त १९४७ की घटनाओं को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें...

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शुक्रवार, 10 अगस्त 2018 21:20

वे पन्द्रह दिन :- १३ अगस्त, १९४७

मुंबई... जुहू हवाई अड्डा..... टाटा एयर सर्विसेज के काउंटर पर आठ-दस महिलाएं खडी है. सभी अनुशासित हैं और उनके चेहरों पर जबरदस्त आत्मविश्वास दिखाई दे रहा है. यह सभी ‘राष्ट्र सेविका समिति’ की सेविकाएं हैं. इनकी प्रमुख संचालिका यानी लक्ष्मीबाई केलकर, अर्थात ‘मौसीजी’, कराची जाने वाली हैं. कराची में जारी अराजकता एवं अव्यवस्था के माहौल में हैदराबाद (सिंध) की एक सेविका ने उनको एक पत्र भेजा है. उस सेविका का नाम है जेठी देवानी. देवानी परिवार सिंध का एक साधारण परिवार है, जो संघ से जुड़ा हुआ है.

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शुक्रवार, 10 अगस्त 2018 12:16

वे पन्द्रह दिन :- ११ अगस्त, १९४७

आज सोमवार होने के बावजूद कलकत्ता शहर से थोड़ा बाहर स्थित सोडेपुर आश्रम में गांधीजी की सुबह वाली प्रार्थना में अच्छी खासी भीड़ हैं. पिछले दो-तीन दिनों से कलकत्ता शहर में शान्ति बनी हुई हैं. गांधीजी की प्रार्थना का प्रभाव यहां के हिन्दू नेताओं पर दिखाई दे रहा था. ठीक एक वर्ष पहले, मुस्लिम लीग ने कलकत्ता शहर में हिंदुओं का जैसा रक्तपात किया था, क्रूरता और नृशंसता का जैसा नंगा नाच दिखाया था, उसका बदला लेने के लिए हिन्दू नेता आतुर हैं. लेकिन गांधीजी के कलकत्ता में होने के कारण यह कठिन हैं. और इसीलिए अखंड बंगाल के ‘प्रधानमंत्री’ शहीद सुहरावर्दी की भी इच्छा हैं कि गांधीजी कलकत्ता में ही ठहरें.

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दस अगस्त.... रविवार की एक अलसाई हुई सुबह. सरदार वल्लभभाई पटेल के बंगले अर्थात १, औरंगजेब रोड पर काफी हलचल शुरू हो गयी है. सरदार पटेल वैसे भी सुबह जल्दी सोकर उठते हैं. उनका दिन जल्दी प्रारम्भ होता है. बंगले में रहने वाले सभी लोगों को इसकी आदत हो गयी है. इसलिए जब सुबह सवेरे जोधपुर के महाराज की आलीशान चमकदार गाड़ी पोर्च में आकर खड़ी हुई, तब वहां के कर्मचारियों के लिए यह एक साधारण सी बात थी. 

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सोडेपुर आश्रम... कलकत्ता के उत्तर में स्थित यह आश्रम वैसे तो शहर के बाहर ही है. यानी कलकत्ता से लगभग आठ-नौ मील की दूरी पर. अत्यंत रमणीय, वृक्षों, पौधों-लताओं से भरापूरा यह सोडेपुर आश्रम, गांधीजी का अत्यधिक पसंदीदा है. जब पिछली बार वे यहां आए थे, तब उन्होंने कहा भी था कि, “यह आश्रम मेरे अत्यंत पसंदीदा साबरमती आश्रम की बराबरी करता है....” 

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शुक्रवार आठ अगस्त.... इस बार सावन का महीना ‘पुरषोत्तम (मल) मास’हैं. इसकी आज छठी तिथि हैं, षष्ठी. गांधीजी की ट्रेन पटना के पास पहुंच रही है. सुबह के पौने छः बजने वाले हैं. सूर्योदय बस अभी हुआ ही है. गांधीजी खिड़की के पास बैठे हैं. उस खिड़की से हलके बादलों से आच्छादित आसमान में पसरी हुई गुलाबी छटा बेहद रमणीय दिखाई दे रही है. ट्रेन की खिड़की से प्रसन्न करने वाली ठण्डी हवा आ रही है. हालांकि उस हवा के साथ ही इंजन से निकलने वाले कोयले के कण भी अंदर आ रहे हैं, लेकिन कुल मिलाकर वातावरण आल्हाददायक है, उत्साहपूर्ण है. (पिछले भाग.. यानी ७ अगस्त १९४७ वाला लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें).

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गुरुवार. ७ अगस्त. देश भर के अनेक समाचारपत्रों में कल गांधीजी द्वारा भारत के राष्ट्रध्वज के बारे में लाहौर में दिए गए वक्तव्य को अच्छी खासी प्रसिद्धि मिली है. मुम्बई के ‘टाईम्स’में इस बारे में विशेष समाचार है, जबकि दिल्ली के ‘हिन्दुस्तान’ में भी इसे पहले पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया है. कलकत्ता के ‘स्टेट्समैन’ अखबार में भी यह खबर है, साथ ही मद्रास के ‘द हिन्दू’ ने भी इस प्रकाशित किया है.

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शुक्रवार, 03 अगस्त 2018 12:54

वे पंद्रह दिन :- ६ अगस्त, १९४७

बुधवार... छः अगस्त. हमेशा की तरह गांधीजी तड़के ही उठ गए थे. बाहर अभी अंधेरा था. ‘वाह’ के शरणार्थी शिविर के निकट ही गांधीजी का पड़ाव भी था. वैसे तो ‘वाह’ कोई बड़ा शहर नहीं था, एक छोटा सा गांव ही था. परन्तु अंग्रेजों ने वहां पर अपना सैनिक ठिकाना तैयार किया हुआ था. इसीलिए ‘वाह’ का अपना महत्व था.

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शुक्रवार, 03 अगस्त 2018 12:17

वे पंद्रह दिन :- ५ अगस्त, १९४७

आज अगस्त महीने की पांच तारीख... आकाश में बादल छाये हुये थे, लेकिन फिर भी थोड़ी ठण्ड महसूस हो रही थी. जम्मू से लाहौर जाते समय रावलपिन्डी का रास्ता अच्छा था, इसीलिए गांधीजी का काफिला पिण्डी मार्ग से लाहौर की तरफ जा रहा था. 

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