अभी कुछ दिन पहले मेरा रांची जाना हुआ था. रांची में 4 दिन तक रुका. देश भर से आये हुए विभिन्न मूर्धन्य विद्वानों/चिन्तकों से मिलना हुआ. कुछ सही में विद्वान थे/है (उनको सुनने से अच्छा लगा लगा कि हाँ, इनको देश-काल-स्थिति का भान है और वे चिंतित भी हैं व देश में आये हुए बड़े संकट से भारत देश के निवासियों को आगाह कर रहे हैं… विशेष रूप से धिम्मियों को आगाह कर रहे हैं). कुछ स्वघोषित स्वयंभू विद्वान भी थे…. तो कुछ “भगवा-मुल्ले” भी थे...

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