कश्मीरी आतंक : अखबार, जज, सरकार की मिलीभगत का खुलासा

Written by शनिवार, 09 सितम्बर 2017 21:17

जम्मू-कश्मीर भारत के गले में फँसी हुई वह हड्डी है, जिसे न उगलते बन रहा है ना निगलते बन रहा है. पिछले सत्तर वर्षों में कई सरकारें आईं और चली गईं, लेकिन मर्ज़ बढ़ता ही गया, ज्यों-ज्यों दवा की.

मोदीजी के नेतृत्व में महबूबा मुफ्ती के साथ मिलकर भाजपा ने कश्मीर में PDP-BJP गठबंधन की सरकार बनाई. देश की जनता को बहुत उम्मीदें थीं कि शायद अब हालात तेजी से सुधरेंगे, परन्तु आतंकवादियों की ठुकाई और पत्थरबाजों की धुलाई के अलावा जमीनी स्तर पर आम कश्मीरी की मानसिकता में कतई बदलाव नहीं आया है. हाल ही में एक ऐसा मामला सामने आया है, जिससे हमें पता चलता है कि कश्मीरी प्रशासन, न्यायिक व्यवस्था तथा अलगाववादी राजनैतिक सरोकारों में लूट और ज़हर की मानसिकता भरी पड़ी है. भारत की जनता से जो करोड़ों रूपए का टैक्स वसूला जाता है, उसका एक बड़ा हिस्सा कश्मीर को सब्सिडी के रूप में दिया जा रहा है. पिछले कई वर्षों में अरबों-खरबों रुपया पानी की तरह कश्मीर में बहाया गया है, लेकिन वहाँ के लोगों की मानसिकता में कोई स्पष्ट बदलाव दिखाई नहीं देता. आगे देखिये पूरा मामला क्या है... और हमारे टैक्स के पैसों से कैसे-कैसे लोग पल रहे हैं.

26 अगस्त को श्रीनगर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट एजाज़ अहमद खान ने प्रख्यात लेखिका एवं ICSSR की प्रोफ़ेसर मधु किश्वर के खिलाफ एक गैर-जमानती वारंट जारी कर दिया. यह गैर-जमानती वारंट इसलिए जारी किया गया, क्योंकि “राईजिंग कश्मीर” नामक एक अलगाववादी अखबार के मालिक शुजात बुखारी ने दिसंबर 2016 में उनकी मानहानि का केस फाईल किया था. यह पढ़कर आपको लगा होगा, कि ठीक है, यह एक सामान्य बात है... लेकिन ऐसा नहीं है. क्योंकि 26 अगस्त के इस आदेश से पहले ही 24 अगस्त को मधु किश्वर के वकील ने सुप्रीम कोर्ट में अपना केस दर्ज करके मधु किश्वर के अदालत में उपस्थित नहीं होने संबंधी आदेश प्राप्त कर लिया था. सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश श्रीनगर की लोअर कोर्ट को ई-मेल द्वारा प्रसारित किया जा चुका था, कि यदि वास्तव में श्रीनगर कोर्ट को मधु किश्वर के बयानों की आवश्यकता है तो वह वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये उनके बयान ले सकती है. लेकिन फिर भी जज साहब एजाज़ अहमद खामख्वाह खुद को सुप्रीम कोर्ट से ऊपर बताने की चेष्टा में गैर-जमानती वारंट जारी कर दिए... इस मानसिकता को क्या कहा जाए? क्या श्रीनगर की कोर्ट भारत के सुप्रीम कोर्ट को नहीं मानती? या अब कश्मीर का संविधान भारत के सुप्रीम कोर्ट से भी ऊपर हो गया??

खैर... ये तो हुई लोअर कोर्ट के जज साहब की मानसिकता, लेकिन जिस मानहानि के मामले में उपरोक्त जज साहब ने मधु किश्वर की गिरफ्तारी के आदेश जारी किए वह मामला और भी खतरनाक है. जैसा कि आपने ऊपर पढ़ा, “राईजिंग कश्मीर” नामक एक अखबार के मालिक शुजात बुखारी ने मधु किश्वर पर यह मुकदमा दायर किया था. शुजात बुखारी इस बात पर भड़के थे, कि मधु किश्वर ने अपने ट्वीट में बुखारी पर साफ़-साफ़ अलगाववादी होने तथा महबूबा मुफ्ती के साथ सांठगाठ करके सरकारी खजाने को चूना लगाने के आरोप लगाए थे. ये रहे मधु किश्वर के कुछ ट्वीट...

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शुजात बुखारी ने मधु किश्वर के किसी ट्वीट का जवाब नहीं दिया, ना ही आरोपों का खंडन किया और ना ही मधु किश्वर द्वारा दी गयी अखबारी कटिंग्स के बारे में कोई सफाई दी. “राईजिंग कश्मीर” में जिस प्रकार से अलगाववादी ख़बरें प्रकाशित होती हैं, मारे गए आतंकियों के जनाज़े की तस्वीरें और उनके इन्टरव्यू छपते हैं, उसे देखते हुए कोई सामान्य व्यक्ति भी बता सकता है कि इस अखबार के लिंक आतंकी संगठनों से हैं. लेकिन इसके बावजूद महबूबा मुफ्ती सरकार लगातार शुजात बुखारी के अखबार को फुल पेज, हाफ पेज के कलर विज्ञापन देती रही हैं. इस प्रकार सरकारी खजाने से करोड़ों रूपए का भुगतान शुजात बुखारी को किया जा चुका है. मधु किश्वर ने इसी बात पर आपत्ति उठाई थी, जिसे “मानहानि” का मुद्दा बनाकर बुखारी ने श्रीनगर कोर्ट में केस दाखिल किया था.

क़ानून के अनुसार एक जिला मजिस्ट्रेट केवल “सम्मन” जारी कर सकता है, न कि सीधे गिरफ्तारी का आदेश दे सकता है. उस स्थिति में तो बिलकुल भी नहीं, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने उस पर पहले ही रोक लगाई हुई हो. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या CJM एजाज़ अहमद और शुजात बुखारी की भी आपस में कोई मिलीभगत है? जब मधु किश्वर ने अपनी ब्रेन ट्यूमर की सर्जरी के सारे कागज़ श्रीनगर कोर्ट में दाखिल कर दिए थे, और चिकित्सकों ने उन्हें यात्रा करने से साफ़ मना कर दिया था, ऐसी स्थिति में केवल मानसिक रूप से परेशान करने हेतु किश्वर के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी करने वाले “माननीय” कम से कम थोड़े मानवीय तो हो जाते. लेकिन नहीं... शुजात बुखारी जैसे “सेटिंगबाज” व्यक्ति की मानहानि(??) पर जज साहब का यह “अतिरिक्त उत्साह” संदेह पैदा करता है. इसके बावजूद मधु किश्वर ने श्रीनगर कोर्ट में हाजिरी के लिए, उनकी जान-माल की सुरक्षा हेतु अर्द्धसैनिक बल की माँग की जिसे एजाज़ अहमद साहब ने तत्काल ठुकरा दिया. मधु किश्वर ने तर्क दिया था कि चूंकि शुजात बुखारी के आतंकी लिंक्स को देखते हुए उन्हें एवं उनके वकील की जान को श्रीनगर में गंभीर खतरा है. श्रीनगर के वकीलों की बार एसोसियेशन खुलेआम पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगा चुकी है. जेड प्लस सुरक्षा प्राप्त महबूबा मुफ्ती तक श्रीनगर में सरेआम चुनाव प्रचार करने से डरती हैं, ऐसे में मधु किश्वर जैसी सामान्य महिला बिना ठोस सुरक्षा के श्रीनगर की कोर्ट में कैसे उपस्थित हो सकती है. लेकिन शायद जज एजाज़ अहमद साहब, पूरी तरह से शुजात बुखारी (या कहें कि कश्मीर में जो प्रशासन-आतंकी का नापाक गठबंधन है) की गिरफ्त में हैं, इसलिए यह अपील ठुकरा दी गयी. स्वाभाविक रूप से मधु किश्वर ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगाई और सुप्रीम कोर्ट ने वीडियो कांफ्रेंसिंग के आदेश जारी किये, लेकिन दो दिन बाद खुद को सुप्रीम कोर्ट से भी ऊपर समझते हुए एजाज़ अहमद ने गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया... इसे क्या कहा जाए?

मामले का एक और खतरनाक पेंच यह भी है कि महबूबा मुफ्ती ने स्वयं व्यक्तिगत रूचि लेकर शुजात बुखारी के इस अखबार को स्थापित होने में मदद की है. महबूबा मुफ्ती मुख्यमंत्री के रूप में लिखित अनुशंसा करके इस अखबार की विज्ञापन दरों में वृद्धि की सिफारिश भी की है. पाठकों को दिलीप पाडगांवकर नाम भी याद होगा, (जिन्हें UPA सरकार ने कश्मीर में मध्यस्थ बनाया था), उन्होंने भी शुजात बुखारी के रहस्यमयी संबंधों एवं अखबार की आपत्तिजनक ख़बरों के बारे में केंद्र को रिपोर्ट भेजी थी, जो पिछले तीन वर्षों से धूल खा रही है. मधु किश्वर के सूत्रों के अनुसार शुजात बुखारी सरकारी पैसों पर कई बार दुबई की यात्रा कर चुका है, जहाँ उसने कथित रूप से अलगाववादी नेताओं और PDP-BJP सरकार के बीच मध्यस्थ(??) की भूमिका निभाई है. कुछ माह पहले एक और वरिष्ठ पत्रकार तुफैल अहमद ने भी अपने ट्वीट में लिखा है कि “कश्मीर के एक विशिष्ट अखबार को सरकार की तरफ से 22 करोड़ के विज्ञापन दिए गए हैं, जो कि बेहद संदिग्ध है...”. साफ़ ज़ाहिर है कि तुफैल अहमद का इशारा भी शुजात बुखारी की तरफ ही था, लेकिन अंतर यह रहा कि उन्होंने खुलकर उसका नाम नहीं लिखा, मधु किश्वर दबंग महिला हैं इसलिए उन्होंने खुलेआम “राईजिंग कश्मीर” अखबार और उसके मालिक का नाम ले लिया... और मजे की बात यह कि इसे “मानहानि”(??) बताया जा रहा है.

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अब आप समझ गए होंगे कि हमारी जेबों से टैक्स काटकर कश्मीर को जो सब्सिडी दी जा रही है, वह किन हाथों में पहुँच रही है. साथ ही आप इस घटना से यह अंदाज़ा भी लगा सकते हैं कि कश्मीर में सरकार-प्रशासन-पुलिस-जज-पत्रकार ये सब किस मानसिकता के लोग हैं और भारत के साथ उनका लगाव कितना और कैसा है? फिर भी हम वर्षों से कश्मीर में हजारों करोड़ रूपए झोंके जा रहे हैं, इस आशा में कि शायद आम कश्मीरी की सोच कभी बदलेगी... लेकिन ऐसी घटनाओं को देखते हुए इसकी उम्मीद कम ही है. हकीकत यही है कि कश्मीरी मुसलमानों को भारत के पैसों (यानी हमसे वसूली गयी ज़कात और जज़िया) पर पलने की आदत पड़ गयी है... 

Read 3717 times Last modified on मंगलवार, 26 सितम्बर 2017 10:06
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