कोंकण की कथित “ग्रीन” रिफायनरी का काला संकट...

Written by रविवार, 31 दिसम्बर 2017 19:31

महाराष्ट्र का कोंकण इलाका पर्यावरणीय शुद्धता, शांत-साफ़ समुद्र तटों एवं जैव विविधता के लिए विश्व प्रसिद्ध है. यहाँ के कई जंगल और समुद्र तटों को “ग्रीन ट्रिब्यूनल” (Green Tribunal) ने अपनी खास निगरानी में रखा है, क्योंकि लगभग 300 किमी लम्बे भारत के इस पश्चिमी समुद्र किनारे ने प्रकृति की अदभुत छटाएँ सहेजने के अलावा, विभिन्न प्रकार के जीवों को भी संरक्षण दिया हुआ है... लेकिन पिछले कुछ माह से कोंकण का क्षेत्र “अशांत” है और इसका कारण है केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित “कथित ग्रीन रिफायनरी” (Konkan Refinery Project).

कोंकण के एक प्रमुख नगर राजापुर (जहां से मधु दण्डवते वर्षों तक सांसद रहे और उनके बाद अब सुरेश प्रभु हैं) की नाणार तहसील में (Rajapur Refinery) चौदह गाँवों की जमीन अधिगृहीत करके विश्व की सबसे बड़ी अर्थात छः करोड़ टन की एक “ग्रीन” रिफायनरी का प्रोजेक्ट प्रस्तावित है. “रिफायनरी” शब्द को शुद्ध हिन्दी में कहूँ तो, “खनिज तेल का शुद्धिकरण करने वाला संयंत्र”. एकबारगी दुनिया में “स्वीट चिली” यानी मीठी मिर्ची मिलने की संभावना हो सकती है, परन्तु “प्रदूषण रहित ग्रीन रिफायनरी” नामक अजूबा कैसे मिलेगा, भगवान् जाने. रिफायनरी यानी प्रदूषण और प्रदूषण यानी रिफायनरी... यह एक दूसरी कक्षा के गणित जैसा सरल समीकरण है. यदि हम कल को श्रीश्री 108 श्री दाऊद भाई इब्राहीम लिखना शुरू कर दें, तो क्या वह व्यक्ति साधू-संत बन जाएगा?? नहीं न!!, जी हाँ, “ग्रीन” रिफायनरी शब्द ऐसा ही है.... जनता-अदालतों और पर्यावरण बचाने वाली संस्थाओं को शब्दजाल द्वारा मूर्ख बनाने के लिए आजकल जहाँ-तहाँ “ग्रीन” शब्द का उल्लेख किया जाने लगा है. अंदर झाँककर कौन देखता है.

 

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बहरहाल मुद्दा ये है कि कोंकण इलाके के जनता अपने पर्यावरण से बेहद प्रेम करती है, इससे पहले भी कोंकण इलाके में भाजपा सरकार द्वारा “केमिकल ज़ोन” बनाने के नापाक मंसूबे यहाँ की जनता ने ध्वस्त कर दिए थे. इसी केमिकल झोन के तहत ये रिफायनरी आने वाली थी. अब चूँकि वह योजना ख़त्म हो चुकी, इसलिए “ग्रीन रिफायनरी” का नया लेबल लगाकर इसे पुनः पेश किया गया है. लेकिन कोंकण की जतना इतनी भी मूर्ख नहीं है कि वह न समझ सके कि “गंगाधर ही शक्तिमान है”, तो अब इस कथित ग्रीन रिफायनरी का सिरे से पुनः तीव्र विरोध शुरू हो गया है और जमीन नपती के लिए गाँव-गाँव जाने वाले शासकीय और तकनीकी टीमों को वहाँ से उल्टे पैरों भगाया जा रहा है.

अब हम आते कुछ तकनीकी और पर्यावरणीय तथ्यों पर, जिनसे स्पष्ट हो जाएगा कि आखिर यह पेट्रोकेमिकल प्लांट और कथित ग्रीन रिफायनरी इस इलाके के लिए खतरनाक क्यों है? चौदह गाँवों को ख़त्म करके बनने वाली इस प्रस्तावित रिफायनरी में पेट्रोल, डीज़ल, LPG, डामर, प्लास्टिक दाने इत्यादि उत्पाद तैयार किए जाएँगे, और यह उत्पाद पुनः समुद्री पाईपलाईनों से विदेशों को निर्यात किए जाएँगे, इस “ग्रीन”(??) रिफायनरी को केवल कच्चा तेल शुद्ध करने के लिए ही भारत में स्थापित किया जा रहा है. इस रिफायनरी को अबाध गति से संचालित करने के लिए 2500 मेगावॉट क्षमता का एक ताप-बिजली संयंत्र भी लगेगा, यानी सरल भाषा में कहें तो रोजाना के 3000 ट्रक भरकर कोयला प्रतिदिन जलेगा, तब इतनी बिजली बनेगी.... और सरल भाषा में कहें तो प्रतिदिन का 1000 ट्रक फ्लाय-एश (राख) निर्माण होगी, जिसे या तो समुद्र में बहाया जाएगा या फिर जमीन में दबाया जाएगा अथवा बाहर बेचा जाएगा (इतनी मात्रा में यह राख बिकने की कोई गारंटी नहीं है), लेकिन असल बात है कि 1000 ट्रक राख उत्पन्न तो होगी, जो कि “पर्यावरण के अनुकूल ग्रीन” तो कतई नहीं होगी. अभी इस “ग्रीन रिफायनरी” से निकलने वाली 67 मीट्रिक टन “शुद्ध और साफ़” सल्फर डाई-ऑक्साइड, नाईट्रोजन ऑक्साइड और कार्बन मोनो-ऑक्साइड का हिसाब नहीं जोड़ा गया है. इन गैसों की वजह से कोंकण की स्वच्छ हवा और यहाँ के निवासियों के स्वास्थ्य पर तो विपरीत प्रभाव पड़ेगा ही, यहाँ के प्रसिद्ध अलफांसो आम, सुपारी, काजू की खेती पर भी दुष्प्रभाव निश्चित ही पड़ेगा.

 

refinery 2

रिफायनरी का दुष्परिणाम देखना हो तो मुम्बई के माहुल परिसर में स्थित रिफायनरी का हालचाल जान लीजिए. उद्योगपतियों के दबाव में सरकारों ने इस रिफायनरी द्वारा फैलाए जा रहे प्रदूषण पर कतई ध्यान नहीं दिया और अंततः निवासियों को उच्च न्यायालय की शरण लेनी पड़ी, जिसने रिफायनरी को बंद करके कहीं और स्थानान्तरण करने के आदेश जारी किए और स्वास्थ्य गँवा चुके लोगों के लिए मुआवज़ा देने को कहा है. कोंकण की प्रस्तावित रिफायनरी मुम्बई की इस रिफायनरी के मुकाबले कई गुना विशालकाय है, तो सोचिये कि खुद केंद्र सरकार द्वारा जिस क्षेत्र के दर्जनों गाँवों, पहाड़ों, समुद्र तटों, जैव विविधता को बाकायदा नोटिफिकेशन जारी करके “संवेदनशील” घोषित किया हुआ है, उसका क्या होगा?? अब कोंकण के इस पर्यावरण संवेदनशील इलाके को तो पूरा का पूरा शिफ्ट कर नहीं सकते... तो क्या सरकार ग्रीन ट्रिब्यूनल में सेटिंग करेगी, ताकि अपनी मनमानी चला सके? इस महाकाय रिफायनरी के लिए पश्चिम एशियाई देशों से कच्चा खनिज तेल आयात किया जाएगा. इसमें से 33% कच्चा तेल जयगढ़ बंदरगाह पर उतारकर वहाँ से 4 फुट व्यास की 150 किमी लम्बी पाईपलाईन समुद्र के नीचे-नीचे बिछाकर यह तेल इस नाणार रिफायनरी में लाया जाएगा. बचा हुआ 67% कच्चा तेल, सिंधुदुर्ग (कोंकण) के समुद्री किनारे से दस किमी अन्दर स्थायी रूप से निर्मित दो विशालकाय टंकियों में एकत्रित किया जाएगा, और जैसे-जैसे जरूरत पड़ती जाएगी, वैसे-वैसे बीस किमी दूर स्थित इस रिफायनरी में लाया जाएगा, इस प्रकार तेल लाने, उसे एकत्रित करके रखने और धीरे-धीरे रिफाइन करके वापस नए बंदरगाहों से निर्यात करने की यह प्रक्रिया चल पड़ेगी. इस प्रक्रिया के दौरान बड़े-बड़े जहाज़ों के आवागमन, उनसे रिसने वाले तेल, गाहे-बगाहे इस पाईपलाईन में होने वाले तेल रिसाव और रिपेयरिंग के कारण समुद्र के इस संवेदनशील इलाके की प्रसिद्ध मछलियाँ (जिनका लाखों रूपए का निर्यात होता है) तबाह हो जाएँगी. इस रिफायनरी के लिए प्रतिदिन 36 करोड़ लीटर पानी समुद्र से खींचा जाएगा. जब बड़े-बड़े पंपों से यह पानी पूरी शक्ति से खींचा जाएगा तब समुद्र किनारे की मछलियाँ, शैवाल, जीवजन्तु, कछुए सब इस प्लांट में जाकर नष्ट होंगे.

यहाँ के निवासियों को समझ नहीं आ रहा है कि अलफांसो आम, काजू, मछलियाँ, सुपारी इत्यादि निर्यात करके इस इलाके के किसान पहले ही समृद्ध हैं और सरकार को भी कमाकर दे रहे हैं, ऐसे में पर्यावरण को नष्ट करने वाली इस “कथित ग्रीन” रिफायनरी की यहाँ जरूरत क्या है? चौदह गाँवों के जो किसान अपनी जमीन खोएँगे वे समृद्ध किसान हैं, भूखे नहीं मर रहे हैं.... उन्हें इस रिफायनरी में नौकरी का लॉलीपाप भी नहीं चाहिए.

अब देखिये एक और खतरनाक बात... इस प्रस्तावित रिफायनरी से केवल पन्द्रह किमी दूर पहले से ही जैतापुर नामक परमाणु ऊर्जा संयंत्र है. यानी केवल पंद्रह किमी के अन्दर दो महाकाय पर्यावरण बिगाड़ने वाले संयंत्र अर्थात विनाश को निमंत्रण पत्र देने जैसा ही है. मूलतः परमाणु ऊर्जा संयंत्र के आसपास कम से कम चालीस किमी की रेंज में कोई भी संयंत्र नहीं होना चाहिए, ताकि किसी भी दुर्घटना की स्थिति में जनसँख्या का कम से कम नुक्सान हो. भारतीय अणु ऊर्जा आयोग के नियमों के अनुसार परमाणु संयंत्र के चालीस-पचास किमी की रेंज के अन्दर कोई दूसरा संयंत्र तो क्या, बस अड्डा, रेलवे स्टेशन और हवाई अड्डा वगैरह कुछ नहीं होना चाहिए. मजे की बात यह है कि आयोग का यह नियम केवल 100 मेगावॉट के अणु ऊर्जा प्रकल्प के लिए है, यानी जैतापुर के 10,000 मेगावॉट संयंत्र पर इस नियम को लागू करें तो इस “कथित ग्रीन” रिफायनरी की दूरी इस परमाणु संयंत्र से कम से कम 400 किमी होनी चाहिए. क्या यह सरकारी मशीनरी की मूर्खता नहीं है? इस प्रकल्प का विचार करने वाले इंजीनियरों, योजनाकारों ने पता नहीं क्या सोचकर इस रिफायनरी का यह स्थान चिन्हित किया है?

कुल मिलाकर बात यह है कि कोंकण जैसे पर्यावरण संवेदनशील इलाके और साफ़ समुद्र तटों वाले क्षेत्र में भीषण गन्दगी फैलाने वाली इस रिफायनरी का कड़ा विरोध शुरू हो चुका है और लेख में वर्णित सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए सरकार को इस पर पुनर्विचार करना चाहिए. 

कोंकण क्षेत्र से सम्बंधित कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण लेखों की लिंक यह है... अवश्य पढ़ें... 

१) मधु दण्डवते - कोंकण रेलवे के सूत्रधार और राजनैतिक संत... http://desicnn.com/news/madhu-dandavate-rail-minister-janta-party-has-credit-of-konkan-railway-and-simplicity-in-politics 

२) कोंकण क्षेत्र से निकला था भारत का सबसे पहला पायलट ... http://desicnn.com/news/who-is-the-first-indian-pilot-not-the-jrd-tata 

३) ब्राहमणों का अपराध क्या है, उनसे घृणा क्यों?? http://desicnn.com/news/anti-brahmin-movement-and-propaganda-of-missionary-and-communists  

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मूल मराठी लेख  :- अनुपम काम्बली 

हिन्दी अनुवाद :- सुरेश चिपलूनकर

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