"गंगा-जमनी" के नाम पर स्वयं से छल कब तक करें?

Written by शुक्रवार, 05 जनवरी 2018 07:54

जिस प्रकार तुर्की स्थित खलीफाओं के अत्याचारों को नकारने के लिए एक पूरी व्यवस्था को जन्म एवं समर्थन दिया गया, जिसमें गाँधी समर्थित खिलाफत आन्दोलन शामिल है, जबकि यह कोई खिलाफत आन्दोलन (Khilafat Movement) नहीं था, यह तुर्की के इस्लामी खलीफा को बचाने वहां लोकतंत्र की स्थापना के खिलाफ आन्दोलन था.

वैसे ही भारत के मूल इतिहास के साथ छेडछाड एवं उसे एक विशेष दृष्टिकोण से परिभाषित एवं ढालने का षड़यंत्र १९२० से ही आरम्भ हो चुका था, यह वस्तुतः किसी एक पक्ष की संतुष्टि के लिए या किसी एक पक्ष के गुनाहों को ढँकने के लिए नहीं वरन राजसत्ता प्राप्त करने के उद्देश्य से इतिहास को बदलने का षड़यंत्र था. इस षड़यंत्र के तहत भारतीय इतिहास को इस प्रकार से लिखा एवं दर्शाया जाने लगा जिससे भारतीयता या हिंदुत्व पर 1000 वर्षों के बर्बर प्रहार (Islamic Invaders in India) एवं भारतीय संस्कृति को नष्ट का देने के कुचक्रों को इतिहास से मिटा कर बर्बर, दुर्दांत, दुष्ट, धर्मांध, अत्याचारी लूटेरों को वर्तमान भारत का भाग्य विधाता घोषित कर इस झूठ के विष को भारत की आनेवाली पीढ़ियों को पिलाया जा सके.

भारत के तथाकथित अंग्रेजीदां राजनीतिबाज एवं वामपंथी बुद्धिजीवी एवं पत्रकार आज किसी भी हद तक जाकर इस दर्दनाक इतिहास के किसी भी सार्वजनिक उद्धरण का अपनी पूरी ताकत से विरोध करते हैं एवं हमारी प्रशासनिक मशीनरी को इतना कमजोर कर दिया गया है की इस प्रकार के स्वरों को दबाने के लिए वे तुरंत ही ऐसे विषय को ढँकने के लिए गतिशील हो जाते हैं, बिना सत्य की परीक्षा किये. ये लोग उस हिन्दू मुस्लिम भाईचारे की मिसाले देते देते किसी भी हद तक चल जाते हैं, जिसकी नींव केवल हिन्दुओं के ऊपर भांति भांति के अत्याचारों, जबरन धर्म परिवर्तन, हिन्दुओं की महिलाओं एवं बच्चियों पर न लिखे जा सकने वाले जुल्मों पर रखी गयी है. (गंगा-जमनी नामक फर्जीवाड़े पर लेख पढने के लिए क्लिक करें)

भारतीय हिन्दुओं की नयी पीढियां पश्चिमी सभ्यता एवं चकाचौंध के रंग में रंग कर इस जहरीले असत्य एवं इतिहास को स्वीकार कर अपने लिए प्रतिमान एवं प्रेरणाएँ ढूंढती नजर आती है, इस पीढी को इससे कोई मतलब नहीं कि नाज़ियों द्वारा मारे गए यहूदियों से मुसलमानों के हाथों मारे गए हिन्दुओं की संख्या १०० गुना से भी ज्यादा है, एवं मुसलमानों द्वारा अत्याचार की नयी इन्ताहाये रच कर जबरन धर्म परिवर्तित किये गए हिन्दुओं की संख्या भी कम से कम १० करोड़ तथा गुलाम बनाकर, नपुसंक बनाकर एवं अपने हरम में अपहृत कर रखे गए हिन्दू स्त्री पुरुषों की संख्या केवल अनुमान ही की जा सकती है, क्योंकि ऐसे विषय पर खोज करने एवं बोलने वाले को “नॉन-सेक्युलर” करार देकर उसके सामाजिक उत्पीडन एवं बहिष्कार का सिलसिला आरंभ कर दिया जाता है. एक भरी पूरी अतिविकसित विज्ञान जन्य संस्कृति को धीरे धीरे नष्ट किया गया, शिक्षण संस्थान एवं पुस्तकों को नष्ट करने के साथ शिक्षक वर्ग को उनकी पुस्तकों के साथ जानवरों के चमड़े में भरकर सिलाई कर तालाबों एवं नदियों में डुबो दिया गया.

अमेरिकन इतिहासकार Will Durant ने अपनी पुस्तक The Story of Civilization में लिखा है कि "The Islamic conquest of India is probably the bloodiest story in history. It is a discouraging tale, for its evident moral is that civilization is a precious good, whose delicate complex of order and freedom, culture and peace, can at any moment be overthrown by barbarians invading from without or multiplying within."

नाजियों द्वारा किया गया नरसंहार तो केवल एक समय सीमा में ही चला एवं समाप्त भी कर दिया गया, किन्तु मुस्लिम बर्बर अत्याचारियों द्वारा नरसंहार तो हिटलर से भी ज्यादा खतरनाक तरीके से १२०० वर्षों तक निरंतर चलाया जा रहा है, हिटलर के नरसंहार को आसानी से संख्यात्मक रूप से समझा जा सकता है किन्तु इस्लाम के अनुयायियों के नरसंहार की तो गिनती भी असंभव है. इस्लाम की विचारधारा के अनुसार दुनिया में तीन तरह के लोग हैं... एक वे जो सीधे जन्नत जायेंगे एवं अल्लाह के बन्दे हैं यानि इस्लाम को मानने वाले... दूसरे यहूदी एवं ईसाई जिन्हें दूसरे दर्जे के नागरिकों की तरह जीने दिया जा सकता है, लेकिन जिनके लिए जन्नत में कोई जगह नहीं है... एवं तीसरे हिन्दू, बौद्ध, जैन आदि हैं जिन्हें जीने का कोई अधिकार ही नहीं है एवं जिनका इस धरती से सफाया किया जाना इस्लाम की वास्तविक स्थापना के लिए आवश्यक है.

 

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(चित्र :- पाकिस्तान से प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में खदेड़े गए हिन्दू परिवारों में से एक परिवार)

इस्लाम की सेनाओं ने अपने शुरूआती दिनों में अरब में जो सफलता पाई उसके पीछे मूल कारण सांस्कृतिक रूप से जुड़े हुए वहां के मूल निवासी थे जिन्होंने इस्लाम को इसके तात्कालिक स्वरुप में माना, युद्ध से आसान समझा एवं उनकी पीढ़ियों ने इस्लाम में जन्म लेकर कभी भी अपने आप की मूल पहचान तक जानने का प्रयास नहीं किया, किन्तु भारत में ऐसा नहीं था, इस्लाम के जन्म के ४०० वर्षों तक तो इस्लामी आततायी भारत में प्रवेश करने का प्रयास ही करते रहे, इसके अलावा उन्हें यहाँ के शासक वर्ग से संघर्ष करना पड़ा जो वीरता एवं संस्कारों में उनसे इक्कीस था, इसका परिणाम यह हुआ कि भारत में इस्लाम को दोगली नीति अपनानी पड़ी एवं समझोते कर राजसत्ता का बंटवारा भी करना पड़ा, तुर्की से चली इस्लाम की सूफी धारा ने धीरे धीरे यहाँ के समाज को अपने चंगुल में लेना आरंभ कर दिया, जिससे इस्लामी शासकों को सहायता तो मिली पर हिन्दू संघर्ष के आगे उन्हें कभी सम्पूर्ण विजय नहीं मिली.

हर आक्रमणकारी ने अपने तरीके से हिन्दुओं के शीशों से मीनारें बनवाई, एक एक दिन में १००००० हिदुओं की गर्दने उड़ाकर उनके रक्त के तालाबों में सुल्तानों एवं हरम की मलिकाओं ने स्नान किया, विजय नगर साम्राज्य को तो सन १५६४ में भारतीय जनसँख्या से विहीन ही कर दिया गया, केवल गुलाम एवं सैनिक ही बचे थे, गुलामों के भी लिंग काट कर उन्हें नपुसंक बना दिया गया था.

भारतीयों की संघर्ष क्षमता एवं जिजीविषा के आगे इस्लाम के दरिंदों ने हनिफई कानून के तहत हिन्दुओं के सह-अस्तित्व को स्वीकार तो किया, किन्तु अत्यंत ही अपमानजनक परिस्थितियों में. ऐसे में कुछ हिन्दुओं ने अपनी प्रजा की रक्षा के लिए मुसलमान शासकों से समझौते स्वीकार कर लिए, इससे काफी सीमा तक हिन्दू संस्कृति का बचाव हो पाया, इस्लामी आतंक एवं अत्याचार कुछ क्षेत्रों में सिमित मात्रा में गुलाम बनाने, विद्रोह को दबाने, या फिर आम जनता को डराने के उद्देश्य से कुछ अत्यंत ही क्रूर एवं घिनोनी सार्वजनिक हत्याओं तक सीमित हो गया. हिदुओं के विरुद्ध आखिरी जिहाद टीपू सुलतान द्वारा किया गया था जिसमें मालाबार के बचे-खुचे हिन्दुओं का क़त्ल या इस्लाम स्वीकार करने के रूप में किया गया. इसके बाद अंग्रेज शासक मजबूत होते गए, एवं मुस्लिम कमजोर, ऐसे में मुस्लिम शासकों एवं उनके चमचों ने हिन्दू-मुस्लिम एकता का कार्ड खेला एवं जनता को मूर्ख बनाया गया कि “हम तो यहीं के हैं, लेकिन ये अंग्रेज हमसे ज्यादा खतरनाक हैं”. इस प्रकार पहली बार १८५७ की लड़ाई हिन्दू-मुस्लिम एकता के नाम पर लड़ी गयी, किन्तु जैसे ही मुसलमान मजबूत होते गए एवं अंग्रेजों के भारत छोड़ने की सूरत आयी सारी हिन्दू मुस्लिम एकता की धज्जियाँ उड़ाकर देश के टुकडे-टुकडे कर दिए गए, जिसमें मूल रूप से सत्ता के भूखे लालची तथाकथित हिन्दू हित की बात करने वाले गद्दार भी शामिल थे.

भारत-पाकिस्तान के विभाजन की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं थी कि विभाजन हुआ एवं लाखों हिन्दुओं का कत्लेआम हुआ. इससे बड़ी त्रासदी यह थी कि अंग्रेजो से पहले भारत पर मुगलों का राज था, इसलिए अंग्रेजों के जाने के बाद स्वाभाविक रूप से भारत मुग़लों की संपत्ति होना चाहिए. यह मानसिकता लिए पाकिस्तान बनना, एवं मुर्ख हिन्दुस्तानियों पर तो कभी भी फिर से कब्ज़ा कर लेंगे वाला झूठा आत्मविश्वास. इसी कारण पाकिस्तान की सेना ने कबाइलियों के भेष में कश्मीर के रास्ते भारत आने का प्रयास किया एवं इसी मानसिकता को आज तक मुसलमानों के नेता एवं मुल्ला मौलवी जीते आ रहे हैं. इसी मानसिकता के जहर के कारण कश्मीर में लड़ाई इस्लाम के नाम पर जमीन हथियाने की हो रही है, न कि राजनैतिक अधिकारों की, थोडा थोडा करके चाइना एवं पाकिस्तान आने वाले सौ-दो सौ वर्षों में भारत को किनारों से निगलना चाह रहे हैं. बांग्लादेश को इस्लामी गणतंत्र घोषित करवाकर मान्यता देना, वहां के मुस्लिम शरणार्थियों को भारत की नागरिकता देना, कश्मीर की जमीन LOC के नाम पर पकिस्तान को भेंट कर देना आदि ऐसे उदहारण हैं जिनसे यह आसानी से समझा जा सकता है कि जिन्होंने यह सब होने दिया वे भारतीय एवं भारतीयता के हितचिन्तक तो कतई नहीं थे.

भारत की अंग्रेजों से स्वतंत्रता के बाद हिन्दू-मुस्लिम एकता “एकतरफा रास्ता” बनकर रह गयी जिसकी नींव २० लाख से भी ज्यादा सिखों एवं हिन्दुओं के कत्लेआम पर रखी गयी एवं हिन्दुओं के हितों के मूल्यों एवं पाकिस्तान में रह गए हिन्दुओं के धर्म परिवर्तन, उनकी माँ बहनों से बलात्कार एवं उनकी समाप्ति के मूल्य पर आज तक जारी है. वास्तविकता यह है कि एक बार इस्लाम अपनाने के बाद, कोई भी कितना ही बुद्धिमान एवं तर्कशील क्यों न हो उसके मुख्यधारा से जुड़ने के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं. हिदू विचारधारा वाले एवं जातिवादी समाज में पहचान का संकट खड़ा हो जाता है एवं ऐसे में उसे इस्लाम छोड़ने का मार्ग ही नहीं मिलता तथा धीरे धीरे इस्लाम की विकृतियों में आने वाली पीढियां गहरी से गहरी रंगती चली जाती हैं.

चूँकि इस्लाम में सौहार्द, शांति, सहिष्णुता जैसी कोई चीज है ही नहीं, इस्लाम के अनुयायियों में जो कुछ भी अच्छाई बची है उसका एकमात्र कारण उनका हिन्दू, फारसी या फिर अफ्रीकन अतीत एवं रक्त का होना है, इस्लाम ने कभी शांति को न अपनाया न ही इसकी इच्छा की. आज भारतीय समाज (समस्त मूल एवं किन्ही भी कारणों से धर्म परिवर्तित मूल) को अपने पूर्वजों पर हुए अत्याचारों को याद करना चाहिए. उन माँ बहनों पर हुए अत्याचारों को स्मरण करना चाहिए, जिनके बलिदानों के कारण आज हम यह दिन देख पा रहे हैं एवं इस्लाम के घातक कुचक्र को समझ कर उससे स्वयं सावधान रहते हुए समाज को सावधान करने का प्रयास करना चाहिए

सूफीवाद की सच्चाई बयान करता हुआ यह लेख भी पढ़ें... :- http://desicnn.com/news/sufism-dargah-and-islam-in-india 

Read 2028 times Last modified on शनिवार, 06 जनवरी 2018 10:30
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