माहेश्वरी समाज द्वारा सिरोंज का बहिष्कार क्यों? - जानिये

Written by रविवार, 26 नवम्बर 2017 07:14

इस्लामिक अत्याचारों (Islamic Terror in India) की एक और विस्मृत दास्तान पेश है. हिन्दू समाज के साथ 1200 वर्षों से मजहब के नाम पर अत्याचार होता आया है।

सबसे खेदजनक बात यह है कि कोई इस अत्याचार के बारे में हिन्दुओं को बताये तो हिन्दू खुद ही उसे ही गंभीरता से नहीं लेते, क्यूंकि उन्हें सेकुलरिज्म के नशे में रहने की आदत पड़ गई है। रही सही कसर हमारे पाठयक्रम ने पूरी कर दी, जिसमें अकबर महान, टीपू सुलतान देशभक्त आदि पढ़ा पढ़ा कर इस्लामिक शासकों के अत्याचारों को छुपा दिया गया। अब भी कुछ बचा था तो संविधान में ऐसी धारा डाल दी गई, जिसके अनुसार सार्वजनिक मंच अथवा मीडिया में इस्लामिक अत्याचारों पर विचार करना धार्मिक भावनाओं को भड़काने जैसा करार दिया गया। इस सुनियोजित षड़यंत्र का परिणाम यह हुआ कि हिन्दू समाज अपना सत्य इतिहास ही भूल गया।

ऐसी हज़ारों दास्तानों में से एक है सिरोंज (Sironj MP) के महेश्वरी समाज की दास्तान। सिरोंज यह स्थान मध्यप्रदेश में विदिशा (Vidisha, MP) से ५० मील की दूरी पर एक तहसील है। मध्यकाल में इस स्थान का विशेष महत्व था। कई इमारतें व उनसे जुड़ी ऐतिहासिक घटनाएँ इस बात का प्रमाण है। सिरोंज के दक्षिण में स्थित पहाड़ी पर एक प्राचीन मंदिर है। इसे उषा का मंदिर कहा जाता है। इसी नाम के कारण कुछ लोग इसे बाणासुर की राजधानी श्रोणित नगर के नाम से जानते थे। संभवतः यही शब्द बिगड़कर कालांतर में "सिरोंज' हो गया। नगर के बीच में पहले एक बड़ी हवेली हुआ करती थी, जो अब ध्वस्त हो चुकी है, इसे "रावजी" की हवेली के नाम से जाना जाता है। इसका निर्माण संभवतः मराठा- अधिपत्य के बाद ही हुआ होगा। ऐसी मान्यता है कि यह मल्हाराव होल्कर के प्रतिनिधि का आवास था।

200 साल पहले सिरोंज, टोंक के एक नवाब के आधिपत्य में था। एक बार नवाब ने इस क्षेत्र का दौरा किया। उसी रात की यहाँ के माहेश्वरी सेठ की पुत्री का विवाह था। संयोग से रास्ते में डोली में से पुत्री की कीमती चप्पल गिर गई। किसी व्यक्ति ने उसे नवाब के खेमे तक पहुँचा दिया। नवाब को यह भी कहा गया कि चप्पल से भी अधिक सुंदर इसको पहनने वाली है। यह जानने के बाद नवाब द्वारा सेठ की पुत्री की माँग कर दी गई। यह समाचार सुनते ही माहेश्वरी समाज में खलबली मच गई। बेटी देने का तो प्रश्न ही नहीं उठता था। अब किया क्या जाये? माहेश्वरी समाज के प्रतिनिधियों ने कूटनीति से काम किया। नवाब को यह सूचना दे दी गयी कि प्रातः होते ही डोला दे दिया जाएगा। इससे नवाब प्रसन्न हो गया। इधर माहेश्वरियों ने रातों- रात पुत्री सहित शहर से पलायन कर दिया, और उनके पूरे समाज में यह निर्णय लिया गया कि माहेश्वरी समाज में कोई भी न तो इस स्थान का पानी पिएगा, न ही निवास करेगा। एक रात में अपने स्थान को उजाड़ कर महेश्वरी समाज के लोग दूसरे राज्य चले गए, मगर अपनी इज्जत, अपनी अस्मिता से कोई समझौता नहीं किया। आज भी एक परम्परा माहेश्वरी समाज में अविरल चल रही है। आज दो सौ वर्षों के बाद भी माहेश्वरी समाज का कोई भी व्यक्ति सिरोंज जाता है, तो न वहाँ का पानी पीता है और न ही रात को कभी रुकता हैं। यह त्याग वह अपने पूर्वजों द्वारा लिए गए संकल्प को निभाने एवं मुसलमानों के अत्याचार के विरोध को प्रदर्शित करने के लिए करता हैं।

माहेश्वरी समाज विदिशा के अध्यक्ष एडवोकेट केजी माहेश्वरी कहते हैं कि, हमारे पूर्वजों ने जो निर्णय लिया है, उसका सम्मान करने के लिए हम लोग आज भी सिरोंज नहीं जाते. यदि कभी मजबूरी में जाना ही पड़े तो वहाँ का पानी भी नहीं पीते और रात को ठहरने का तो सवाल ही नहीं उठता. पूर्व विधायक बृजमोहन माहेश्वरी कहते हैं, कि जब मैं शमशाबाद का विधायक था, तब भी शहर से बाहर बने डाक बंगले पर रुकता था, सिरोंज में नहीं.... यह परंपरा के पालन का सवाल है. अब ऐसे में कोई संजय लीला भंसाली जैसा व्यक्ति अपनी मनमानी कहानी को लेकर राजस्थान की रानी पद्मिनी पर फिल्म बनाएगा, तो स्वाभाविक है कि इस्लाम की सच्चाई और नीयत समझने वाले आहत तो होंगे ही. 

दरअसल मुस्लिम शासकों में हिंदुओं की लड़कियों को उठाने, उन्हें अपनी हवस बनाने, अपने हरम में भरने की होड़ थी (पाकिस्तान और बांग्लादेश में आज भी इसी प्रकार की इस्लामिक हवस का पालन किया जा रहा है और हिन्दू लडकियां उठाई जा रही हैं). उनके इस व्यसन के चलते हिन्दू प्रजा सदा आशंकित और भयभीत रहती थी। ध्यान दीजिये किस प्रकार हिन्दू समाज ने अपना देश, धन, सम्पति आदि सब त्याग कर दर दर की ठोकरे खाना स्वीकार किया। मगर अपने धर्म से कोई समझौता नहीं किया। अगर ऐसी शिक्षा, ऐसे त्याग और ऐसे प्रेरणादायक इतिहास को हिन्दू समाज आज अपनी लड़कियों को दूध में घुटी के रूप में दे, तो कोई हिन्दू लड़की कभी लव जिहाद का शिकार न बने। 

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स्रोत साभार :- पत्रिका, १७ मार्च २०१७ 

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