काँग्रेसी और दलित चिन्तक, सावरकर से चिढ़ते क्यों हैं?

Written by सोमवार, 26 जून 2017 07:34

जब भी विनायक दामोदर सावरकर का ज़िक्र आता है, अथवा उनकी जयन्ती/पुण्यतिथि आती है, तो आपने अक्सर देखा होगा कि सावरकर की सभी बातों को दरकिनार करके कुछ निहित स्वार्थी और घटिया तत्व उनके "कथित माफीनामे" को उछालने लगते हैं. चूँकि उनके पास सावरकर की आलोचना करने का कोई और मुद्दा नहीं होता है, इसलिए वे अपनी शर्म छिपाने के लिए इस "नकली मुद्दे" को हवा देते रहते हैं.

वास्तव में बात यह है कि अंग्रेज सावरकर से जितना भयभीत से, उतना भारत में किसी भी क्रांतिकारी से नहीं थे. दूसरे पड़ाव में जब अंडमान से सशर्त रिहाई के बाद सावरकर रत्नागिरी में अपनी दलित-सेवा के लिए मशहूर होने लगे तो एक बार फिर दलितों के नाम पर रोटी खाने वाले स्वार्थी तत्वों की आत्मा कलपने लगी. इस लेख में आपको संक्षेप में वीर सावरकर के दो रूप पढने को मिलेंगे, पहला उनके अंडमान जेल प्रवास से सम्बंधित (जिसमें अंग्रेजों से ली गई तथाकथित माफी के बारे में तथ्य हैं) और दूसरा भाग सावरकर की दलित सेवाओं और उनके योगदान को लेकर है...  

वीर सावरकर भारत देश के महान क्रांतिकारियों में से एक थे। कांग्रेस राज की बात है... मणिशंकर अय्यर ने मुस्लिम तुष्टिकरण को बढ़ावा देने के लिए अण्डेमान स्थित सेलुलर जेल से वीर सावरकर के स्मृति चिन्हों को हटवा दिया। यहाँ तक उन्हें अंग्रेजों से माफ़ी मांगने के नाम पर गद्दार तक कहा था। भारत देश की विडंबना देखिये जिन महान क्रांतिकारियों ने अपना जीवन देश के लिए बलिदान कर दिया। उन क्रांतिकारियों के नाम पर जात-पात, प्रांतवाद, विचारधारा, राजनीतिक हित आदि के आधार पर विभाजन कर दिया गया। इस विभाजन का एक मुख्य कारण देश पर सत्ता करने वाला एक दल रहा। जिसने केवल गांधी-नेहरू को देश के लिए संघर्ष करने वाला प्रदर्शित किया। जिससे यह भ्रान्ति पैदा हो गई हैं कि देश को स्वतंत्रता गांधी जी/कांग्रेस ने दिलाई? वीर सावरकर भी स्वाधीनता के लिए प्राणोत्सर्ग करने वाले, सर्वस्व समर्पित करने वाले असंख्य क्रांतिकारियों, अमर हुतात्माओं में से एक थे जिनकी पूर्ण रूप से उपेक्षा की गई। वीर सावरकर को जब अंडमान जेल में दाखिल किया गया था उस समय उनकी जेलवाली वर्दी पर "D" लिखा गया था अर्थात "Dangerous". सावरकर ने अपनी डायरी और लेखों में अंडमान की जेल-यात्रा पर प्रकाश डालते हुए कोल्हू में बैल की तरह जुत कर तेल पेरने का बड़ा ही मार्मिक वर्णन किया है | उन्होंने लिखा है -

"हमें तेल का कोल्हू चलाने का काम सौंपा गया है जो बैल के ही योग्य माना जाता है | जेल में सबसे कठिन काम कोल्हू चलाना ही था | सवेरे उठते ही लंगोटी पहनकर कमरे में बंद होना तथा सांय तक कोल्हू का डंडा हाथ से घुमाते रहना | कोल्हू में नारियल की गरी पड़ते ही वह इतना भारी चलने लगता कि हृष्ट-पुष्ट शरीर के व्यक्ति भी उसकी बीस फेरियां करते रोने लग जाते| राजनीतिक कैदियों का स्वास्थ्य खराब हो या भला, ये सब सख्त काम उन्हें दिए ही जाते थे| सवेरे दस बजे तक लगातार चक्कर लगाने से श्वास भारी हो जाता और प्रायः सभी को चक्कर आ जाता या कोई बेहोश हो जाते | दोपहर का भोजन आते ही दरवाजा खुल पड़ता, बंदी थाली भर लेता और अंदर जाता कि दरवाजा बंद| यदि इस बीच कोई अभागा कैदी चेष्टा करता कि चलो दो मिनट का समय मिला है तो वह हाथ-पैर धो ले या बदन पर थोड़ी धूप लगा ले, तो नम्बरदार का पारा चढ़ जाता| वह माँ-बहन की गालियाँ देनी शुरू कर देता था| हाथ धोने का पानी नहीं मिलता था, पीने के पानी के लिए तो नम्बरदार के सैंकड़ों निहार करने पड़ते थे| कोल्हू को चलाते चलाते पसीने से तर हो जाते, प्यास लग जाती| पानी मांगते तो पानी वाला पानी नहीं देता था| यदि कहीं से उसे एकाध चुटकी तम्बाकू की दे दी तो अच्छी बात होती, नहीं तो उलटी शिकायत होती कि ये लोग पानी बेकार बहाते हैं जो जेल में एक बड़ा भारी जुर्म होता| यदि किसी ने जमादार से शिकायत की तो वह गुस्से में कह उठता - "दो कटोरी पानी देने का हुक्म है, तुम तो तीन पी गया, और पानी क्या तुम्हारे बाप के यहाँ से आएगा?" नहाने की तो कल्पना करना ही अपराध था| हां, वर्षा हो तो भले नहा लें| केवल पानी ही नहीं अपितु "भोजन की भी वही स्थिति थी| खाना देकर जमादार कोठरी बंद कर देता और कुछ देर में हल्ला करने लगता - "बैठो मत, शाम को तेल पूरा हो नही हुआ तो पीटे जाओगे, और जो सजा मिलेगी सो अलग|" इस वातावरण में बंदियों को खाना निगलना भी कठिन हो जाता| बहुत से ऐसा करते की मुंह में कौर रख लिया और कोल्हू चलाने लगे| कोल्हू पेरते पेरते, थालियों में पसीना टपकाते टपकाते, कौर को उठाकर मुंह में भरकर निगलते कोल्हू पेरते रहते| १०० में से एकाध ऐसे थे जो दिन भर कोल्हू में जुतकर तीस पौंड तेल निकाल पाते| जो कोल्हू चलाते चलाते थककर हाय हाय कर दते, उन पर जमादार और वार्डन की मार पड़ती| तेल पूरा न होने पर उपर से थप्पड़ पड़ रहे हैं, आँखों में आंसुओं की धारा बह रही है| "

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वीर सावरकर जानते थे कि यह अत्याचार क्रांतिकारियों पर अंग्रेजों द्वारा इसलिए किया जा रहा है ताकि वे मानसिक रूप से विक्षिप्त होकर या तो पागल हो जाये अथवा मर जाये। अंग्रेजों की छदम न्यायप्रियता का यह साक्षात उदहारण था। इतिहास फिर से दोहरा रहा था। औरंगजेब ने भी कभी अंग्रेजों के समान शिवाजी को कैद कर समाप्त करने का सोचा था ताकि शिवजी दक्कन का कभी दोबारा मुँह न देख सके। जन्मभूमि से इतनी दूर जाकर इस प्रकार बिना कुछ किए मरना, वीर सावरकर को किसी भी प्रकार से स्वीकार्य नहीं था। उन्हें लगा कि उनका जीवन इसी प्रकार से नष्ट हो जायेगा। मातृभूमि की सेवा वह कभी नहीं कर पाएंगे। उन्होंने साम,दाम, दंड और भेद की वही नीति अपनाई जो वीर शिवाजी ने औरंगज़ेब की कैद में अपनाई थी। उन्होंने अंग्रेजों से क्षमा मांग कर मातृभूमि जाने का प्रस्ताव उनके समक्ष रखा। अंग्रेज उनकी कूटनीति का शिकार बन गए। वीर सावरकर को सशर्त रिहा कर दिया गया। अपने निर्वासित जीवन में उन्हें रत्नागिरी से बाहर नहीं निकलना था और न ही किसी प्रकार की क्रांतिकारी गतिविधि में भाग लेना था। वीर सावरकर ने अवसर का समुचित लाभ उठाया। उन्होंने अण्डमान जेल के कैदियों के अधिकारों के लिए आंदोलन किया। उससे भी बढ़कर उन्होंने छुआछूत रूपी अन्धविश्वास के विरोध में आंदोलन चलाया। वीर सावरकर ने पतित पावन मंदिर की स्थापना की जिसमें बिना किसी भेदभाव के ब्राह्मण से लेकर शूद्र सभी को प्रवेश करने की अनुमति थी। सामूहिक भोज का आयोजन किया जिसमें शूद्रों के हाथ से ब्राह्मण भोजन ग्रहण करते थे। दलित बच्चों को जनेऊ धारण करवाने से लेकर गायत्री मंत्र की शिक्षा दी। रत्नागिरि में वीर सावरकर ने छुआछूत रूपी अभिशाप को समाप्त करने के लिए अत्यंत प्रभावशाली आंदोलन किया। इसके साथ साथ जनचेतना के लिए उनका लेखन कार्य अविरल चलता रहा।

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(सन 1929 में रत्नागिरी के दलित बच्चों का उपनयन संस्कार करके जनेऊ धारण करवाते हुए सावरकर)

दलित उद्धारक के रूप में वीर सावरकर

सावरकर जी पर लगे आरोप भी अद्वितीय थे और उन्हें मिली सजा भी अद्वितीय थी। एक तरफ उन पर आरोप था कि अंग्रेज सरकार के विरुद्ध युद्ध की योजना बनाने का, बम बनाने का और विभिन्न देशों के क्रांतिकारियों से सम्पर्क करने का तो दूसरी तरफ उनको सजा मिली थी पूरे 50 वर्ष तक दो सश्रम आजीवन कारावास। इस सजा पर उनकी प्रतिक्रिया भी अद्वितीय थी, कि ईसाई मत को मानने वाली अंग्रेज सरकार कब से पुनर्जन्म अर्थात दो जन्मों को मानने लगी? वीर सावरकर को 50 वर्ष की सजा देने के पीछे अंग्रेज सरकार का मंतव्य था कि उन्हें किसी भी प्रकार से भारत अथवा भारतीयों से दूर रखा जाये। जिससे वे क्रांति की अग्नि को न भड़का सके। सावरकर के लिए शिवाजी महाराज प्रेरणा स्रोत थे। जिस प्रकार औरंगजेब ने शिवाजी महाराज को आगरे में कैद कर लिया था, उसी प्रकार अंग्रेज सरकार ने भी वीर सावरकर को कैद कर लिया था। जैसे शिवाजी महाराज ने औरंगजेब की कैद से छूटने के लिए अनेक पत्र लिखे, उसी प्रकार से वीर सावरकर ने भी अंग्रेज सरकार को पत्र लिखे। जब उनकी अंडमान की कैद से छुटने की योजना असफल हुई, जब उसे अनसुना कर दिया गया। तब वीर शिवाजी की तरह वीर सावरकर ने भी कूटनीति का सहारा लिया क्यूंकि उनका मानना था अगर उनका सम्पूर्ण जीवन इसी प्रकार अंडमान की अँधेरी कोठरियों में निकल गया तो उनका जीवन व्यर्थ ही चला जायेगा। इसी रणनीति के तहत उन्होंने सरकार से सशर्त मुक्त होने की प्रार्थना की, जिसे सरकार द्वारा मान तो लिया गया। उन्हें रत्नागिरी में 1924 से 1937 तक राजनितिक क्षेत्र से दूर नज़रबंद रहना था। विरोधी लोग इसे वीर सावरकर का माफीनामा, अंग्रेज सरकार के आगे घुटने टेकना और देशद्रोह आदि कहकर उनकी आलोचना करते हैं, जबकि यह आपातकालीन धर्म अर्थात कृष्ण कूटनीति थी, जो कि शिवाजी ने भी अपनाई थी।

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मुस्लिम तुष्टिकरण को प्रोत्साहन देने के लिए मणिशंकर अय्यर ने अंडमान द्वीप के कीर्ति स्तम्भ से वीर सावरकर का नाम हटा दिया और तत्कालीन कौंग्रेस सरकार ने संसद भवन में भी उनके चित्र को लगाने का विरोध किया। जीवन भर जिन्होंने अंग्रेजों की यातनाये सहीं, मृत्यु के बाद उनका ऐसा अपमान करने का प्रयास किया गया। उनका विरोध करने वालों में कुछ दलित वर्ग की राजनीती करने वाले नेता भी थे। जिन्होंने अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षा को पूरा करने के लिए उनका विरोध किया था। दलित वर्ग के बीच कार्य करने का वीर सावरकर को अवसर उनके रत्नागिरी प्रवास के समय मिला। 8 जनवरी 1924 को सावरकर जी रत्नागिरी में प्रविष्ट हुए तो उन्होंने घोषणा कि की वे रत्नागिरी दीर्घकाल तक आवास करने आए हैं, और छुआछुत समाप्त करने का आन्दोलन चलाने वाले है। उन्होंने उपस्थित सज्जनों से कहाँ कि अगर कोई अछूत वहां हो तो उन्हें ले आये, और अछूत महार जाति के बंधुओं को अपने साथ बैलगाड़ी में बैठा लिया। पाठकगण उस समय में फैली जातिवाद की कुप्रथा का सरलता से आंकलन कर सकते है, जब किसी भी शुद्र को सवर्ण के घर में प्रवेश तक निषेध था। नगर पालिका के भंगी को नारियल की नरेटी में चाय डाली जाती थी। किसी भी शुद्र को नगर की सीमा में धोती के स्थान पर अंगोछा पहनने की ही अनुमति थी। रास्ते में महार की छाया पड़ जाने पर अशौच की पुकार मच जाती थी। कुछ लोग महार के स्थान पर बहार बोलते थे जैसे की महार कोई गाली हो। न्यायालय में साक्षी के रूप में महार को कटघरे में खड़े होने की अनुमति न थी। इस भंयकर दमन के कारण महार समाज का मानो साहस ही समाप्त हो चुका था, परन्तु इससे लड़ने का साहस उस समय केवल और केवल सावरकर में ही था, और उन्होंने किया भी. 

इसके लिए सावरकर जी ने दलित बस्तियों में जाने का, सामाजिक कार्यों के साथ साथ धार्मिक कार्यों में भी दलितों के भाग लेने का और सवर्ण एवं दलित दोनों के लिए पतितपावन मंदिर की स्थापना का निश्चय लिया गया। जिससे सभी एक स्थान पर साथ साथ पूजा कर सके और दोनों के मध्य दूरियों को दूर किया जा सके।

1. रत्नागिरी प्रवास के 10-15 दिनों के बाद में सावरकर जी को मढ़िया में हनुमान जी की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा का निमंत्रण मिला। उस मंदिर के देवल पुजारी से सावरकर जी ने कहा कि प्राण प्रतिष्ठा के कार्यक्रम में दलितों को भी आमंत्रित किया जाये। जिस पर वह पहले तो न करता रहा पर बाद में मान गया। श्री मोरेश्वर दामले नामक किशोर ने सावरकार जी से पूछा कि आप इतने साधारण मनुष्य से व्यर्थ इतनी चर्चा क्यूँ कर रहे थे? इस पर सावरकर जी ने कहाँ कि “सैंकड़ों लेख या भाषणों की अपेक्षा प्रत्यक्ष रूप में किये गए कार्यों का परिणाम अधिक होता है। अबकी हनुमान जयंती के दिन तुम स्वयं देख लेना।”

2. 29 मई 1929 को रत्नागिरी में श्री सत्य नारायण कथा का आयोजन किया गया जिसमे सावरकर जी ने जातिवाद के विरुद्ध भाषण दिया जिससे की लोग प्रभावित होकर अपनी अपनी जातिगत बैठक को छोड़कर सभी महार- चमार एकत्रित होकर बैठ गए और सामान्य जलपान हुआ।

3. 1934 में मालवण में अछूत बस्ती में चायपान , भजन कीर्तन, अछूतों को यज्ञपवीत ग्रहण, विद्यालय में समस्त जाति के बच्चों को बिना किसी भेदभाव के बैठाना, सहभोज आदि हुए।

4. 1937 में रत्नागिरी से जाते समय सावरकर जी के विदाई समारोह में समस्त भोजन अछूतों द्वारा बनाया गया जिसे सभी सवर्णों- अछूतों ने एक साथ ग्रहण किया था।

5. एक बार शिरगांव में एक चमार के घर पर श्री सत्य नारायण पूजा थी जिसमे सावरकर जो को आमंत्रित किया गया था। सावरकार जी ने देखा की चमार महोदय ने किसी भी महार को आमंत्रित नहीं किया था। उन्होंने तत्काल उससे कहाँ की आप हम ब्राह्मणों के अपने घर में आने पर प्रसन्न होते हो, पर में आपका आमंत्रण तभी स्वीकार करूँगा जब आप महार जाति के सदस्यों को भी आमंत्रित करेंगे। उनके कहने पर चमार महोदय ने अपने घर पर महार जाति वालों को आमंत्रित किया था।

6. 1928 में शिवभांगी में विट्टल मंदिर में अछुतों के मंदिरों में प्रवेश करने पर सावरकर जी का भाषण हुआ।

7. 1930 में पतितपावन मंदिर में शिवू भंगी के मुख से गायत्री मंत्र के उच्चारण के साथ ही गणेशजी की मूर्ति पर पुष्पांजलि अर्पित की गई। 

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(वीर सावरकर द्वारा ब्राह्मणों के नेतृत्व में दलितों के लिए विशेष रूप से स्थापित पतित-पावन मंदिर का वर्तमान स्वरूप, जिसके पुजारी दलित समाज से होते हैं)

8. 1931 में पतितपावन मंदिर का उद्घाटन स्वयं शंकराचार्य श्री कूर्तकोटि के हाथों से हुआ एवं उनकी पाद्यपूजा चमार नेता श्री राज भोज द्वारा की गयी थी। वीर सावरकर ने घोषणा करी की इस मंदिर में समस्त हिंदुओं को पूजा का अधिकार है और पुजारी पद पर गैर ब्राह्मण की नियुक्ति होगी।

इस प्रकार के अनेक उदहारण वीर सावरकर जी के जीवन से हमें मिलते है जिससे दलित उद्धार के विषय में उनके विचारों को, उनके प्रयासों को हम जान पाते हैं। सावरकर जी के बहुआयामी जीवन के विभिन्न पहलुयों में से सामाजिक सुधारक के रूप में वीर सावरकर को स्मरण करने का मूल उद्देश्य दलित समाज को विशेष रूप से सन्देश देना है। जिसने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए सवर्ण समाज द्वारा अछूत जाति के लिए गए सुधार कार्यों की अपेक्षा कर दी है, और उन्हें केवल विरोध का पात्र बना दिया हैं। लन्दन में पढ़ते हुए वीर सावरकर महान क्रांतिकारी श्याम जी कृष्ण वर्मा जी के क्रांतिकारी विचारों के संपर्क में आये। श्यामजी कृष्ण वर्मा स्वामी दयानंद के शिष्य थे। स्वामी दयानंद के दलितों के उद्धार करने रूपी चिंतन को हम स्पष्ट रूप से वीर सावरकर के चिंतन में देखते हैं।

खेद हैं कि वीर सावरकर के इस चिंतन, श्रम और पुरुषार्थ की अनदेखी कर साम्यवादी इतिहासकार अपनी आदत के मुताबिक उन्हें गद्दार कहकर अपमानित करते हैं। उनकी माफ़ी मांगने की कूटनीति को कायरता के रूप में प्रेषित करते है। धिक्कार है ऐसे पक्षपाती लेखकों को और ऐसे राजनेताओं को जो वीर सावरकर के महान कार्यों की उपेक्षा कर अपने राजनीतिक हितों को साधने में लगे हुए हैं। उन्हें गद्दार कहते है। वीर सावरकर गद्दार नहीं अपितु स्वाभिमानी थे। देशभक्त थे। धर्मयोद्धा थे। अनेक क्रांतिकारियों के मार्गदर्शक थे। कूटनीतिज्ञ थे। प्रबुद्ध लेखक थे। आत्मस्वाभिमानी थे। समाज सुधारक थे। हमारे क्रांतिकारी महान हैं, गद्दार तो वो है जो उनकी आलोचना करते है।  

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(लेख का जो शीर्षक चित्र अर्थात कार्टून है, उसका पूर्ण ब्यौरा इस प्रकार है... यह कार्टून 1946 में प्रकाशित एक अंगरेजी अखबार का है. इस कार्टून में वीर सावरकर को महाराष्ट्र के प्रसिद्ध संत ज्ञानेश्वर के रूप में चित्रित किया गया है. संत ज्ञानेश्वर के बारे में यह जनश्रुति है कि उन्होंने अपने चमत्कार से बैलों को भी बोलना और प्रार्थना करना सिखा दिया था. कार्टूनिस्ट ने इस चित्र में यह दर्शाने का प्रयास किया है कि वीर सावरकर ही एकमात्र ऐसे नेता हैं जो अपने जादू या चमत्कार के बल पर अपने विरोधियों, अर्थात बैलों के मुख से यह उगलवा सकते हैं कि, "पाकिस्तान का निर्माण अव्यावहारिक है"... "पाकिस्तान बना तो एक गृहयुद्ध अवश्य होगा"... इत्यादि.) 

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