डार्विन थ्योरी विवाद :- सत्यपाल सिंह सही थे, कुछ प्रश्न

Written by मंगलवार, 30 जनवरी 2018 11:55

हाल ही में केन्द्रीय शिक्षा राज्यमंत्री श्री सत्यपाल सिंह (Satyapal Singh) ने मनुष्य की उत्पत्ति से सम्बन्धित बहुप्रचलित और बहुप्रचारित “डार्विन थ्योरी” (Darwin Theory) की वैज्ञानिकता को चुनौती देते हुए अपना बयान दिया था. जिस पर भारत के कथित बुद्धिजीवियों ने बिना किसी ठोस वजह के अथवा बिना किसी तर्क-वितर्क के हंगामा मचाना शुरू कर दिया था (क्योंकि यह बयान भाजपा सरकार के मंत्री ने दिया था).

हद तो तब हो गई, जब मीडिया के दबाव में और कथित सेकुलर बुद्धिजीवियों की “गुड़-बुक” में शामिल रहने के लिए HRD मंत्री प्रकाश जावडेकर (Prakash Javdekar) ने भी सत्यपाल सिंह को डपटकर चुप करवा दिया, कि उन्हें डार्विन के सिद्धांत पर नहीं बोलना चाहिए. बेचारे सत्यपाल सिंह चुप्पी साध गए, लेकिन उनके द्वारा उठाए गए डार्विन थ्योरी पर इस सवाल ने देश में हलचल मचा दी और विभिन्न तरह के ठोस तर्कों के साथ कई विज्ञानियों ने भी सत्यपाल सिंह का समर्थन किया. वास्तव में देखा जाए तो केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री श्री सत्यपाल सिंह ने डार्विन के विकासवाद पर प्रश्न खड़ा करके बड़ी सांस्कृतिक सेवा की है। वैसे तो डार्विन की पुस्तक छपने के समय से ही उनके उत्क्रांतिवाद (Evolution Theory) का अनेक वैज्ञानिक विरोध करते रहें हैं, पर अभी तक भारत पर हावी गुलाम मानसिकता ने उसे कोई बड़ी चुनौती नहीं दी थी.

कुछ वैज्ञानिक सोच के “महानुभाव” सत्यपाल सिंह के बयान को साम्प्रदायिक संकीर्णताजन्य रूढ़िवादी सोच की संज्ञा दे रहे हैं। जबकि मंत्रीजी का यह विचार रूढ़िवादी नहीं, बल्कि सुदृढ़ तर्कों पर आधारित वैदिक विज्ञान का ही पक्ष है। ऐसा नहीं है कि डार्विन के विकासवाद का विरोध कुछ भारतीय विद्वान् ही करते हैं अपितु अनेक यूरोपियन वैज्ञानिक भी इसे नकारते आये हैं। पहले विज्ञान कहता था, कि एक कोशीय अमीबा से विकास होते होते मनुष्य योनि तक उत्क्रांति हुई। अब विज्ञान कहता है कि सीधे अमीबा से मनुष्य तक की विकास यात्रा एक रेखीय नहीं हुई, बल्कि अनेक शाखाएं होती गईं और उसमें से बंदर प्रजाति में चिंपाजी जाति से मनुष्य की उत्क्रांति हुई! अस्तु।

इस उत्क्रांतिवाद (Darwin Evolution Theory) के समर्थकों से मेरा पहला प्रश्न है कि क्या वे इस उत्क्रांतिवाद को सम्पूर्ण रूप में मानते हैं? मेरा निष्कर्ष है, आज का विज्ञान भी उसे मानने में कुटिलता करता है। अगर आधुनिक विज्ञान ऐसा मानता है कि मनुष्य की उत्क्रांति चिंपांजी से हुई है, तो वह आदिमानव को शाकाहारी बताता है या मांसाहारी? सभी पुस्तकों में आदिमानव को तो मांसाहारी बताया गया है... यदि डार्विन के अनुसार बंदर प्रजाति से मनुष्य जाति उत्क्रांत हुई है, तो मनुष्य भी अपने आहार-भोजन में बंदर प्रजाति की नकल करेगा या जंगली जानवरों की नकल करेगा? क्या आदि मानव जाति को मांसाहारी बता कर स्वयं वैज्ञानिक जगत डार्विन के उत्क्रांतिवाद पर सवाल नहीं खड़े किए हैं? जब बन्दर (या चिम्पांजी) कभी भी माँसाहारी था ही नहीं, तो आदिमानव माँसाहारी कैसे बन गया, क्योंकि उसमें तो बन्दर के भोज्य गुण आने चाहिए ना??

Darwin 2

 

दूसरी बात.... इस जगत के लगभग सभी प्राणी पानी में जन्मजात तैरना जानते हैं। रेगिस्तान में बढ़ा भैंस का बच्चा भी, जिसने कभी तालाब नहीं देखा हो, वह भी पानी में उतरते ही तैरने लगता है। डार्विन के उत्क्रांतिवाद को सनातन सत्य मानने वाले जो वैज्ञानिक मनुष्य जाति की उत्पत्ति जिस बंदर प्रजाति से मानते हैं, वे भी पानी में तैरने वाले गुण को “जन्मजात” मानते हैं, लेकिन क्या मनुष्य का बच्चा पानी में तैरना जन्मजात जानता है? नही... उसे सीखना पड़ता है। अब यह कैसी डार्विन उत्क्रांति है कि बंदर प्रजाति तो जन्मजात तैरना जानती है, लेकिन उसी से मनुष्य बने हुए व्यक्ति का बच्चा तैरना भूल गया? यह कैसा विकासवाद है? यदि डार्विन का उत्क्रांतिवाद सत्य होता, तो बंदर प्रजाति की तरह ही मनुष्य को भी जन्मजात तैरना आना चाहिए था. स्वाभाविक है कि यह कथित उत्क्रांतिवाद अधूरा है, अपूर्ण विज्ञान है.

तीसरी बात... इस विश्व में दो तरह के दृश्य प्राणी दिखाई देते हैं – अंडज और जरायुज. जरायुज अर्थात शिशु का जन्म होता है, और अण्डज में पहले अंडे आते हैं, उनसे शिशु उत्पन्न होते हैं। जिन प्रजातियों में शिशु का सीधे जन्म होता है, जिनमें बंदर प्रजाति भी है, उन सभी में जन्म होते ही माता के गर्भ में जुड़ी गर्भनाल अपने-आप टूट जाती है। लेकिन मनुष्य में यह गर्भनाल अपने आप नहीं टूटती है... ऐसा क्यों? मनुष्य में गर्भनाल अपने आप नहीं टूटती है, काटनी पड़ती है, बांधनी पड़ती है। अगर ऐसा नहीं किया तो कठिन परिस्थिति उत्पन्न हो जाती है. अपवाद रूप में ऐसे कठिन प्रसंग अन्य प्राणियों में भी आते हैं, पर वह नियम नहीं है, अपवाद है। अब सवाल उठता है कि अन्य प्राणियों में गर्भनाल का अपने आप टूटना लेकिन मनुष्य में न टूटना, क्या यह डार्विन के उत्क्रांति या विकास सिद्धांत में फिट बैठता है? अगर मनुष्य की उत्क्रांति बंदर प्रजाति से होती, तो उसकी गर्भनाल भी प्रसव के समय अपने-आप टूट जाती, पर ऐसा कहीं नहीं होता, और कभी ऐसा होता था, मनुष्य की शरीर रचना के आधार पर भी कभी संभव नहीं! ऐसे में यह Darvin Evolution हुआ या मनुष्य की “स्वतंत्र योनि” होने का द्योतक हुआ?

इस लेख में डार्विन के उत्क्रांतिवाद को अधूरा विज्ञान सिद्ध करने के लिए तीन प्रश्न उपस्थित किये हैं। ऐसे अनेक प्रश्न उपस्थित करने की आवश्यकता है। इस सृष्टि के अनेक रहस्य हैं, जिनका उत्तर अभी तक विज्ञान के पास नहीं है। उसे विज्ञान स्वीकारता है, वैसे ही इस धरा पर जीव सृष्टि के विषय में विज्ञान क्यों नहीं स्वीकारता कि वह अभी उत्तर ढूंढने का प्रयास कर रहा है... और अंतिम उत्तर अभी मिला नहीं है। इस आधार पर वैज्ञानिकों को डार्विन के विकासवाद को कुरआन की तरह “अंतिम सत्य” के रूप में रखने से बचना चाहिए। यही विज्ञान जगत के लिए अधिक सही अवस्था होगी....

शारीरिक विकास

१. डार्विन के समर्थक विकासवादी अमीबा से विकसित होकर पहले बन्दर फिर शनैः-२ मनुष्य की उत्पत्ति मानते हैं। वे यह बताएं कि उस पहले “अमीबा” की उत्पत्ति कैसे हुई?

२. यदि किसी अन्य ग्रह से यह जीवन (या अमीबा) आया, तो वहाँ उत्पत्ति कैसे हुई? और जब उस ग्रह पर उत्पत्ति हो सकती है, तो इस पृथ्वी पर क्यों नहीं हो सकती?

३. यदि अमीबा की उत्पत्ति रासायनिक क्रियाओं से किसी ग्रह पर हुई, तब मनुष्य के शुक्राणु व अण्डाणु की उत्पत्ति इसी प्रकार क्यों नहीं हो सकती?

४. विकासवाद के अनुसार उड़ने की आवश्यकता होने पर प्राणियों के पंख आने की बात कही जाती है, परन्तु मनुष्य जब से उत्पन्न हुआ, उड़ने हेतु हवाई जहाज बनाने का प्रयत्न करता रहा, उसके पंख क्यों नहीं उगे? यदि डार्विन का विकासवाद पूर्णरूप से सही होता, तो हवाई जहाज के अविष्कार की आवश्यकता नहीं होती।

५. डार्विन के अनुसार शीत प्रदेशों में शरीर पर लम्बे बाल विकसित होने की बात कही जाती है, तब शीत प्रधान देशों में शुरू से रहने वाले आदिमानवों के रीछ जैसे बाल क्यों नहीं उगे? उसे कम्बल आदि की आवश्यकता क्यों पड़ी?

६. जिराफ की गर्दन इसलिए लम्बी हुई कि वह धरती पर घास सूख जाने पर ऊपर पेड़ों की पत्तियां गर्दन ऊँची करके खाता था। विकासवाद के समर्थक जरा बताएं कि, कितने वर्ष तक नीचे सूखा और पेड़ों की पत्तियां हरी रहीं? फिर बकरी आज भी पेड़ों पर दो पैर रखकर पत्तियां खाती है, उसकी गर्दन लम्बी क्यों नहीं हुई?

७. बंदर की पूंछ गायब होकर वह मनुष्य बन गया। जरा कोई बताये, कि बंदर की पूंछ कैसे गायब हुई? क्या उसने पूंछ का उपयोग करना बंद कर दिया? कोई बताये कि बन्दर पूंछ का क्या उपयोग करता है और वह उपयोग उसने क्यों बंद किया था? यदि ऐसा ही है तो मनुष्य के भी नाक, कान गायब होकर छिद्र ही रह सकते थे। मनुष्य लाखों वर्षों से बाल और नाखून काटता आ रहा है, तब भी बराबर वापिस उगते आ रहे हैं, ऐसा क्यों?

८. सभी बंदरों का विकास होकर मानव क्यों नहीं बने? कुछ तो अमीबा के रूप में ही अब तक चले आ रहे हैं, और हम मनुष्य बन गये, यह क्या है? बंदरों की प्रजाति अब तक बची कैसे, सभी बन्दर मनुष्य क्यों नहीं बन पाए??

९. बंदर व मनुष्य के बीच बनने वाले प्राणियों की श्रंखला कहाँ गई?

१०. विकास मनुष्य पर जाकर ही क्यों रुक गया? किसने इसे विराम दिया? क्या अब मनुष्य से आगे विकास की कोई आवश्यकता नहीं है?


बौद्धिक व भाषा सम्बन्धी विकास

1. कहते हैं कि मानव ने धीरे-धीरे बुद्धि का विकास कर लिया, तब प्रश्न है कि बन्दर व अन्य प्राणियों में बौद्धिक विकास क्यों नहीं हुआ?

2. मानव के जन्म के समय इस धरती पर केवल पशु पक्षी ही थे, तब उसने उनका ही व्यवहार क्यों नहीं सीखा? मानवीय व्यवहार का विकास कैसे हुआ? करोड़ों वनवासियों में अब तक विशेष बौद्धिक विकास क्यों नहीं हुआ? यदि Evolution होता तो सभी मानवों में एक जैसा होता.

3. गाय, भैंस, घोड़ा, भेड़, बकरी, ऊंट, हाथी करोड़ों वर्षों से मनुष्य के पालतू पशु रहे हैं... पुनरपि उन्होंने न मानवीय भाषा सीखी और न मानवीय व्यवहार, तब मनुष्य में ही यह विकास कहाँ से हुआ?

4. दीपक से जलता पतंगा करोड़ों वर्षों में इतना भी बौद्धिक विकास नहीं कर सका कि स्वयं को जलने से रोक ले, और मानव बन्दर की काया से होते-होते इतना बुद्धिमान् बन गया, कि मंगल की यात्रा करने को तैयार है? क्या इतना जानने की बुद्धि भी विकासवादियों में विकसित नहीं हुई? पहले सपेरा सांप को बीन बजाकर पकड़ लेता था और आज भी वैसा ही करता है परन्तु सांप में इतने ज्ञान का विकास भी नहीं हुआ, कि वह सपेरे की पकड़ में नहीं आये।

5. पहले मनुष्य बल, स्मरण शक्ति एवं शारीरिक प्रतिरोधी क्षमता की दृष्टी से वर्तमान की अपेक्षा बहुत अधिक समृद्ध था, आज इसकी इस शक्ति में कमी क्यों आई? जबकि इन शक्तियों में तो विकास होना चाहिए था?

6. संस्कृत भाषा, जो सर्वाधिक प्राचीन भाषा है, उस का व्याकरण वर्तमान विश्व की सभी भाषाओं की अपेक्षा अतीव समृद्ध व व्यवस्थित है, तब भाषा की दृष्टी से विकास के स्थान पर ह्रास क्यों हुआ?

विचार करें कि यदि पशु पक्षियों में बौद्धिक विकास हो जाता, तो एक भी पशु पक्षी मनुष्य के वश में नहीं आता। यह कैसी अज्ञानता भरी सोच है, जो यह मानती है कि पशु पक्षियों में बौद्धिक विकास नहीं होता... परन्तु बन्दर का शारीरिक विकास होकर वह उन्हें मनुष्य में बदल देता है और मनुष्यों में शारीरिक विकास नहीं होकर केवल भाषा व बौद्धिक विकास ही होता है। इसका कारण क्या विकासवादी मुझे बताएंगे?

जो प्रबुद्धजन किसी वैज्ञानिक पत्रिका में पेपर प्रकाशित होने को ही प्रामाणिकता की कसौटी मानते हैं, उनसे मेरा अति संक्षिप्त विनम्र निवेदन है-

1. बिग बैंग थ्योरी व इसके विरुद्ध अनादि ब्रह्माण्ड थ्योरी, दोनों ही पक्षों के पत्र इन पत्रिकाओं में छपते हैं, तब कौनसी थ्योरी को सत्य मानें?

2. ब्लैक होल व इसके विरुद्ध ब्लैक होल न होने की थ्योरीज् इन पत्रिकाओं में प्रकाषित हैं, तब किसे सत्य मानें?

3. ब्रह्माण्ड का प्रसार व इसके प्रसार न होने की थ्योरीज् दोनों ही प्रकाशित हैं, तब किसे सत्य मानें? 

नासा के पूर्व वैज्ञानिक ने भी उठाए सवाल...

डार्विन के क्रमिक विकास सिद्धांत पर केंद्रीय मंत्री के बाद अब वैज्ञानिकों ने भी सवाल खड़े किए हैं। लखनऊ यूनिवर्सिटी में "वेदों में ज्योतिष तथा विज्ञान" विषय पर हुए सेमिनार में नासा के पूर्व वैज्ञानिक प्रफेसर ओपी पांडेय ने भी इसे सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि देशभर के बच्चों को गलत सिद्धांत पढ़ाया जा रहा है, जिससे उन पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है. पांडेय ने कहा कि डार्विन के सिद्धांत के मुताबकि हम बंदर से चिंपैंजी और फिर मानव बने, जबकि बंदर कभी मानव बन ही नहीं सकता। क्योंकि बंदरों में 24 गुणसूत्र होते हैं, और मनुष्यों में 46, ऐसे में अगर बंदर से मनुष्य बने होते तो अतिरिक्त गुणसूत्र कहां से आए। समयानुकूल स्वरूप में परिवर्तन हो सकता है, लेकिन अंगों में परिवर्तन नहीं हो सकता। इसलिए यह सिद्धांत सही नहीं है। 

हाल ही में केंद्रीय मंत्री सत्यपाल सिंह ने डार्विन के सिद्धांत पर सवाल उठाए थे। इसके अगले ही दिन 100 से ज्यादा वैज्ञानिकों ने खंडन कर इस सिद्धांत को सही बताया था। इस पर प्रोफेसर पांडेय का कहना है कि एक दिन में 1200 वैज्ञानिक हस्ताक्षर कर रिट करें इससे ये साफ जाहिर है कि इसके पीछे राजनीति है। साथ ही जिन्होंने इसका विरोध किया है वो वैज्ञानिक नहीं बल्कि टेक्नॉलजिस्ट हैं। प्रोफ़ेसर पांडेय ने बताया कि साल 1905 में डार्विन के दूसरे बेटे जॉर्ज डार्विन ने भी पिता के डार्विन सिद्धांत को कल्पना मात्र बताया था। विज्ञान और तर्क दोनों में ही यह सिद्धांत कभी भी सही साबित नहीं हुआ। केन्द्रीय मंत्री जावड़ेकर बहुत जल्दी मीडिया-विपक्ष और एजेण्डावादियों के दबाव में आ जाते हैं, इसीलिए उन्होंने सत्यपाल सिंह को डार्विन मसले पर डपट दिया, जो कि दुर्भाग्यपूर्ण है. 

इस कारण योग्य वैज्ञानिकों एवं देश व संसार के प्रबुद्धजनों से अनुरोध है कि प्रत्येक प्राचीन ज्ञान का अन्धविरोध तथा वर्तमान पद्धति का अन्धानुकरण कर बौद्धिक दासत्व का परिचय न दें। तार्किक दृष्टी का सहारा लेकर ही सत्य का ग्रहण व असत्य का परित्याग करने का प्रयास करें। स्वाभाविक है कि डार्विन महोदय की इवोल्यूशन थ्योरी “अंतिम सत्य” नहीं है, उस पर चर्चा-विमर्श-तर्क-वितर्क होना ही चाहिए.

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