औरंगज़ेब को सबक सिखाने वाले सतनामी सिखों की कथा...

Written by बुधवार, 26 जुलाई 2017 13:22

सतनामियों के इतिहास के बारे में अधिकाँश लोग अंजान हैं. झारखंड, छत्तीसगढ़ और बंगाल के एक बड़े हिस्से में फैले लगभग एक करोड़ से अधिक सतनामी समुदाय वही हैं, जिन्होंने औरंगजेब द्वारा हिन्दुओं पर जजिया थोपने के इस्लामिक फैसले का कठोरतम विरोध किया था.

असल में गुरुनानक देव के दौरे के बाद से ही इन्होंने “सिख पंथ” अपना लिया था, और अभिवादन तथा बातचीत में “सत्-नाम” के उच्चारण के कारण इनका नाम सतनामी सिख पड़ गया.

सन 1667 में औरंगजेब ने घोषित किया कि जितने भी हिन्दू हैं वे पाँच प्रतिशत जज़िया देंगे. इसी प्रकार 9 अप्रैल 1669 को औरंगजेब ने एक आदेश निकाला कि हिन्दू मंदिरों तथा हिन्दू शिक्षण संस्थाओं को ढहा दिया जाए और इनमें कोई भी धार्मिक गतिविधि नहीं होनी चाहिए. (सन्दर्भ :- मसिर-ए-जहाँगीरी 1947, पृष्ठ 51-55; हिस्ट्री ऑफ़ औरंगजेब, भाग 3, पृष्ठ 265). इस प्रकार के दमनकारी इस्लामिक आदेश के खिलाफ दिसंबर 1671 में गुरु तेगबहादुर ने असम से पंजाब की तरफ कूच किया और जनवरी 1672 में वे दिल्ली पहुँचे (सन्दर्भ :- पंजाब पास्ट एंड प्रेजेंट, अप्रैल 1975, पृष्ठ 234). दिल्ली में उन्होंने औरंगजेब के खिलाफ हुंकार भरी कि, “..भय काहू को देत नाही, ना भय मानत आन..” (अर्थात ना तो मैं किसी को डराता हूँ और ना ही किसी से भय खाता हूँ). तेगबहादुर समझ गए थे कि यदि इस अन्याय के खिलाफ अभी आवाज़ नहीं उठाई तो इस्लामिक क्रूरता और भी बढ़ेगी. गुरूजी की हुंकार सुनकर जोश में आए सतनामी सम्प्रदाय के हजारों अनुयायियों ने कह दिया, कि हम गुरुनानक के अनुयायी हैं और अपने गुरु के अलावा किसी भी सरकारी अथवा औरंगजेब के कर्मचारी को कुछ भी नहीं देंगे. गुरु तेगबहादुर के नेतृत्व में औरंगजेब के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंक दिया. औरंगजेब के सिपाहियों ने सतनामियों के साथ जबरदस्ती करने का प्रयास किया, लेकिन सतनामियों ने उन्हें खदेड़ कर रख दिया. मुग़ल फ़ौज वहाँ से भागकर नारनौल में जा टिकी. इस बीच अफवाह फैला दी गई कि, चूंकि सतनामियों को गुरुनानक जी का आशीर्वाद प्राप्त है, इसलिए उन्हें कभी हराया नहीं जा सकता.

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सतनामियों के साथ औरंगजेब की भिडंत चलती रही, और लगभग हर बार मुगलों को पीछे हटना पड़ा. इस कारण उस अफवाह को और बल मिला कि सतनामियों को कोई आशीर्वाद प्राप्त है, इसलिए उन्हें हराया नहीं जा सकता. जबकि वास्तविकता यह थी कि औरंगजेब के हाथों से स्थिति नियंत्रण के बाहर जा रही थी, क्योंकि उधर पेशावर से लेकर अफगानिस्तान तक विद्रोहियों ने औरंगजेब की हालत खराब कर रखी थी. औरंगजेब की नींद हराम हो चुकी थी. सतनामियों ने अपने नेता जगजीवन दास चंदेल के नेतृत्व में दक्षिण हरियाणा और उत्तरी राजस्थान के एक बड़े हिस्से में अपना प्रभुत्व कायम कर लिया था. परिस्थिति की गंभीरता को समझते हुए औरंगजेब ने खुद मोर्चा सँभालने का निर्णय लिया और एक बड़ी सेना बनाकर सालार सैयद अहमद खान को आगे भेजा. सेना के झंडों पर कुरआन की आयतें खुद अपने हाथों से औरंगजेब ने लिखीं ताकि उस अफवाह से डरे हुए मुगल सैनिकों को थोड़ी हिम्मत मिले. “सतनामी अपराजित होते हैं”, यह भय मुगल सेना में जबरदस्त फैला हुआ था, इसलिए सेना को रवाना करते समय औरंगजेब ने खुद सभी सैनिकों को संबोधित करते हुए कहा कि अब आपके परचम पर कुरआन की आयतें लिखी हुई हैं... अब कोई काफिर आपको हरा नहीं सकता... जाओ और सभी काफिरों का कत्ल कर दो...” (सन्दर्भ :- महान कोष, पृष्ठ 147).

मुगलों की भारीभरकम सेना जब नारनौल पहुँची तब वहाँ सतनामियों की संख्या बहुत कम थी, लेकिन फिर भी वे बहुत बहादुरी से लड़े और एक रणनीति के तहत धीरे-धीरे पीछे हटते अपने परिवारों सहित उत्तरी मध्यप्रदेश तक पीछे चले गए और जंगलों में जा छिपे. सतनामियों को हारा हुआ मानकर औरंगजेब की सेनाएँ आगरा लौट गईं. लेकिन अंत तक सतनामी सिखों ने औरंगज़ेब को जज़िया नहीं चुकाया और लड़ते रहे. लगभग तभी से सतनामी सम्प्रदाय वाले अधिकांशतः छत्तीसगढ़ और झारखंड के जंगलों में शहरों से दूर ही रहते थे. 1820 में छत्तीसगढ़ के एक दलित संत गुरु घासीदास ने इन्हें पुनः संगठित किया. जब अंग्रेज भारत में आए तो उन्होंने अपनी मिशनरी सेवाओं के जरिये, बहुत से सतनामियों को ईसाई पंथ में परिवर्तित कर दिया. ऐसा माना जाता है कि छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी भी मूलतः सतनामी हैं जिनके पुरखे ईसाई बन गए थे.

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कुछ वर्षों पूर्व धमतरी के पास की घटना है, जिसमें एक सतनामी परिवार के घर में भीषण आग लग गई. पूरा मकान और एक-एक सामान जल गया, लेकिन लकड़ी के एक बक्से में रखी गुरुग्रंथ साहब की एक प्रति को कुछ भी नहीं हुआ. देखते-देखते यह खबर चारों ओर फ़ैल गई. मजे की बात यह कि वह सतनामी परिवार अपनी जड़ों से इतना कट चुका था कि उसे गुरुग्रंथ साहब के बारे में कुछ भी पता नहीं था, उसने वह लकड़ी का बक्सा सिर्फ इसलिए संभालकर रखा था, क्योंकि उसे उसके पुरखों ने आशीर्वाद के स्वरूप दिया था. वहीं पास में एक पंजाबी परिवार रहता था, उन्होंने आकर उस सतनामी परिवार को गुरुग्रंथ साहब का इतिहास और सतनामियों के औरंगजेब से युद्ध के बारे में बताया (दैनिक भास्कर, रायपुर 8 नवंबर 2003). जब धमतरी के निवासियों को इस आश्चर्यजनक घटना के बारे में पता चला तो उन्होंने उस स्थान पर एक गुरुद्वारा निर्माण करने की मुहिम चलाई. मकान मालिक ने भी उदारता दिखाते हुए और यह जानकर कि उसके पुरखे कभी सिख थे, वह जमीन गुरुद्वारा बनाने के लिए दान कर दी. उस गुरूद्वारे में कई भटके हुए सतनामियों ने “अमृत चखकर” पुनः सिख पंथ में प्रवेश किया. 

अंग्रेजों की तरह पूरे भारत पर मुगलों का साम्राज्य कभी भी नहीं था. अंग्रेज इसलिए सफल रहे, क्योंकि उन्होंने शुरुआत में चतुराई और संधियों के साथ अपना व्यापार और प्रभाव क्षेत्र फैलाया, हिंसा और दमन पर वे बाद में उतरे. जबकि मुगलों ने शुरुआत से ही हिंसा, लूट, बलात्कार और अत्याचार का सहारा लिया, तो स्वाभाविक है कि उसी शक्ति से हिंदुओं द्वारा प्रतिरोध होना ही था. वास्तव में मुगलों के अत्याचार और लूट के खिलाफ पूरे भारत में भिन्न-भिन्न स्तरों पर कई छोटे-बड़े युद्ध लगातार चलते रहे हैं. हमारे इतिहास में ऐसी कई दबी-छिपी हुई संघर्ष गाथाएँ हैं, जिन्हें समुचित तरीके से जनता तक नहीं पहुँचाया जा सका है. सतनामी सिखों का संघर्ष इन्हीं में से एक है.

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