जनेऊ पर आंबेडकर के विचार और दक्षिण में सूअर अभियान

Written by मंगलवार, 15 अगस्त 2017 20:39

कुछ दिनों पहले तमिलनाडु में (जहाँ कि ब्राह्मण विद्वेष अपने चरम पर है), पेरियार के चेलों ने एक नया तमाशा रचा था। वैसे तो पहले भी इन “विकृत मानसिकता वाले” लोगों ने सेलम, तमिलनाडु में ही भगवान राम की प्रतिमा को जूते की माला पहनाकर उनका जुलुस निकाला था।

उनका कहना था कि भगवान राम दलित विरोधी थे। इस बार अपनी नीच हरकत में उन्होंने सूअर को यज्ञोपवीत (जनेऊ) पहनाकर अपनी कुंठा का प्रदर्शन किया है। ऐसी हरकते करने वाले मुख्य रूप से धर्मपरिवर्तित ईसाई या मुसलमान होते हैं। जो अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए ऐसी हरकतें करते रहते हैं। दलित नाम का परिवेश धारण कर, दलितों को भ्रमित करते है। गौर करने लायक बात यह है कि इस हरकत की खबर पर सबसे अधिक वो दलित उछल रहे हैं, जो अपने आपको डॉ अम्बेडकर का शिष्य बताते हैं। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि डॉ अम्बेडकर स्वयं महारों (दलितों) का यज्ञोपवीत संस्कार करवाते थे। प्रमाण देखिये-

अम्बेडकर जी ने बम्बई में "समाज समता संघ" की स्थापना की, जिसका मुख्य कार्य अछूतों के नागरिक अधिकारों के लिए संघर्ष करना तथा उनको अपने अधिकारों के प्रति सचेत करना था। यह संघ बड़ा सक्रिय था। इसी समाज के तत्वाधान में 500 महारों को जनेऊ (यज्ञोपवीत) धारण करवाया गया, ताकि सामाजिक समता स्थापित की जा सके। यह सभा बम्बई में मार्च 1928 में संपन्न हुई जिसमें डॉ अम्बेडकर भी मौजूद थे। (डॉ बी आर अम्बेडकर- व्यक्तित्व एवं कृतित्व पृष्ठ 116-117).  डॉ. अम्बेडकर जी के 6, सितम्बर-1929 के ’बहिष्कृत भारत‘ में यह समाचार प्रकाशित हुआ था, कि ’मनमाड़ के महारों (दलितों) ने श्रावणी मनायी। 26 दलितों ने यज्ञोपवीत धारण किये। यह समारोह मनमाड़ रेल्वे स्टेशन के पास डॉ. अम्बेडकरजी के मित्र श्री रामचन्द्र राणोजी पवार नांदगांवकर के घर में सम्पन्न हुआ था।

कहने एक मतलब ये है कि डॉ अम्बेडकर ने जिस कार्य में अपनी श्रद्धा दिखाई, उसी कार्य का ये लोग परिहास कर रहे हैं। ये लोग एक और तथ्य भूल जाते है, जिसका वर्णन डॉ अम्बेडकर ने अपनी लेखनी में किया है। आंबेडकर लिखते है कि शूद्र राजाओं और ब्राह्मणों के बीच अनवरत संघर्ष होते रहते थे, और ब्राह्मणों को शूद्रों के हाथों अनेक कष्ट और अपमान सहने पड़े। शूद्रों द्वारा किये गये उत्पीड़न और पीड़ाओं से त्रस्त होने के फलस्वरूप ब्राह्मणों ने शूद्रों का उपनयन संस्कार सम्पन्न करवाना बंद कर दिया। उपनयन संस्कार से वंचित होने पर शूद्र जो क्षत्रिय थे उनका सामाजिक ह्रास हो गया। (सन्दर्भ :- 'शूद्र कौन थे' के सातवें संस्करण-2013 के प्राक्कथन का पृष्ठ 3 और 4)

अर्थात, संस्कारों के न होने से कितनी हानि होती है। इसे डॉ अम्बेडकर भी स्वीकार करते है। लेकिन सवाल है कि ब्राह्मण यज्ञोपवीत किस लिए धारण करते हैं? यज्ञोपवीत केवल विद्या का एक चिह्न है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ये तीन वर्ण शिक्षित वर्ण है। इसलिए ये तीनों जनेऊ धारण करते है। शूद्र अशिक्षित वर्ण का नाम है। इसलिए वह जनेऊ धारण नहीं करता। मगर चारों वर्ण ब्राह्मण से लेकर शूद्र आर्य कहलाते है। यज्ञोपवीत में तीन सूत्र होते है। तीनों सूत्र ऋषिऋण, पितृऋण और देवऋण। ऋषिऋण ब्रह्मचर्य धारण कर वेद विद्या के अध्ययन से, गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कर उत्तम संतानोत्पत्ति से और देवऋण मातृभूमि की सेवा से निवृत होता हैं। संक्षेप में तीनों ऋणों से व्यक्ति को उसके कर्त्तव्य का बोध करवाया जाता है। इस प्रकार से यज्ञोपवीत कर्त्तव्य बोध का नाम है। वर्ण व्यवस्था के अनुसार कोई भी शूद्र ब्राह्मण बन सकता है और कोई भी ब्राह्मण शूद्र बन सकता है। इसलिए शूद्र शब्द को दलित कहना भी गलत है। यज्ञोपवीत संस्कार को जानकर ब्राह्मणवाद, मनुवाद के जुमले के साथ नत्थी कर अपनी हताशा, निराशा का प्रदर्शन किया जा रहा हैं। अंत में मूल बात यह है कि प्राचीन संस्कारों के उद्देश्य, प्रयोजन, लाभ आदि को बिना जाने, बिना समझे व्यर्थ के फूहड़ तमाशे करने से किसी का हित नहीं होगा, लेकिन वैसे भी इन “तथाकथित दलित संगठनों” को समाज में समरसता कायम नहीं करनी है, केवल भडकाऊ बातें करके, ब्राह्मणों के खिलाफ जहर उगलकर माहौल को खराब करना है ताकि राजनैतिक हितसाधन किया जा सके.

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अब संक्षेप में जान लीजिए कि आखिर यज्ञोपवीत (अर्थात जनेऊ) आखिर है क्या?? जनेऊ के पहले तंतु पर ओंकार होता है. जनेऊ के दूसरे तंतु पर अग्नि होती है, तीसरे तंतु पर नवनाग होता है. यज्ञोपवीत के चौथे तंतु पर सोम, पाँचवें पर पितृ, छठवें पर प्रजापति, सातवें पर वायु, आठवें तंतु पर सूर्यनारायण और नौंवें तंतु पर विश्वदेव होते हैं. जनेऊ, तीन तंतुओं से तीन गाँठो का अर्थात कुल नौ धागों से बना होता है. यह तीन तंतु (अर्थात तीनों गुण - सत्व, रज, तम) मिलाकर कुल 96 अंगुल लंबा होता है. जनेऊ की लम्बाई नाभि तक ही होनी चाहिए, कमर से नीचे नहीं जाना चाहिए. सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार 96 अंगुल का हिसाब इस प्रकार है कि कंधे से नाभि तक स्वयं की उँगली का नाप लगभग 32 उँगली होता है, और चूँकि जनेऊ का धागा तीन तह का होता है इसलिए 32 x 3 = 96 उँगली कुल लम्बाई रखनी चाहिए. तीनों तहों को मिलाकर्र अंत में एक सामूहिक गाँठ लगाई जाती है, जिसे ब्रह्म-गाँठ कहते हैं. यह ब्रह्म-गाँठ अर्थात अद्वैत गाँठ का अर्थ यह है कि जीव एवं ब्रह्म एक ही है.

बहरहाल... यज्ञोपवीत की महिमा बड़ी निराली है और इसके पीछे वैज्ञानिक आधार भी है. परन्तु जिन “असुरों” का उद्देश्य केवल ज़हर फैलाना हो, वे अपने ही पूजनीय बाबासाहब आंबेडकर को ठीक से पढ़ते नहीं हैं. इसीलिए सूअर को जनेऊ पहनाने की नौटंकी करते हैं, जबकि इस लेख में दिए गए सन्दर्भों के अनुसार्र इन मूर्खों के इस उपक्रम का वास्तविक अर्थ निकाला जाए, तो सोचिये क्या निकलेगा??

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