संघ शाखा की स्मृतियाँ...

Written by बुधवार, 01 फरवरी 2017 18:16

करीब दसियों साल पहले, एक मित्र RSS की एक शाखा का परिचय इस तरह करवाकर मुझे वहां ले गया कि "चलो, वहां लाठी चलाना, जूडो- कराटे सिखाते हैं". मैं उसके साथ गया, फिर करीब 5-6 साल सक्रिय स्वयंसेवक रहा, बहुत से लोगों से संपर्क हुआ, बहुत कुछ सीखा जाना, कबड्डी खेली, राष्ट्रवाद समझा,

समूह में काम करना सीखा, जितने भी लोग संपर्क में थे किसी की जाति नहीं जान पाया और ना ही जानने की जरूरत लगी, उन सबके घर भोजन किया, जबर्दस्ती जाकर किया. हर शाम, शाखा के बाद सब इकठ्ठा होकर program बनाते कि आज किसके यहाँ शाम को चाय पीने चलना है, हममें से किसी एक के यहाँ जाते, परिवार से मिलते, चाय पीते, बातचीत करते, इस तरह संपर्क में रहते. अपनी शाखा, या किसी आसपास की शाखा के किसी स्वयंसेवक के घर कोई शादी विवाह का मौका होता तो बिना कहे हम् सब पहुचते, सारी व्यवस्था संभालते,भागदौड़ करते। किसी का कोई काम कहीं रुका हुआ हो तो शाखा में से ही कोई स्वयंसेवक मदद कर या करवा देता.

उन दिनों करीब 100 रुपये में संघ के स्थानीय कार्यालय से "गणवेश" मिलती थी, जिसमे एक खाकी नेकर, पीले चतुर्भुजी बक्कल वाली भूरी बेल्ट, पीले-भूरे मोटे मोज़े, काली टोपी, और एक दंड या लट्ठ... इतना सामान मिलता था. हर शाम को दंड या लट्ठ लेकर मोहल्ले से निकलता तो लोग कुतूहल से देखते, दंड भी दाहिने हाथ में फंसाकर पीछे ले जाकर अपनी लंबाई के समानांतर रखा जाता था। किसी विशेष अवसर पर बड़ा आयोजन होता और हज़ारों स्वयंसेवक और आसपास की जनता भी देखने आती। तमाम खेल, पिरामिड बनाना, गैंडा खेल, बिच्छू दौड़, हनुमान दौड़ आदि का प्रदर्शन होता. मैं कुछ चित्रादि बनाने में माहिर था तो बड़े आयोजन में मुझे ध्वज (भगवा झंडा) के गाड़ने के स्थान पर कुछ कलाकारी करने , जैसे 'ऊँ' लिखने या भारतवर्ष का नक्शा बनाने को बोला जाता. रविवार को आसपास की किसी बड़ी शाखा में जाते, और कुछ विशेष कार्यक्रम होता, प्रचारक आते या कुछ नया सीखने को मिलता। हरेक दिन प्रार्थना के बाद सब एक दूसरे से उनके नाम के आगे "जी" लगाकर नमस्ते करते.

उस समय हम् छोटे बालक थे. एक मुस्लिम मित्र हुआ करता था, वो हमें शाखा की बातें करते देखता तो उसे भी रूचि जागी. फिर क्या था... उसको भी शाखा में ले गए एक दिन. वो भी हमारे साथ घेरे में बैठा. हम् इक्का दुक्का मित्रों को छोड़कर और किसी को नहीं मालूम था कि वो मुस्लिम है। उसी दिन किसी ने गीत शुरू कर दिया "हिन्दू हैं, हिन्दू हैं, हम् हिन्दू हैं,भूलें सब भाषा-रास्त्रभेद, जात्यभिमान का भ्रम भूलें पर मत भूलें हम् हिन्दू हैं..". हम जोर जोर से इसे गा रहे थे सुर लय के साथ, अचानक नज़र पड़ी अपने मुस्लिम मित्र की ओर। वो हक्काबक्का सा इधर उधर देख रहा था पर धीमे धीमे गा भी रहा था "हिन्दू हैं हम.."..हम सब उस समय बच्चे ही थे, और वो कक्षा में विदूषक की भांति बड़बोला था. इसलिए उस दिन शाखा में पहले तो उसकी दशा देखकर बहुत हंसी आयी, पर फिर बाद में किसी वरिष्ठ सदस्य ने उसकी समस्या समझी, और शाखा के बाद कुछ समझाया। फिर बाद में वो मुस्लिम मित्र शाखा के सभी बड़े आयोजनों में भी भाग लेने लगा. उसके घर से अक्सर मैं ही उसे बुलाकर लाता और उसके घर वाले बिना किसी संकोच के उसे भेजते. तमाम बढ़िया बातें, संस्कार, देशप्रेम, सामूहिकता संघ और शाखा से सीखा..सालों सक्रिय सदस्य रहा कभी किसी की जाति नहीं जानी, किसी वर्ग समुदाय आदि के प्रति द्वेष आदि नहीं सीखा। बस एक कमी रह गयी.

जिस बात को सुनकर शाखा जाना शुरू किया था, लट्ठ चलाना और जूडो आदि सीखना, वो सीखने के अवसर नहीं मिले, संघ में इनके बारे में अधिक व्यवस्था नहीं दिखती, बस थोड़ा-बहुत आरंभिक कदमताल सिखा दिखा जाते है. कभी कायदे से लठ्ठ का पूरा प्रशिक्षण नहीं मिला. मैंने अपने किसी भी वरिष्ठ संघी जन को कायदे से लाठी चलाते नहीं देखा, सब यही कहते मिले कि शिविर आयोजित होगा वहां सिखाते हैं, मुझे तो नहीं आता, फलां फलाँ व्यक्ति है जो बारिश में सर के ऊपर लट्ठ नचा दे तो बारिश की बूंदे नीचे न गिरें. एक बार बड़े आयोजन के दौरान लट्ठ बाजी का प्रदर्शन किया गया। 3 लोग विशेषज्ञ के रूप में आये। दो स्वयंसेवक वार कर रहे थे, एक बचाव. दोनों ऊबड़ खाबड़ वार कर रहे थे, कोई कलात्मक प्रदर्शन नहीं था, और बचाव के कथित विशेषज्ञ अपना बचाव नहीं कर पा रहे थे, कई बार लाठी की चोट खाये वो, जनता बैठी हँस रही थी. आज इन्ही की कमी महसूस होती है. ये कुछ न्यूनतम विधाएं हैं जो प्रत्येक हिन्दू को आनी चाहिए, बल्कि इससे आगे की भी जरूरत है, लेकिन हमें इतना भी नहीं आता...?? 

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