RSS और स्वतंत्रता संग्राम : तथ्य एवं मिथ्या प्रचार

Written by बुधवार, 07 जून 2017 08:08

मूल लेखक : अरविन्दन नीलकंदन

जिस तरह नई दुल्हन चूड़ी की आवाज़ अधिक करती है, नए नए मुल्ले या पंडित की आवाज़ तेज ही होती है, उसी तरह हाल ही में बुद्धिजीवी होने का एक नया चलन पैदा हो गया है, और वह है राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उसके नेताओं के बारे में झूठ फैलाना, झूठा प्रचार करना!

अक्सर सेकुलर बुद्धिजीवियों के मुँह और कलम से आपने सुना-पढ़ा होगा कि, “बताओ, RSS ने आज़ादी के आन्दोलन में क्या किया?”... “अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम में RSS तो चुप्पी साधे बैठा था...” इत्यादि.

कहा गया है कि “हेडगेवार, स्वतंत्रता सेनानी, एक स्वयंसेवक थे और उन्हें खिलाफत आन्दोलन में उनकी भूमिका के लिए एक वर्ष की सजा हुई थी, और वे आख़िरी बार स्वतंत्रता आन्दोलन में शामिल हुए थे. (1919-1924) जबकि वर्ष 1930 में, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की शुरुआत करने के पांच वर्ष के बाद महात्मा गांधी द्वारा आरम्भ किए गए वन सत्याग्रह के चित्रों में उन्हें देखा जा सकता है. वर्ष 1930 में जब संघ केवल पांच वर्ष का ही था, तो कॉंग्रेस ने घोषणा की कि वह 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस मनाएगी, क्योंकि एक ही वर्ष पहले कॉंग्रेस ने वर्ष 1929 तक पूर्ण स्वतंत्रता हासिल करने का संकल्प पारित किया था. इसके बाद डॉ. हेडगेवार ने सभी संघ पदाधिकारियों को लिखा था:

“....कॉंग्रेस ने स्वतंत्रता को अपना लक्ष्य घोषित किया है और कॉंग्रेस कार्यकारी समिति ने घोषणा की है कि 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाएगा. हम सबके लिए आह्लादित होना बहुत ही स्वाभाविक है क्योंकि यह अखिल भारतीय राष्ट्रीय इकाई अपने स्वतंत्रता के लक्ष्य के एकदम नज़दीक आ गयी है. इसलिए यह हमारा उत्तरदायित्व है कि उस संस्था के साथ कार्य करें, जो उद्देश्य को हासिल करने की तरफ कदम उठा रही हैं..”. आरएसएस की सभी शाखाओं को शाम को छः बजे इकट्ठा होने के लिए आदेश दिए गए और राष्ट्रीय ध्वज को नमन किया, जो उस समय केसरिया रंग का ध्वज था. स्वतंत्रता क्या है? और कैसे इसके लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है? शाखाओं में चर्चा का मूल बिंदु यही था. चूंकि हमने कॉंग्रेस के इस लक्ष्य को स्वीकार कर लिया है, तो पार्टी को इसके लिए बधाई देनी चाहिए. इस कार्यक्रम की रिपोर्ट हमें भेजी जानी चाहिए”.... (सन्दर्भ :- डॉ. हेडगेवार का 21 जनवरी 1930 को लिखा गया पत्र, राकेश सिन्हा, डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार, प्रकाशन विभाग, 2015 पृष्ठ 95)

जो सेकुलर बुद्धिजीवी केसरिया ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज पुकारे जाने की आलोचना करते हैं, उन्हें याद दिला जरूरी है कि एक ही वर्ष उपरांत अर्थात अप्रेल 1931 में, कॉंग्रेस कार्यकारी समिति ने एक ध्वज समिति को नियुक्त किया था, जिसमें मौलाना आज़ाद भी सम्मिलित थे, और इसी समिति ने निम्न शब्दों के साथ राष्ट्रीय ध्वज के रूप में केसरिया ध्वज को स्वीकारने की अनुशंसा की थी. “....हमें लगता है कि ध्वज को विशेष, कलात्मक, आयताकार और असाम्प्रदायिक होना चाहिए. इस बारे में हमारा विचार एकदम स्पष्ट है कि हमारे राष्ट्रीय ध्वज का एक ही रंग होना चाहिए. अगर कोई एक ऐसा रंग है जो भारत को एक पूर्ण रूप से बाँध सकता है, जो सभी भारतवासियों में एकता के भाव को उत्पन्न कर सकता है और जो एक प्राचीन परम्परा से जुड़ा हुआ है तो वह है केसरिया रंग....”. लेकिन जैसे-जैसे गांधी-नेहरू का प्रभाव कांग्रेस पर बढ़ता गया, केसरिया ध्वज तिरंगे में बदलता चला गया.

यह बात सही है कि एक संगठन के रूप में संघ ने कभी भी खुद को आन्दोलनकारी राजनीति से बहुत अधिक नहीं जोड़ा. कॉंग्रेस के अधिकतर आन्दोलन से संघ दूर ही रहा, बल्कि साथ ही संघ ने हिन्दू महासभा के आन्दोलन में भाग नहीं लिया. यहाँ तक कि जब हिन्दू महासभा ने निज़ाम के खिलाफ आन्दोलन की शुरुआत की तो, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने इस आन्दोलन में भाग लेने से इनकार कर दिया. पुणे से हिन्दू महासभा के एक सदस्य, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इस कदम से बहुत ही क्रोधित हुए. उनका नाम था नाथूराम विनायक गोडसे. वे आरएसएस को हिन्दू ऊर्जा को गलत दिशा में मोड़ने के लिए हमेशा कोसते थे. हालांकि उनके मन में संघ के लिए, और वीर सावरकर के लिए मन में बहुत आदर था. 8 अप्रेल 1940 को पुणे में आरएसएस के एक प्रमुख नेता भानुराव देशमुख ने हिन्दू महासभा के अतिवादी तत्वों को जबाव दिया कि :- “सबसे पहले तो मैं इन खुराफाती हिन्दुओं को यह कहना चाहूंगा, कि आरएसएस न तो हिन्दुओं की कोई सेना है और न ही हिन्दू महासभा की सैन्य शाखा है. संघ का कार्य हिन्दू राष्ट्रवादियों को सही अर्थों में बनाना है....”. यह नोट करना बहुत ही रोचक होगा कि हालांकि कॉंग्रेस और हिन्दू महासभा के व्यक्तिगत नेता, आरएसएस के अनुशासन, उसमें अस्पृश्यता के न होने और इसके द्वारा दी जा रही सेवाओं के लिए उसकी प्रशंसा करते थे और दोनों ही संगठन संघ को अपने नियंत्रण में करना चाहते थे. जब संघ ने कांग्रेस और हिन्दू महासभा दोनों के ही इशारे पर चलने से इंकार कर दिया, तो दोनों ही संगठनों ने संघ पर साम्प्रदायिक और हिन्दू विरोधी होने का आरोप लगा दिया.

बोस और हेडगेवार संघ के राजनीतिक रूप से सीधे न जुड़े होने के बावजूद संघ किसी भी राजनीतिक आन्दोलन की मदद करने को हमेशा तैयार रहता था, बशर्ते यदि भारत के कल्याण के लिए कार्य कर रहा हो, और वह उनकी मदद अपने कैडर देकर या उन्हें तमाम सुविधाएं प्रदान करने के द्वारा करता था. त्रिलोकनाथ चक्रवर्ती (1889–1970) एक बंगाली क्रांतिकारी और स्वतंत्रता संग्रामी थे. वे हेडगेवार जी से मिले जिन्होंने उनसे वादा किया कि संघ उन्हें भविष्य के आंदोलनों के लिए अपने कैडर प्रदान करेगा. (सन्दर्भ :- सत्यव्रत घोष, रेमेम्बरिंग अवर रेवोल्युश्नरीज़, मार्क्सिस्ट स्टडी फोरम 1994 पृ.57). संघ ने क्रांतिकारी राजगुरु की भी मदद की थी जब वे निर्वासन में थे. छिछले स्तर की राजनीति करने वाले कई कांग्रेसी नेताओं ने वर्ष 1934 में यह संकल्प पारित किया कि उनके सदस्य, आरएसएस के सदस्य नहीं बन सकते हैं. प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. कंचनमोय मजूमदार बताते हैं कि कांग्रेस के द्वारा इस प्रकार की घोषणा जारी होने के बाद सुभाष बोस ने हेगडेवार को कई बार सन्देश भेजा और शायद यह सशस्त्र विद्रोह के लिए था. ‘मॉडर्न रिव्यू’ (मार्च 1941) के अनुसार डॉ. हेगडेवार की मृत्यु 51 वर्ष की आयु में हाई ब्लड प्रेशर के कारण नागपुर में हुई थी. उनकी मृत्यु से एक दिन पहले ही सुभाष चन्द्र बोस उनसे मिलना चाहते थे.

हेडगेवार के बाद आए गुरूजी गोलवलकर राजनीति में हेगडेवार से अलग प्रवृत्ति के थे. जहां एक तरफ डॉ. हेगडेवार कलकत्ता आधारित क्रांतिकारी समूह अनुशीलन समिति से आए थे, तो वहीं गोलवलकर ने आध्यात्मिक प्रेरणा स्वामी अखंडानन्द से ली थी. स्वामी जी को मानवता के प्रति उनकी सेवाओं के लिए जाना जाता है. गोलवलकर जी के गुरु श्री रामकृष्ण के सीधे शिष्य थे. वे अकाल में एक मुस्लिम लड़की की स्थिति से बहुत ही विचलित हो गए थे और उन्होंने अपनी तीर्थयात्रा छोड़कर उसी गाँव में सेवा करने का प्रण ले लिया था. गोलवलकर ने राजनीति छोड़ दी थी. वे संघठन निर्माण में विश्वास रखते थे. यह वह समय था जब देश के परिदृश्य की राजनीति बदल रही थी. विभाजन की धमकी अब हकीकत बनने लगी थी. भारत छोडो आन्दोलन के साथ ही पश्चिमी पंजाब और पूर्वी बंगाल के क्षेत्रों के हिन्दुओं और सिक्खों के भाग्य भी खटाई में पड़ गए थे.

विभाजन की स्थिति में, जिसमें कांग्रेस के तमाम नेताओं के प्रयासों के बावजूद पश्चिमी पंजाब के हिन्दू और सिख और पूर्वी बंगाल में हिन्दुओं और सिखों की स्थिति बहुत ही दुखदायी होने वाली थी और उनकी रक्षा करना बहुत जरूरी था. तो गुरूजी गोलवलकर को संगठन के विस्तार की आवश्यकता महसूस हुई. चूंकि संघ की निंदा करने वाले यह बात करते हुए नहीं थकते, कि गोलवलकर यह मानते थे कि अंग्रेजों के पास संघ पर प्रतिबन्ध लगाने का कोई कारण नहीं होना चाहिए. गुरूजी गोलवलकर के एक वक्तव्य को तोड़ मरोड़ कर 1942 के आन्दोलन के संबंध में न केवल पहले, बल्कि आज तक लिखा जा रहा है, जैसे द वायर में लिखा है “वर्ष 1942 में कई लोगों के दिल में यह था कि संघ निष्क्रिय लोगों का एक संघठन है, उनकी बातें बेकार हैं... न केवल बाहरी बल्कि हमारे वोलंटियर भी इसी तरह की बात करते हैं...” मगर यह वाक्य दो महत्वपूर्ण वाक्यों को छोड़ देता है, कि “इस समय भी संघ का नियमित कार्य चालू है. संघ ने सीधे तौर पर कुछ न करने का फैसला किया है.” संघ की परिचालन टीम ने कुछ भी सीधे न करने का फैसला लिया था. ब्रिटिश खुफिया रिपोर्ट का भी यह कहना था कि उन्हें कोई भी ऐसा सबूत नहीं मिला, जिससे यह साबित हो कि संघ संघटन के रूप में 1942 के आन्दोलन में जुड़ा था. और न ही पुलिस को कोई ऐसा सबूत मिला जिससे यह पता चला कि संघ कार्यालय में अंग्रेजों के खिलाफ कोई भाषण दिया जाता है. संघ की शुरू से यही कार्यशैली थी, कि वे जनता के बीच चुपचाप काम करते थे और कभी भी खुलकर सामने नहीं आते थे. जनता के बीच से निकलने वाले जन-नायकों की मदद करना और उन्हें हरसंभव संसाधन उपलब्ध करवाना संघ की पहचान तब भी था, और आज भी स्थिति वही है.

ब्रिटिश खुफिया रिपोर्ट के अनुसार पुणे में संघ के एक प्रशिक्षण शिविर में 27 अप्रेल 1942 को गोलवलकर ने उन लोगों की निंदा की, जो निहित स्वार्थवश अंग्रेजी सरकार की मदद कर रहे थे. 28 अप्रेल 1942 को उन्होंने घोषणा की कि चाहे कुछ भी हो जाए, संघ अपने क़दमों से पीछे नहीं हटेगा और उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं से अपील की कि वे देश की सेवा करने के लिए हमेशा तैयार रहें और देश हित में कुर्बानी भी दें. (सन्दर्भ :- No.D. Home Pol. (Intelligence) Section F. No. 28 Pol). गृह विभाग की एक और रिपोर्ट जबलपुर में होने वाले संघ के सम्मेलन में अंग्रेज विरोधी माहौल को दिखाती है, जिसमें यह दावा किया गया है कि संघ का उद्देश्य था अंग्रेजों को भारत से बाहर करने का और इस बात को कई वक्ताओं द्वारा दोहराया गया. अच्युत पटवर्धन, नाना पाटिल और अरुणा आसफ अली भारत छोडो आन्दोलन के कुछ मुख्य चेहरे थे जो अपने संघर्ष के दौरान संघ के महत्वपूर्ण नेताओं के घरों में रुके थे. कई क्रांतिकारियों को संघ से बहुत जरूरी संसाधन सहायता मिली थी. अरुणा आसफ अली ने, लाला हंसराज गुप्ता के घर पर शरण ली थी और नाना पाटिल की रक्षा पंडित दामोदर सत्वलकर ने की थी... जबकि गुरूजी भाऊसाहेब देशमुख और बाबासाहेब आप्टे के घर पर रुके थे.

16 अगस्त 1942 को महाराष्ट्र में चिमूर में संघ के कई नेताओं ने प्रत्यक्ष रूप से भारत छोडो आन्दोलन में भाग लिया था जिसका परिणाम अंग्रेजों द्वारा दमन था. दादा नायक जो चिमूर की संघ की शाखा के प्रमुख भी थे, उन्हें अंग्रेजों द्वारा मृत्यु दंड दिया गया था. हिन्दू महासभा नेता डॉ. एनबी खरे ने इस मामले को अधिकारियों के समक्ष उठाया. रामदास रामपुरे एक और संघ के नेता को अंग्रेजों के द्वारा गोली मारी गया थी. गोपनीय रिपोर्ट में इन दोनों नेताओं को इन विद्रोहों के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था. जिनमें से एक थे दादा नायक जो हालिया अवरोधों के पीछे काफी हद तक थे और दूसरे थे संत तुकडोजी महाराज जो संघ से जुड़े थे, और जिन्हें चिमूर में हिंसा के लिए जिम्मेदार माना गया था. बाद में संत तुकडोजी महाराज विश्व हिन्दू परिषद के एक सह संस्थापक बन गए थे. संत तुकडोजी महाराज को, संत गाडगे महाराज के साथ देखा जा सकता है... दोनों ही सामाजिक सुधारक थे. तुकडोजी महाराज संघ के साथ जुड़े हुए थे और उन्हें अंग्रेजों ने निशाना बनाया था, वे न केवल भक्ति गीत गाते थे बल्कि वे अंग्रेजों के खिलाफ भी एक आन्दोलन का हिस्सा थे. वे स्वच्छता की आवश्यकता के लिए भी भजन गाते थे. यदि कोई इसे संघ का योगदान नहीं माने, तो न सही.

एक और झूठ बहुत ही ज्यादा फैलाया जाता है, कि अंग्रेजों को गुरु गोलवलकर ने कभी भी भारत की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया. जबकि हकीकत में संघ के प्रमुख के रूप में, उन्होंने हिन्दू समाज की समस्याओं के लिए बाहरी संस्थाओं और यहाँ तक कि संघ पर सीधे आरोप नहीं लगाया. उदाहरण के लिए, धर्मांतरणों के मामलों में उन्होंने मुस्लिमों और ईसाइयों पर आरोप लगाने से मना किया. इस संदर्भ में उनका कहना था कि हमारे कई स्वयंसेवक अपनी कमियों के लिए दूसरों को जिम्मेदार मानते हैं. कुछ राजनीतिक स्थितियों पर तो कुछ ईसाइयों और मुस्लिमों की गतिविधियों पर आरोप लगाते हैं. मैं अपने कार्यकर्ताओं से आग्रह करूंगा कि वे अपने दिमाग से ये सभी बातें हटाएं और अपने लोगों और धर्मों के लिए सही रूप में कार्य करें, जरूरतमंदों की मदद करें और जहाँ भी वे किसी को गिरा हुआ देखें, उनकी मदद करें. [Bunch Of Thoughts, P.277]

जब नेहरु के द्वारा संघ पर लगाया हुआ प्रतिबन्ध टिक नहीं पाया, और उसे उठा लिया गया तो गुरूजी ने नेहरू से क्रोधित अपने कार्यक्रताओं से कहा “अपने मन में उन लोगों के लिए कडवाहट न आने दो, जिन्होनें तुम्हारे साथ अन्याय किया है. अगर दांत जीभ को काटेंगे तो क्या हम दांतों को बाहर खींच लेंगे? यहाँ तक कि जिन्होनें अन्याय किया है वे भी हमारे ही लोग हैं, तो हमें भुलाना आना चाहिए. वायर के लेख ने गुरु गोवलकर के विचारों को बंगाल के अकाल से जोड़ा है. यहाँ यह याद रखना जरूरी है कि बंगाल के अकाल के दौरान डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, जो हिन्दू महासभा के नेता और संघ के नज़दीकी थे, वे कई राहत केन्द्रों के माध्यम से अकाल से लड़ रहे थे. मधुश्री मुखर्जी ने श्यामाप्रसाद मुखर्जी की दर्द को बहुत ही मुखर रूप में बताया है. अंग्रेजी इतिहासकार जेम्स हार्टफील्ड ने इस बात को इंगित किया है कि मुखर्जी ने किसानों को इस बात के लिए मजबूर किया कि वे अपनी फसल को सरकारी दलालों को न भेजें, और कहा कि अधिकारियों ने सारा अनाज सेना के लिए और निर्यात के लिए ले लिया है. उन्होंने यह भी बताया कि बोस के कई समर्थक श्यामाप्रसाद मुखर्जी द्वारा संचालित राहत केन्द्रों में काम कर रहे थे.

राजनीति से आगे बढ़कर काम करने की उनकी क्षमता तब शिखर पर पहुँची जब चीनी आक्रमण के दौरान उन्होंने सरकार की आलोचना के स्थान पर उनके साथ खड़े होने की घोषणा की. महाभारत का उदाहरण देते हुए कहा “हम सौ और पांच हैं.” चीनी हमले पर नेहरू की गलतियों को बताने वाले धारावाहिक को रोकने से बुद्धिजीवी और इतिहासकार सीताराम गोयल, संघ के आलोचक बन गए. हालांकि चीन से युद्ध के समय और उसके बाद RSS ने जो सेवाएं भारतीय सेना को दीं, उसने नेहरू को संघ के प्रति विचार बदलने पर विवश कर दिया. प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि वे अपने देश की एक अंगुल भर जमीन भी नहीं देंगे, और उन्होंने संघ को गणतंत्र दिवस की परेड में बुलाया था.

संक्षेप में कहने का तात्पर्य यह है कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान RSS ने अपना अधिकाँश कार्य स्वतन्त्र रूप से और परदे के पीछे रहकर चलाया. क्रांतिकारियों को मानव संसाधन की आपूर्ति की तथा हिन्दू महासभा के अतिवादी रवैये से खुद को दूर रखा. यह कहना एकदम साफ़ झूठ है कि संघ ने अंग्रेजों के खिलाफ तटस्थता बनाए रखी, ऐसा कोई सबूत या तथ्य कहीं नहीं मिलता है. 1930 में ही हेडगेवार जी द्वारा स्वतंत्रता की तारीख संबंधी कांग्रेस के प्रस्ताव को खुला समर्थन दिया गया... परन्तु वास्तविकता यह थी कि कांग्रेस और उसके तत्कालीन नेता, संघ की, सुभाषचंद्र बोस की, गुरूजी गोलवलकर की बढ़ती शक्ति से घबराए हुए थे, इसलिए मिथ्या प्रचार करके इन्हें बदनाम करना जरूरी था... आज भी ऐसा ही हो रहा है... लेकिन तमाम षड्यंत्रों के बावजूद उस समय भी संघ आगे बढ़ता गया... आज भी ऐसा ही हो रहा है.

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संदर्भ:

- Dina Nath Mishra, RSS: Myth and Reality, Vikas Publishing House, 1980
- Kavita Narawane, The Great Betrayal, 1966-1977, Popular Prakashan, 1980
- C.P.Bhishikar, Shri Guruji, Pioneer of a new era, Sahitya Sindhu Prakashana, Bangalore, 1999
- Kanchanmoy Mojumdar, Saffron versus green: communal politics in the Central --Provinces and Berar, 1919-1947, Manohar, 2003
- James Heartfield, Unpatriotic History of the Second World War , London, Zer0 Books, 2012
- Rakesh Sinha, Builders of Modern India: Dr. Keshav Baliram Hedgewar, Publications Division, 2015

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