रोमिला थापर का गजनवी प्रेम : इतिहास का विकृतिकरण

Written by शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2018 17:37

यह सन् 1980 की बात है। तब #डॉ_कर्ण_सिंह श्रीमती इंदिरा गाँधी के कैबिनेट मंत्री थे। उन्होंने अपने मित्र #रोमेश_थापर से एक दिन शिकायत की कि उनकी बहन #रोमिला_थापर “अपने इतिहासलेखन से भारत को नष्ट कर रही हैं”। इस पर उन की रोमेश से तीखी तकरार हो गई। यह प्रत्यक्षदर्शी वर्णन स्वयं रोमिला की भाभी और अत्यंत विदुषी समाजसेवी एवं प्रसिद्ध अंग्रेजी विचार पत्रिका #सेमिनार की संस्थापक, संपादक #राज_थापर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है (राज थापर, ऑल दीज इयर्स, पृ. 462-63)। ध्यान दें कि यह लिखते हुए राज ने रोमिला का बचाव नहीं किया। उलटे कर्ण सिंह से इस झड़प में अपने पति रोमेश को ही कमजोर पाया जो “केवल भाई” के रूप में उलझ पड़े थे। संकेत यही मिलता है कि कर्ण सिंह की बात राज को अनुचित नहीं लगी थी।

तब से रोमिला थापर ने बड़ी तरक्की की। उनके लेखन का मुख्य स्वर हिन्दू-विरोध रहा है। इसी को भारत को नष्ट करना अथवा भारतीय इतिहास की कलुषित छवि बनाना भी कहा गया है। मगर एक चीज का ध्यान रखना चाहिए। कि लेखकों के प्रिय खब्त भी हुआ करते हैं। जिनसे उनका विशेष लगाव होता है। मार्क्सवादी इतिहासकारों के लिए यह और सही है। प्रोफेसर डी. एन. झा को गोमांस-भक्षण पसंद हैं। प्रो. बिपनचंद्र ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ सुनते ही भड़क उठते हैं। उन्हें ये दो शब्द जोड़ना नागवार हैं! उसके बदले ‘हिंदू सांप्रदायिकता’ बोलिए तो वे प्रसन्न होंगे। उसी तरह, प्रो. हरबंस मुखिया को इस्लाम से ऐसी मुहब्बत है कि उन से आप भारत के बारे में पूछिए, वे आपको इस्लाम की खूबियाँ बताने लगेंगे। ऐसी-ऐसी, जो अरब वाले भी नहीं जानते!

इसी तरह, रोमिला थापर को गजनी के #महमूद से विचित्र मुहब्बत है। दसवीं-ग्यारहवीं सदी का महमूद तारीख में भारत पर सत्रह हमले और सोमनाथ मंदिर के विध्वंस के लिए मशहूर/ बदनाम हुआ। पिछले चालीस साल से रोमिला जी की पाठ्य-पुस्तक, या इतिहासलेखन, सांप्रदायिकता, हिंदुत्व आदि पर उनका कोई भाषण, लेख ढूँढना कठिन है जिस में महमूद का हसरत भरा जिक्र न हो। कि किस तरह उसके साथ नाइंसाफी हुई। थापर को शुरू से ही, शायद जब से उस का नाम सुना तभी से, दृढ़ विश्वास है कि महमूद को सबने, विशेषकर मूढ़ हिन्दुओं ने गलत समझा। अल बरूनी से लेकर मीनाक्षी जैन तक, हजार साल से इतिहासकारों ने उस का भ्रामक चित्रण किया। महमूद कत्लो-गारत मचाने वाला, मंदिरों-मूर्तियों का विध्वंसक, हिंदुओं का उत्पीड़क, और इस्लामी गाजी नहीं था – इस में तो रोमिला जी को कभी संदेह न रहा। किंतु तब वह था क्या? वह इसी खोज में लगी रही हैं।

उनकी इस असमाप्त खोज का एक आकलन है उन की पिछली पुस्तक  सोमनाथः_मेनी_वॉयसेज_ऑफ_ए_हिस्टरी’ । इसमें थापर ने अनेक अनुमानों, संभावनाओं, किंवदंतियों को इकट्ठा किया। ताकि महमूद के माथे से सोमनाथ विध्वंस का कलंक हटाने का उपाय हो। अपने मिशन में थापर ने ऐतिहासिक तथ्यों की भी परवाह नहीं की। वैसे भी, हजार साल बाद आप किसी तथ्य के बारे में पक्के तौर पर कह ही कैसे सकते हैं? इसलिए थापर के लिए ‘सबसे महत्वपूर्ण सवाल’ इस प्रकार थाः “ठीक-ठीक किस वर्ग ने (सोमनाथ) मंदिर का विध्वंस किया था और कौन वर्ग इससे प्रभावित हुए थे? इन वर्गों के बीच क्या संबंध थे और क्या यह हर ऐसी क्रिया से बदले भी थे? क्या यह मुसलमानों द्वारा हिंदू मंदिर अपवित्र करने का मामला था या कोई और उद्देश्य था? क्या मजहबी वाहवाही पाने के अलावा किन्हीं और मकसद से ऐसी घटनाओं को जान-बूझकर बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया?”

इन सवालों को ध्यान से पढ़ें। सवाल रखने के इस चतुर तरीके में मनचाहा उत्तर निहित होता है। इसमें अपनी तयशुदा धारणा को ‘उत्तर’ के रूप में पेश करने के लिए तदनुरूप प्रश्न गढ़े जाते हैं। एक बौद्धिक किले-बंदी, ताकि सुनिश्चित हो कि उन उत्तरों से बाहर किन्हीं तथ्यों का अस्तित्व नहीं। सो, जाहिर है, महमूद ने अकेले तो सोमनाथ का ध्वंस किया न होगा, वह जरूर कोई वर्ग होगा। तो वह कौन था – उसे सामने लाना चाहिए। बेचारे अकेले महमूद को दोषी बताने की क्या तुक? सोमनाथ विध्वंस को ही मामूली घटना बताने, उस में महमूद की भूमिका कम करने, यहाँ तक कि उसे अच्छे उद्देश्यों से प्रेरित बताने की गरज से रोमिला ने बेपर-की को भी ऊँचा स्थान दिया है। इस में गल्प-लेखन और इतिहास का भेद मिट गया है। थापर ने महमूद के बारे में अंतर्विरोधी कथाओं को भी समान आदर से रखा है। कौन जाने, भोला हिंदू पाठक किससे कायल हो जाए!

जैसे, यह कि महमूद कोई हिंदू मंदिर तोड़ने थोड़े ही आया था। वह तो किसी पूर्व-इस्लामी अरब देवी की मूर्ति ढूँढ़ता आया था जिसे खुद पैगंबर साहब ने नष्ट करने का हुक्म दिया था। अब कहीं वह सोमनाथ मंदिर में रही हो, तो महमूद क्या करता! एक सच्चे मुसलमान के लिए किसी दूर देश पर हमले का यह कितना बड़ा और उचित कारण था! फिर भी अज्ञानी यूरोपीय और सांप्रदायिक हिंदू इतिहासकार लोग महमूद को दोषी बताते रहे। कैसे अधम लोग हैं।

आगे रोमिला दूसरी कथा सुनाती हैं। महमूद केवल धन लूटने आया था, क्योंकि उसे साम्राज्य-विस्तार करना था। इसके लिए फौज चाहिए थी। फौज के लिए धन चाहिए था। अतः अपने राज्य का विस्तार, न कि किसी मंदिर का ध्वंस उसका उद्देश्य था। फिर भारत की लूट से उसने गजनी में मस्जिद, और हाँ, एक लाइब्रेरी भी बनवाई! क्या अब भी कोई उसे दोषी मानेगा? बल्कि हुआ यह हो सकता है कि महमूद के जरखरीद सिपाहियों में हिंदू भी रहे होंगे। संभवतः सोमनाथ ध्वंस में उन्हीं का मुख्य हाथ हो। यानी, कुछ भी हुआ हो सकता है। इसीलिए, अंततः रोमिला जी का निष्कर्ष है कि अगर महमूद ने सोमनाथ मंदिर तोड़ा भी, तो उसके पास इसके “बहुत बड़े कारण थे”।

तब तो सचमुच महमूद के प्रति यहाँ भारी अन्याय हुआ! रोमिला जी का हिसाब है कि उसके द्वारा भारत पर चढ़ाई के बाद की सदियों में भारत की बड़ी तरक्की हुई। इससे क्या संकेत नहीं मिलता कि महमूद की शरारतों (अगर उसने किया भी) को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता रहा है? नहीं तो, डेढ़ ही सदी बाद लिखे गए चंद बरदाई के ‘पृथ्वीराज रासो’ में सोमनाथ विध्वंस का जिक्र क्यों नहीं मिलता? जैन पुराणों और संस्कृत अभिलेखों में भी इसका मामूली ही जिक्र क्यों है? इसके माने यह कि सोमनाथ विध्वंस कोई उल्लेखनीय घटना नहीं रही होगी। हो सकता है उसका बार-बार ध्वंस होता रहा हो, स्वयं हिंदुओं ने भी उसका कई बार ध्वंस किया हो। वैसे भी, हिंदुओं द्वारा मंदिर तोड़ने की पुरानी परंपरा रही है (इसका प्रमाण मत माँगिए। मार्क्सवादी इतिहासकारों से जानकारी का स्त्रोत पूछना उनकी तौहीन करना है। सीताराम गोयल और अरुण शौरी को रोमिला थापर यह साफ-साफ जता चुकी हैं)। अतः महमूद द्वारा किए गए ध्वंस के विशेष जिक्र की क्या जरूरत है? बल्कि, यह सोचिए कि महमूद के बारे में कटु बोलने से आज मुसलमानों को बुरा लग सकता है।

फिर महमूद एक लड़ाका और सुलतान था। जब लड़ाका और सुलतान था तो जाहिर है, यहाँ-वहाँ चढ़ाई करना, मुल्क पर मुल्क जीतना और मनमानी करना उसका स्वभाविक कर्म था। उस जमाने की नैतिकता न भूलिए! आखिर कोई अपने समय के चलन से बाहर थोड़े होता है! फिर महमूद इस्लाम का पक्का बंदा था। उसे मस्जिद बनवाने के लिए दौलत चाहिए थी। अब यदि गजनी में दौलत नहीं थी, तो कहीं से उसे लाना ही था। वैसे भी, सोमनाथ की दौलत तो उच्च-जातीय हिंदुओं ने दलितों का खून चूसकर ही इकट्ठा किया होगा (इन तथ्यों के लिए भी क्या शोध की जरूरत है?)। तब लूटे माल को फिर किसी ने लूट लिया तो कौन सी बड़ी बात हो गई!

मगर यह सब न तो प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद, न कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, न सरदार पटेल जैसे सांप्रदायिक हिंदुओं ने सोचने का कष्ट किया। और सन् 1947 के बाद सोमनाथ- जीर्णोद्धार का निहायत गलत काम कर डाला। यदि वह न हुआ होता, तो 1991 में लालकृष्ण अडवाणी ने वहाँ से रथयात्रा न की होती। वह रथयात्रा न हुई होती, तो न सेक्यूलरिज्म को अब तक की सबसे बड़ी चोट न पहुँची होती। अब समझे आप? कि महमूद के बारे में बढ़ा-चढ़ा कर लिखने-बोलने के कितने खराब खराब नतीजे हुए!

इस प्रकार रोमिला जी ने सन् 1010 से लेकर 1991 तक इतनी चीजों को जोड़ कर सोमनाथ और महमूद गजनवी पर इतिहास लिखा। जरा सोचिए। मामला ऐतिहासिक तथ्यों का नहीं, सेक्यूलरिज्म के भविष्य का है। तब आप समझ सकेंगे कि ‘अपने देश से कटे हुए’ पश्चिमी भारतविदों और ‘हिंदू सांप्रदायिक’ इतिहासकारों ने महमूद गजनवी के साथ कितनी नाइंसाफी की।

पर मुश्किल यह है कि महमूद के बारे में उसके अपने विद्वान अल बरूनी से लेकर बीसवीं सदी में मुहम्मद हबीब तक अनगिनत इतिहासकारों ने ही ढेर सारी गड़बड़ बातें लिख छोड़ी हैं। जैसे, अल बरूनीः “महमूद ने (भारत की) उन्नति को तहस-नहस कर दिया औ ऐसे लाजबाव कारनामे किए जिससे हिन्दू धूल-कणों की तरह हर दिशा में बिखर गए और उनकी कहानियाँ ही बच गई। तब से इन बिखरे लोगों में सभी मुसलमानों के प्रति तीव्र घृणा भर गई”। अल बरूनी को पता न था कि ऐसा लिखने से हजार साल बाद भाजपा को लाभ हो सकता है।

मगर हबीब साहब का क्या करें! इन्होंने बीसवीं सदी में लिख दियाः “न कोई ईमानदार इतिहासकार, न कोई मुसलमान जो अपने मजहब से वाकिफ है, मंदिरों का वह मनमाना विध्वंस छिपाने की कोशिश करेगा जो गजनवी की फौजों ने किया था… लोगों को जो सबसे प्रिय हो उसे लूटकर मित्रवत नहीं बनाया जा सकता, न ही लोग ऐसे मजहब को पसंद करेंगे जो लुटेरी फौजों के रूप में आए और खेतों को बर्बाद व शहरों को तबाह करके छोड़ दे… महमूद की नीति ने (हिंदुओं द्वारा) इस्लाम को जाने बिना ही खारिज कर देना पक्का कर दिया।” क्या बुजुर्गवार को सब कुछ लिखना जरूरी था? जरा तो होशियारी बरतनी थी। अफसोस, उनके निकट कोई रोमिला थापर जैसा दूरंदेश मौजूद न था।

यह दूरंदेशी वाले लेखन को ही कर्ण सिंह भारत को नष्ट करना कह रहे थे। उन्हें किसी की मुहब्बत की इज्जत करनी चाहिए थी। भारत-वारत क्या चीज है! खैर, कर्ण सिंह तो फिर भी काव्य-संस्कृति प्रेमी थे, इसलिए उन्होंने अच्छे शब्दों का उपयोग किया था। बाद में, सर वी. एस. नायपॉल ने इस्लामी समाजों और इतिहास का विशेष अध्ययन किया। नायपाल बड़े रुखे आदमी निकले। उन्होंने ब्रिटिश भारतीय लेखक फारुख ढोंढी को एक इंटरव्यू में सीधे कह दिया कि रोमिला थापर जैसे इतिहासकार भारत में मुस्लिम आक्रमणकारियों के कारनामों पर “राजनीतिक उद्देश्यों से झूठ लिखते रहे हैं।” (द एसियन एज, 9 अगस्त 2001)।

अब क्या कहें? हर जानकार यही कहता है कि ऐसे इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास के अध्ययन, अध्यापन को पूरी तरह चौपट करके रख दिया। मगर इतिहास के छात्रों और युवा प्राध्यापकों को यह सब नहीं बोलना चाहिए। अपना कैरियर बनाना है या नहीं?

लेखक : डॉ शंकर शरण

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